जम्मू कश्मीर पर वार्ताकारों की रिपोर्ट – एक अलगाववादी दस्तावेज

Friday, July 13th, 2012

 

१३ अक्तूबर, २०१० को भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने जम्मू कश्मीर की समस्या का अध्ययन कर उसका समाधान खोजने के लिए एक तीन सदस्यीय दल का गठन किया गया | इस दल में जिस प्रकार से गैरराजनीतिक लोगो को ही रखा गया , उससे देशवासियों को आशा थी कि शायद इस बार कुछ ईमानदार प्रयास होगा | इस दल में एक प्रसिद्द पत्रकार दिलीप पाडगावकर के अतिरिक्त एक शिक्षाविद राधा कुमार और एक पूर्व उच्च सरकारी अधिकारी एम्. एम्. अंसारी थे | थोड़े ही दिन में इन लोगों की असलियत देश के सामने आ गई | राधा कुमार और दिलीप पाडगावकर के साथ आई.एस. आई.के कुख्यात एजेंट गुलाम नवी फाई के संबंधो का खुलासा होते ही इन लोगों की नीयत के बारे में किसी को कोई भी संदेह नहीं रह गया था | ये लोग अपने विचारों के कारण ही फाई के द्वारा चुने गए थे और उनके निमंत्रण पर अमेरिका में जाकर वे भारत विरोधी विचारों को ही प्रतिपादित करते थे | इसके लिए आई.एस.आई. के द्वारा इन लोगो को पर्याप्त सुविधाए भी मिलती थी | इनके द्वारा १२ अक्तूबर ,२०११ को सौंपी गई रिपोर्ट को पढ़कर कोई आश्चर्य नहीं होता क्योंकि इन्होंने अपनी रिपोर्ट में केवल वे ही विचार रखे है जिनको भारत के अलगाववादी , आई.एस.आई. और अमेरिका की भारत विरोधी लाबी कई वर्षों से सार्वजनिक करते रहे हैं | इनके अनुसार ये २२ जिलो के ७०० से अधिक प्रतिनिधि मंडलों से मिले है और तीन गोलमेज सम्मेलनों में लोगो से वार्ता करके ही इस रिपोर्ट को तैयार कर पाए है | इस काम में देश की जनता की खून पसीने की कमाई को पानी की तरह बहाया गया है | इन सब लोगो से मिलकर इस टीम ने इन लोगो ,कश्मीर सरकार और केंद्र सरकार का समय ही बर्बाद किया है क्योंकि इस रिपोर्ट की पटकथा तो इनके दिमाग में पहले से ही थी |यह रिपोर्ट कश्मीर घाटी में अलगाववाद और उग्रवाद को स्थिति को और भी बदतर कर देगी | ऐसे समय में , जबकि कश्मीर घाटी के लोग यह अनुभव करने लगे है कि उग्रवादियों ने उनके जीवन को नरक बना दिया है और वे अब शांतिपूर्ण जीवन जीने का मन बना चुके है तब यह रिपोर्ट उग्रवादियों के विध्वंसक दुष्प्रचार को बढाने में सहायक सिद्ध होगी |

अपने व्यक्तिगत एजेंडे के प्रचार प्रसार के लिए इन्होंने सबसे पहले अलगाववादियों और उग्रवादियों को मिलने के लिए बुलाया | अपने इस प्रयास को इन्होने मीडिया के माध्यम से बहुत महिमा मंडित भी किया |परन्तु इन लोगों ने इनके निमत्रण को ठुकरा दिया |इसके बाद इन वार्ताकारो ने उनके दरवाजे पर जाकर उनका मान- मनव्वल किया | उनके इन्ही विचारों को इस दल ने अपनी रिपोर्ट में रखा जिनको वे पहले से ही सार्वजनिक करते रहे हैं | कश्मीर घाटी की देशभक्त जनता तथा जम्मू और लद्दाख की देश के प्रति समर्पित जनता के विचारों और कष्टों को इस रिपोर्ट में कोई स्थान नहीं दिया गया है | ऐसा लगता है कि यह रिपोर्ट अलगावाद का एक विध्वंसक दस्तावेज है जिसको यदि स्वीकार कर लिया गया तो जम्मू कश्मीर के लोगो की दुर्दशा बढ़ेगी और वे अधिक अनिश्चितता में चले जायेंगे |

भारतीय संविधान , संसद और भारत की जनता की भावनाओं का खुला अपमान

इस दल की सिफारिश है कि धारा ३७० के शीर्षक को” अस्थाई ” के स्थान पर” विशेष ” में परिवर्तित कर दिया जाए | इनकी यह सिफारिश संविधान निर्माताओं की भावनाओं का खुला अपमान है जो यह मानते थे कि यह धारा धीरे-धीरे अपने-आप समाप्त हो जायेगी | इस विचार की पुष्टि १९६० के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री प. जवाहरलाल नेहरू ने की थी उन्होंने संसद में कहा था कि” यह धारा घिसते-घिसते घिस जायेगी |” संभवतः इस धारा के जनक रहे नेहरू जी भी इसके अलगाववादी चरित्र को समझते थे | यह धारा जम्मू कश्मीर को जोड़ने की नहीं उसको अलग रखने की धारा है | अब घाटी के लोग भी समझने लगे है कि इस धारा के कारण ही इस क्षेत्र का विकास नहीं हो पा रहा है और अलगाववादियों को खुलकर खेलने का मौक़ा मिल रहा है | देश के साथ छलावा करने का इस दल का मंतव्य इस बात से ही स्पष्ट हो जाता है कि वे धारा ३७० को कुछ राज्यों में लागू की गई धारा ३७१ के समकक्ष रख रहे है | यह षडयंत्र पहली बार नहीं किया जा रहा है | इससे पहले भी अलगाववादियों को बौद्धिक आधार प्रदान करने वाले कई बुद्धिजीवी इस कुतर्क का प्रयोग देश को भ्रमित करने के लिए करते रहे है | धारा ३७१ , ३७० की तरह अलगावादी चरित्र की नहीं है | यह कुछ राज्यों को वहा की स्थानीय परिस्थितियों के कारण कुछ विशेष प्रावधान का निर्माण करती है |जैसे गोवा के संबंध में लिखा गया है कि ,”इस संविधान में उल्लेखित विचारों के होते हुए भी गोवा की विधानसभा में ३० से कम सदस्य नहीं होगे |” अन्य राज्यों में भी लागू की गई धारा ३७१ का अध्ययन करने पर ध्यान में आयेगा कि वे भी किसी भी दृष्टि से धारा ३७० के समकक्ष नहीं रखी जा सकती |

१९९४ में भारत की संसद का सर्वसम्मत रूप से पारित प्रस्ताव था कि सम्पूर्ण जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और गुलाम कश्मीर को भारत में वापस लाना चाहिए | इस प्रस्ताव को जम्मू कश्मीर के सभी सांसदों का भी समर्थन था | परन्तु इन वार्ताकारो ने इस सर्वसम्मत प्रस्ताव की भावनाओं के विपरीत सिफारिशे की है | उन्होंने गुलाम कश्मीर के लिए” पाक शासित कश्मीर ” ( ) शब्द का प्रयोग कर पाकिस्तान के कब्जे को वैधानिक जामा पहनाने का महापाप किया है| केवळ अलगाववादी ,पाकिस्तान व अमेरिका में भारत विरोधी लांबी ही इस शब्द का प्रयोग करते है | ऐसा लगता है कि इन लोगो के लिये संसद या देश की भावनाओ का कोई स्थान नही है| इसके विपरीत इन वार्ताकारो ने पाकिस्तान द्वारा हथिया लिय गए कश्मीर के भाग की वर्त्तमान परिस्थितियों का भी इस रिपोर्ट में कोई उल्लेख नहीं है | गुलाम कश्मीर के लोगो को अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रयोग का वैसा मौक़ा कभी नहीं मिला जैसा कि भारत के लोगो को मिलता है | इनकी कश्मीर के संबंध में यह अनुशंसा कि इसे दक्षिण और मध्य एशिया के बीच एक सेतु के रूप में स्थापित करना यह दिखाता है कि जम्मू कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं अपितु एक स्वतंत्र सता है | क्या यह भारत की प्रभुसता पर भारत के ही नागरिको का हमला नहीं है ?

इन वार्ताकारो ने १९५२ के बाद लागू किये गए सभी कानूनों की समीक्षा के लिए एक सम्विधान समिति बनाने की अनुशंसा की है | इसका सीधा सा अर्थ होगा कि वहा अब सर्वोच्च न्यायालय , चुनाव आयोग आदि सम्वैधानिक संस्थाओं का कोई नियंत्रण नहीं रहेगा | १९७५ में इंदिरा शेख समझौते के बाद ये सभी बाते निरर्थक हो गई थी | केवल अलगाववादी ही इस तरह की मागे किया करते थे जिनका कोई समर्थन वहा का समाज नहीं करता था | अब इन वार्ताकारो ने अलगाववादियों को नया बल प्रदान कर दिया है | यदि इनको घडी की सुइया वापस मोड़नी हैं तो ये १९४७ तक क्यों नहीं पहुंचते? यदि १९४७ की स्थिति आ जाती है तो ये सब बाते ही निरर्थक हो जायेगी |

अभी तक यह तथ्य स्थापित हो चुका था कि जम्मू कश्मीर का मामला भारत का आतंरिक मामला है | इसमे पाकिस्तान या संयुक्त राष्ट्र संघ को दखल देने का कोई अधिकार नहीं है | शिमला समझौते के द्वारा पकिस्तान भी इस तथ्य को स्वीकार कर चुका था | केवल पाकिस्तान परस्त कुछ अलगाववादी ही इस मांग को उठाते थे | इन वार्ताकारो की यह अनुशंसा कि हितग्राहियों के सहमत होने पर पाकिस्तान को भी वार्ता में शामिल करना चाहिए ,न केवल भारत के अभी तक के रुख के विपरीत है अपितु यह खुल्लमखुल्ला देशद्रोह है | इसके कारण पाकिस्तान को भारत के विरोध में एक और हथियार इन लोगो ने थमा दिया है | इसके अलावा भारतीय प्रशासनिक सेवाओं के अधिकारियों की संख्या को कम करना ,भारतीय सेनाओं की घटोतरी करना ,वहा की परिस्थितियों को देखते हुए उनको मिले विशेषाधिकारो की कटौती ,सुरक्षा और विशेष आर्थिक परिस्थितियों को छोड़कर संसद द्वारा वहा के लिए कोई कानून न बनाने की अनुशंसाए केवल जम्मू कश्मीर को अलगाव की ओर धकेलने जैसा ही है | इन सब बातों को यदि स्वीकार कर लिया गया तो हिंसा का पुराना दौर फिर प्रारम्भ हो जाएगा |

केंद्र सरकार का नियत्रण पूर्ण रूप से समाप्त करने के लिए इन वार्ताकारो ने यह अनुशंसा भी की है कि वहा के राज्यपाल की नियुक्ति के लिए राज्यसरकार द्वारा भेजे गए तीन नामो में से ही राज्यपाल की नियुक्ति की जायेगी | इसका सीधा सा अर्थ है कि अगर पूर्व की तरह कोई मुख्यमंत्री पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत के विरोध में कोई षडयंत्र करता है तो केंद्र सरकार चुपचाप देखने के सिवाय कुछ नहीं कर पाएगी | वह वहा पर हस्तक्षेप कर इस राज्य को बचाने के लिए कुछ नहीं कर पाएगी | अब देश की अखंडता की रक्षा करना केवल नारों में ही रह जाएगा | राज्यपाल और मुख्यमंत्री के लिए उर्दू के प्रचलित समानार्थी शब्दों के प्रयोग की अनुशंसा भी देश के हित में नहीं है | प्रचलित शब्दों के प्रयोग का अर्थ होगा ,”वजीरे आजम” और” सदरे रियासत ” शब्दों का प्रयोग, जो इस राज्य को केवल अलगाव की ओर ही ले जायेंगे |

इन वार्ताकारो की एक ऐसी अनुशंसा है जिसके बारे में कोई भी विचारशील देशभक्त सोच भी नहीं सकता | इन्होने कहा है कि अचिन्हित कब्रों की पहचान के लिए न्यायिक आयोग की स्थापना की जाए | अभी तक अलगाववादी यह आरोप लगाते रहे है कि भारतीय सेनाओं ने कश्मीर के युवको का नरसंहार किया है और उनके शवो को लावारिस की तरह दफना दिया है | इस तर्क के आधार पर वे एक तीर से दो निशाने लगाते रहे है | जो युवक शस्त्रों के प्रशिक्षण के लिए पाकिस्तान गए है या जो आतंकी गतिविधियों के कारण भूमिगत हो गए है ,उनके गायब होने का पाप वे सेना के ऊपर मढ़ना चाहते है और इस आधार पर ही वे सेना को बदनाम कर उनको वापस भेजने की मांग को बल प्रदान करना चाहते है | यह मांग हुर्रियत के द्वारा बार-बार की जाती रही है | क्या वे हुर्रियत का समर्थन करने में इस सीमा तक जा सकते है कि देश का हित उनके लिए बेमानी हो जाए ?

क्या जम्मू कश्मीर में देशभक्त होना पाप है ?

वार्ताकारो ने अपनी रिपोर्ट में हितग्राही जैसे शब्द का प्रयोग बहुत ही शरारतपूर्ण ढंग से किया है |इस शब्द को परिभाषित करते समय वे लिखते है कि जिन्होंने सब कुछ दांव पर लगा दिया है | किसके लिए दांव पर लगाया , यह उन्होंने स्पष्ट नहीं किया | परन्तु थोडा आगे बढते ही ध्यान में आता है कि इस शब्द काप्रयोग करते समय उनके दिमाग में केवल उग्रवादी और अलगाववादी ही है |इसलिए वे उनकी ही भावनाओं को महत्त्व दे रहे है | जिन्होंने देश के लिए सब कुछ दाव पर लगाया वे उनके लिए हितग्राही नहीं है | क्या जम्मू और लद्दाख की देशभक्त जनता जिन्होंने देश की रक्षा के लिए बार-बार अपना सब कुछ दाव पर लगाया ,वे हितग्राही नहीं है ? क्या पाकिस्तान से आये ४ लाख शरणार्थी और गुलाम कश्मीर से आये १० लाख विस्थापित हितग्राही नहीं है जिन्होंने भारत के प्रति अपने प्रेम के कारण अपनी जन्मभूमि को छोड़ दिया ?क्या वे लाखो कश्मीरी पंडित हितग्राही नहीं है जिन्होंने अपने धर्म की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व छोड़ दिया और दर-दर की ठोकरे खाना स्वीकार किया ?क्या कश्मीर के वे लाखो मुसलमान हितग्राही नहीं है जो आज भी वहा पर आतंकियों के षडयन्त्रो को विफल करने के लिए निरंतर संघर्ष कर रहे है ? इनके विपरीत अलगाववादियों ने अपने भारत विरोधी षडयन्त्रो के कारण अकूत संपत्ति एकत्रित कर ली है | इस रिपोर्ट में इन वास्तविक देशप्रेमियो की भावनाओं और कष्टों को स्थान न मिलना इस बात का द्योतक है कि केवल अलगाववादियों की भावनाओं को ही उजागर करना इन वार्ताकारो का मुख्य लक्ष्य है | इनके लिए देशभक्ति एक अपराध है और इसकी सजा देशभक्तो को मिलनी ही चाहिए |

इन वार्ताकारो ने पाकिस्तान में प्रशिक्षण प्राप्त करने वालो के पुनर्वास की जितनी चिंता जताई है ,उसका दशांश भी कश्मीरी पंडितो के लिए समर्पित नहीं किया | उनकी दुर्दशा का वर्णन करने के लिए इन लोगो को शब्द नहीं मिले | इसी प्रकार जम्मू व लद्दाख की जनता के साथ किये जा रहे भेदभाव पर इन लोगो की चुप्पी एक अपराधिक षडयंत्र के सिवाय कुछ नहीं है | राज्य वित्त निगम द्वारा राज्य के संसाधनों का जम्मू व लद्दाख के साथ उचित बटवारे की बात कही गई है | इस विषय पर भी इनको साँप सूंघ जाता है | विधानसभा क्षेत्रो के पुनर्गठन की मांग इन क्षेत्रो की जनता के द्वारा एक अर्से से उठाई जा रही है | इस माग पर वार्ताकारो की चुप्पी को किसी भी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता |

यद्यपि केंद्र सरकार ने रिपोर्ट को घोषित रूप में स्वीकार नहीं किया है परन्तु इन्होने इसको अपनी वेबसाईट पर डालकर इसको महिमामंडित अवश्य किया है | सरकार यह भली भाति जानती है कि भारत की देशभक्त जनता इस देशद्रोही दस्तावेज को कभी स्वीकार नहीं करेगी | वह केवल मुस्लिम वोट बैंक के सौदागरों को खुश करना चाहती है | ये ठेकेदार समझते है कि अलगावादियों की भावना ही कश्मीरियों की भावना है और वही देश के मुस्लिम समाज की है | सरकार द्वारा इन वार्ताकारो के माध्यम से जनभावना और देशहित के साथ खिलवाड़ करना एक जघन्य अपराध है | यह रिपोर्ट अलगाववाद के ऐसे बीज का रोपण करेगी जो जम्मू कश्मीर के बाद देश के अन्य राज्यों में भी इस आग को भड़का सकता है | इसलिए हर देशभक्त नागरिक का कर्तव्य है कि वे इस रिपोर्ट का सशक्त विरोध कर केंद्र सरकार को इस बात के लिए बाध्य कर दे कि वह इसको रद्द कर दे और भविष्य में फिर कभी देशहित के साथ खिलवाड़ न कर सके |

1 Response to जम्मू कश्मीर पर वार्ताकारों की रिपोर्ट – एक अलगाववादी दस्तावेज

  1. Kumar

    नारी जाती पे पग पग पर अत्याचार, कौन जिमेवार?

    इतनी तरकी होने के बावजूद भी एसा देखा जाता है की अभी भी नारी जाती पर अत्याचार व् अव्यह्वारिक जारी है. कौन है जिमेवार, वधु-पक्ष या वर-पक्ष? बच्चा पैदा करने के लिए लड़के की चाह व् कोशिश व् पैदा होने के बाद लड़के से ख़ुशी मानना व् मनाना पर लड़की पर कुछ न करना या अफ़सोस करना, लड़के होने पर पार्टी, फिर जवान होने तक पल पल टोकना व् निरुतसाहित करना, जवान होने से बहुत टोकना, बाहर न भेजना आदि, शादी के लिए दबाना व् लड़के वालो के सामने गिरना व् लड़की को गिरने की शिक्षा देना, इतने भारी वस्त्रो, गहनों व् जिमेदारी से लाद देना, गिरे हुए इन्सान की तरह इतना आवभगत, खर्चा आदि करना लड़की को कोई वस्तु रूपी चीज की तरह दान देना फिर हमेशा के लिए अपने घर से विदा कर देना. लड़की को लड़के के बराबर न तो समझाना न ही उसे बाप दादों की ज्यदाद में बराबर का हिस्सा देना. कियो क्या वो लड़की को निम्न जाती की समझता है, किया लड़की का खून लड़के की भाती उसका नहीं होता? क्यों भाई लोग लडकियों का न्याय संगत हक़ मारते है? एसा सोचा जाता है की धन घरवालो की मिली जुली किस्मत से आता है तो फिर किया पता वो लड़की की किस्मत से आया हो?? इतना लडको को को देने के बावजूद यदि वो कुछ लड़की के लिए करते है वो एक एहसान रूपी देखा जाता है जबकि वो लड़की के हक़ में से जाता है. पहले लड़की को पराया समझा व् कहा जाता था जिससे शायद उसकी किस्मत होने वाले वर के घर me चली जाती हो पर अब वे लड़की-लड़के में भेदभाव न दिखाकर भी भेदभाव किया जाता है. एसा दोगलापन व्यहवार कियो वो भी दादा-दादी, माँ-बाप, व् भाइयो की तरफ से? किया ये नहीं दर्शाता की कन्या पक्ष ही नारी जाती के ऊपर अत्याचार व् निमन्ता समझे जाने के लिए मूल रूप से जिमेवार है? यदि लड़की को अपने माँ बाप के घर से ही हक़ व् न्याय नहीं मिला तो वो अपनी ससूराल से कैसे उम्मीद कर सकेगी व् पायगी? ये बहुत बड़ा प्रशन है व् सामाजिक कुरूति है, किया एसा नही??? सम भाव से चलना अति उतम होता है.

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