वीर सैनिको के बलिदान पर ७ दिन तक मौन रहने वाले देश के अपमान का बदला नही ले सकते

Wednesday, January 16th, 2013

आखिरकार “मौनी बाबा” का मौन टूट ही गया । पाकिस्तानी सेना के द्वारा भारत के दो सैनिको की क्रूर हत्या के बाद उनके शवो के साथ की गई दरिन्दगी केवल उन हुतात्माओ का ही नही अपितु सम्पूर्ण देश का अपमान था । इस बर्बर व्यवहार ने सबकी अन्तरआत्मा को झझकोर दिया। पूरे देश ने इस अपमान पर जबर्दस्त आक्रोश प्रकट किया । विश्व के कई नेताओ ने भी इस अमानवीय व्यवहार की भर्त्सना की । भारत मे भी यहा के वायू सेनाध्यक्ष, थल सेनाध्यक्ष एवम सभी नेताओ ने पकिस्तान के इस बर्बर व्यवहार पर उसको ललकारा और इसका बदला लेने का सन्कल्प भी लिया। अगर इस राष्ट्रीय अपमान पर कोई चुप था तो वह था भारत का प्रधानमन्त्री जिसका प्राथमिक दायित्व देश और देशवासियो की सुरक्षा एवम संरक्षण का ही है । एक हुतात्मा का परिवार ७ दिन से अनशन पर है । उनकी मांग केवल यही है उनके लाडले का सिर पाकिस्तान से वापस लाया जाये । उस शहीद की भूखी प्यासी पत्नी की हालत बिगड रही है । परन्तु राजनीतिक लाभ के लिये एक गरीब महिला के घर पर खाना खाने का नाटक करने वाले युवराज के पास समय नही है कि वह इस महिला के आंसू पूछ सके जिसके पति ने देश की रक्षा के लिये अपना बलिदान दिया है । भारत की “सबसे शक्तिशाली महिला ” भी इस विषय पर अपनी शक्ति  व दायित्व का विस्मरण कर देती है ।

इनका यह शर्मनाक मौन केवल इस अवसर ही नही, हर राष्ट्रीय अपमान और शर्म के अवसर पर दिखाई देता है । “दामिनी” के साथ किया वीभत्स बलात्कार भी एक राष्ट्रीय शर्म था। परन्तु उस समय भी इनका मौन तभी टूटा जब पूरा देश गुस्से मे उबल उठा था। क्या देश पर राज करने वाली इस तिकडी ने यह ठान रखा है कि वे ऐसे संवेदनशील मुद्दो पर मौन ही रहेंगे?  क्या वे सभी मुद्दे जिनके साथ देश का स्वाभिमान जुडा है , इनके लिये बेमानी बन गये हैं? अब देश की जनता यह विश्वास करने के लिये मजबूर हो गई है कि इन लोगो का उद्देश्य केवल अपनी गद्दी बचाना ही है । वे अपनी गद्दी बचाने के लिये कुछ भी कर सकते है, यहा तक कि अगर देश को साम्प्रदायिक या जातीय आधार पर बांटना भी पडे तो ये बांट सकते है। परन्तु देश के वे संवेदनशील मुद्दे जो वोट बैंक से नही जुडे इनके लिये महत्वहीन हैं। ऐसे लोगो के हाथ मे न तो देश का भविष्य सुरक्षित है और न ही देश की जनता व सेना का सम्मान ।

अब देश की जनता को गम्भीरता से विचार करना होगा कि इस प्रकार के संवेदनशून्य और गैरजिम्मेदार लोगों को किस प्रकार सबक सिखाया जाये!

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