बाघाजतिन- भारत माँ का एक महान सपूत

Tuesday, September 8th, 2015

 

वर्ष २०१५ भारत के इतिहास में एक अनोखा वर्ष है | इस वर्ष ८७ क्रांतिकारियों के बलिदान को १०० वर्ष पूरे हो रहे हैं| इन सबका अपना महत्त्व है , लेकिन जतिंद्र नाथ मुखर्जी (बाघाजतिन ) इस सूचीमें विशिष्ट स्थान रखते हैं| ९ सितम्बर को उनके बलिदान को १०० वर्ष पूरे हो रहे हैं | वे भारत के ऐसे एकमात्र क्रांतिकारी थे जिनकी प्रशंसा न केवल महात्मा गाँधी अपितु अंग्रेजो ने भी की थी | महात्मा गाँधी ने उन्हें दैवीय व्यक्तित्व कहा था | लार्ड मिन्टो ने बाघा जतिन से इतने भयभीत थे कि अपने मन की  दहशत को व्यक्त करते हुए उनके मुंह से निकल गया था कि भारत में एक ऐसी आत्मा आ गयी है जो न केवल ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ सकती है अपितु उनके मुखिया को भी समाप्त कर सकती है | एक पुलिस अधिकारी , तेगार्ट , ने उनकी वीरता का वर्णन करते हुए कहा था कि यदि यह अंग्रेज होता तो उसकी मूर्ति नेल्सन के साथ लगती | यह स्मरण रखना चाहिये कि नेल्सन वह सेनापति था जिसके कारण ब्रिटेन प्रथम विश्वयुद्ध जीता था |
जतिन्द्रनाथ मुखर्जी का जन्म ७ दिस.,१८७९ को बंगाल के नदिया जिला ( वर्तमान बंगलादेश) के एक गाँव में हुआ था | ये बाल्यकाल से ही बहुत निर्भीक , चिन्तनशील व् बलशाली थे | स्वामी विवेकानन्द जी से हुई भेंट ने उनके जीवन को एक विशिष्ट अर्थ दे दिया | उन्होंने इनको एक सामाजिक  दृष्टी तो दी ही, एक दिशा भी प्रदान की | स्वामी विवेकानंद का यह आह्वान कि उनको लोहे की मांसपेशियों और इस्पात की धमनी वाले युवकों की आवश्यकता है , उनके मन में घर कर गया | उन्होंने अपना शरीर उसी आह्वान के अनुरूप बनाया था | उनके गाँव में एक बार बाघ का आतंक छाया था | उससे मुक्ति पाने का कोई उपाय कम नहीं कर रहा था | एक दिन जतिन्द्रनाथ से उसका आमना –सामना हो गया | उनमे संघर्ष हुआ और जतिन्द्रनाथ ने उसको निहत्थे ही समाप्त कर दिया | इस संघर्ष में वे काफी घायल हो गए थे | उनकी वीरता को देखते हुए ही उनका इलाज करने वाले डा ने उनको “बाघा “ की उपाधि दी | तबसे ही वे “बाघाजतिन” के रूप में पहचाने जाने लगे |
बाघाजतिन बचपन से ही देश को आजाद कराने का स्वप्न देखते थे | दासता की जिंदगी का एक भी पल उनको स्वीकार नहीं था | वे अनुशीलन समिति के संस्थापक सदस्यों में से एक थे | अनुशीलन समिति के विस्तार का श्रेय जतिन को ही जाता है |उन्होंने महर्षि अरविन्द घोष के साथ भी बहुत काम किया | उनके साथ बिताये पलों ने उनकी जिंदगी को काफी संवारा | वे कई अभियानों में शामिल थे | लेकिन यह उनकी कुशलता ही थी कि जल्दी पकड़ में नहीं आते थे | हाबड़ा – शिबपुर केस में वे पकडे गए थे | लेकिन यह उनकी संगठन कुशलता ही थी अंग्रेज इस केस में भी उनको नहीं फंसा सके | इन्होंने इसके बाद जर्मनी के साथ मिलकर भी एक सैन्य अभियान के माध्यम से भारत को मुक्त कराने की योजना भी बनाई थी | उनके अधिकारियों के साथ निर्धारित मुलाकात नहीं हो सकी , वरना शायद भारत को आजादी के लिये १९४७ तक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती |
जतिन ने एक स्वयंसेवी संगठन भी बनाया था जिसके सदस्य पूर्ण रूप से अनुशासित थे | देश में कहीं भी बाढ़ , सूखा या महामारी होती थी , इनका संगठन वहां सबसे पहले पहुच कर सेवाकार्यों में संलग्न हो जाता था | यह कार्य समाज के प्रति उनके समर्पण को बताता था | उन्होंने कुम्भ के मेले में भी अपनी सेवाएँ प्रदान की थी | लेकिन ये सेवा के इन अवसरों का उपयोग युवकों को क्रांतिकारी संगठन में जोड़ने के लिए भी करते थे |
उनकी निर्भीकता के कई किस्से पढ़ने में आते हैं| उन्होंने एक बार देखा कि एक  गाड़ी की छत पर कुछ गोर सिपाही बैठे थे | उनकी टाँगें खिड़कियो पर आ रही थीं और उनके जूतेखिड़की के पास बैठी भारतीय महिलओं के चेहरे पर आ रहे थे | बाघा जतिन के मना करने पर भी जब वे नहीं माने तो अकेले जतिन ने उनकी पिटाई करके गाड़ी से नीचे गिरा दिया था |  १९१५ में उनको अंग्रेजो ने एक जंगल में घेर लिया | जतिन ने भरपूर संघर्ष किया | लेकिन वे इस संघर्ष में बहुत घायल हो गए और इन्हीं घावों के कारण १० दिस, १९१५ को उन्होंने यह शरीर छोड़ दिया |
बाघा जतिन केवल एक क्रांतिकारी नहीं थे , उनके चिंतन और कार्यकुशलता को देखते हुए उन्हें एक दार्शनिक क्रांतिकारी कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी | वे एक शोला थे जो अपनी लपटों से भारत माँ की गुलामी की जंजीरों का जला डालना चाहते थे | ऐसे महान की जीवनी को सम्पूर्ण भारत में पढ़ाना चाहिए | उनका जीवन आज की युवा पीढ़ी के लिए एक प्रेरणा बन सकता है | एक कृतज्ञ राष्ट्र का बाघा जतिन को कोटि-कोटि प्रणाम |

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