समरसता के पुरोधा – डा. भीमराव अम्बेडकर

Tuesday, December 6th, 2016

६ दिसम्बर भारत के आज के युग की स्मृति के निर्माता और समरसता के महामंत्र के सृजक डा.भीमराव अबेडकर की पुन्य तिथी है | आज उनको स्मरण कर उनको भावांजलि देना हर कृतज्ञ हिन्दू का पावन कर्तव्य है | छुआछुत भारत का मूल स्वभाव नहीं है | भारत वेदों की धरती है | ऋग्वेद की ऋचाओं के संदेश हमें स्मरण रखने चाहियें | ऋग्वेद में स्पष्ट रूप से लिखा है ,” ओम सहना ववतु , सहनौ भुनक्तु ….”, ” ॐ संगच्छध्वं , संवद्धध्वं …..” इनके अर्थ यही है कि हम साथ रहे , साथ भोजन करें  , साथ-साथ काम करें …|  सब साथ रहेगे तो ही विकास होगा | समरसता हिन्दू समाज का मूल चरित्र है | स्वयं डा. आंबेडकर ने लिखा है ,” वेदों में छुआछुत का वर्णन नहीं है | चार सौ इसवी तक भारत में अस्पृश्यता नहीं थी |” यह सहज ही समझ में आता है कि “आत्मवत सर्वभूतेषु….” का जाप करने वाला हिन्दू अपने सहोदर , सहधर्मी को कैसे अस्पृश्य मान सकता है | ७१२ ई. से पूर्व भारत में कहीं भी अस्पृश्यता नहीं थी | इसको समझाने के लिए हमें थोडा इतिहास देखना पड़ेगा |

१. सामाजिक सुधार आन्दोलन : भारत में समय समय पर सुधार आन्दोलन होते रहे हैं| यह हिन्दू समाज की विशेषता रही है कि उसने किन्हीं भी कारणों से आने वाली कमियों को कभी स्वीकार नहीं किया | हमारे महापुरुषों को जब भी कोई कमी दिखाई दी , उन्होंने एक सशक्त जनजागरण के द्वारा उन कमियों को दूर किया है और हिन्दू समाज ने सहज रूप से उस परिवर्तन को स्वीकार भी किया है |हमें इन सुधार  आन्दोलनों को दो भागो में बाँट कर देखना होगा , ७१२  से पूर्व और उसके पश्चात् | ७१२  से पूर्व के दो प्रमुख सशक्त आन्दोलन थे , बौद्ध धर्म और जैन धर्म | हिंसा , कर्मकांड , धर्म के नाम पर पाखण्ड इनके प्रमुख विषय रहे | परन्तु इन्होने कभी अस्पृश्यता का वर्णन नहीं किया | भगवान बुद्ध और भगवान महावीर की करुणामयी दृष्टि से ये अपराध छिप नहीं सकते थे | इसका अर्थ है कि उस समय तक यह कुरीति नहीं थी| हाँ , उसके बाद के सभी समाज सुधार आन्दोलनों का यह मुख्य विषय रहा है |
२ : हिन्दू समाज की आत्मसात करने की मूल प्रवृत्ति : शक , हुण, कुषाण , यवन जो भी आये हमने उनको आत्मसात किया है | उनके साथ कोई भेद भाव नहीं रखा | मुसलमान और इसाई अपवाद रहे | हिन्दू का स्वभाव समरसता है , भेदभाव नहीं |
३: पर्वस्नान की परंपरा : कुम्भ , अर्धकुम्भ , गंगा सागर आदि किसी भी स्थान पर अछ्तों के लिए अलग घाट नहीं मिलेगे | हाँ , महिलाओं के अवश्य अलग होगे |
४: तीर्थस्थानों की परम्परा: चार धाम , १२ ज्योतिर्लिंग , ५२ शक्तिपीठ आदि कहीं भी स्पृश्य – अस्पृश्य का विचार नहीं किया जाता है |
५: संत परंपरा : ” जाति न पूछो साधू की ” हिन्दुओ में किसी भी जाति वर्ण के व्यक्ति को संत बनने से नहीं रोका गया | इनके भक्त बनने में भी कोई रोक नहीं रही है | क्षत्रिय कुल में उत्पन्न मीरा बाई रविदास की शिष्या रही |
सबको आत्मसात करने वाले हिन्दू समाज में ७१२ ई. के बाद क्यों यह कुरीति आ गयी , आज किसी को या बताने की जरुरत नहीं है | मुस्लिम काल में आयी अस्पृश्यता को अंग्रेजों ने बांटो और राज करो की नीति के अनुसार और मजबूत किया | स्वतंत्रता के बाद भी जाति के आधार पर राजनीति करने वाले अधिकांश राजनेताओ ने इसको रोकने की जगह इस खाई को और चौड़ा करने का महापाप किया है | परन्तु डा. अबेडकर ने अस्पृश्यता के इस जहर को न केवल सहा अपितु इसको हिन्दू समाज के शरीर से बाहर निकालने का मार्ग भी दिखाया | वे केवल दलितों के देवता नहीं थे , वे एक युग दृष्टा व् कुशल संगठक भी थे | वे नीलकंठ की तरह विष को कंठ में रखते थे , परन्तु समाज को उससे पीड़ित नहीं होने देते थे | उनका सारा जीवन अपमानों और कष्टों से भरा था | जब स्कुल में प्रवेश के लिए गए तो उनको अलग टाट लाने के लिए कहा गया | उनको पानी ऊपर से डालकर पिलाया जाता था | नाई ने बाल कटाने से इंकार किया तो अपनी बहन से बेतरतीब बाल कटवाए | कक्षा में जब एक प्रश्न का उत्तर छात्रों से पूछा गया तो केवल भीम ही उसका उत्तर जानता था | अध्यापक ने उसका उत्तर बोर्ड पर लिखने के लिए कहा | जब बालक भीम आगे बढ़ा तो कक्षा के बच्चों ने चिल्लाकर भीम को रोका क्योकि वहां पर रखे उनके खाने पर उसकी परछाई पड़ जाती| सर्वोच्च शिक्षा प्राप्त करने के कारण जब वड़ोदरा के राजा ने उनको अपना सेना सचिव बनाया तो उनको रहने के लिए एक छोटा सा कमरा भी नहीं मिला | उनका सवर्ण चपरासी भी ऊपर से फ़ाइल् फेंकता था |
ऐसे कितने ही अपमानों के बावजूद उनके मन में हिन्दू समाज के प्रति नफ़रत नहीं थी | उनका आन्दोलन घृणा नहीं प्रेम के आधार पर था | उनमें समभाव और ममभाव कूट कूट कर भरे थे | ये दोनों समरसता के लिए बहुत जरुरी हैं | दलित आन्दोलन के नाम पर नफ़रत फ़ैलाने वालो को वे ” छद्म दलित आन्दोलनकारी” कहते थे | उन्होंने एकजुट व् सशक्त भारत के निर्माण का संकल्प लिया था | उन्होंने अपनी पुस्तक ” अछूत कौन और कैसे में लिखा ,” genetics के हिसाब से उ.प्र. के ब्राह्मण , बिहार के चमार और पंजाब के भंगी एक ही वंश के है |” उन्होंने अपने पहले ही भाषण में कहा था कि हमें मानवाधिकार चाहियें , ऊँची जाति वालों के सिर नहीं | वे दलितोत्थान के लिए काम करते थे परन्तु उनका जीवन एकांगी नहीं था | उनका कहना था कि यदि हिन्दू समाज का एक भाग अशक्त रह गया तो हिन्दू समाज सशक्त कैसे बनेगा | यदि एक भाग ज्ञान – विज्ञानं से से दूर रहेगा तो देश कैसे प्रगति करेगा | उनको चिंता थी कि जो स्वतंत्रता हमें मिली है , क्या जाति पाती में बंटा हिन्दू समाज उसकी रक्षा कर पायेगा | दलित समाज के महत्त्व को बताते हुए उन्होंने कहा था ,” जब देश को एक महाकाव्य की जरुरत थी तो बाल्मीकि को बुलाया गया , जब शास्त्रों की जरुरत थी तो एक शूद्र व्यास को बुलाया गया और अब जब संविधान की जरुरत है मुझे बुलाया गया है| ” वास्तव में उनके  जीवन  की विकास यात्रा समरसता का एक अद्भुत उदहारण है | उनका मूल नाम अम्बावाडेकर था | अबेडकर उपनाम एक ब्राह्मण अध्यापक का दिया हुआ है जो उनको विशेष स्नेह करते थे | उनकी माता के स्वर्गवास होने के के कारण वे ही भीमराव के लिए दोपहर का खाना भी लाया करते थे और साथ बिठाकर खिलाते भी थे | अगर वड़ोदरा के राजा की छात्रवृत्तियां न मिलाती तो भीम, डा. भीमराव अम्बेडकर नहीं बन पाते | जीवन के हर कदम पर जहाँ उन्हें अपमानित होना पड़ा वहीँ  ममता भरा सहारा भी उनको उसी वर्ग से मिला जिसको यद् करके वे कई बार भावुक हो जाते थे |
ऐसे महापुरुष व् क्रातिकारी युगदृष्टा को उनकी पुण्यतिथि पर सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके अधूरे सपनों को पूरा करे | सवर्ण समाज को यह समझना होगा कि छुआछुत का महापाप करके वे वंचित समाज को तो अपमानित कर ही रहे हैं , अपने पैरों पर भी कुल्हाड़ी मर रहे हैं | वे इस लोक को भी बिगाड़ रहे हैं और परलोक को भी | इस अस्पृश्यता से वे ३ प्रकार के नुकसान कर रहे हैं :
१. इस महापाप के कारण वे हिन्दू समाज के सर्वश्रेष्ठ दर्शन , चिंतन और समाज व्यवस्था को बदनाम कर रहे हैं |  हिन्दू विरोधियों को वे  विष वमन का अवसर देते है |
२.वह वर्ग जिसने हमारे धर्म , देश व् समाज की रक्षा करने के लिए सब प्रकार के संघर्ष किये , अपमान सहे पर धर्म नहीं छोड़ा , आज अपनों के द्वारा ही अपमानित हो रहा है |
३, इस वर्ग के दुःख का लाभ लेने के लिए समाज , देश व् धर्म के दुश्मन आज काक दृष्टि जमाये बैठे हैं और तथाकथित उच्च वर्ग के इस अपराध का लाभ लेकर समाजअकी  और देश को तोड़ने का षड़यंत्र कर रहे हैं |
 हमारा दर्शन कृतज्ञता का दर्शन दिया है | जिसने हमें कुछ भी दिया है हमने उसे देवता कहकर उसकी पूजा की है | जिस वर्ग ने हमेशा देश व् धर्म की रक्षा के लिए बलिदान दिए हैं , उनको अपमानित करके सवर्ण वर्ग भी खुश नहीं रह सकता है | अगर ये खुश नहीं तो देश भी खुश नहीं रह सकता और अगर देश खुश नहीं तो कोई एक वर्ग खुश रहने की कल्पना भी नहीं कर सकता | कथित उच्च वर्ग के पूर्वजों ने इन पर बहुत अमानवीय अत्याचार किये हैं , आज भी कर रहे हैं |सवर्ण समाज में पश्चाताप जनित विनम्रता आनी चाहिए | इस सवर्ण वर्ग को अपनी गलतियों का परिमार्जन करना है | कुछ लोग इनको मिलने वाले आरक्षण पर क्रोध करते है | उनको समझना चाहिए कि यह आरक्षण उन्होंने नहीं दिया संविधान ने दिया है | यह प्रगति के अवसरों से वंचित एक पुरुषार्थी समाज को बराबरी पर लाने का एक अवसर कृतज्ञ समाज ने दिया है | भारत में ६०% BPL हैं | इनमें ८०% दलित वर्ग के हैं | इनके भी केवल २०% ही आरक्षण का लाभ ले पा रहे हैं | हमें आज यह विचार करना होगा कि समाज  के इतने बड़े वर्ग के पिछड़े रहते हुए हम प्रगतिशील कैसे बन सकते हैं | बचे हुए दलित समाज तक यह अवसर कैसे पहुचे , आज इस पर विचार करना होगा |अस्पृश्यता एक जहर है जो हमारे देश के शरीर को क्षीण कर रहा है , इसके रहते विकास संभव नहीं है | हमें इस जहर को बाहर निकालना ही पड़ेगा , तभी इहलोक और परलोक सुधरेगा |
आज वंचित वर्ग को भी यह विचार करना पड़ेगा कि उनकी समस्याओं का समाधान डा. अम्बेकर के विचारों से ही होगा | समस्या जहाँ से पैदा हुई वहीँ से समाधान निकलेगा | उन्हें अपना क्षात्र तेज जागृत करके अशिक्षा , बेरोजगारी और अपमान के विरुद्ध संघर्ष करना होगा | यह संघर्ष घृणा नहीं ममभाव से सफल होगा | युवक – युवतियों को उच्च शिक्षा प्राप्त कर विकास के शिखर पर पहुँचने  का संकल्प लेना होगा | दीनता – हीनता और अकर्मण्यता छोड़नी होगी | आज सब प्रकार के अवसर उपलब्ध हैं | आप लोग जुझारू हैं , हर संघर्ष में विजय प्राप्त की है, इसमे भी करनी है | यही सच्ची श्रद्धांजलि उस महामना के लिए होगी |

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