गौरक्षा के सम्बन्ध में केंद्र सरकार का अंतर्द्वंद

Sunday, July 23rd, 2017

वर्त्तमान भाजपानीत केंद्र सरकार ने भारत के विकास के कई नए आयाम स्थापित किये हैं। सम्पूर्ण विश्व में भारत एक मजबूत देश रूप में उभरा है , इसका श्रेय वर्त्तमान सरकार को ही जाता है। राष्ट्र विरोधी अप्रासंगिक होते जा रहे हैं और राष्ट्रभक्ति हिलोरें ले रही है। यह दृश्य सबको ख़ुशी से भर देता है। राष्ट्रीयता की भावना अब देश में चर्चा का केंद्र बिंदु बन चुकी है। इस आलेख का उद्देश्य केंद्र सरकार की प्रशंसा या आलोचना नहीं , एक राष्ट्रभक्त का समयोचित आकलन है।
जनसंघ से भाजपा की यात्रा वैचारिक विचलन की यात्रा नहीं रही है। जिन विषयों के लिए प्रतिबद्धता जनसंघ के समय थी , इस यात्रा के किसी भी पड़ाव में यह प्रतिबद्धता कम नहीं हुई है। अगर कभी विचलन दिखाई भी दिया है तो इसे न तो कार्यकर्ताओं ने पसंद किया है और न ही देश की जनता ने। कार्यकर्ता प्रधान जनसंघ / भाजपा की इस विकास यात्रा में कार्यकर्ता का निर्लोभ परिश्रम मूल आधार रहा है। व्यक्तियों का आभामंडल वातावरण बनाने में सहयोगी रहा है परन्तु इस अनुकूल वातावरण को वोटों में परिवर्तित करना कार्यकर्ताओं की साधना के बिना संभव नहीं था। कार्यकर्ताओं के समर्पण ,त्याग और बलिदान की प्रेरणा किसी व्यक्ति विशेष को सत्ता में लाना नहीं रहा है । व्यक्ति के माध्यम से अपने अधूरे सपनों को पूरा होते हुए देखने की लालसा ही इनकी प्रेरणा है। इन सपनों को “कोर मुद्दे ” के रूप में पूरा विश्व जानता है। ये मुद्दे वर्त्तमान सरकार के लिए भी मुख्य प्रश्न हैं जिनके समाधान के लिए सम्पूर्ण देश इन पर बार -बार विश्वास व्यक्त करता है। परन्तु इन मुद्दों की उपलब्धता के आधार पर ही अंततोगत्वा इनका मूल्यांकन देश की जनता करेगी। इन विषयों को विवादित मुद्दे कहना विश्वास को अपमानित करना है और इसके आधार पर इनको ठन्डे बस्ते में भी नहीं डाला जा सकता है। एक वातावरण बनाया गया कि दो साल तक इन मुद्दों को न उठाया जाए। इसका अर्थ है कि दो साल के बाद इनका समाधान अवश्य किया जाएगा। इसकी बेसब्री से प्रतीक्षा की जा रही है।
ये सभी मुद्दे हिन्दू संवेदनाओं से जुड़े हैं। गौरक्षा का मुद्दा थोड़े – थोड़े दिन के अंतराल पर लगातार चर्चा में आता रहता है। देश में लाखों गौवंश प्रतिदिन कटता रहता है और कई हजार बांग्लादेश को तस्करी होता रहता है। अधिकांश राज्यों में प्रतिबंध के बावजूद वे इस कानून को प्रभावी रूप से लागु नहीं करते हैं। परन्तु हिन्दू समाज हमेशा से गौरक्षा को अपना पावन कर्तव्य मानता रहा है। जब भी गौहत्या होती है ,उसे कष्ट पहुंचता है। वह मजबूर होकर संघर्ष करता है। गौरक्षा का काम प्रशासन का है। कई बार अपने निहित स्वार्थों के कारण वह प्रभावी सिद्ध नहीं होता। परिणाम स्वरूप गौरक्षक सड़क पर आता है। गौहत्यारे सब प्रकार के शास्त्रों से सुसज्जित होते हैं। वे पुलिस वालों का भी मुकाबला करते हैं। कई बार पुलिस वाले भी उनके हाथों मारे भी जाते हैं। गोरक्षकों पर हमला करके उनको घायल कर देना या मार देना आम बात हो गयी है। पिछले ४ वर्षों में १३२ से अधिक बार गेहत्यारों पुलिस और गौरक्षकों प्राणघातक हमले किये हैं। कुछ मामलों में भी क्षति पहुंचती है जो किसी भी संघर्ष में स्वाभाविक है। दुर्भाग्य से इन्हीं घटनाओं को भाजपा विरोधी दल ,निहित स्वार्थों से जुड़े पेशेवर बुद्धिजीवी व् मिडिया का एक वर्ग इन घटनाओं का दुष्प्रचार करता है। कुछ बहुप्रचारित घटनाओं के असत्य सिद्ध होने पर भी इनको कोई पछतावा नहीं होता और ये अगली घटना ढूंढने लग जाते हैं।
संघर्षों के वास्तविक कारणों को छिपाकर ये गौरक्षकों को गुंडे या हत्यारे के रूप में प्रस्थापित करने का प्रयास करते हैं। बजरंग दल या विश्व हिन्दू परिषद् का नाम न होने पर भी जबर्दस्ती डालते हैं। यह वर्ग इन घटनाओं को मिडिया इवेंट के रूप में लेता है और जो स्वयं हर कार्यक्रम को मिडिया इवेंट के लेते हैं वही इससे प्रभावित होते है। आम समाज इस दुष्प्रचार से प्रभावित नहीं होता। कुछ मिडिया तंत्रों ने ओपिनियन पोल आयोजित करवाए हैं। इनके परिणाम गौरक्षकों व् हिन्दू संगठनों के पक्ष में ही गए हैं।
गौरक्षकों को अपमानित करने वाला यह वर्ग वही है जो पथरबाजों व् आतंकियों के साथ खड़ा होता है। इनका निशाना गौरक्षक या हिन्दू संगठन नहीं , भाजपा सरकार है। तथ्यों से मुंह मोड़कर सत्ताधीश गौरक्षकों को चेतावनी देने लगते हैं और इन बौद्धिक जेहादियों के जाल में फंस जाते हैं। कुछ लोग गौरक्षा के पुनीत कार्य का दुरुपयोग करते होंगे , उन पर कार्यवाही होनी चाहिए। सम्पूर्ण गौरक्षा अभियान को अपमानित करना देश की ऋषि और कृषि परंपरा को अपमानित करना है। इससे हिन्दू समाज दुखी है।
भाजपाशासित सरकारों ने गौहत्या विरोधी सख्त कानून तो बनाये हैं परन्तु उनको सख्ती से लागू नहीं किया जाता है। देश में गौहत्यारे बिना किसी विशेष बाधा के खुले आम गौहत्या करते हैं , खुले आम बीफ पार्टियों का आयोजन करते हैं और बीफ बिरयानी बेचते हैं। इनके विरोध में एक भी शब्द नहीं बोला जाता है। गोवा के मुख्यमंत्री विधानसभा में गर्व के साथ घोषणा करते हैं की गोवा में गौमांस की कमी नहीं होने दी जाएगी चाहे कर्नाटक से मंगवाना पड़े। वे भूल जाते हैं कि गोवा में गौवध पर प्रतिबन्ध का कानून है जिसे उन्होंने कूड़े दान में डाल दिया है। कर्णाटक में भी गौहत्या निषेध कानून है। मुख्यमंत्री कैसे दो राज्यों के कानून तोड़ने के लिए प्रोत्साहित करता है ? कोई भी सत्ताधीश इस अपराध पर मौन कैसे साध सकता है ? विहिप द्वारा दबाव बनाने पर एक ऐसी सफाई दी जाती है जिस पर कोई विश्वास नहीं कर सकता है | वे कहते हैं कि बीफ का मतलब केवल गौमांस नहीं है। वे कौन से शब्दकोष से यह परिभाषा लेकर आये हैं ? गौरक्षकों व् भाजपा पर आक्रमण करने के लिए पश्चिमी मीडिया ने यह अर्थ उछाला , जिसे कांग्रेस और वामपंथियों जैसे गौहत्यारे प्रेमियों ने लपक लिया। अब दुर्भाग्य भाजपा इस अनर्थ का उपयोग कर रही है। कौन किसके जाल में फंस रहा है , वह दुनिया देख रही है। परन्तु प्रताड़ित तो गौरक्षक हो रहा है , अपमानित तो गौरक्षा की पावन परंपरा हो रही है। यह पहली बार नहीं हो रहा है। पहले भी गौरक्षा अभियान को रोकने का प्रयास हुआ है लेकिन वे सफल नहीं हो सके हैं।
गौरक्षा में हिंसा का कोई समर्थन नहीं करता है , परन्तु आत्म रक्षा का अधिकार भी कोई नहीं वहीं सकता है। गौरक्षा का दायित्व प्रशासन का है। वह अपनी असफलता का ठीकरा गौरक्षकों के सर पर फोड़ना चाहते हैं। केंद्र सरकार को एक विश्लेषण अवश्य करना चाहिए। जिन प्रदेशो में गौवध विरोधी कानून है वहां गौहत्यारों पर कितने मामले दर्ज हुए हैं और गौरक्षको पर कितने तथा इन पर कौन सी धाराएं लगाई गयी हैं। इसका विश्लेषण उन्हें सत्य की ओर ले जाएगा। यह काम जल्दी करें। कहीं ऐसा न हो कि विलम्ब हो जाए।

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