हिन्दुत्व – न दैन्यं न पलायनम

Saturday, November 11th, 2017

भगवान कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश देते हुए कहा था, ‘‘न दैन्यं न पलायनम।’’
अर्जुन को प्रेरणा देने के लिए कहा गया यह वाक्य वास्तव में एक सच्चे हिन्दू
के चरित्र को भी परिभाषित करता है। हिन्दू ने न कभी पराजय स्वीकार की है और न
कभी रणक्षेत्र छोड़कर भागना स्वीकार किया है। इसीलिए स्वामी विवेकानन्द ने हिन्दू की
परिभाषा देते हुए इसी चरित्र को इंगित किया है। उन्होंने कहा था- ‘तुम हिन्दू कहलाने के
अधिकारी तभी हो जब भारत की दुर्दशा देखते ही छत्रपति शिवाजी की तरह तुम्हारी नसों
में रक्त खौलने लगे, गुरु गोविन्द सिंह की तरह तुम सर्वस्व अर्पण के लिए तत्पर हो
जाओ।’ इतिहास इस बात का साक्षी है कि हिन्दू ने कभी पराधीनता स्वीकार नहीं की है।
उसने केवल मृत्यु तक ही नहीं, जन्म-जन्मान्तर में भी अन्तिम विजय प्राप्त करने का
संकल्प लिया है।
अंग्रेजों से स्वतंत्रता प्राप्त करने के 70 वर्ष पश्चात भी हिन्दू को चतुर्दिक आक्रमणों
का सामना करना पड़ रहा है। विधर्मियों के साथ-साथ कुछ हिन्दू भी सैक्युलर माफिया का
रूप धारण कर हिन्दू समाज को जड़-मूल से समाप्त करने का षड्यंत्र कर रहे हैं। जब
कभी हिन्दू आत्मरक्षार्थ प्रतिकार करता है तो कहा जाता है कि प्रतिकार करना हिन्दू का
चरित्र नहीं है। हिन्दू का चरित्र तो सहनशीलता है। इस कुतर्क से हिन्दू को कायर बनाने
का प्रयास किया जाता है जिससे वे अपने षड्यंत्रों में सफल हो सके। यह सत्य है कि
सहिष्णुता हमारी विशेषता है परन्तु यह स्मरण रखना चाहिए कि ‘जयिष्णुता’ हमारा संकल्प
है। हिन्दू हमेशा विजीगीषु प्रवृत्ति का स्वामी रहा है। जो हिन्दू के प्रति सद्भाव रखता है,
हिन्दू उसके प्रति सहिष्णु रहा है परन्तु दुर्भाव रखने वालों के प्रति उसकी विजीगीषु प्रवृत्ति
ही सामने आती है। उसने विजय प्राप्त होने तक निरन्तर संघर्ष किया है। सहिष्णुता और
जयिष्णुता में से किसी एक का चयन करते समय भी हिन्दू कभी भ्रम में नहीं रहा। उसने
जयिष्णुता को ही प्राथमिकता दी है। इतिहास साक्षी है कि जब-जब भी आसुरी शक्तियाँ
सामने आई हैं, हिन्दू ने कभी समर्पण नहीं किया संघर्ष किया है और अन्त में विजय प्राप्त
की है।
भारत का चकाचौंध करने वाला वैभव सम्पूर्ण विश्व को आकर्षित करता रहा है।
सभ्य लोगों ने व्यापार या भ्रमण के माध्यम से इस वैभव का आनन्द लिया है तो असभ्य
और बर्बर जातियों ने आक्रमण करके इस वैभव को लूटकर बर्बाद करने का प्रयास किया
है। इसमें से कई आक्रमणकारी तो ऐसे रहे हैं जिनके सामने 30-40 वर्षों में ही विश्व का
बड़ा भाग नतमस्तक हो गया, परन्तु उनको भारत में प्रवेश करने में ही सैंकड़ों साल लग
गए। भारत को पराभूत करने का आनन्द वो कभी नहीं ले सके।
लगभग 2600 वर्ष पूर्व इरान के सायरस ने आक्रमण किया था परन्तु परास्त होकर
भागना पड़ा था। 2400 वर्ष पूर्व तथाकथित विश्व विजेता सिकन्दर आया था तो पहले
महाबली पुरु ने हराया, इसके बाद कठ साम्राज्य ने उसको ब्यास नदी भी पार नहीं करने
दी और उसे वापस ही भागना पड़ा। इसके 20 साल बाद सैल्यूकस आया तो अपनी बेटी
हेलेना की शादी चन्द्रगुप्त मार्य से कराकर भागने में कुशलता समझी। इसके बाद महान
यौद्धा खारवेल ने ग्रीक व देमेट्रियस को परास्त किया। विक्रमादित्य ने बर्बर शकों को तथा
समुद्रगुप्त के बेटे चन्द्रगुप्त ने कुषाणों को परास्त कर आत्मसात कर लिए। जिन हूणों की
क्रूरता से बचने के लिए चीन को दीवार बनानी पड़ी, उनको स्कन्दगुप्त ने अन्तिम रूप से
समाप्त कर अस्तित्वविहीन बना दिया था। इसके बाद 500 साल तक कोई भी भारत पर
आक्रमण करने का साहस नहीं कर पाया।
इस्लाम का पहला आक्रमण 637 ई0 में हुआ, जिसमें वे बुरी तरह परास्त हुए। 75
वर्ष तक वे लगातार हारते रहे। परन्तु 712 ई0 में कासिम ने सिन्ध पर बड़ा हमला किया
और वहाँ के राजा दाहिर को मार दिया। परन्तु इसके बाद बप्पा रावल ने हमलावरों को
खदेड़ा और ईरान तक साम्राज्य स्थापित किया। कभी मिहिर भोज तो कभी ललितादित्य ने
इनको खदेड़ा। गजनी, सालार मसूद, मोहम्मद गोरी ने भारत पर कई हमले किए, बर्बादी
का नंगा नाच खेला, क्रूरता और बर्बरता की सीमाएं पार की, परन्तु दिल्ली तक नहीं पहुँच
पाए। 1206 ई0 में गोरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ने दिल्ली में सल्तनत स्थापित की। जिस
इस्लाम ने 30-40 वर्षों में आधा यूरोप, 40-50 वर्षों में अफ्रीका व मध्य एशिया को जीता,
उसे दिल्ली पहुँचने में 570 साल लग गए।
अलाउद्दीन खिलजी ने दक्षिण भारत पर हमला किया और केरल को छोड़कर सारे
दक्षिण भारत पर कब्जा किया। परन्तु वह भी चैन से नहीं बैठ सका। उसे महाराणा कुम्भा
ने 6 महीने कैद में रखा और बाद में छोड़ दिया। इसी तरह हमीर ने तुगलक को हराया
और छोड़ दिया। यदि इनको समाप्त कर दिया होता तो इतिहास अलग होता। 330 में
स्वामी विद्यारण्य की प्रेरणा से हरिहर बुक्का पुनः हिन्दू बने और विजयनगर साम्राज्य की
स्थापना की। 221 वर्ष तक सारा दक्षिण भारत इस हिन्दू साम्राज्य के अन्तर्गत था। इस
साम्राज्य का सर्वश्रेष्ठ समय राजा कृष्णदेव राय का था। वे भारत के महानतम शासकों में
से एक थे। इन्होंने विजयनगर साम्राज्य का विस्तार पूर्व में उड़ीसा तक किया था। इन्हीं से
प्रेरणा प्राप्त कर छत्रपति शिवाजी महाराज ने हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना की थी।
1526 में बाबर ने पानीपत की लड़ाई जीतकर मुगल राज्य प्रारम्भ किया। सब प्रकार
की बर्बरता के बावजूद वह बार-बार लड़ाइयाँ हारता भी रहा। हिन्दुओं की जिजीविषा ने
मुगलों को कभी चैन से नहीं बैठने दिया। राणा सांगा, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी,
छत्रसाल, गुरु गोविन्द सिंह जैसे महान वीरों ने इनको कभी आराम से शासन नहीं करने
दिया। सम्पूर्ण भारत कभी किसी आततायी के अधीन नहीं रहा। आसाम तो हमेशा अजेय
रहा। इसी प्रकार केरल भी केवल 20 वर्षों तक विधर्मियों के आधीन रहा। दक्षिण भारत ने
हैदर व टीपू की बर्बरता का भी सामना किया परन्तु घुटने नहीं टिकाये।
मुस्लिम साम्राज्य के पतन के बाद अंग्रेज भारत की धरती पर पहले व्यापारी के रूप
में आए। इसके पश्चात इनका लूटने का मूल चरित्र सामने आया। ब्रिटेन की औद्योगिक
क्रान्ति इसी लूट के पैसे से हुई थी। लेकिन जिन अंग्रेजों के साम्राज्य में सूरज कभी नहीं
डूबता था, उनको भारत ने एक भी दिन चैन से राज्य नहीं करने दिया। 1857 की
जनक्रान्ति एक साथ 30 स्थानों पर प्रकट हुई। लगभग 6 लाख का बलिदान हुआ। सिक्ख,
मराठे, वनवासी, संन्यासी आन्दोलन, रामसिंह कूका आन्दोलन ने इनको हमेशा परेशान
रखा। वासुदेव बलवन्त फड़के से शुरू हुआ क्रान्तिकारी आन्दोलन इनकी जड़े उखाड़ने के
लिए बहुत बड़ा कारक सिद्ध हुआ। वीर सावरकर, चन्द्रशेखर, भगतसिंह, चाफेकर बन्धु जैसे
सैंकड़ों क्रान्तिकारी अपना बलिदान देते गए और भारत को आजादी के नजदीक लाते गए।
आजाद हिन्द फौज का संघर्ष और सैनिक विद्रोह ने अंग्रेजों को समझा दिया था कि अब वे
भारत में टिक नहीं सकेंगे। इसके अतिरिक्त अहिंसक आन्दोलन ने आम समाज की
सहभागिता को सुनिश्चित किया। बंग-भंग, स्वदेशी, रोलेट एक्ट, जलियांवाला बाग,
असहयोग आन्दोलन, भारत छोड़ो जैसे आन्दोलनों की कड़ी के बाद अंग्रेजों को भारत
छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा।
2500 वर्ष के संघर्ष के बाद भारत को स्वतंत्रता मिली। भारत का यह इतिहास
पराधीनता का नहीं सतत संघर्ष का इतिहास था। हमारी इस मृत्युंजय शक्ति का आधार
कोई राजनीतिक चेतना नहीं, आध्यात्मिक चेतना रही है। यह कहा जाता है कि जब तक
भारत में धर्म के प्रति आस्था है, इसे कोई नष्ट नहीं कर सकता। जगद्गुरु शंकराचार्य,
आचार्य चाणक्य, स्वामी विद्यारण्य, समर्थ गुरु रामदास, शंकरदेव, रामानन्दाचार्य, स्वामी
विवेकानन्द, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी रामतीर्थ, सिक्ख गुरुओं की परम्परा तथा कई
स्वनामधन्य सन्तों ने भारत की इस आध्यात्मिक शक्ति को निरन्तर जागृत रखा, जिसके
परिणामस्वरूप भारत ने कभी हार नहीं मानी। सतत संघर्ष किया और अन्ततोगत्वा विजय
प्राप्त की।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद दुर्भाग्यवश भारत की इस आध्यात्मिक विरासत को नष्ट
करने का षड्यंत्र तत्कालीन सत्ताधारियों ने किया। वामपंथी, जेहादी और मिशनरी तो पहले
से ही इस काम में लगे थे। इन चारों ने मिलकर हिन्दू समाज की इस संजीवनी शक्ति पर
चारों ओर से प्रहार करना शुरू कर दिया। समाज को बांटने के लिए कई प्रकार के विभेद
निर्माण किए गए। वोट बैंक निर्माण करने के लिए भारत पर बर्बर आक्रमण करने वालों को
मुस्लिम समाज का आदर्श बनाया गया। परिणामस्वरूप उनकी उग्रता और बढ़ गई जबकि
भारत विभाजन के पाप के लिए उन्हें क्षमाप्रार्थी होना चाहिए था। इसी कारण वे हिन्दू
समाज पर हमले करते थे और हिन्दू याचना करता रहता था। अगर कभी प्रतिकार करता
तो सैक्युलर माफिया मिलकर फिर आक्रमण कर प्रतिकार को भी लज्जित करते थे। इसी
माफिया की शह पर मिशनरी धर्मान्तरण का कुचक्र तेजी से चलाने लगते थे। माओवादियों
व अन्य आतंकियों के निशाने पर भी हिन्दू समाज ही रहा है। हिन्दू केवल याचना ही कर
रहा था। 1984 में प्रारम्भ हुए श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन ने हिन्दू की आध्यात्मिक शक्ति
का जागरण किया। हिन्दू भिक्षुक की कोठरी से बाहर निकलकर संघर्ष के मैदान में एक
नये आत्मविश्वास के साथ उतर गया।
श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मन्दिर का निर्माण केवल हिन्दू समाज ही नहीं सभी
देशभक्तों का नैसर्गिक अधिकार है। परन्तु मुस्लिम वोट बैंक के लिए हिन्दुओं पर अप्रतिम
अत्याचार किए गए। 02 नवम्बर, 1990 का भीषण नरसंहार जलियांवाला बाग व टीपू के
नरसंहारों की याद दिलाता है। हिन्दुओं ने इस चुनौती को स्वीकार किया और भारत के
अपमान का प्रतीक बाबरी ढाँचा ध्वस्त हो गया। बाकी बचा तो हिन्दू स्वाभिमान का प्रतीक
राम मन्दिर जिसके भव्य स्वरूप को कभी भी साकार रूप मिलने ही वाला है। हिन्दू शून्य
बन चुकी कश्मीर घाटी में अमरनाथ यात्रा को सुरक्षित रखना एक चुनौती थी। हिन्दू ने इस
चुनौती को स्वीकारा और आज अमरनाथ यात्रा सुरक्षित ही नहीं, फल-फूल रही है।
रामसेतु के ध्वंस की कल्पना मात्र ही पागलपन लगती है। परन्तु आसेतु हिमाचल हिन्दू
समाज के आक्रोश के कारण अब यह संभव ही नहीं है।
एक बर्बर हत्यारे टीपू को एक देशभक्त, कुशल शासक के रूप में कई वर्षों से
स्थापित किया जा रहा था। इसी जागरण का परिणाम है कि आज सत्ता के मद में डूबे
कर्नाटक के सत्ताधारी नाम मात्र के कार्यक्रम कर पा रही है। हालांकि इसके लिए उन्हें
न्यायपालिका समेत सभी तरफ फटकार मिल रही है। लेकिन अब टीपू का महिमामंडन
संभव नहीं है। कश्मीर, पूर्वोत्तर, बंगाल, दक्षिण भारत जेहादियों के अभयारण्य बन चुके थे।
अब पूर्वोत्तर, दक्षिण भारत जेहादियों के चंगुल से बाहर आ गया है। बंगाल बाहर आने के
लिए तड़प रहा है, अत्याचार का प्रतिकार भी कर रहा है। हिन्दू की विजीगीषु प्रवृत्ति पुनः
जागृत हो रही है। भारत मानो भगवा क्रान्ति के युग में प्रवेश कर चुका है। ‘‘न दैन्यं न
पलायनम’’ का संकल्प आज हिन्दू समाज अपने कर्तव्य से पुनः प्रकट कर रहा है। इसी
कारण अब भारत को गौरव प्राप्त हो रहा है और राष्ट्रविरोधी कान्तिहीन बनते जा रहे हैं,
शीघ्र ही अस्तित्वहीन भी बनेंगे।

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