मैहर (माई हार) शक्तिपीठ की दुर्दशा और सामाजिक दायित्व

Tuesday, September 15th, 2015

मध्य प्रदेश के कटनी शहर से ६५ किमी दूरं त्रिकूटगिरी पर्वत श्रृंखला के घने जंगल में स्थित माँ शारदा का यह ऐतिहासिक मंदिर सम्पूर्ण विश्व के हिन्दू समाज की आस्था का केंद्र है | यह पावन मंदिर ५२ शक्तिपीठों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है | इस स्थान पर माँ शारदा का हार गिरा था , इसलिए इसका प्राचीन नाम माई हार था जो कालांतर में मैहर बन गया | इस स्थान पर प्रसिद्द योद्धा आल्हा –उदल का भी केंद्र था | आज भी उनका अखाडा और वह सरोवर जिसमे वे कुश्ती के बाद स्नान करते थे देखे जा सकते है | यह भी मान्यता है कि आज भी वे माँ शारदा के दर्शन के लिए प्रतिदिन आते हैं और उनकी श्रद्धा के प्रतीक रूप में वहां प्रतिदिन १ ताजा गुलाब का फूल मंदिर खुलते ही मिलता है | यह पावन मंदिर श्रद्धा का प्रतीक तो है ही , राष्ट्रीय एकात्मता का भी प्रतीक है | भारत के कोने –कोने में स्थित ५२ शक्तिपीठ राष्ट्रीय एकता के ज्वलंत प्रतीक हैं | यहाँ भी नवरात्रि के दिनों में लाखों श्रद्धालू आते हैं और लघु भारत का दृश्य निर्माण होता है |
विश्व हिन्दू परिषद् के जबलपुर प्रान्त की बैठक के निमित्त मेरे को भी इस पावन स्थल पर दो दिन रहने का सौभाग्य मिला | माँ शारदा के दर्शन कर ह्रदय एक नए उत्साह से भर गया | माँ शारदा के दर्शन भी भरपूर मिले | इस पावन स्थल को पवित्र नगरी भी घोषित किया गया है परन्तु पवित्र नगरी की मर्यादा का यहाँ बिल्कुल भी पालन नहीं किया जा रहा  है | उस पावन नगरी में मांस और मदिरा की दुकाने भी हैं और कई क़त्ल खाने भी हैं जहां सरे आम पशु काटे जाते हैं | वहां आने वाले हर श्रद्धालु यह पीड़ा लेकर वहां से जाता है | नवरात्रि के दिनों में जब यहाँ प्रतिदिन सवा लाख भक्त आते हैं और शहर के हर कोने में बिखरे होते हैं, तब वे यह दृश्य देखकर व्यथित होते है | प्रशासन को बार – बार कहने पर भी वे ध्यान देना जरुरी नहीं समझते | इस बार की बैठक में भी इस पर चिंता व्यक्त की गयी | अगर विश्व हिन्दू परिषद् धार्मिक स्थलों की पवित्रता की रक्षा नहीं करेगी तो और कौन करेगा ? सबने तय किया कि अब निवेदन से काम नहीं चलेगा |इसलिए वहां के विहिप ने प्रशासन को नवरात्रि तक का समय इस पवित्र नगरी से सम्पूर्ण कत्लखाने , शराब की दुकाने ,मांस की दुकाने हटाने के लिये दिया है | यदि प्रशासन अब भी संवेदनाशून्य रहता है तो बजरंगदल के है कार्यकर्ता इन दुकानों को नहीं रहने देंगे |
ऐसा भी लगता कि अधिग्रहित मंदिरों का सरकारी प्रशासन केवल पैसा बटोरने  से मतलब रखता है | आज के सन्वेदनशील काल में भी वहां भक्तों व् मंदिर की सुरक्षा का कोई प्रबंध  नहीं  किया जा रहा है | सफाई का तो मतलब ही नहीं है| यह विषय प्रशासन के ध्यान में दिलाकर ही वहां के कार्यकर्ता अपने काम को पूरा नहीं मान रहे थे | वहां की इकाई ने निश्चय किया है कि वे सप्ताह में एक दिन मंदिर परिसर की सफाई स्वयं करेंगे , नवरात्रि के दिनों में तो प्रतिदिन ही करेंगे | वहां के कार्यकर्ता साधूवाद के पात्र हैं| यदि सब अपना दायित्व समझें और केवल शिकायत तक सीमित न रखें तो क्या नहीं किया जा सकता |

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