भारत के सन्दर्भ में ट्रंप की जीत के निहितार्थ

Friday, November 25th, 2016

अमेरिका के नव निर्वाचित राष्ट्रपति श्री डोनाल्ड ट्रम्प की जीत ने जहाँ विश्व के एक वर्ग को अचंभित कर दिया , वहीं विश्व का चिन्तक वर्ग इस जीत का विश्लेषण करने में व्यस्त है | वैश्विक परिदृश्य में इस जीत का विश्लेषण आवश्यक भी है | परन्तु भारत के सम्बन्ध में भी इसका विश्लेषण बहुत आवश्यक है | भारत इस जीत से कई सबक सीखकर इनका लाभ ले सकता है | ट्रम्प ने अपने चुनावी भाषणों में बहुत ही बेलाग तौर पर इस्लामिक आतंकवाद को समाप्त करने का संकल्प लिया |यह भाषा परम्परागत भाषा नहीं थी | इस भाषा से मुख्यधारा के मिडिया से कुख्याति मिली और अपने आपको संभ्रांत कहने वाले वर्ग ने जबर्दस्त आलोचना भी की | परन्तु इस सबसे बेपरवाह होकर चुनाव जीतते ही अपने सुरक्षा सलाहकार की नियुक्ति करते समय यह स्पष्ट किया कि ये इस्लामी आतंकवाद को समाप्त करेगें| राष्ट्रपति बनने के बाद कई लोगों ने उन्हें जिम्मेदारी की भाषा प्रयोग करने का सुझाव दिया था परन्तु ट्रम्प समझते थे कि इस्लामिक आतंकवाद लीपापोती की भाषा से समाप्त नहीं होगा , इसके लिए स्पष्ट संकल्प लेना होगा और ऐसा ही संकेत मुस्लिम समाज को देना होगा | आज सम्पूर्ण विश्व के परिदृश्य को देखने पर ध्यान में आयेगा कि यह स्पष्टता केवल अमेरिका ही नहीं सम्पूर्ण विश्व में पसंद की जा रही है | यही विश्व का जनमत है |
इस जनमत के निहितार्थ को समझना भारत के लिए अत्यंत आवश्यक है क्योकि आज भारत इस्लामिक आतंकवाद से सबसे अधिक पीड़ित है | यह ठीक है कि हमने आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में इसके मुख्य संरक्षक व् प्रेरक पाकिस्तान की बेशर्म भूमिका का पर्दाफाश कर दिया है | परन्तु यह भी विचार करना पड़ेगा कि क्या आतंकवाद केवल पाकिस्तान के कारण ही है | आई एस आई एस के पीछे तो पाकिस्तान नहीं है | विश्व के कई आतंकी संगठन जैसे बोको हराम आदि को प्रारम्भ करने में पाकिस्तान का हाथ नहीं है |भारत के भी कई आतंकी संगठन पाकिस्तान के समर्थन का इंतजार नहीं करते | भारत का विभाजन कर एक जेहादी व् दारुल इस्लाम को साकार करने वाले देश ,पाकिस्तान , का निर्माण करके भी भारत के मुस्लिम समाज का एक बड़ा वर्ग आज भी संतुष्ट नहीं है | उसको संतुष्ट करने के लिए तरह -तरह के विशेषाधिकार दिए गए | इसके बावजूद वे आतंकियों के जनाजों में हजारों की संख्या में एक हिंसक भीड़ के रूप में शामिल होते हैं और भारत विरोधी नारे लगाने में कोई संकोच नहीं करते |वे आतंकियों को शरण भी देते हैं और उनको बचाने के लिए सुरक्षाबलों से भिड भी जाते हैं| क्या पाकिस्तान का समर्थन रोकने पर भी इनको रोका जा सकता है ? क्या इनका प्रेरणास्रोत एक निश्चित विचारधारा नहीं है ? यह बात स्पष्ट रूप से कहने में हम क्यों संकोच करते हैं?
भारत को भी इस्लामिक आतंकवाद से लड़ाई में अपनी झिझक छोड़नी पड़ेगी और जो नेता इस झिझक को छोड़कर सीधे जेहादी विचारधारा को समाप्त करने का संकल्प लेगा , वही जननायक बन जायेगा | मुस्लिम वोट बैंक का भ्रम ,कुछ बिके हुए बुद्धिजीवी व् निहित स्वार्थों वाले राजनीतिक लोगों के कारण अभी तक की सरकारे इनके पापों को न केवल अनदेखा करती रही हैं अपितु इनको संरक्षण भी देती रही हैं| देश के संविधान और कानून को इनके लिए गिरवी रखती रही हैं | कई बार तो इनको बचाने के लिए देशभक्त समाज को ही प्रताड़ित करती रही हैं|
विश्व बदल रहा है | पहले पश्चिम में भी इस्लाम को एक “पवित्र गाय” की तरह मानकर उसकी सैद्धांतिक आलोचना से बचा जाता था परन्तु अब खुलकर केवल इस्लामिक परम्पराओं की आलोचना ही नहीं हो रही अपितु उसके अमानवीय पक्षों को उजागर किया जा रहा है |
भारत में भी अब मुस्लिम समाज को यह समझाने की जरुरत है कि भारत के मुस्लिम ही इस्लाम से सबसे अधिक पीड़ित हैं| इनमे से अधिकांश के पूर्वज हिन्दू ही थे जिनको बलपूर्वक इस्लाम में धर्मान्तरित किया गया |तीन सौ साल तक प्रत्यक्ष रूप से और अंग्रेजो तथा सेक्युलर सरकारों के राज में अप्रत्यक्ष रूप में लगभग १५० साल तक इनका शासन रहा है | फिर क्यों ये हिन्दू समाज की तुलना में पिछड़े कहे जाते हैं? उनकी समस्याओं के लिए अमेरिका ,भारत या हिन्दू समाज जिम्मेदार नहीं है |मध्ययुगीन बर्बर विचारधारा , शरीयत,उलेमा , कट्टरपंथी मुस्लिम नेता और इनको वोट बैंक समझने वाले राजनीतिक ही इसके लिए दोषी हैं| मुस्लिम समाज को इनकी जकड से मुक्त होना चाहिए | तभी ये विकास की दिशा में जा सकेंगे अन्यथा इनकी दशा पाकिस्तान जैसी ही हो सकती है जो हमेशा पश्चिम की खैरात पर जीने के लिए अभिशप्त है |
तीन तलाक , बहुविवाह , हलाला जैसे मुद्दों पर मुस्लिम समाज से मिलीजुली प्रतिक्रियाएं सबूत हैं इनमे परिवर्तन के | कट्टरपन्थियो से मीठी बाते करके न तो पश्चिम को लाभ हुआ है और भारत को हुआ है | अनुभव यही है कि तुष्टिकरण से जेहादी दानव और सशक्त हुआ है |अब मुस्लिम नेताओं से दबकर नहीं , बराबरी पर बात करनी होगी | इस्लाम में चलरही बदलाव की इस बयार को समझना होगा और एक सुधार आन्दोलन को प्रोत्साहन देना होगा | जो न सुधारना चाहें या इस प्रक्रिया में बाधा बनें, उनको ट्रम्प की तरह कठोर संकेत देने होगे | वर्त्तमान सरकार थोड़ी झिझक के साथ इस दिशा में कुछ करना चाहती है , ऐसे संकेत भी मिलते हैं| अब यह झिझक छोड़नी होगी | ऐसे कोई भी कदम जो इनको कट्टरता की ओर ले जाएँ ,से बचना होगा | केवल तभी देश का जननायक बना जा सकता है और देश को जिहाद के अभिशाप से मुक्ति दिलाई जा सकती है | देश बहुत उम्मीदों से वर्त्तमान सरकार की ओर देख रहा है और वर्त्तमान नेतृत्व में उसका विश्वास भी है |

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