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गुरू गोविन्द सिंह जी महाराज – एक प्रेरणादायी जीवन, 350वें प्रकाश पर्व के अवसर पर श्रद्धा समर्पण

सम्पूर्ण संसार में फैला सिक्ख समाज दशम गुरू गोविन्द सिंह जी महाराज के प्रकाश पर्व (जन्मदिन) का 350वाँ वर्ष मना रहा है। 350 वर्ष पहले पौष शुक्ल सप्तमी को पटना में माता गुजरी ने एक बालक को जन्म दिया, बालक को पटना के विद्वानों ने ‘‘गोविन्द’’ नाम दिया। यह ऐतिहासिक शोध का विषय है कि आखिर किन परिस्थितियों में गुरू तेग बहादुर सिंह पंजाब से चलकर पटना पहुँचे और अपनी धर्मपत्नी को पटना में ही रोककर वे अकेले आगे की यात्रा पर निकल पड़े। शायद तीर्थयात्रा के दौरान ही उन्हें खबर मिली होगी कि घर में एक बालक आया है। पटना के विद्वान शिवदत्त शर्मा जी ने उस बालक को गोविन्द कहा और कहा कि ये तो एक अद्भुत, दिव्य, शक्ति सम्पन्न बालक है। बालक पटना में ही पला, चलने फिरने लगा, सम आयु के मित्रों के साथ खेलने लगा।
ऐसा वर्णन आता है कि एक बार पटना के मुस्लिम नवाब शहर में जा रहे थे, नवाब के सेवकों ने, सिपाहियों ने बच्चों से कहा कि नवाब को सलाम करों, गोविन्द ने सलाम करने से इंकार कर दिया और अपने साथियों को भी सलाम नहीं करने दिया। छोटा सा बालक जन्म से ही स्वाभिमान के संस्कार लेकर पैदा हुआ।
पिता जी वापस आए और पंजाब के लिए चल दिए। काशी, प्रयागराज व अयोध्या के दर्शन बालक को कराती हुई माताजी पंजाब पहुँची।
यह इतिहास सर्वज्ञात है कि आस-पास के हिन्दू गुरू तेग बहादुर जी के पास आए, अपने कष्ट बताये, इस्लाम के अनुयायी हमें सता रहे है, हमें मुसलमान बनने के लिए दबाव डाल रहे है, मना करने पर जान से मारने की धमकी देते है, गुहार लगाई-गुरूदेव हमारी रक्षा करों। सुना और पढ़ा जाता है कि गुरू तेग बहादुर जी के मुँह से निकला कि ये धर्म किसी महापुरुष का बलिदान चाहता है। सम्भवतः उस समय उन्हीं के पास खड़ा 9 वर्ष आयु का उनका पुत्र गोविन्द पिता जी को कहता है आपसे बड़ा कौन है, आप ही बलिदान दे दीजिए। अपने पिता को बलिदान की प्रेरणा देने वाला किशोर आयु का कौन सा दूसरा बालक इतिहास के पन्नों में पाया जाता है ? शायद दूसरा कोई नहीं मिलेगा और फिर सब जानते है कि तत्कालीन अत्याचारी इस्लामिक सत्ता के द्वारा गुरू जी को दिल्ली लाया गया। इस्लाम स्वीकार नहीं करने के कारण, आज दिल्ली के चांदनी चैक में जहाँ गुरूद्वारा शीशगंज है वहीं गुरू तेग बहादुर सिंह जी को शहीद किया गया। अन्याय के विरुद्ध अपने पिता को बलिदान की प्रेरणा देने वाले बालक गोविन्द का यह कार्य पीढ़ियों तक समाज को प्रेरणा देता रहेगा। अपने पिता को बलिदान की प्रेरणा देने की यह घटना पंजाब के जिस स्थान पर हुई वह स्थान ही आज कीरतपुर साहब के नाम से जाना जाता है।
गोविन्द राय बड़े होते है, निकट की पहाड़ियों में स्थित नैना देवी में जाकर एक वर्ष तक माँ भगवती का महायज्ञ किया, (नैना देवी आज हिमाचल प्रदेश में है)। इस कार्य के लिए काशी के विद्वानों को बुलाया। उपासना में उन्होंने देश, धर्म और समाज की रक्षा के लिए, अत्याचारों के विरुद्ध संघर्ष के लिए आवश्यक शक्ति माँ भगवती से अवश्य मांगी होगी, माँ ने वह शक्ति प्रदान की।
अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष प्रारम्भ करने से पहले गुरू गोविन्द राय जी के मन में यह विचार अवश्य आया होगा कि सारे हिन्दुस्तान की सम्मिलित शक्ति के साथ मिलकर अत्याचारों का मुकाबला करेंगे। उन्होंने संगत (सम्मेलन) बुलाई। पूज्य पिता जी के शिष्य जहाँ-जहाँ थे उन सबको बुलाया। देश का प्रत्येक कोना आया। (यह संगत जिस स्थान पर हुई वह स्थान ही आज पंजाब में अनन्दपुर साहब के नाम से जाना जाता है)।
गुरू गोविन्द राय जी ने संगत का आह्वान किया कि धर्म की रक्षा के लिए शीश चाहिए। गुरू जी ने पाँच बार शीश देने का आह्वान किया, एक-एक करके पाँच युवक खड़े हुये, अलग-अलग राज्यों के, अलग-अलग जातियों के। कोई खत्री, कोई नाई, कोई धोबी। भारत की एकता, एकात्मता, सामाजिक समरसता और देश के लिए प्रणोत्सर्ग का यह अद्भुत उदाहरण है। गुरू जी ने घोषणा की कि ये मेरे खालसा है। खालसा यानी शुद्ध, केवल बहादुर, युद्ध के मैदान में केवल विजय प्राप्त करने वाले। वे पाँचों युवक ही पंच प्यारे कहलाये।
एक बड़े बर्तन में पानी में मिष्ठान घोला गया, खड़ग से उस मीठे जल को स्पर्श कराया गया, घोषणा की कि यह अमृत है, इसका पान करों। पांचों शिष्यों को अमृत पान कराया, अमृत छकाया, पांचों शिष्य बन गये। परन्तु गुरू गोविन्द राय जी ने फिर उन शिष्यों से स्वयं अपने लिए अमृत लिया और अमृत पान किया। ये कैसा अद्भुत उदाहरण है, दुनिया में पहले शिष्य बनाये और उन शिष्यों से अमृत छक कर स्वयं उन शिष्यों के ही शिष्य बन गये। यहीं से खालसा की स्थापना भी हो गई। पुरुषार्थ जागरण के लिए अपने नाम के साथ ‘‘सिंह’’ लगाने का आदेश हो गया, गुरू गोविन्द राय अब गुरू गोविन्द सिंह बन गये। अन्य सब शिष्य भी सिंह हो गये। केश, कंघा, कड़ा, कृपाण और कच्छा अर्थात् योद्धा का वेश (पंच ककार) की परम्परा चल पड़ी। सिक्ख समाज का आज का बाहरी रूप यहीं से प्रारम्भ हुआ है। सब जातियों के लोग जिन्होंने गुरू गोविन्द सिंह जी से अमृत छका, उनके शिष्य (सिक्ख) अपने नाम के साथ सिंह लिखने लगे।
गुरू गोविन्द सिंह जी ने घोषणा की कि जब मेरा एक-एक खालसा वीर योद्धा सवा-सवा लाख सैनिकों से लड़ेगा तभी गुरू गोविन्द सिंह नाम सार्थक होगा। समाज के अन्दर व्याप्त भय को चीरकर पुरुषार्थ का जागरण करने जो कार्य अत्याचारी औरंगजेब के काल में महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी महाराज ने किया है, वहीं कार्य उत्तर भारत मंे गुरू गोविन्द सिंह जी महाराज के द्वारा हुआ है।
गुरू गोविन्द सिंह जी के चार पुत्र थे, इस्लाम के अत्याचारों के विरुद्ध युद्ध का काल था, चारों पुत्र पिता से अलग हो गये, दो पुत्र सरहिंद के किले की दीवार में इस्लामिक अत्याचारी सत्ता ने चिनवा दिये। अन्य दो भाई चमकौर के दुर्ग में लड़ते हुए मारे गये। गुरू गोविन्द सिंह जी महाराज को जब समाचार मिला कि चारों पुत्र धर्म की रक्षा के लिए बलिदान हो गये, तब गुरू गोविन्द सिंह जी महाराज रोये नहीं, दुःख प्रकट नहीं किया, अपितु बोले कि चार पुत्र चले गये तो क्या हुआ मेरे हजारों पुत्र अभी जिन्दा है। कौन है ये हजारों बेटे ? ये हजारों पुत्र है शेष सम्पूर्ण हिन्दू समाज।
इस प्रकार सारे समाज को अपना पुत्र मानकर आचरण करने वाला, पुत्रों के बलिदान पर दुःख प्रकट न करने वाला, अपने पिता को भी धर्म की रक्षा के लिए बलिदान की प्रेरणा देने वाला, किशोर अवस्था से ही स्वाभिमानी ऐतिहासिक पुरुष इस भारत की धरती पर जन्मा, उन्होंने माँ भगवती के जीवन पर ग्रंथ लिखा, हिन्दू धर्म में माने जाने वाले सभी अवतारों की गाथा लिखी, स्वयं अपना जीवन लिखते हुए उन्होंने लिखा कि मेरा तो जन्म ही धर्म की रक्षा और दुष्टों के निवारण के लिए हुआ है। गुरू गोविन्द सिंह जी महाराज ने कभी नहीं कहा कि मैं इस्लाम के विरुद्ध लड़ रहा हूँ, वे कहते थे कि मैं तो अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध समाज की रक्षा के लिए कार्य कर रहा हूँ।
गुरू जी ने विदेशी आक्रांताओं का मार्ग सदैव के लिए बंद कर दिया, परन्तु कभी इस विजय का श्रेय स्वयं नहीं लिया, इसके विपरीत उन्होंने कहा यह विजय तो बलिदानी सिक्खों की कृपा से प्राप्त की है, अन्यथा मेरे जैसे अनेकों गरीब इस संसार में पड़े है।
ऐसे पुरुष का जीवन प्रत्येक भारतीय को, चाहे वह भारत में रहता है अथवा भारत के बाहर अन्य किसी देश में, बारम्बार स्मरण करना चाहिए। उनका जीवन सभी को प्रेरणा देगा। ऐसे महापुरुष के चरणों में मैं बारम्बार मस्तक नमन करता हूँ।
विश्व हिन्दू परिषद भारत के कार्यकर्ताओं ने ये संकल्प लिया है कि हम हर जिले में गुरु गोविन्द सिंह जी महाराज के ऊपर एक कार्यक्रम करेंगे और उनका जीवन समाज को बतायेंगे। हम सब दशम् गुरू गोविन्द सिंह जी महाराज के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते है। सारे भारत वर्ष को भी, सारे संसार में फैले हुए भारतीयों को गुरू गोविन्द सिंह जी महाराज के इस जीवन को पढ़ाना चाहिए, मनन करना चाहिए और अपनी संतानों को भी पढ़ने की प्रेरणा देनी चाहिए। इतना ही सब बन्धुओं से मेरा निवेदन है।

चम्पतराय
महामंत्री-विश्व हिन्दू परिषद
संकट मोचन आश्रम, हनुमान मंदिर,
सेक्टर-6, रामकृष्णपुरम, नई दिल्ली-110022
दूरभाष: 011- 26103495