श्रीराम जय राम जय जय राम, শ্ৰীৰাংজয়ৰাংজয়জয়ৰাং, শ্রীরাম জয় রাম জয় জয় রাম , શ્રીરામ જય રામ જયજય રામ, ಶ್ರೀರಾಮಜಯರಾಮಜಯಜಯರಾಮ, ശ്രിറാം ജയ് റാം ജയ്‌ ജയ് റാം, శ్రీరాంజయరాంజయజయరాం

विश्व हिन्दू परिषद् के बढते चरण

  • स्थापना , स्थापना की पृष्ठभूमि
  • सम्मेलन पर्व
  • धर्म प्रसार कार्य
  • सामाजिक समरसता के कार्य
  • गोरक्षण-गोसंवर्धन के लिए कार्य
  • श्रीराम जन्मभूमि, गंगा व रामसेतु की रक्षा
  • सन्त शक्ति हिन्दू समाज का मार्गदर्शन करने को तत्पर हुई
  • यात्राएं जिनके कारण अभूतपूर्व जन जागरण हुआ
  • तीर्थ एवं धर्मयात्राओं के कार्य
  • मठ मन्दिर
  • संस्कृत, अर्चक पुरोहित, योग एवं वेद शिक्षा
  • समन्वय मंच
  • सेवा कार्य
  • दैवीय आपदा में सहायता

स्थापना , स्थापना की पृष्ठभूमि
विश्व हिन्दू परिषद भारत तथा विदेश में रह रहे हिंदुओं की एक सामाजिक, सांस्कृतिक संस्था है, सेवा इसका प्रधान गुण है। इसकी स्थापना हिन्दुओं के धर्माचार्यों और संतों के आशीर्वाद तथा विश्व विख्यात दार्शनिकों और विचारकों के परामर्श से हुई है।
स्थापना
एक हजार वर्ष के निरन्तर संघर्ष से प्राप्त स्वातंत्र के पश्चात् यह इच्छा स्वाभाविक थी कि भारत अपनी वैश्विक भूमिका निर्धारित करे। हिन्दू धर्माचार्य यह अनुभव कर रहे थे कि हिन्दू राष्ट्र के रूप में भारत विश्व के समस्त हिन्दुओं के आस्था केन्द्र के रूप में स्थापित हो और विश्व कल्याण के अपने प्रकृति प्रदत्त दायित्व का निर्वाह करे। इस उदात्त लक्ष्य की पूर्ति के लिए पूज्य स्वामी चिन्मयानंद जी (चिन्मय मिशन के संस्थापक) की अध्यक्षता में उन्हीं के मुम्बई स्थित आश्रम ‘‘सांदीपनी साधनालय’’ में आयोजित बैठक में मास्टर तारा सिंह, ज्ञानी भूपेन्द्र सिंह (अध्यक्ष-शिरोमणि अकाली दल),  डॉ0 के. एम. मुंशी, श्रीगुरु जी (तत्कालीन सरसंघचालक-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ), स्वामी शंकरानंद सरस्वती, राष्ट्र सन्त तुकड़ो जी महाराज, वी. जी. देशपांडे (तत्कालीन महामंत्री-हिन्दू महासभा) बैरिस्टर एच.जी. आडवाणी, पद्मश्री के. का. शास्त्री, श्रीपाद् शास्त्री किंजवड़ेकर, डाॅ0 वी. ए. वणीकर, प्रिंसीपल महाजन, के. जे. सोमय्या, राजपाल पुरी, श्री सूद एवं श्री पोद्दार (नैरोबी), श्रीराम कृपलानी (त्रिनिदाद), धर्मश्री मूलराज खटाऊ, डॉ0 नरसिंहाचारी आदि 40 से भी अधिक सन्तों एवं विचारकों ने चिन्तन किया। इस अवसर पर मास्टर तारा सिंह ने स्पष्ट कहा कि हिन्दू और सिख दो अलग जातियां नहीं हैं। सिखों का उत्थान तभी संभव है, जब तक हिन्दू धर्म जीवित है।
संस्था के नाम ‘‘विश्व हिन्दू परिषद’’ की घोषणा भी इन्हीं श्रेष्ठजनों ने विक्रमी संवत 2021, 29 अगस्त, 1964 ई0 श्रीकृष्ण जन्माष्टमी (भगवान श्रीकृष्ण का जन्मदिन) को की।
डॉ0 के. एम. मुंशी ने परिषद के उद्देश्यों को निम्नलिखित प्रकार से रखा –
1. हिंदू समाज को सुसंगठित एवं सुदृढ़ बनाने की ओर अग्रसर रहना। 2. आधुनिक युग के अनुकूल समस्त विश्व में हिंदू धर्म के नैतिक एवं आध्यात्मिक सिद्धांतों तथा आचार-विचार का प्रचार करना। 3. विदेश स्थित समस्त हिंदुओं से सुदृढ़ संपर्क स्थापित करना तथा उनकी सहायता करना।
संस्था का पंजीकरण  एक्ट 1860’ के अंतर्गत दिल्ली में 08 जुलाई, 1966 को हुआ (पंजीकरण संख्या एस 3106) और पंजीकृत संविधान में उद्देश्य लिखे गए-
1.  भारत तथा विदेशस्थ हिंदुओं में भाषा, क्षेत्र, मत, सम्प्रदाय और वर्ग सम्बन्धी भेदभाव मिटाकर एकात्मता का अनुभव कराना।
2.  हिन्दुओं को सुदृढ़ और अखंड समाज के रूप में खड़ा कर उनमें धर्म और संस्कृति के प्रति भक्ति, गौरव और निष्ठा की भावना उत्पन्न करना।
3.  हिंदुओं के नैतिक एवं आध्यात्मिक जीवन मूल्यों को सुरक्षा प्रदान कर उनका विकास और विस्तार करना।
4.  छुआछूत की भावना समाप्त कर हिन्दू समाज में समरसता पैदा करना।
5.  हिंदू समाज के बहिष्कृत और धर्मान्तरित, पर हिंदू जीवन पद्धति के प्रति लगाव रखने वाले भाई-बहिनों को हिंदू धर्म में वापस लाकर उनका पुनर्वास करना।
6. विश्व के भिन्न-भिन्न देशों में बसे हिंदुओं को धार्मिक एवं सांस्कृतिक आधार पर परस्पर स्नेह के सूत्र में बांधकर उनकी सहायता करना और उन्हें मार्गदर्शन देना।
7.  संपूर्ण विश्व में मानवता के कल्याण हेतु हिन्दू धर्म के सिद्धांतों और व्यवहार की व्याख्या करना।
स्थापना की पृष्ठभूमि
हिन्दू समाज हजार वर्ष के परतंत्रता काल में अपना स्वत्व, स्वाभिमान, गौरव और महत्व भूल गया। उसने उन सब महान विशेषताओं को अन्धकार में विलीन कर दिया, जिनके बल पर वह विश्वगुरु था।
इसी बीच ईसाई पादरियों द्वारा विदेशी डाॅलर के बल पर म0प्र0 में अशिक्षित, निर्धन और सामाजिक दृष्टि से कमजोर वर्गों के धर्मान्तरण के समाचार मिल रहे थे। इस समस्या की वास्तविकता जानने के लिए नियुक्त नियोगी कमीशन की रिपोर्ट 1957 में प्रकाशित होते ही देश में हडकंप मच गया।
विदेशों में बसे हिन्दुओं की संस्कृति और संस्कारों के संरक्षण की चिंता भी अनेक श्रेष्ठजनों को सता रही थी। त्रिनिदाद से भारत आये एक सांसद डा0 कपिलदेव ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री गोलवलकर (श्रीगुरु जी) से भेंट करके उन्हें कैराबियाई द्वीप समूह में रह रहे हिन्दुओं पर मंडराते खतरे की बात कही और विदेशस्थ हिन्दुओं से संपर्क स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
इन्हीं परिस्थितियों में यह अनुभव किया जाने लगा था कि हिंदू समाज के बीच काम करने वाला एक संगठन खड़ा किया जाए। स्वामी चिन्मयानंद जी के मन में भी हिंदुओं के एक विश्वव्यापी संगठन बनाने की इच्छा पनप रही थी। इसी मंथन का परिणाम है विश्व हिन्दू परिषद।
हिन्दू की परिभाषा
परिषद के संविधान में ‘हिन्दू’ की परिभाषा लिखी गई कि:-
‘‘जो व्यक्ति भारत में विकसित हुए जीवन मूल्यों में आस्था रखता है, वह हिंदू है। इससे भी आगे बढ़कर कहा गया कि जो व्यक्ति अपने आप को हिंदू कहता है, वह हिंदू है।‘’
इस परिभाषा के अंतर्गत वे सब सम्मिलित हो जाते हैं, जो अन्य देशों के नागरिक हैं; पर स्वयं को हिंदू कहते हैं।
घोष वाक्य
हिंदू समाज को गतिशील, सक्रिय और सुधरे रूप में प्रतिष्ठापित करने हेतु घोष वाक्य दिये गये।
‘‘हिन्दवः सोदराः सर्वे, ना हिंदु पतितो भवेत
मम दीक्षा हिंदू रक्षा, मम मंत्रः समानता।’’

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