श्रीराम जय राम जय जय राम, শ্ৰীৰাংজয়ৰাংজয়জয়ৰাং, শ্রীরাম জয় রাম জয় জয় রাম , શ્રીરામ જય રામ જયજય રામ, ಶ್ರೀರಾಮಜಯರಾಮಜಯಜಯರಾಮ, ശ്രിറാം ജയ് റാം ജയ്‌ ജയ് റാം, శ్రీరాంజయరాంజయజయరాం

विश्व हिन्दू परिषद् के बढते चरण

सन्त शक्ति हिन्दू समाज का मार्गदर्शन करने को तत्पर हुई
हिन्दू समाज का मार्गदर्शन करने के लिए वरिष्ठ धर्माचार्यों का केन्द्रीय मार्गदर्शक मण्डल, हिन्दू समाज के लिए सामान्य आचार संहिता का निर्माण करने के लिए विद्वत परिषद का गठन तथा गाँव-गाँव सन्तों के साथ सतत सम्पर्क रखने के लिए धर्माचार्य सम्पर्क विभाग का गठन हुआ। समय-समय पर समाज का मार्गदर्शन करने के लिए सभी परम्पराओं के प्रमुख सन्तों के, सभी जिलों का प्रतिनिधित्व करते हुए, अखिल भारतीय सम्मेलन हुए, जिन्हें ‘धर्मसंसद’ नाम दिया गया। मार्गदर्शक मण्डल की बैठकें एक वर्ष में न्यूनतम दो बार तथा धर्मसंसद के 12 अधिवेशन आवश्यकतानुसार हुए।
प्रथम धर्मसंसद
7-8 अप्रैल, 1984 को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में। अध्यक्षता तत्कालीन ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य पूज्य स्वामी शान्तानन्द जी महाराज ने की। प्रास्ताविक भाषण पूज्य स्वामी चिन्मयानन्द जी महाराज, सान्दीपनी साधनालय, चिन्मय मिशन, मुम्बई ने दिया। धर्मसंसद अधिवेशन में हिन्दुओं के 76 परम्पराओं के 558 धर्माचार्य सम्मिलित हुए थे।
आचार संहिता के निम्नलिखित 12 सूत्र निश्चित किए गए:-
01. वर्तमान युग के परिप्रेक्ष्य में हिन्दू समाज की एक सूत्रात्मकता की परिवृद्धि करने के लिए धर्म-व्यवस्था देना।
02. स्वस्थ समाज के निर्माण हेतु भ्रष्टाचार, अस्पृश्यता तथा दहेज जैसे रोगों के निवारण की व्यवस्था देना।
03. धर्म, संस्कृति, भाषा एवं महापुरुषों द्वारा निर्मित श्रेष्ठ परम्पराओं के प्रति उत्पन्न हुए भ्रमों का निवारण करते हुए उनमें गहन आस्था निर्माण करना।
04. सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था में धर्म-शिक्षा को अनिवार्य स्थान प्राप्त कराते हुए उपयुक्त साहित्य-सृजन द्वारा समुचित व्यवस्था करना एवं संस्कृत को नित्य प्रयोग की भाषा के रूप में विकसित कर राष्ट्रभाषा के स्थान पर प्रतिष्ठित कराना।
05. समाज में श्रम के प्रति प्रतिष्ठा का भाव जागृत करते हुए उपेक्षित एवं पिछड़े हुए बन्धुओं को समता एवं एकात्मता की अनुभूति कराना।
06. अभावग्रस्त क्षेत्रों में व्यापक सम्पर्क स्थापित कर वहाँ की समस्याओं का निराकरण करने के लिए ‘दत्तक‘ योजना कार्यान्वित कराना।
07. विभिन्न सम्प्रदायों के तीर्थ, मठ-मन्दिरादि पूजा स्थानों को, हिन्दू एकता के शक्तिशाली संस्कार केन्द्रों के रूप में विकसित कराना तथा प्राचीन केन्द्रों का जीर्णोद्धार कराना।
08. हर हिन्दू पर्व के पीछे जो सांस्कृतिक धरोहर है उसके परिपालन के लिए वर्तमान संदर्भ में व्यवस्था देना।
09. विदेशस्थ हिन्दुओं में हिन्दू जीवन मूल्यों के प्रति जीवन्त सम्पर्क के अभाव में घटती हुई आस्थाओं को दृढ़ मूल कराना।
10. किसी कारणवश परकीय धर्म स्वीकार किए हुए बन्धु अपने हिन्दू धर्म में स्वेच्छा से वापस आने के इच्छुक हों तो उनका स्वागत करते हुए हिन्दू समाज में आत्मसात् करने की व्यवस्था देना।
11. हिन्दू समाज एवं उसके मान-बिन्दुओं पर विश्व में कहीं भी होने वाले आघात के प्रति चेतना जागृत कराते हुए उचित समाधान की व्यवस्था देना।
12. शासन को हिन्दू हितों की रक्षा के लिए कटिबद्ध करते हुए हिन्दू संख्याबल को घटाने के विधर्मियों के कुचक्र को हर संभव उपाय से विफल करना।
पारित किए गए 4 प्रमुख प्रस्ताव –
01. श्रीराम जन्मभूमि, काशी विश्वनाथ और श्रीकृष्ण जन्मस्थान हिन्दुओं को लौटाए जाएं।
02. बंगलादेश की सरकार द्वारा हिन्दू सम्पत्ति को हड़पने के उद्देश्य से बनाए गए शत्रु सम्पत्ति नियम का विरोध किया जाए
03. पंजाब में आतंकवादियों और उग्रवादियों द्वारा किए गए हत्याकाण्डों आदि के कारण जन-मानस में उत्पन्न अस्थिरता और अशान्ति के शमन करने का प्रयास किया जाए
04. अशिक्षित, दुर्बल और निर्धन वनवासियों, गिरिवासियों आदि के क्षेत्रों के पूर्ण विकास के लिए मठ-मन्दिरों द्वारा उनको गोद लिया जाएं
महत्वपूर्ण उपलब्धि – श्रीराम जानकी रथों की यात्राओं के माध्यम से श्रीराम जन्मभूमि के संदर्भ में जन-जागरण करने का निर्णय लिया गया।
द्वितीय धर्मसंसद
31 अक्टूबर और 01 नवम्बर, 1985 ई. को उडुप्पी (कर्नाटक) में। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता जगद्गुरु मध्वाचार्य पूज्य स्वामी विश्वेशतीर्थ जी महाराज ने की। प्रास्ताविक भाषण ब्रह्मलीन सन्त पूज्य स्वामी चिन्मयानन्द जी महाराज-सांदीपनी साधनालय, मुम्बई ने किया था। देशभर से 851 सन्त सम्मिलित हुए थे।
उल्लेखनीय कार्य – हिन्दू समाज को चेतनायुक्त, सामथ्र्य सम्पन्न और सशक्त बनाने का संकल्प दोहराते हुए श्रीराम जन्मभूमि पर मन्दिर निर्माण के लिए घोषणा की गई कि आगामी शिवरात्रि तक मन्दिर पर लगा अवैध ताला यदि नहीं खोला गया तो इसके लिए आन्दोलन किया जाएगा। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन के संचालन के लिए सभी प्रान्तों के 34 धर्माचार्यों की एक समिति बनाई गई।
पारित किए गए प्रमुख प्रस्ताव –
01. राष्ट्र की एकता और अखण्डता की सतत दृढ़ता के लिए देवोत्थान एकादशी को ‘एकात्मता दिवस‘ के रूप में मनाया जाए और इसे ‘राष्ट्रीय दिवस‘ के रूप में स्वीकार कराया जाए।
02. विद्यालयों आदि में संस्कृत भाषा और अध्यात्म तथा योग की अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था कराई जाए।
03. समाज में फैली अस्पृश्यता, भ्रष्टाचार और दहेज जैसी कुरीतियों के निवारणार्थ अभियान चलाया जाए जिसमें धर्माचार्य, मठाधीश, सन्त-महात्मा आगे बढ़कर सहयोग करें।
04. सामान्य जीवन-यापन की निम्नतम सीमा रेखा से नीचे अवस्थित वनवासी, गिरिवासी और उपेक्षित बन्धुओं के उत्थान के कार्य में समाज के सभी वर्गों को जोड़कर उनमें यह विश्वास जगाया जाए कि वे हिन्दू समाज के अभिन्न अंग हैं।
05. विदेशस्थ हिन्दू छात्रों के हिन्दू संस्कार व संस्कृति की शिक्षा के लिए कार्य किया जाए।
06. पोप का भारत में आगमन यदि किसी सम्प्रदाय विशेष को प्रोत्साहन देने हेतु हो रहा है तो उसका राजकीय आमंत्रण रद्द करवाया जाए। वे एक मजहबी प्रमुख के नाते स्वतः ही भारत आएं, यही उनके लिए उचित होगा।
07. (अ) श्रीराम जन्मभूमि, श्रीकृष्ण जन्मस्थान और काशी विश्वनाथ मन्दिर, ये तीनों स्थान हिन्दू समाज को अविलम्ब सुपुर्द किए जाएं।
(ब) उत्तर प्रदेश सरकार यदि श्रीराम जन्मभूमि को अधिग्रहीत कर श्रीरामानन्दाचार्य जी को सुपुर्द नहीं करती है तो इसके लिए देशभर में एक प्रचण्ड आन्दोलन चलाया जाए।
08. धर्माचार्य द्वारा मठ-मन्दिरों से बाहर आकर मानव को मानव बनाकर भारत को विश्वगुरु बनाने के लिए सफल प्रयास किए जाएं।
महत्वपूर्ण उपलब्धि – श्रीराम जन्मभूमि पर लगा ताला खोलने के लिए निश्चित की गई तिथि से पूर्व ही सरकार ने ताला खोल दिया।
तृतीय धर्मसंसद
29 – 30 – 31 जनवरी, 1989 को महाकुम्भ के अवसर पर प्रयागराज में किया गया था। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कांची कामकोटि पीठ के जगद्गुरु पूज्य स्वामी शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती जी ने की। देशभर से पधारे लगभग 3000 सन्त-महन्त, धर्माचार्य, धर्मगुरु सम्मिलित हुए। पूज्य देवराहा बाबा सम्मेलन में पधारे।
उल्लेखनीय निर्णय – हिन्दू समाज के लिए पंचसूत्री विधि-निषेध कार्यक्रम की घोषणा की गई, श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर का प्रारूप स्वीकृत किया गया, श्रीराम जन्मभूमि के प्रश्न को अयोध्या और उत्तर प्रदेश की सीमा से बाहर निकालकर देशव्यापी बनाने तथा श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर के शिलान्यास के लिए देश के प्रत्येक ग्राम से पूजित एक-एक श्रीरामशिला और प्रत्येक हिन्दू से सवा-सवा रुपया भेंट स्वरूप लेने का निर्णय किया गया एवं शिलान्यास की निश्चित तिथि एवं स्थान की घोषणा की गई।
पंचसूत्रीय विधि निषेध
प्रथम सूत्र-
* विधि – हिन्दू स्वत्व जागरण निषेध – आत्म विस्मृत एवं स्वार्थ परायण जीवन का।
द्वितीय सूत्र-
* विधि – हिन्दू सशक्तिकरण  निषेध – ऊँच-नीच, छुआछूत एवं विघटनकारी मनोवृत्ति का।
तृतीय सूत्र-
* विधि – हिन्दू सदाचरण    निषेध – दहेज, भ्रष्टाचार जैसी कुरीतियों का।
चतुर्थ सूत्र-
* विधि – हिन्दू संरक्षण  निषेध- हिन्दू मानबिन्दुओं पर होने वाले प्रहारों के प्रति उदासीनता का।
पंचम सूत्र-
* विधि – राजनीति का हिन्दूकरण  निषेध – राजनीति द्वारा हिन्दू समाज के भ्रष्टीकरण,
विदेशीकरण एवं विभक्तीकरण का।
पारित किए गए प्रमुख प्रस्ताव –
01. इलाहाबाद नगर के लिए सभी जगह ‘प्रयाग‘ नाम का प्रयोग किया जाए।
02. अक्षयवट को जनता के दर्शन, पूजन और अर्चन के लिए खोल दिया जाए।
03. नवरात्रों में सभी घरों, मन्दिरों और धार्मिक स्थानों पर भगवे ध्वजों का आरोहण किया जाए।
04. भाषा, पंथ, जाति के नाम पर होने वाले संघर्षों से समाज की रक्षा करने हेतु सन्त शक्ति आगे आए।
05. हिन्दू देवस्थानों का प्रबन्ध स्वायत्तशासी धार्मिक मण्डलों द्वारा हो और मन्दिरों से प्राप्त निधि को हिन्दू धार्मिक कार्यों में ही लगाया जाए।
06. विश्व में जहाँ-जहाँ भी हिन्दुओं पर अत्याचार हो रहे हैं, उनको संयुक्त राष्ट्र संघ के सम्मुख लाया जाए।
07. संसद और विधान मण्डलों में ऐसे चरित्रवान और निष्कलंक प्रतिनिधियों को भेजा जाए जो हिन्दू हित रक्षण की घोषणा अपने चुनाव घोषणा पत्र में करें।
08. श्रीराम मन्दिर निर्माण के लिए भारत के प्रत्येक ग्राम से पूजित एक-एक श्रीरामशिला मँगाई जाए एवं हर हिन्दू से मन्दिर – निर्माण के निमित्त सवा – सवा रूपया भेंट स्वरूप लिया जाए।
09. गाँव -गाँव में भग्न मन्दिरों का जीर्णोद्धार करने तथा पिछड़े क्षेत्रों में नवीन मन्दिरों के निर्माण का प्रयास करने के लिए भारत हिन्दू मन्दिर जीर्णोद्धार न्यास का गठन किया जाए।
महत्वपूर्ण उपलब्धि – ब्रह्मर्षि पूज्य देवरहा बाबा की उपस्थिति में स्वीकृत श्रीराम मन्दिर के प्रारूप के करोड़ों चित्र देशभर में वितरित हुए, छः करोड़ लोगों तक सम्पर्क हुआ, पौने तीन लाख ग्रामों में श्रीरामशिला पूजित होकर अयोध्या आईं, और 9 नवम्बर, 1989 को पूर्व निश्चित समय और स्थान पर श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर के लिए शिलान्यास किया गया।
चतुर्थ धर्मसंसद
2 – 3 अप्रैल, 1991 को नई दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता जगद्गुरु शंकराचार्य ज्योतिष्पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी वासुदेवानन्द सरस्वती जी महाराज ने की। देशभर से लगभग 4000 सन्त-महंत सम्मिलित हुए।
उल्लेखनीय कार्य – 30 अक्टूबर एवं 02 नवम्बर, 1990 को अयोध्या में हुए सन्तों के अपमान और हिन्दू वीरों के बलिदान को ध्यान में रखते हुए मई, 1991 के महानिर्वाचन में अपने मत का विवेकपूर्ण उपयोग करने के लिए जनता का आह्वान किया गया।
4 अप्रैल, 1991 को दिल्ली में 25 लाख लोगों की उपस्थिति का इस सदी का सबसे बड़ा किन्तु शान्त, सुव्यवस्थित और अभूतपूर्व महाप्रदर्शन किया गया। इसी दिन सायंकाल में उत्तर प्रदेश सरकार का पतन हो गया।
पारित किए गए प्रमुख प्रस्ताव –
01. महामहिम राष्ट्रपति जी से श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण हेतु मार्ग प्रशस्त करने के लिए उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू करने एवं जन्मभूमि को न्यायालयीन नियंत्रण से मुक्त करके श्रीराम जन्मभूमि न्यास को सौंपने का अनुरोध किया गया।
02. आगामी महानिर्वाचन में अपनी मत शक्ति का विवेकपूर्ण ढंग से उपयोग करने के लिए जनता का आह्वान किया गया।
03. हिन्दू विनाश की देशव्यापी मुस्लिम योजना से सचेत और सावधान रहने और अपने धन, जन तथा महिलाओं के सम्मान की रक्षा के लिए हिन्दू जनता का आह्वान किया गया।
04. हिन्दू धर्मस्थानों के सरकार द्वारा किए जा रहे अधिग्रहण को रोकने की माँग की गई।
05. हिन्दू समाज में व्याप्त अस्पृश्यता, जातीय विद्वेष, दहेज, महिलाओं पर अत्याचार जैसी कुरीतियों को दूर कराने, उसमें फैले भ्रष्टाचार और सामाजिक अन्याय एवं उसके नैतिक मूल्यों में हुए ह्रास को रोकने के लिए सन्त शक्ति का आह्वान किया गया।
06. दूरदर्शन और आकाशवाणी द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रमों को भारत के सामाजिक एवं राष्ट्रीय जीवन के लिए महान संकट मानते हुए उन्हें छोड़ने का आह्वान किया गया।
07. भारत की सीमा में गोवंश हत्या पर पूर्ण और प्रभावी प्रतिबन्ध लगाने का आग्रह किया गया।
पंचम धर्मसंसद
30-31 अक्टूबर, 1992 को दिल्ली के रानी झाँसी स्टेडियम, केशवपुरम में। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानन्द सरस्वती जी महाराज ने की। धर्मसंसद अधिवेशन में लगभग 5000 सन्त-महंत सम्मिलित हुए।
उल्लेखनीय निर्णय – 06 दिसम्बर, 1992 की तिथि से अनवरत कारसेवा द्वारा श्रीराम मन्दिर निर्माण का कार्य करने का निश्चय किया गया।
पारित किए गए प्रमुख प्रस्ताव-
01. 02 नवम्बर, 1990 को अयोध्या में पराभव, परोत्कर्ष और पराधीनता के चिन्ह् को हटाकर पराक्रम, स्वोत्कर्ष और स्वाभिमान की प्रतिष्ठापना करने के लिए जीवन की आहुति देने वाले धर्मवीरों की पावन स्मृति में श्रद्धांजलि।
02. 06 दिसम्बर, 1992 को श्रीराम जन्मभूमि परिसर में पुनः कारसेवा का शुभारम्भ करने की घोषणा। श्रीराम कारसेवा के पुनः शुभारम्भ के लिए कारसेवकों से निश्चित समय पर अयोध्या में उपस्थित रहने का आह्वान।
03. पिछड़े और पीडि़त हिन्दू बन्धुओं को धर्मान्तरित किए जाने के बाद भी केन्द्र शासन द्वारा विशेष सुविधाएँ प्रदान करने के अविवेकपूर्ण निर्णय को हिन्दू समाज के विघटन और विनाश के पथ को प्रशस्त करने वाला मानते हुए इसे अविलम्ब वापस लिए जाने की माँग।
04. विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा हिन्दुओं की धार्मिक शोभायात्राओं पर अपने ही देश में विशिष्ट मार्गों एवं मोहल्लों से निकालने पर प्रतिबन्ध लगाने जैसी पक्षपातपूर्ण दुर्नीति की निन्दा करते हुए उपद्रवी और अराजक तत्त्वों के कठोरतापूर्वक दमन का आग्रह।
05. अल कबीर पशु वधशाला पर तुरन्त रोक लगाने की माँग।
06. हिन्दुओं के पावन पर्व, यथा – रामनवमी, जन्माष्टमी, शिवरात्रि, बुद्ध जयंती आदि पर शराब की बिक्री पर रोक लगाने के लिए सरकार से अनुरोध।
महत्वपूर्ण उपलब्धि – 06 दिसम्बर, 1992 से प्रारम्भ अनवरत कारसेवा के परिणामस्वरूप इसी दिन 468 वर्ष पूर्व निर्मित ढाँचा ध्वस्त कर दिया गया।
षष्टम धर्मसंसद
यह अधिवेशन देशभर में अंचलानुसार पाँच अलग – अलग स्थानों पर आयोजित किया गया, यथा-
* पश्चिमांचल: इस अंचल का सम्मेलन 3 – 4 फरवरी, 1994 को नासिक में हुआ।
* दक्षिणांचल: इस अंचल का सम्मेलन 24 – 25 फरवरी, 1994 को तिरुपति में हुआ।
* मध्यांचल: इस अंचल का सम्मेलन 17 – 18 मार्च, 1994 को काशी में हुआ।
* पूर्वांचल: इस अंचल का सम्मेलन 23 – 24 मार्च, 1994 को गुवाहाटी में हुआ।
* उत्तरांचल: इस अंचल का सम्मेलन 3 – 4 अप्रैल, 1994 को हरिद्वार में हुआ।
धर्मसंसद के पश्चिमांचल अधिवेशन में 2500, दक्षिणांचल में 300, मध्यांचल में 3500, पूर्वांचल में 250 और उत्तरांचल में 4000 सन्तों ने सहभागिता की।
विचारणीय विषय – पाँचों स्थानों पर स्थानीय समस्याओं और श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण के संकल्प को दोहराने के साथ-साथ निम्नलिखित बिन्दुओं पर विचार किया गया –
01. भारत में धर्मराज्य की पुनः प्रतिष्ठापना। 02. मानव समाज को अध्यात्मिक अधिष्ठान पर खड़ा करना।
03. आध्यात्मिक संस्कार केन्द्रों की सुव्यवस्था। 04. भारत के हिन्दू राष्ट्र होने की घोषणा तथा भारत की समृद्ध अतीत परम्परा की वाहिका संस्कृत भाषा की अनिवार्य शिक्षा।
05. सामाजिक अस्पृश्यता के कलंक का सम्पूर्ण निषेध एवं सामाजिक समरसता की प्रतिष्ठा का संकल्प।
06. भारत में हिन्दुओं के मतान्तरण पर कानूनी रोक तथा मतान्तरित भारतीय की किसी भी हिन्दू जीवन पद्धति से वापसी। 07. गोवंश के वध पर पूर्ण प्रतिबन्ध, गोमांस के निर्यात पर रोक तथा यान्त्रिक कत्लखानों के निर्माण पर पाबंदी।
08. विश्व हिन्दू परिषद पर लगा प्रतिबन्ध तत्काल हटे एवं केन्द्र सरकार श्रीराम जन्मभूमि न्यास से छीनी गई भूमि के साथ सम्पूर्ण परिसर न्यास को वापस होे। 09. जाति, पंथ, भाषा, क्षेत्र एवं वर्गवाद से समाज को ऊपर लाकर हिन्दुत्व का बोध कराना। 10. स्वदेशी अर्थनीति। 11. सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन एवं व्यसन मुक्ति।  12.हिन्दू जनसंख्या घटाने के विधर्मियों के जागतिक षड्यंत्र एवं सरकार द्वारा किया जा रहा उनका तुष्टीकरण। 13. प्रचार माध्यमों द्वारा हिन्दू स्वाभिमान पर किए जा रहे आघात।
महत्वपूर्ण उपलब्धि – श्रीराम जन्मभूमि परिसर की भूमि का केन्द्र सरकार द्वारा किया गया अधिग्रहण अनधिकृत है अतः इस विषय पर जन जागरण के लिए 14 से 24 अक्टूबर, 1994 की अवधि में सन्त यात्राएँ निकाली गईं। सरकार द्वारा नियुक्त ट्रिब्यूनल ने विश्व हिन्दू परिषद से प्रतिबंध हटा दिया।
सप्तम धर्मसंसद
16-17 नवम्बर, 1996 को पंचवटी चैक, नई दिल्ली में। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता पूज्य जगद्गुरु मध्वाचार्य स्वामी विश्वेशतीर्थ जी महाराज ने की। अधिवेशन में लगभग 3,000 सन्तों ने भाग लिया।
अधिवेशन में गंगाजी की पावनता, निरन्तरता और अक्षुण्णता को बनाए रखने के लिए संकल्प लिया गया।
जब तक भारतवर्ष रहेगा, जब तक मुझमें प्राण रहेंगे, तब तक मैं भागीरथी के पथ (प्रवाह) को नष्ट नहीं होने दूँगा। मैं भागीरथी का भक्त हूँ तथा गंगा स्रोत (मूल) का अवगाहक हूँ। मैं मुक्तिदात्री माता गंगा के बन्धन को कभी नहीं सहूँगा। जब तक मुझमें प्राण हैं, तब तक मैं गंगा पर बांध नहीं बनने दूँगा, यह मेरा दृढ़ संकल्प है, यह मेरा सुनिश्चय है। मुक्तिदात्री, भुक्तिदात्री, श्रेय एवं प्रेय की प्रदात्री गंगा को निश्चय ही मैं सब दिशाओं के दूषणों से रहित कर मुक्त करूँगा।  कामदेव के शत्रु भगवान शिव के मस्तक पर सुशोभित सब मनुष्यों के दुःखों को क्षणभर में नष्ट करने वाली एवं सुन्दर शैल-शिखरों से तरंगित गंगा को मैं नष्ट नहीं होने दूँगा।
पारित किए गए प्रस्ताव –
01. गंगोत्री से गंगासागर तक ‘गंगा बचाओ‘ अभियान में जुटने के लिए जनता का आह्वान।
02. गोवंश रक्षा हेतु सब प्रकार के बलिदान तथा लक्ष्य प्राप्ति तक सतत संघर्षरत रहने का अनुरोध।
03. श्रीराम जन्मभूमि, श्रीकृष्ण जन्मस्थान तथा काशी विश्वनाथ मन्दिर तीनों स्थानों से अपना दावा वापस लेने के लिए मुस्लिम नेताओं से आग्रह तथा हिन्दू समाज और सन्तों से इन स्थानों के लिए सर्वस्व बलिदान को सदैव तत्पर रहने का आह्वान किया गया।
04. प्रचार माध्यमों द्वारा लाए जाने वाले सांस्कृतिक प्रदूषण को रोकने, नारी को विलासिता  की मूर्ति मात्र प्रदर्शित करने और आकाशवाणी तथा दूरदर्शन को अपनी काम – भोग परायण नीति में अविलम्ब सुधार करने को बाध्य करने के लिए महिला समाज से अनुरोध किया गया।
05. सामाजिक समरसता के पवित्र कार्य में एकजुट होकर लगने के लिए समाज के सभी बन्धुओं से आग्रह तथा पूज्य सन्तों से पिछड़े बन्धुओं के मध्य विशेष कार्य को लेकर समाज का मार्गदर्शन करने का अनुरोध किया गया।
06. दैनन्दिन जीवन में काम में आने वाली वस्तुओं का चाहे वे गुणवत्ता में विदेशी वस्तुओं की अपेक्षा हल्की ही क्यों न हों, प्रयोग करने के लिए देशवासियों से आग्रह तथा स्वदेशी वस्तु निर्माताओं से अपनी वस्तुएं विश्व मानक के अनुरूप तैयार करने का अनुरोध किया गया।
07. केन्द्रीय तथा प्रान्तीय सरकारों से धर्मान्तरण के राष्ट्रघाती अभियान को रोकने के लिए कानून बनाकर इसे संज्ञेय अपराध घोषित करने और विदेशी धन के विनियोग पर कड़ी निगाह रखने का आग्रह एवं सन्तों से इस राष्ट्र विरोधी वायुमण्डल को समाप्त करने के लिए सामाजिक समरसता का मधुर वातावरण बनाने का अनुरोध किया गया।
08. हिन्दू दलितों को मिलने वाली आरक्षण की सुविधा धर्मान्तरित दलित ईसाइयों को भी देने के लिए लाए जाने वाले बिल को संसद में न लाने के लिए सरकार को सन्त समाज द्वारा चेतावनी दी गई।
केरल से पधारे जगद्गुरु स्वामी सत्यानन्द जी द्वारा भी इसी संदर्भ में एक तथा केरल सरकार से ‘हरिवर्षनम्‘ परियोजना को तुरन्त कार्यान्वित करने और राष्ट्रपति से केरल सरकार द्वारा पारित अनुसूचित जनजातियों से सम्बंधित कतिपय विधेयकों को स्वीकृति प्रदान न करने के अनुरोध से सम्बंधित दो अन्य प्रस्ताव प्रस्तुत किए गए।
09. कन्या – भू्रण की हत्या के जघन्य पाप से अपने को बचाए रखने और संयत जीवन जीकर देश की बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रित रखने में सहभागी होने के लिए सन्तों का हिन्दू समाज से अनुरोध।
10. श्रीकृष्ण जन्मस्थान की लीलाभूमि की घेराबन्दी करके तथा पूर्ण परिसर को परोक्ष रूप से पुलिस छावनी बनाकर सुरक्षा के नाम पर सन्तों, माताओं और बहनों को अपमानित करने के लिए सरकार की भत्र्सना करते हुए देवरहा बाबा की भविष्यवाणी को क्रियान्वित करने के लिए श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर भव्य मन्दिर निर्माण हेतु सरकार से कानून बनाने का आग्रह।
11. तिब्बत में तैनात चीनी सैनिकों को हटाने, सम्पूर्ण तिब्बत को शान्ति एवं अहिंसा का क्षेत्र घोषित करने, तिब्बत के पर्यावरण को दूषित होने से बचाने तथा कैलास मानसरोवर की तीर्थयात्रा को बिना किसी प्रतिबन्ध के सुविधापूर्ण व्यवस्था करने के लिए सरकार से यथावश्यक व्यवस्था कराने के लिए अनुरोध।
12. मकबूल फिदा हुसैन द्वारा हिन्दू देवी-देवताओं के नग्न और अश्लील चित्रांकन करने की प्रवृत्ति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उसका समर्थन करने वालों की तीव्र भत्र्सना।
13. हिन्दू जीवन-मूल्यों में अहर्निश हो रहे अवमूल्यन पर चिन्ता प्रकट करते हुए पूज्य सन्तों से समाज का मार्गदर्शन करके, उसे उचित दिशा-बोध देकर आर्य परम्परा की निधि की रक्षा करने का अनुरोध।
14. हिन्दू धर्मस्थानों और मठ-मन्दिरों के देवस्व पर गिद्ध दृष्टि रखने तथा उनका अधिग्रहण करने की सरकारी प्रवृत्ति की तीव्र भत्र्सना करते हुए उन्हें सरकारी नियंत्रण से मुक्त करके सम्बंधित सम्प्रदाय के धर्माचार्यों का बोर्ड बनाकर उन्हें सौंपने का अनुरोध।
15. अयोध्या नगरी की सड़कों, नालियों, बिजली आदि की व्यवस्था के सुधार की दृष्टि से गठित विशेष विकास प्राधिकरण को तत्कालीन राज्यपाल श्री रोमेश भण्डारी द्वारा 09 नवम्बर, 1996 से समाप्त कर दिए जाने और अयोध्या के विकास को फैजाबाद विकास प्राधिकरण से जोड़ दिए जाने की तीव्र भत्र्सना।
16. सरकारों द्वारा हिन्दू मठ-मन्दिरों के अधिग्रहण का विरोध करने के लिए जन जागरण करने के लिए जनता का आह्वान।
17. देश में कोई भी प्राणी भूखा न रहे, इस दृष्टि से मठ-मन्दिरों के अधिष्ठाताओं, आचार्यों, महन्तों के साथ-साथ श्रद्धालु हिन्दू समाज से अन्नदान के माध्यम से अपने-अपने क्षेत्र में अन्न क्षेत्र चलाने का अनुरोध।
महत्वपूर्ण उपलब्धि – गंगाजी को प्रदूषणरहित बनाने तथा इस पर बनने वाले टिहरी बाँध के विरोध में जन-जागरण हेतु कोलकाता से प्रयाग तक की ‘गंगा यात्रा‘ निकालने के साथ-साथ घोषित अन्य कार्यक्रम।
अष्टम धर्मसंसद
6-7 फरवरी, 1999 को अहमदाबाद, लगभग 3,500 सन्तों ने भाग लिया।
निर्णय – सन्तों द्वारा हिन्दुओं के धर्मान्तरण को रोकने के लिए राष्ट्रव्यापी जन-जागरण पर निकलने का निश्चय किया गया।
मानवता के अभ्युदय एवं उत्कर्ष के लिए हिन्दू संस्कारों एवं हिन्दू चेतना के विस्तार को आवश्यक मानते हुए विश्व हिन्दू परिषद के हिन्दू एजेण्डे के प्रत्येक सूत्र के क्रियान्वयन के लिए किया गया आह्वान।
नवम् धर्मसंसद
19-20-21 जनवरी, 2001 को प्रयाग में महाकुम्भ के अवसर पर। लगभग 6000 सन्तों ने भाग लिया।
निर्णय – केन्द्र सरकार श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण की समस्त बाधाओं को अविलम्ब हटाए। ताकि आगामी शिवरात्रि अर्थात 12 मार्च, 2002 के पश्चात किसी भी शुभ दिन से मन्दिर निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया जा सके। इस अभियान के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा का निर्माण करने तथा हिन्दुत्व का जागरण करने और मन्दिर निर्माण के कार्य को गति प्रदान करने की दृष्टि से तीन कार्यक्रमों की घोषणा की गई –  पुरुषोत्तम मास में भगवान शंकर का जलाभिषेक  विजयमहामंत्र ‘श्रीराम जय राम जय जय राम‘ का जप यज्ञ  अयोध्याजी से दिल्ली तक सन्त चेतावनी यात्रा
पारित किए गए प्रमुख प्रस्ताव –
01. धर्मसंसद ने कट्टरवादी मुस्लिम समाज और जेहादी प्रवृत्ति पर चिन्ता व्यक्त करते हुए उनसे आग्रह किया कि वे जेहाद और आतंकवाद का रास्ता छोड़कर भारत एवं भारतीय समाज के उत्थान के लिए किए जा रहे प्रयासों में सम्मिलित हों।
02. त्रिपुरा सहित समस्त उत्तर पूर्वांचल मंे चल रही अलगाववादी एवं आतंकवादी प्रवृत्ति के पीछे चर्च के समर्थन को देखते हुए धर्मसंसद ने मांग की कि, ‘धर्मान्तरण‘ पर प्रतिबन्ध लगाने का केन्द्रीय कानून बनाकर चर्च की राष्ट्र विरोधी गतिविधियों पर अंकुश लगाया जाए और त्रिपुरा में कड़े कदम उठाकर वहाँ राष्ट्रवादी एवं हिन्दू धर्मावलम्बियों की रक्षा की जाए।
03. टिहरी बांध की अनुपयोगिता तथा गंगा की उपयोगिता की महत्ता को सिद्ध करते हुए गंगाजी की पवित्रता बनाए रखने के लिए सरकार से मांग करते हुए धर्मसंसद ने हिन्दू समाज से प्रयाग की पवित्रता, संगम की शुद्धता तथा भगवती गंगा के पुण्य प्रवाह को साक्षी कर यह संकल्प लेने को कहा कि जब तक वे तथा उनका विश्वास अक्षुण्ण है तब तक गंगा की पवित्रता व प्रवाह पर कोई आंच नहीं आने देंगे। गंगा की निर्मलता और अविरलता के लिए वे अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए तत्पर रहेंगे।
05. केन्द्र सरकार एवं प्रान्तीय सरकारों से मठ-मन्दिरों का प्रबन्ध वहाँ की सरकारों के नियंत्रण में न रखकर एक स्वायत्तशासी संगठन के माध्यम से कराने का अनुरोध किया गया और यह भी कहा गया कि स्वायत्तशासी संगठन में साधु-सन्त, सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति, सरकारी अधिकारी, समाजसेवी और धार्मिक जनप्रतिनिधि सम्मिलित किए जाएं।
दशम् धर्मसंसद
22-23 फरवरी, 2003 को रामलीला मैदान, दिल्ली में। लगभग 9 हजार सन्त सम्मिलित हुए।
निर्णय – धर्मसंसद ने विश्व वन्दनीया भारत माता की सनातन संतति हिन्दू जाति और उसकी महान धार्मिक एवं संास्कृतिक अस्मिता की उसकी अपनी ही मातृभूमि, पितृभूमि और पुण्यभूमि में हो रही घोर दुर्दशा के निराकरण हेतु आसेतु हिमाचल अखण्ड भारत में पूर्ण प्रभुता सम्पन्न अजेय, अभय, सक्षम, समर्थ, सम्पन्न, समृद्ध, अनाक्रमणकारी, विश्ववत्सल, धर्मनिष्ठ, सुसंस्कृत और स्वाभिमानी हिन्दू राष्ट्र की पुनप्र्रतिष्ठा का दृढ़ संकल्प व्यक्त करते हुए सभी भारतमूलीय दर्शनों, उपासना पद्धतियों, पंथों, मतों और सम्प्रदायों के अनुयायी विराट हिन्दू समाज का एवं उसके मार्गदर्शक आचार्यों, गुरुओं तथा सन्तों और भारत के सभी धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक संगठनों का सादर और सस्नेह आह्वान किया कि वे सब विश्वमानव परिवार के लिए कल्याणकारी इस पवित्र ईश्वरीय कार्य में, अपने पूर्वाग्रहों और सीमित स्वार्थों से मुक्त होकर अखण्ड मातृभूमि और महान हिन्दू राष्ट्र के अभ्युत्थान हेतु संलग्न और समर्पित हो।
पारित किए गए प्रमुख प्रस्ताव –
01. सभी दलों से अनुरोध किया गया कि वे निहित राजनीतिक स्वार्थों से ऊपर उठकर श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण के लिए अपेक्षित कदम उठाएं और भारतीय अस्मिता एवं आस्था का सम्मान करें। साथ ही भारत सरकार से अनुरोध किया गया कि वह आवश्यक और अनुकूल व्यवस्था सुनिश्चित करे जिससे आज जहाँ रामलला विराजमान हैं, उस स्थान सहित सम्पूर्ण श्रीराम जन्मभूमि परिसर ‘श्रीराम जन्मभूमि न्यास‘ को सौंपा जा सके। यदि ऐसा नहीं होता है तो-
 बाबर द्वारा श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर ध्वंस के समय से लेकर विगत 27 फरवरी, 2002 को गोधरा में रचे गए षड्यंत्र तक बलिदान हुए रामसेवकों और श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण के संकल्प को पूरा करने के लिए आगामी 27 फरवरी, 2003 (गुरुवार) को देश के प्रत्येक नगर व प्रखण्ड में धरना एवं प्रदर्शन के आयोजन किए जाएंगे और मन्दिर निर्माण विरोधी समस्त व्यक्तियों की वास्तविकता को जनता के समक्ष उजागर किया जाएगा।
02. धर्मसंसद ने भारत सरकार को चेतावनी दी कि- टिहरी के अव्यवहारिक विशाल बांध के रूप में भारत माता के पश्चात गंगामाता की भी हत्या कर देने की इस दुरभि सन्धि से सम्पूर्ण हिन्दू जगत क्षुब्ध है। गंगा के बिना भारत के अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अतः गंगामाता के निर्मल स्वरूप को पुनप्र्रतिष्ठापित करने के लिए अविलम्ब युद्ध स्तरीय कार्यक्रम की घोषणा करे और उसे क्रियान्वित करे।
03. धर्मसंसद ने केन्द्र सरकार का आह्वान किया कि वह आतंकवाद को कुचलने के लिए अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति प्रकट करे। आतंकवाद की जननी मदरसों पर प्रतिबन्ध लगाए। दारूल उलूम देवबन्द, तब्लीग, हले-हदीस, दावतें इस्लाम आदि पर रोक लगाए और जेहाद के विरुद्ध मृत्युदण्ड का कानून बनाए। साथ ही कश्मीर में पोटा लागू करके पाकिस्तान व बंगलादेश में चल रहे आतंकवादी प्रशिक्षण केन्द्रों को हमला करके नष्ट करे।
04. धर्मसंसद ने भारत में 03 करोड़ बंगलादेशी घुसपैठियों की विकराल समस्या पर गहन चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा कि ‘भारत माँ के दुश्मन ये बंगलादेशी घुसपैठिए किसी रहम के हकदार नहीं हैं अतः जहाँ इन्हें पहचानकर भारत से बाहर धकेलने की आवश्यकता है वहीं ऐसी परिस्थिति निर्माण करने की आवश्यकता है जिससे कोई भी घुसपैठिया भारत में रह ही न सके। साथ ही बंगलादेशी घुसपैठियों को हटाने का समयवध कार्यक्रम घोषित करे। पश्चिम बंगाल सरकार को बर्खास्त करे, असम में लागू प्डक्ज् कानून को समाप्त करे तथा बंगलादेश एवं पाकिस्तान में हो रहे हिन्दुओं पर अमानवीय अत्याचारों को रोके।
05. धर्मसंसद ने असम में अवैध घुसपैठ निर्धारण पंचाट अधिनियम को अविलम्ब निरस्त करने के लिए मत व्यक्त किया। साथ ही यह भी कहा कि यदि आवश्यक हो तो एतदर्थ संसद का संयुक्त अधिवेशन भी बुलाया जाए अन्यथा जिन आतंकवादियों के मुख्यालय बंगलादेश में हैं, वे अपनी जिहादी गतिविधियों का विस्तार उत्तर-पूर्व तक करके हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा को अकल्पनीय संकट में डाल देंगे और इसके दोषी अल्पसंख्यक राजनीति के दृष्टिकोण से सोचने वाले व्यक्ति ही होंगे।
06. धर्मसंसद ने भारत सरकार एवं सभी राज्य सरकारों से आग्रह किया कि नियोगी कमीशन, रेगे कमीशन और वेणुगोपाल के जांच परिणामों को ध्यान में रखते हुए धर्मान्तरण पर रोक लगाने हेतु कानून बनाकर धर्मान्तरण को संगीन अपराध घोषित करे।
07. बंगलादेश में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों के संदर्भ में धर्मसंसद ने बंगलादेश सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि वहाँ के हिन्दू समाज को अनाथ न समझे, पूरे विश्व का हिन्दू समाज अपने सहोदरों पर होने वाले अत्याचारों को रोकने के लिए कृतसंकल्प है। धर्मसंसद ने भारत सरकार से मांग की कि बंगलादेश में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों को रोकने के लिए वहां की सरकार को विवश करे।
ग्यारहवीं धर्मसंसद
धर्मसंसद के 11वें अधिवेशन का आयोजन देशभर में 6 अलग-अलग स्थानों पर किया गया, यथा-
* उत्तर-हरिद्वार: 13-14 दिसम्बर, 2005 को हरिद्वार में। उŸारांचल, मेरठ, मध्यभारत, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, पंजाब, हरियाणा, इन्द्रप्रस्थ, जयपुर, ब्रज प्रान्तों के 1294 सन्त सम्मिलित हुए।
* पश्चिम-बड़ताल: 21 और 22 जनवरी, 2006 को बड़ताल (गुजरात) में। चित्तौड़, मालवा, कोंकण, सौराष्ट्र, उत्तर गुजरात, दक्षिण गुजरात, विदर्भ, महाराष्ट्र, देवगिरि, जोधपुर प्रान्तों के 2199 सन्त।
* मध्य-प्रयागराज: 1 और 2 फरवरी, 2006 को प्रयागराज (उ0प्र0) में। महाकौशल, उत्तर बिहार, दक्षिण बिहार, अवध, गोरखपुर, काशी, कानपुर प्रान्तों के 1365 सन्त।
* उत्तर पूर्वांचल-गुवाहाटी: 10 और 11 फरवरी, 2006 को गुवाहाटी (असम) में। असम एवं उसके सभी उप-प्रान्तों के 439 सन्त।
* पूर्व-जगन्नाथपुरी: 18 और 19 फरवरी, 2006 को जगन्नाथपुरी (उड़ीसा) में। झारखण्ड, पू0 उत्कल, प0 उत्कल, उ0 बंगाल, द0 बंगाल, छत्तीसगढ़ प्रान्तों के 3194 सन्त।
* दक्षिण-तिरुपति: 4 और 5 मार्च, 2006 को तिरुपति (आन्ध्र प्रदेश) में। केरल, तमिलनाडु, उत्तर कर्नाटक, दक्षिण कर्नाटक, पूर्व आन्ध्र, पश्चिम आन्ध्र प्रान्तों के 1176 सन्त उपस्थित रहे।
उल्लेखनीय कार्य – 11वीं धर्मसंसद में संगम तट पर गंगा व गाय की रक्षा तथा श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मन्दिर और हिन्दू वोट बैंक बनाने के लिए संघर्ष करने का संकल्प लिया गया। विश्व हिन्दू परिषद के शीर्ष नेताओं और सन्तों की मौजूदगी में अगले साल तक मन्दिर निर्माण की राह में आने वाली हर बाधा को उखाड़ फेंकने का ऐलान किया गया। एक साल के दौरान हिन्दुत्व की धारा को और तेजी से फैलाने की हुंकार भरी गई।
पारित किए गए प्रस्ताव – 9 प्रस्ताव पारित किए गए जिसमें गाय, गंगा, श्रीराम जन्मभूमि, मठ-मन्दिरों के अधिग्रहण, हिन्दू वोट बैंक, धर्मान्तरण, इस्लामिक आतंकवाद के मुद्दे शामिल हैं।
केन्द्रीय मार्गदर्शक मण्डल
विश्व हिन्दू परिषद के विधान में उल्लिखित मार्गदर्शक मण्डल की धारा के अनुपालन की दृष्टि से प्रारम्भ में परमपूज्य स्वामी सत्यमित्रानन्दगिरि जी महाराज, भानुपुरा (मन्दसौर) तथा परमपूज्य प्रभुदत्त जी ब्रह्मचारी, झूसी (इलाहाबाद) को मार्गदर्शक मण्डल के सम्मानित सदस्य के रूप में मनोनीत किया गया। विश्व हिन्दू परिषद के माध्यम से सम्पूर्ण हिन्दू समाज को इन दोनों पूज्य सन्तों द्वारा मार्गदर्शन का यह पवित्र कार्य चल ही रहा था कि जनवरी, 1978 ई. में कर्णावती (गुजरात) में सम्पन्न प्रबन्ध समिति की बैठक में सान्दीपनी साधनालय के परमपूज्य स्वामी श्री चिन्मयानन्द जी महाराज, उडुप्पी के परमपूज्य जगद्गुरु मध्वाचार्य स्वामी विश्वेशतीर्थ जी महाराज और वैदिक परम्परा के महान उद्धारक परमपूज्य स्वामी गंगेश्वरानन्द जी महाराज को भी मार्गदर्शक रूप में मनोनीत किया गया। इस प्रकार पंच-परमेश्वर के रूप में भारत के परम प्रतिष्ठित पाँच परमपूज्य धर्माचार्यों को मार्गदर्शक मण्डल के सम्मानित सदस्यों के रूप में मनोनीत किया। बाद में भी समय-समय पर मार्गदर्शक मण्डल के सदस्यों की संख्या में वृद्धि होती रही। शनैः शनैः यह संख्या बढ़ती गई, वर्तमान में मार्गदर्शक मण्डल में सम्पूर्ण भारत के सभी प्रान्तों के सभी सम्प्रदायों, परम्पराओं के 400 सन्त धर्माचार्य सम्मिलित हैं। प्रान्तों में मार्गदर्शक मण्डल बनाए गए। प्रान्त मार्गदर्शक मण्डल के सम्मेलन होते हैं।
1982 ई. के मई मास में हरिद्वार में सम्पन्न केन्द्रीय मार्गदर्शक मण्डल की बैठक में तीन प्रस्ताव, यथा- (१) प्रत्येक राज्य में पूज्य सन्तों का मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए प्रान्तीय मार्गदर्शक मण्डलों का गठन किया जाए, (२) इनकी गतिविधियों की सूचना केन्द्र को दी जाए तथा (३) प्रान्तीय मार्गदर्शक मण्डलों के पूज्य सन्तों को केन्द्रीय धर्मसंसद का सदस्य मानकर भारत के विभिन्न स्थानों में धर्मसंसदों का आयोजन किया जाए, पारित किए गए। इस बैठक में उपस्थित सन्त इस प्रकार थे-
उत्तर प्रदेश: 01. आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी प्रकाशानन्द जी (हरिद्वार), 02. स्वामी बृजकिशोर जी पुरी (हरिद्वार), 03. आचार्य स्वामी जगदीशमुनि जी (हरिद्वार), 04. स्वामी अभयानन्द जी (हरिद्वार), 05. स्वामी हीरानन्द जी (हरिद्वार), 06. स्वामी विवेकानन्द जी (हरिद्वार), 07. स्वामी लक्ष्मणपुरी जी (हरिद्वार), 08. सेक्रेटरी श्री पंचायती अखाड़ा (हरिद्वार), 09. स्वामी गीतानन्द जी (हरिद्वार), 10. आचार्य श्री श्रीराम जी शर्मा (हरिद्वार), 11. महंत श्री गिरधरनारायणपुरी जी (हरिद्वार), 12. स्वामी सुन्दरदास जी (हरिद्वार), 13. स्वामी सत्यमित्रानन्द जी (निवृत्त शंकराचार्य) (हरिद्वार), 14. स्वामी हरिहरानन्द जी (हरिद्वार), 15. डाॅ0 स्वामी श्यामसुन्दरदास जी शास्त्री (हरिद्वार), 16. ऋषि केशवानन्द जी (हरिद्वार), 17. स्वामी परमानन्द जी (हरिद्वार), 18. स्वामी महेश्वरदेव जी (हरिद्वार), 19.महामण्डलेश्वर स्वामी सच्चिदानन्द जी महाराज (हरिद्वार), 20.महन्त कर्णपुरी जी (हरिद्वार), 21. स्वामी सुरेश्वरानन्द जी (हरिद्वार), 22. स्वामी सूर्यदेव जी आचार्य (हरिद्वार), 23. महंत अवेद्यनाथ जी महाराज (गोरखपुर) 24. महामण्डलेश्वर स्वामी रामदास शास्त्री (वृन्दावन) 25. जगदाचार्य स्वामी नारदानन्द जी (सीतापुर) 26. स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य, गौडेश्वराचार्य (वृन्दावन), 27. स्वामी ब्रह्मानन्द जी, (सहारनपुर) पश्चिम बंगाल: 28. स्वामी देवानन्द जी (हुगली) 29. स्वामी सुमेयानन्द जी (हुगली) बिहार: 30. स्वामी जयराम प्रपन्न महाराज (राँची), उड़ीसा: 31. महंत अयोध्यादास जी (पुरी), राजस्थान: 32. स्वामी शालिग्रामदास जी (रेवासा), 33. महामण्डलेश्वर स्वामी महेशानन्द जी महाराज (आबू पर्वत), मध्यप्रदेश: 34. स्वामी सत्यकामानन्द जी (भोपाल), 35. स्वामी अमरानन्द जी, (रायगढ़) पंजाब: 36. स्वामी हिममुनि जी (फरीदकोट), 37. स्वामी त्रिलोकीनाथ बाबा जी (कपूरथला), 38. महन्त मुरारीलाल जी (नाभा), 39. महामण्डलेश्वर स्वामी निरंजनानन्द जी महाराज (जालन्धर), दिल्ली: 40. स्वामी राघवानन्द जी, 41. स्वामी विजयानन्द जी, (नई दिल्ली ), बम्बई: 42. पूज्य ब्रह्मचारी विश्वनाथ जी, (बम्बई)।

महिला सन्तों के मध्य संगठन एवं उनके द्वारा सेवा कार्याें का प्रारम्भ करने के लिये साध्वी शाक्ति परिषद का गठन हुआ, लगभग 400 साध्वियाँ साध्वी शक्ति परिषद के सम्पर्क में है हरिद्वार में साध्वियों की ओर से निराश्रित बालिकाओं का एक केन्द्र 2001 में प्रारम्भ हुआ, आज मातृ आंचल नामक इस केन्द्र में 75 बालिकाएं हैं, जिनके आवास, भोजन, शिक्षण, वस्त्र, चिकित्सा आदि सम्पूर्ण व्यवस्थाएं समाज के सहयोग से साध्वी करती है।

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