श्रीराम जय राम जय जय राम, শ্ৰীৰাংজয়ৰাংজয়জয়ৰাং, শ্রীরাম জয় রাম জয় জয় রাম , શ્રીરામ જય રામ જયજય રામ, ಶ್ರೀರಾಮಜಯರಾಮಜಯಜಯರಾಮ, ശ്രിറാം ജയ് റാം ജയ്‌ ജയ് റാം, శ్రీరాంజయరాంజయజయరాం

विश्व हिन्दू परिषद् के बढते चरण

यात्राएँ-जिनके कारण अभूतपूर्व जनजागरण हुआ
यात्राओं का महत्व-
जन-जागरण का मुख्य आधार जन-सम्पर्क और जन-सम्पर्क का सशक्त माध्यम है धर्मयात्राएँ। यात्राओं के दौरान असंख्य लोगों से सम्पर्क आता है। भारत तो तीर्थयात्राओं का ही देश है अतः यहाँ जन-सम्पर्क के लिए यात्राएँ और भी अधिक महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी हैं। आसेतु हिमाचल बसे हिन्दू समाज में राष्ट्रीयता की भावना भरने, सांस्कृतिक स्वाभिमान जगाने और धर्म के प्रति आस्था पैदा करने के लिए यात्राएँ मेरुदण्ड सिद्ध हैं। इसी दृष्टिकोण के कारण समय-समय पर विभिन्न यात्राओं की योजना बनी। फलतः हिन्दू समाज में नई चेतना जागृत हुई।
प्रमुख यात्राएं इस प्रकार रहीं:-
01. 1982 की तमिलनाडु ज्ञान रथम् यात्रा
रथ यात्रा जून, 1982 में निकाली गई थी। रथ में भगवान मुरुगन की मूर्ति प्रतिष्ठित थी। यह यात्रा 18 मास तक चली। 20825 किलोमीटर चलकर लगभग 900 ग्रामों में भ्रमण किया। 418 दिनों में 970 स्थानों पर 4 लाख से भी अधिक अभिषेक के कार्यक्रम हुए। यात्रा की अवधि में 6 लाख से अधिक लोगों से सम्पर्क हुआ।
इसे पिछड़े इलाकों में जहाँ हरिजन तथा अन्य पिछड़े वर्गों के लोग बहुतायत में रहते थे विशेष रूप से ले जाया गया। जिन लोगों को स्वामी मुरुगन के दर्शनों का कभी सौभाग्य ही नहीं मिला था, उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। उनकी भक्ति-भावना का उद्वेग सभी सीमाओं को लांघ गया था। पूजा के लिए भक्तों का तांता लगा रहता था। कहीं-कहीं पूजा का कार्यक्रम आधी रात तक चलता था। इस क्रम को शक्ति रथम् और ज्ञान दीपक रथम् ने आगे बढ़ाया। तमिलनाडु में इस परियोजना का बड़ा दूरगामी प्रभाव पड़ा।
02. 1983 की केरल धर्मयात्रा
मार्च, 1983 में धर्माचार्यों ने धर्मयात्रा के नाम से यात्रा निकाली। केरल की दक्षिण और उत्तरी सीमाओं से एक साथ दो रथ निकाले गए। रथों में क्रमशः कन्याकुमारी और मुकाम्बिका मन्दिरों से प्राप्त दैवी ज्योति स्थापित की गई। रथों ने 25 दिनों की अवधि में 14 जिलों का परिभ्रमण किया। परिभ्रमण के दौरान सन्तों ने मुख्य रूप से हरिजन और गिरिजन बस्तियों का दौरा किया। उनकी झोपडि़यों में जाकर उनके द्वारा बनाया गया भोजन ग्रहण किया। उन लोगों का प्रेम और स्नेहपूर्ण व्यवहार तथा उनकी निश्छलता को देखकर सन्तों के नेत्र अश्रुपूरित हो गए। यात्रा विवरण- सहभागी सन्त-52, परिभ्रमित ताल्लुके-52, परिभ्रमित स्थान-798, हरिजन-गिरिजन बस्तियाँ-580, सहभागी व्यक्ति-2,10,000, जनसभाएं-60, शोभायात्राएं-24, कुल दूरी-7000 किलोमीटर।
03. 1983 की प्रथम एकात्मता यज्ञ यात्रा
युगाब्द 5085 (विक्रमी संवत् 2040, 1983 ई.) में आयोजित एकात्मता-यज्ञ-यात्रा अपने उद्देश्य में पूर्ण सफल रही। यात्रा ने सिद्ध किया कि सम्पूर्ण भारत का हिन्दू समाज गंगा माता के प्रति अपार श्रद्धा रखता है। ‘हिन्दू हम सब एक’ का जयघोष इस यात्रा ने साकार कर दिखाया, यह भी स्पष्ट हो गया कि देश में हिन्दुत्व ही राष्ट्रीयता का पर्याय है।
परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष महाराणा श्री भगवत सिंह मेवाड़ तथा महामंत्री श्री हरमोहन लाल जी ने सभी सम्बंधितों को सर्वप्रथम पत्र लिखकर यात्रा की योजना का परिचय देते हुए इसके उद्देश्य से परिचित कराया। देशभर में 150 से अधिक प्रेस सम्मेलनों, भेंटवार्ताओं, वक्तव्यों और भाषणों से बार-बार यात्रा के उद्देश्यों को उद्घोषित किया। धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक कार्य करने वाले व्यक्तियों/संस्थाओं से सम्पर्क साधा गया और उनसे सहयोग की अपेक्षा की गई।
एकात्मता यज्ञ यात्रा में 300 से भी अधिक रथों ने देश के सभी राज्यों में गंगा कलश और भारत माता की प्रतिमा के साथ संयुक्त रूप में लगभग 1000 दिनों तक अपनी परिभ्रमण परिक्रमा पूर्ण की थी। सभी प्रान्तों से कई मुख्य यात्राएँ और कई उपयात्राएँ निकाली गई किन्तु काठमाण्डु से रामेश्वरम् (पशुपति रथ), हरिद्वार से कन्याकुमारी (महादेव रथ) और गंगासागर से सोमनाथ (कपिल रथ) , ये तीन यात्राएँ सबसे बड़ी यात्राओं के रूप में रहीं। इन तीनों यात्राओं का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:-
(क) काठमाण्डु से रामेश्वरम् तक ‘पशुपति रथ’ यात्रा
इस रथ ने 5500 किलोमीटर से अधिक की यात्रा की थी। इस यात्रा का मार्ग अन्य रथों से 1500 किलोमीटर अधिक लम्बा था। इसीलिए अन्य रथों की यात्राओं के प्रारम्भ होने से 18 दिन पहले ही अर्थात 28 अक्टूबर, 1983 को इस रथ ने काठमाण्डु से यात्रा प्रारम्भ की। रथ की विदाई नेपाल नरेश महाराजाधिराज वीरेन्द्र वीर विक्रम शाह देव व महारानी ऐश्वर्य राजलक्ष्मी ने निर्जल व्रत रखकर गंगाकलश का पूजन करके की। विभिन्न प्रान्तों से गुजरते हुए रथ ने 02 दिसम्बर, 1983 को आन्ध्र प्रदेश में प्रवेश किया, आन्ध्र में 1300 किलोमीटर की यात्रा पूरी करके 11 दिसम्बर, 1983 को तिरूपति पहुँचा, 16 दिसम्बर, 1983 को अपने गंतव्य स्थान रामेश्वरम् पहुँचा। इसी दिन रथ में स्थापित गंगा कलश के जल से वहाँ भगवान आशुतोष शिव का अभिषेक किया गया।
(ख) हरिद्वार से कन्याकुमारी तक ‘महादेव रथ’ यात्रा
रथ ने हर की पैड़ी हरिद्वार से 16 नवम्बर, 1983 को देवोत्थान एकादशी की पावन बेला में घण्टे-घडि़यालों के तुमुल निनाद और गंगा माता की जय-जयकार के साथ यात्रा प्रारम्भ की। इस रथ में स्थापित कलश में ब्रह्मकुण्ड से जल संभरण का कार्य 15 नवम्बर, 1983 को समारोहपूर्वक सम्पन्न हो चुका था। यात्रा से पूर्व प्रातः हर की पौड़ी पर यज्ञ किया गया और सायंकाल गंगा आरती की गई। विभिन्न अखाड़ों के साधु, धर्माचार्य व सन्यासी उपस्थित थे।

‘महादेव रथ‘ उत्तर प्रदेश से चलकर हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, विदर्भ और महाराष्ट्र तक 1200 किलोमीटर की यात्रा करके 03 दिसम्बर, 1983 को आदिलाबाद (आन्ध्रप्रदेश) पहुँचा। यहां हिन्दुओं के साथ-साथ ईसाइयों तथा मुस्लिमों ने भी रथ का स्वागत किया। 8 दिसम्बर, 1983 की रात्रि को आन्ध्र प्रदेश के ताडपत्री नामक स्थान पर रथ पहुँचा, सौ ग्रामों से आए हुए 50 हजार से भी अधिक नर-नारियों ने भारतमाता एवं गंगामाता का पूजन किया। सौभाग्य था कि गंगामाता स्वयं ही अनुग्रह करके अपना दर्शन व आशीर्वाद देने पहुँची।
आन्ध्र के विभिन्न नगरों से हिन्दूपुर से कर्नाटक से कन्याकुमारी के लिए दिनांक 10 दिसम्बर, 1983 को चला। 18 दिसम्बर, 1983 को कन्याकुमारी जिले की सीमा पर सायंकाल में पहुँचा। 19 दिसम्बर, 1983 को रथ राधाकृष्णपुरम से चलकर गणपतिपुरम पहुँचा। अगला पड़ाव नागरकोइल था। नागरकोइल से रथ सुचित्रम् पहुँचा। 20 दिसम्बर, 1983 को कन्याकुमारी के भगवती अम्बा मन्दिर में एकात्मता यज्ञ की पूर्णाहुति के रूप में गंगाजल तथा अन्य पवित्र नदियों से लाए गए जल से, जिसमें मानसरोवर से लाया गया जल भी था, भगवती का अभिषेक किया गया।
(ग) गंगासागर से सोमनाथ तक ‘कपिल रथ’ यात्रा
15 नवम्बर, 1983 की प्रातः 08.30 बजे वेद मंत्रों की ध्वनि के बीच अनेक साधु-सन्तों एवं गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में कपिलमुनि के आश्रम के सामने से गंगासागर तीर्थ (पश्चिम बंगाल) से पवित्र जल ग्रहण करके कलश का विमोचन किया गया। कलश को कचुबेरिया लाया गया, वहाँ से नौका द्वारा कर्क द्वीप लाया गया, जहाँ रात भर कीर्तन होता रहा। 16 नवम्बर, 1983 को कलश डायमण्ड हार्बर और वहाँ से रथ कोलकाता पहुँचा, एक विशाल सभा हुई। ब्रह्मदेश का शिष्टमण्डल ‘इरावदी‘ नदी का जल लेकर कोलकाता में ‘कपिल रथ‘ की यात्रा में सम्मिलित हुआ। सभा में बौद्ध भिक्षु पूज्य भन्ते ज्ञानजगत जी सहित अनेक सन्त उपस्थित थे। इस यात्रा का समापन विश्व हिन्दू परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष महाराणा भगवतसिंह मेवाड़ के द्वारा सोमनाथ मन्दिर में भगवान शिव के महाभिषेक के लिए गंगाजल कलश के समर्पण के बाद हुआ।
तीनों यात्राएँ प्रतिदिन लगभग 100 किलोमीटर की दूरी पार करती थीं। प्रति 25 किलोमीटर या उसके आसपास की दूरी पर उसका पड़ाव होता था और वहाँ दो घण्टे का कार्यक्रम होता था। इन कार्यक्रमों में आसपास के नगरों और ग्रामों के प्रतिनिधि भाग लेते थे। वे अपने साथ अपने पवित्र स्थानों का जल लाते थे। उस जल को जल-कलश में डाल देते थे और उसके स्थान पर कुछ गंगाजल अपने देवी-देवताओं के अभिषेक के लिए ले लेते थे। जब ये यात्राएँ अपने गन्तव्य स्थान रामेश्वरम्, कन्याकुमारी और सोमनाथ पहुँची तो उनके कुम्भों में सभी पावन स्थलों अर्थात चारों धामों, बारह ज्योतिर्लिंगों, बावन शक्तिपीठों, मानसरोवर, नानक सागर, हेमकुण्ड और सैंकड़ों पावन नदियों, झीलों और कूपों से एकत्रित पवित्र जल था।
सभी यात्राओं ने 50,000 किलोमीटर की दूरी तय की। यात्राएँ सभी प्रान्तों के सभी विकास खण्डों से होकर निकलीं। हिमालय से हिन्द महासागर तक फैला समूचा देश ‘भारत माता की जय‘, ‘गंगा माता की जय, ‘हिन्दू धर्म की जय‘ के जयघोषों से गूँज उठा।
भूटान से आया उपरथ यात्रा में सम्मिलित हुआ। मौरिशस के रामसर का जल लेकर वहां के भू0पू0 मंत्री श्री दयानन्द वसंतराय जी दिल्ली आए तो कटाक्षराज (पाकिस्तान) का जल लेकर गोस्वामी गिरधारीलाल जी पधारे। मानसरोवर एवं बंगलादेश के कोने-कोने से हिन्दू तीर्थों का जल इस यात्रा का वैशिष्ट्य था। यह सिद्ध कर दिया गया कि नेपाल, भूटान, ब्रह्मदेश सभी की राजनैतिक सीमाएं भले ही भिन्न हो किन्तु भारत सहित इन सब देशों की सांस्कृतिक आत्मा एक ही है।
‘इण्डिया टुडे‘ की यह पंक्ति कि गोरखपुर की उच्च वर्ग की ठकुरानी एवं कथित निम्न वर्ग की महतरानी साथ-साथ खड़ी होकर पूजा करके राजनेताओं को शिक्षा दे रही थीं कि यह भेदभाव, राजनीति ने ही अधिक बढ़ाए हैं, अन्यथा धर्म के क्षेत्र में तो ‘जो हरि को भजे सो हरि का होई‘ का ही प्रचलन है। पांढरकोणा में अग्रपूजा वाल्मीकि समाज के एक सदस्य ने की, रामेश्वरम् में अभिषेक कुम्भ पिछड़े समाज के सदस्य द्वारा ले जाया गया। मणिपुर के उपमुख्यमंत्री कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे। फतहगढ़ में राजपूत (वाहिनी) रेजीमैण्ट ने यात्रा को मान वन्दना (गार्ड आॅफ औनर) प्रदान की।
नागपुर में 29 नवम्बर, 1983 को अभूतपूर्व दृश्य था। उस दिन सभी मार्ग नागपुर जा रहे थे। तीनों यात्राओं का त्रिवेणी संगम बना था। नागपुर में एक दिन पूर्व ही विश्वकर्मा के वरद पुत्र कलाकार भारत माँ की मूर्ति निर्माता दम्पत्ति तथा जगाधरी के कुम्भ निर्माता युगल बन्धुओं को उनकी कला के सम्मानार्थ पूज्य सरसंघचालक श्री बालासाहेब देवरस द्वारा सम्मानित किया गया था।
कर्नाटक में इस यात्रा की रूपरेखा एक ही स्थान ‘धर्मस्थल‘ पर की गई थी। धर्मस्थल सचमुच एकात्मता का जीवन्त प्रतीक है जहाँ देवालय तो भगवान शिव का है और पुजारी होता है वैष्णव और धर्माधिकारी (प्रबन्धक) होता है जैन। यही एकात्मता-चिन्तन वस्तुतः हिन्दू जीवन-पद्धति है। विश्व में ऐसा अपूर्व उदाहरण विरल है।
प्रथम एकात्मता यज्ञ यात्रा के आंकड़े –
मुख्य यात्राएँ-3, उपयात्राएं-312, रात्रि विश्राम स्थल-974, कुल कार्यक्रम-4,323। 38,526 स्थानों से 77,440 जल कलश पूजन हेतु समाज के द्वारा लाए गए। सम्पर्कित जिले एवं महानगर-531, सम्पर्कित प्रखण्ड-4,432, सम्पर्कित ग्राम एवं बस्ती-1,84,592, कुल चली गई दूरी-85,874, सहभागी व्यक्तियों का संख्या अनुमान-7,28,00,000।
श्रीराम जानकी रथ यात्राएँ
04. 1984 की सीतामढ़ी – श्रीराम जानकी रथ यात्रा –
श्रीराम जन्मभूमि पर लगे ताले को खुलवाने के लिए श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति की अयोध्या में आयोजित बैठक के निर्णय के अनुसार 25 सितम्बर, 1984 को माता जानकी के जन्मस्थान सीतामढ़ी से श्रीराम जानकी रथ यात्रा प्रारम्भ हुई।
रथ यात्रा सीतामढ़ी से चलकर पुपरी, बेनीपट्टी, मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, छपरा, सीवान, देवरिया (देवराहा बाबा के आश्रम में आशीर्वाद लेकर), गोरखपुर होते हुए 06 अक्टूबर, 1984 की संध्या को अयोध्या पहुँची। 07 अक्टूबर, 1984 का दिन अयोध्या के लिए स्मरणीय रहा। वहाँ ‘श्रीराम जन्मभूमि मुक्त हो‘ जयघोष से बाल-वृद्ध-नर-नारी सबमें अपूर्व उत्साह भर गया। 07 अक्टूबर, 1984 को सरयू किनारे संकल्प कार्यक्रम में हजारों सन्तों और श्रीरामभक्तों ने सम्मिलित रूप से संकल्प लिया और श्रीराम जन्मभूमि पर लगे अवैध ताले को खोलने की माँग की।
08 अक्टूबर, 1984 को श्रीराम जानकी रथ यात्रा अयोध्या से लखनऊ के लिए चल पड़ी। जैसे-जैसे आगे बढ़े अपार भीड़ मिली। यात्रा का पहला पड़ाव था ‘‘सोहावल‘‘। संदेह था कि आठ-नौ हजार लोगों को खाना कैसे मिलेगा ? परन्तु जब यात्रा उस पड़ाव से चली तो रास्ते भर लोग चाय, जलपान, भोजन लिए खड़े थे।
लखनऊ पहुँचने के पूर्व अन्तिम पड़ाव ‘‘चिनहट‘‘ का दृश्य तो देखने लायक था। वहाँ पक्का खाएँ तो पूडि़याँ मिल रही थी, कच्चा खाएँ तो भोजन मिल रहा था। उस इलाके से ग्वाले सैंकड़ों लीटर दूध लेकर लखनऊ के बाजारों में जाते थे। उस दिन यह सोचकर कि हमारे भाग्य से ही इस स्थान पर श्रीराम जानकी रथ यात्रा आ रही है – भगवान आ रहे हैं, वे सभी वहीं रुक गए। उस दिन बाजार के लिए एक छटांक दूध भी नहीं गया, यात्रियों को सारा दूध पिला दिया। कैसा विचित्र और अदम्य उत्साह था ?
14 अक्टूबर, 1984 को लखनऊ में यात्रा के स्वागत के लिए उर्मिला वाटिका (बेगम हजरत महल पार्क) में एक सभा का आयोजन था। पत्रकारों ने भी स्थान-स्थान पर ‘गेट‘ (द्वार) बनाए हुए थे। उर्मिला वाटिका (बेगम हजरत महल पार्क) में सभा प्रारम्भ होने से 2 घण्टे पूर्व से ही छोटे-छोटे जुलूसों में लोग ‘‘आगे बढ़ो, जोर से बोलो, जन्मभूमि का ताला खोलो‘‘ नारे लगाता हुआ नाचता-गाता हुआ वहाँ जुटने लगा। श्रीराम जानकी रथ के साथ लक्षावधि जनता उमड़ पड़ी। सभा के स्वागताध्यक्ष सेवानिवृत्त पुलिस महानिरीक्षक श्री श्रीशचन्द्र दीक्षित का स्वागत भाषण सुनकर लोगों को सुखद आश्चर्य हुआ। मार्मिक शब्दों में उन्होंने कहा कि लक्षावधि श्रीराम भक्तों के आगमन से यह लक्ष्मण नगरी धन्य हो गई है क्योंकि ‘‘श्रीराम भक्तों के चरणों में श्रीराम की लीलाभूमि की रज लगी है। उन्होंने कहा कि हम अयोध्या, मथुरा और काशी के पावन स्थलों को दासता के अवशेष के रूप में नहीं देखना चाहते। अतः सभी लोग इन्हें मुक्त कराने के इस अभियान मंे सब प्रकार से सहयोग करें।
दीप प्रज्ज्वलन करके सम्मेलन का उद्घाटन करने के बाद महामण्डलेश्वर स्वामी प्रकाशानन्द जी (हरिद्वार) ने अपने उद्बोधन में कहा कि रामजन्मभूमि का ताला खुलेगा, इसके शुभ संकेत स्पष्ट दीख रहे हैं। क्योंकि सन्यासी अग्नि नहीं छू सकते परन्तु जब मैंने दीपक की तीन मोटी -मोटी बत्तियों को जलाया और वे तुरन्त जल उठीं तो हमें विश्वास हो गया कि अब वह दिन दूर नहीं जब श्रीराम जन्मभूमि की मुक्ति होगी।
श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति के महामंत्री श्री दाऊदयाल खन्ना ने अपने प्रस्तावित भाषण में कहा कि हमारी तीन माँगे हैं- (1) श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर अयोध्या का ताला हिन्दुओं के लिए खोला जाय। (2) मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर बनी ईदगाह मन्दिर को लौटाई जाय तथा (3) काशी में विश्वनाथ मन्दिर पर बनी मस्जिद मन्दिर ट्रस्ट को सौंप दी जाय। श्री खन्ना ने नौजवानों से अपील की कि वे बड़ी संख्या में ‘‘बजरंग दल’’ के सदस्य बनें और प्रतिज्ञा पत्र भरें।
केरल के तेजस्वी महात्मा स्वामी भूमानन्द ने हिन्दू जन शक्ति का साक्षात्कार कराते हुए कहा कि राजनीति की शक्ति के मुकाबले में श्रीराम की शक्ति सौ गुना बड़ी होती है परन्तु आज यहाँ वह हजार गुना बड़ी दीख रही है। स्वामी जी ने सरकार से एक अध्यादेश लाकर लखनऊ का नाम लक्ष्मणपुरी एवं बेगम हजरत महल पार्क का नाम ‘‘उर्मिला वाटिका’’ घोषित करने का भी आग्रह किया।
हरिद्वार के भारत माता मन्दिर के संस्थापक और निवृत्तमान शंकराचार्य स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि जी ने बलिदानियों की सूची में लिखने के लिये सर्वप्रथम अपना नाम प्रस्तुत किया और कहा कि बलिदानी कभी घाटे में नहीं रहता। लखनऊ से यह यात्रा दिल्ली जानी थी किन्तु यात्रा के दिल्ली पहुँचने से पूर्व ही प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी की अचानक ही अस्वाभाविक रूप से हत्या कर दी गई। अतः यात्रा को रोक देना पड़ा।
05. 1984-85 की 200 श्रीराम जानकी रथों की यात्राएँ –
1985 में उडुप्पी में आयोजित द्वितीय धर्मसंसद में अन्य महत्वपूर्ण विषयों के साथ-साथ श्रीराम जन्मभूमि के सम्बन्ध में स्पष्ट रूप में एक प्रस्ताव पारित किया गया था, जिसमें कहा गया था कि वहाँ पर अवैध रूप में लगा ताला खोला जाए। यदि 08 मार्च, 1986 को शिवरात्रि के दिन तक ताला नहीं खुला तो सन्तगण गिरफ्तारियाँ देंगे। इसी के साथ धर्मसंसद ने यह भी निर्णय लिया कि देश के हर प्रान्त में और प्रान्तों के गाँव-गाँव में श्रीराम जानकी रथ निकाले जाएं, जिससे हिन्दू जनता के साथ अयोध्या के श्रीराम मन्दिर के संदर्भ में हो रहे अन्याय की जानकारी समस्त हिन्दू समाज को हो सके।
धर्मसंसद के इस निर्णय के अनुपालन में पूरे भारत में श्रीराम, जानकी और हनुमान जी के विग्रहों के 200 रथ निकाले गए। यद्यपि श्रीराम जन्मभूमि पर लगा ताला 01 फरवरी, 1986 को ही खुल गया था तथापि श्रीराम जानकी रथों का देश के सभी प्रान्तों के ग्रामों में अलग-अलग समय पर प्रवास चलता ही रहा। अनुमान है कि इसमें 40 करोड़ जनता सहभागी बनी थी।
द्वितीय धर्मसंसद के निर्णय के अनुसार श्रीराम जानकी रथों का प्रवास विभिन्न प्रदेशों में तीन वर्षों तक चलता रहा। इस यात्रा में जनता ने बड़े उत्साह से भाग लिया। जहाँ-जहाँ भी रथ गए उनका भव्य स्वागत किया गया।
06. 1984 की बिहार की ज्ञान रथ यात्रा –
तत्कालीन बिहार के आदिवासी प्रधान जिले छोटा नागपुर के क्षेत्रों में 7 अप्रैल से 11 मई, 1984 तक एक मास से भी अधिक समय में ज्ञान रथ ने भ्रमण किया। यह रथ 50 से भी अधिक ग्रामों में गया। ज्ञान रथ पर रामेश्वर के मन्दिर की आकृति की भगवान श्रीराम और भगवान शिव की प्रतिमाएँ थीं। उक्त अवधि में 10 हजार से भी अधिक लोगों ने इन प्रतिमाओं की पूजा की।
07. 1984 की तमिलनाडु की शक्ति रथम् यात्रा –
तमिलनाडु के मदुरई जिले में मई, 1984 में शक्ति रथम् की यात्रा निकाली गई। रथ ने 250 से अधिक ग्रामों का परिभ्रमण किया। 3 लाख से अधिक लोगों की सहभागिता रही। रामनाथपुरम जिले में 205 स्थानों पर कार्यक्रम हुए और 2.5 लाख से अधिक लोगों की उपस्थिति रही।
1985 में इसी रथ ने इरोड, दक्षिण आरकोट, नीलगिरि, कोयम्बटूर, बेल्लौर, तिरुबन्नमलाई जिलों में भी यात्रा की। रथ यात्रा में 746 कार्यक्रम सम्पन्न हुए, जिनमें 934000 से अधिक लोगों ने भाग लिया। रथ में स्थापित मूर्ति का अभिषेक 228000 से अधिक व्यक्तियों ने किया।
08. 1984 की आन्ध्र की सत्य रथ यात्रा –
आन्ध्र के जिन स्थानों पर प्रथम एकात्मता यज्ञ यात्रा नहीं पहुँच सकी थी, उन-उन स्थानों के लिए सत्य रथ यात्रा 18 नवम्बर, 1984 से प्रारम्भ की गई। रथ में अन्नावरम के श्री सत्यनारायण स्वामी और रमादेवी की मूर्तियाँ स्थापित करके जिलों में घुमाया। अन्नावरम से चली सत्य रथ यात्रा ने आन्ध्र प्रदेश के लगभग सभी जिलों में भ्रमण डेढ़ वर्ष में पूरा किया। बाद में इस रथ को समीपस्थ राज्यों के वनवासी बन्धुओं के बीच भी ले जाया गया।
09. 1984 की असम की भागवत रथ यात्रा –
असम में 1984 ई. में भागवत पदयात्रा रथ का कार्यक्रम रखा गया। रथ में श्रीमद्भागवत को प्रतिष्ठापित किया गया। रथ को भक्तगणों ने रस्सियों के माध्यम से स्वयं खींचा। कीर्तन मण्डली कीर्तन करती हुई पीछे-पीछे चल रही थी। रथ सन्त श्रीमद् शंकरदेव की जन्मस्थली बरदावा से उनकी कर्मभूमि बरपेटा तक ले जाया गया। मार्ग में रथ को 22 स्थानों पर कार्यक्रम हुए।
10. 1985 की गुजरात की जगन्नाथ रथ यात्रा –
अहमदाबाद में साम्प्रदायिक दंगे 1985 में शुरू हो गए थे। पूरे शहर में आग, लूट और खून का खेल खेला जाने लगा था। शहर सेना को सौंप दिया गया और संचार साधन बन्द कर दिए गए। आषाढ़ सुदी 2 को रथ यात्रा के दिन सरकार ने मन्दिर के महंत को साथ लेकर ‘‘रथ यात्रा नहीं निकाली जाएगी‘‘ ऐसी घोषणा करवाई। हिन्दू समाज इससे नाराज हो उठा। 300 युवक प्रातः मन्दिर पहुँचे, जुलूस निकालने का प्रबन्ध किया, धीरे-धीरे 10 हजार की संख्या में जनता एकत्रित हो गई। जय-घोष के साथ यात्रा का प्रारम्भ हुआ।  यात्रा में 12 हाथी, 80 ट्रक, 30 रथ, महंत जी की जीप और धीरे-धीरे हजारों से लाखों की ओर बढ़ती हुई जनता। किसी भी स्थान पर कुछ नहीं हुआ। पूर्ण शान्ति से सब कुछ चलता रहा लेकिन मुस्लिम विस्तार क्षेत्र आते ही गड़बड़ी प्रारम्भ हो गई। व्यायामशाला के 500 वीर और अन्य लोगों ने संघर्ष करके यात्रा को मन्दिर में पहुँचाया। यह हिन्दुओं के लिए गौरव और प्रसन्नता की बात रही।
11. 1986 की तमिलनाडु की ज्ञान दीपक रथ यात्रा –
फरवरी, 1986 में ज्ञान दीपकम् रथम् नाम से एक रथ यात्रा निकाली। यात्रा ने तीन जिलों के 200 ग्रामों का भ्रमण किया, जहाँ लगभग 300 कार्यक्रमों में एक लाख व्यक्तियों ने भाग लिया। 25 से अधिक सन्यासियों ने भाग लिया।
12. 1987 की उड़ीसा की जगन्नाथ रथ यात्रा –
वर्षा के उपरान्त उड़ीसा में जब जगन्नाथ रथ पुनः प्रारम्भ हुआ तो ईसाईयों के कहने पर 18 नवम्बर, 1987 को उसे ब्रह्मपुर में रोक दिया गया था परन्तु प्रबल जनमत के दबाव के कारण सरकार को यह पाबन्दी हटानी पड़ी। तत्पश्चात फुलवाड़ी एवं गंजाम जिले में उसका प्रवास निर्बाध रूप से चला।
13. 1984 की हरियाणा की ‘एकात्मता मास’ यात्रा –
18 नवम्बर, 1984 को हरियाणा के मेवात क्षेत्र में यात्रा चली। यात्रा में सींखचों में बन्द दिखाए हुए भगवान श्रीराम जी का एक विशाल चित्र था। यात्रा मेवात के बीवां ग्राम से प्रारम्भ होकर हुई फिरोजपुर झिरका, साकरस, सीसौनाजाट, मांडीखेड़ा, नगीना, मादस, मालन, नूंह, उजीना, रणसीका, विधावली, मण्डकोला, मंढनाका, जनाधौली, घर्रोट, हथीन, गहलब, कौंडल, मानपुर, पहाड़ी, बहीन, नांगल, सौदहद, आलीब्राह्मण, अन्धोप, बिछोर, सिंगार, पुन्हाना, बीसरु, शाहचोरबा होते हुए 27 नवम्बर, 1984 को पिनगंवा में समाप्त हुई।
14. 1984-85 की हरियाणा की चार धर्म जागरण यात्राएँ –
1984-85 में ब्रज क्षेत्र में चार महत्त्वपूर्ण यात्राओं का आयोजन हुआ।
(क)  उजीना यात्रा -यात्रा का स्वरूप पदयात्रा का था। स्वामी अवधेश ब्रह्मचारी जी के नेतृत्व में इस पदयात्रा 09 जून, 1984 से 19 जून, 1994 तक रही। यात्रा प्रतिदिन 15-20 किलोमीटर प्रवास करती थी। दो या तीन ग्रामों में धर्म सम्मेलन किया जाता था। यात्रा 09 जून, 1984 को उजीना से प्रारम्भ होकर 19 जून, 1984 को फिरोजपुर-झिरका में समाप्त हुई।
(ख)  जगाधरी यात्रा – 04 जून, 1985 से 14 जून, 1985 तक छछरौली प्रखण्ड में एकादश दिवसीय धर्म जागरण पदयात्रा प्रखण्ड के 66 गाँवों में गई और इस दौरान 170 कि.मी. की दूरी तय की गई।
(ग)  फिरोजपुर-झिरका यात्रा – दिनांक 10 जून, 1985 से 30 जून, 1985 तक 22 दिन की पदयात्रा का शुभारम्भ भगवान आशुतोष की वरद् छाया में शिव मन्दिर फिरोजपुर झिरका से और समापन 30 जून, 1985 को पुन्हाना में हुआ।
(घ)  महिला ब्रज यात्रा – हरियाणा के ब्रज मण्डल जिले में 10 दिन की महिला यात्रा का आयोजन दिनांक 22 सितम्बर, 1985 से 01 अक्टूबर, 1985 तक की अवधि में किया गया। 40 महिलाएँ और 20 पुरुषों ने यात्रा में भाग लिया।
15. 1988 की जम्मू की जल यात्रा –
श्री रूद्र महायज्ञ के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम में 2000 से 2500 माताओं ने भाग लिया। वे अपने-अपने कलश में तवी नदी से जल भरकर जुलूस के रूप में श्री रणवीरेश्वर मन्दिर र्गइं जहाँ वेद मंत्रों द्वारा रूद्री पाठ के साथ रूद्राभिषेक किया गया।
16. 1990 की बजरंग दल की धर्म जागरण यात्रा –
08 फरवरी, 1990 को प्रधानमंत्री की अपील पर श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण का कार्यक्रम चार मास के लिए स्थगित कर दिया गया था। इस अवधि में सरकार को सचेत करने एवं श्रीराम मन्दिर निर्माण हेतु निरन्तर हिन्दू दबाव बनाए रखने के उद्देश्य से ही बजरंग दल द्वारा दिनांक 16 अप्रैल से 21 अप्रैल, 1990 तक धर्म जागरण यात्रा का आयोजन महंत नृत्यगोपालदास जी महाराज के नेतृत्व में हुआ। लगभग 100 जीपों, कारों एवं लगभग 1000 कार्यकर्ताओं सहित अयोध्या से 16 अप्रैल, 1990 को सायंकाल धर्मसभा के पश्चात यात्रा प्रारम्भ होकर काशी, प्रयाग, चित्रकूट, कानपुर, कन्नौज, मैनपुरी, आगरा होती हुई 21 अप्रैल, 1990 को प्रातः मथुरा पहुँच कर विशाल सभा के पश्चात पूर्ण हुई।
17. 1995 की द्वितीय एकात्मता यात्रा –
समाज की एकता और देश की अखण्डता को सुरक्षित बनाए रखने की दृष्टि से पहला प्रयास 1983 ई. में एकात्मता यात्रा युगाब्द 5085 के माध्यम से किया था। उस यात्रा में भारतमाता और गंगामाता जैसे हिन्दू समाज के मानबिन्दुओं को सामने रखकर व्यक्ति-व्यक्ति के अन्तःकरण में उनके प्रति श्रद्धा-भक्ति का भाव जगाने का प्रयास किया गया था। 12 वर्ष पश्चात पुनः भारत माता, गंगा माता एवं गोमाता की प्रतिमाओं के साथ वर्ष 1995 में देवोत्थानी एकादशी से गीता जयन्ती तक द्वितीय एकात्मता यज्ञ यात्रा का आयोजन किया गया।
यात्रा के अन्तर्गत देश में स्थित दस प्रमुख मानबिन्दु केन्द्रों से दस प्रमुख तथा अन्य भिन्न-भिन्न प्रमुख और पावन स्थानों से 135 उप तथा 1,581 लघु यात्राएँ निकाली गईं। इन्होंने 15,25,000 किलोमीटर की दूरी तय की। इस अवधि में 43,817 धर्मसभाएँ हुईं और 5,210 स्थानों पर सामाजिक समरसता के प्रतीक के रूप में श्रीरामखिचड़ी के कार्यक्रम हुए। विभिन्न सभाओं, श्रीरामखिचड़ी और स्वागत कार्यक्रमों, जुलूसों आदि में कुल मिलाकर 9 करोड़ 39 लाख लोगों ने भाग लिया।
इन यात्राओं में से परशुराम कुण्ड यात्रा का समापन कोलकाता में हो गया था और गंगासागर तथा जगन्नाथपुरी की यात्राएँ सम्बलपुर (उड़ीसा) से सम्मिलित रूप में चलकर रामटेक में पहुँची। 19-20 अक्टूबर, 1995 को द्वितीय एकात्मता यज्ञ यात्रा का समापन समारोह नागपुर में सम्पन्न हुआ।
दीक्षा भूमि पर एकात्मता यात्रा का स्वागत
द्वितीय एकात्मता यात्रा के समापन समारोह के पश्चात नागपुर में 20 अक्टूबर, 1995 को साधु-सन्तों के साथ दीक्षाभूमि पर पहुँचे, डाॅ. अम्बेडकर जिन्दाबाद, भगवान बुद्ध जिन्दाबाद, जय श्रीराम, सन्तों की जय हो आदि उद्घोषों से सम्पूर्ण वातावरण गूँज उठा। यहाँ डाॅ. अम्बेडकर स्मारक समिति की ओर से यात्रा का भव्य स्वागत करते हुए सभी सन्तों-महंतों का अभिनन्दन किया गया।
18. 1997 से 2000 तक चलीं गो-जागरण रथ यात्राएँ –
1997 में दिल्ली की धर्मसंसद में धर्माचार्यों द्वारा आगामी 3 वर्षों तक गोसंवर्धन के लिए कार्य करने का निर्देश हुआ। सन्तों का कहना था कि बूढ़ा गोवंश भी आर्थिक भार नहीं है। यदि किसान को यह ज्ञात हो जाए तो वह बूढ़े गोवंश को भी पालेगा।
जैन मुनियों की प्रेरणा से समाजसेवी बन्धुओं ने रथ प्रदान किए। गोपाष्टमी से गो-जागरण रथ यात्राएँ प्रारम्भ हुईं। 100 रथ यात्राएँ सन् 2000 तक पूरे देश में निकाली गईं। इन यात्राओं के माध्यम से लोक जागरण, लोक प्रशिक्षण हुआ। गाय के गोबर व गोमूत्र से तैयार औषधि, खाद, कीटनाशक, विद्युत निर्माण का प्रत्यक्ष प्रदर्शन हुआ।

19. 2004 की श्रीरामजानकी विवाह बारात यात्रा –
भारत एवं नेपाल के बीच सांस्कृतिक, धार्मिक सम्बन्धों को और अधिक सुदृढ़ करने, बिहार राज्य में व्याप्त जातीय दूरियों को घटाने एवं सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करके ऊँच-नीच के भेदभाव को कम करने के उद्देश्य से श्रीरामजानकी विवाह बारात यात्रा का अनोखा धार्मिक आयोजन निश्चित किया गया।
07 दिसम्बर, 2004 को अयोध्या में वैदिक विद्वानों द्वारा यज्ञ के पश्चात तिलकोत्सव कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। महाराजा जनक के प्रतिनिधि के रूप मंे जानकी मंदिर जनकपुर के श्रीमहंत रामतपेश्वर दास जी महाराज की ओर से विवाह की मंगलपावती व तिलक अपने ब्राह्मण व नाई के द्वारा अयोध्याजी भेजी गई थी। जानकी जी के भाई के रूप में गोलाघाट अयोध्या स्थित आश्रम के महंत पूज्य सियाकिशोरी शरण जी महाराज ने तिलक चढ़ाया और राजा दशरथ की भूमिका में मणिरामदास छावनी के महंत पूज्य श्री नृत्यगोपालदास जी महाराज ने तिलक स्वीकार किया।
08 दिसम्बर प्रातःकाल महर्षि वशिष्ठ की भूमिका में बड़े भक्तमाल आश्रम के महंत पूज्य श्री कौशल किशोर दास जी महाराज के नेतृत्व में बारात ने अयोध्या से जनकपुर के लिए प्रस्थान किया। बारात में 25 बड़ी गाडि़यों (टाटा सूमो) में अयोध्या के संत एवं देश के विभिन्न भागों से आए भक्त बाराती के रूप में चले।
अयोध्या से चलकर बारात बदलापुर (सुल्तानपुर), जौनपुर, काशी (प्रथम रात्रि पड़ाव), फलाहारी बाबा की तपःस्थली गाजीपुर, बक्सर (दूसरा रात्रि पड़ाव), आरा, पटना (तीसरा रात्रि पड़ाव),  मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी (चैथा रात्रि पड़ाव), बेनीपट्टी, दरभंगा (पाँचवा रात्रि पड़ाव), उमगाँव (भारत सीमा पर दोपहर भोजन) होते हुए नेपाल सीमा के प्रथम ग्राम मटिहानी में पहुँचकर रात्रि भोजन-विश्राम (छठा रात्रि पड़ाव) किया। बाद में बारात ने मटिहानी से चलकर दोपहर को महाराजा जनक की राजधानी जनकपुर में 14 दिसम्बर, 2004 दोपहर को प्रवेश किया, 15, 16 व 17 दिसम्बर को जनकपुर में विवाह सम्बन्धी विविध आयोजन सम्पन्न हुए। 16 दिसम्बर को विवाह पंचमी पर विवाह का मुख्य कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। विवाह में अयोध्या के संत मानस कोकिल रामदास जी महाराज ने विश्वामित्र की भूमिका का निर्वाह किया।
इस अवसर पर उपस्थित भक्तजनों की संख्या का अनुमान लगभग 5 लाख का लगाया गया। नेपाल नरेश इस अवसर पर विशेष रूप से उपस्थित रहे। जनकपुर में बारात तीन दिन तक ठहरी। बारात की विदाई जनकपुर से 18 दिसम्बर प्रातःकाल को हुई। वीरगंज (नेपाल सीमा) से बिहार के मोतिहारी गोपालगंज और गोरखपुर होकर 19 दिसम्बर रात्रि को बारात अयोध्या वापस लौट आई।
नेपाल राज्य के मंत्री द्वारा अत्यन्त उत्साहपूर्वक यह निवेदन किया गया कि प्रतिवर्ष ऐसी बारात अयोध्या से जनकपुर आए तो भारत नेपाल के सम्बन्ध और अधिक मजबूत होंगे। इस सम्पूर्ण यात्रा में विश्व हिन्दू परिषद के साथ धर्मयात्रा महासंघ का महत्वपूर्ण योगदान रहा। यह बात स्वयं सिद्ध हो गई कि धर्म ही समाज को जोड़ता है। उत्तर बिहार के जाति-बिरादरी के सब बंधन टूट गए और संपूर्ण क्षेत्र राममय हो गया। विवाह का रथ समाज के नियन्त्रण में हो गया। आयोजकों की भूमिका दर्शकों जैसी बन गई।
20. 2005 की तिरुपति (तमिलनाडु) छतरी यात्रा –
चेन्नई के एक विशेष परिवार से सम्बंधित लोग ब्रह्मोत्सव के दिनों में वहाँ से सजी-धजी छतरियों के साथ भगवान वेंकटेश्वर की मूर्तियाँ तिरुपति देवस्थानम् में समर्पित करने को ले जाते थे। छतरियों को पदयात्रा के माध्यम से ले जाया जाता था। मार्ग में लाखों की संख्या में लोग उनके पूजन-अर्चन के लिए सम्मिलित हो जाते थे।
अनेक कारणों से यह कार्यक्रम कुछ वर्ष सम्पन्न नहीं हो सका। वर्ष 2005 में परिषद कार्यकर्ताओं ने कार्यक्रम को करने का निश्चय किया और कार्यक्रम 5, 6, 7 अक्टूबर, 2005 को सफलतापूर्वक सम्पन्न किया। चेन्नई के पुलिस कमिश्नर ने यात्रा का शुभारम्भ किया। तिरुमला में छतरियों का समर्पण जगद्गुरु शंकराचार्य पूज्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी द्वारा किया गया। छतरियों की यात्रा के दौरान मार्ग में लगभग 10 लाख लोगों ने भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन किए।

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