श्रीराम जय राम जय जय राम, শ্ৰীৰাংজয়ৰাংজয়জয়ৰাং, শ্রীরাম জয় রাম জয় জয় রাম , શ્રીરામ જય રામ જયજય રામ, ಶ್ರೀರಾಮಜಯರಾಮಜಯಜಯರಾಮ, ശ്രിറാം ജയ് റാം ജയ്‌ ജയ് റാം, శ్రీరాంజయరాంజయజయరాం

विश्व हिन्दू परिषद् के बढते चरण

तीर्थ एवं धर्मयात्राओं में कार्य
हमारा लक्ष्य –
तीर्थ, तीर्थयात्राओं, धर्मयात्राओं, तीर्थयात्रियों, को केन्द्र मानकर कार्य करना प्रमुख लक्ष्य है। घोष वाक्य –
‘‘भारत की आत्मा तीर्थो में वास करती है।
तीर्थो का विकास, भारत का विकास।।’’
हमारे तीर्थ स्थलों पर पराधीनता के काल में तो आक्रमण हुए ही, स्वतंत्रता के पश्चात् भी तीर्थ सरकारों द्वारा भी उपेक्षित ही किये गए। दो प्रतिशत पर्यटकों के लिए सरकारों द्वारा भारी भरकम बजट व स्वतंत्र प्रभार वाला पर्यटन मंत्रालय, दूसरी तरफ 98 प्रतिशत तीर्थयात्रियों के लिए न कोई विभाग है न कोई बजट जबकि सम्पूर्ण राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता की प्रेरणा सर्वाधिक हमारे तीर्थ प्रदान कर रहे हैं।
पृष्ठभूमिः-
हरिद्वार से गंगाजल ले जाकर अपने-अपने स्थानों पर भगवान शंकर का अभिषेक करने वाले लाखों कांवड़ यात्रियों के विशाल समूह को देखकर उनकी सेवा, सुरक्षा और व्यवस्था के लिए स्थायी रूप से कुछ किया जाए, इस प्रेरणा से 1995 ईÛ के श्रावण मास में हरिद्वार (मायापुरी) की अधिष्ठात्री देवी भगवती माया देवी मंदिर के प्रांगण से यह कार्य प्रारम्भ हुआ।
14 जनवरी 1995, मकर संक्रान्ति, हरिगिरि सन्यास आश्रम कनखल में कांवड यात्रियों के बीच सेवा व संगठन कार्य करने हेतु विधिव्त ‘‘कांवड़ सेवा समन्वय समिति’’ की घोषणा की।
कुछ ही दिनों पश्चात कांवड सेवा समन्वय समिति का नाम परिवर्तित हुआ ‘कांवड एवं धर्मयात्रा महासंघ’ तत्पश्चात कार्यक्षेत्र की व्यापकता को समझते हुए धर्मयात्रा महासंघ नाम निश्चित हुआ।
26 दिसम्बर 1995 को धर्मयात्रा महासंघ के नाम से विधिवत एक न्यास पंजीकृत कराया गया।
किए जा रहे कार्य –
1. 8 जून 1995, से प्रति वर्ष हरिद्वार में हर की पौड़ी पर श्री गंगा अवतरण महोत्सव परम दिव्यता एवं भव्यता पूर्वक सम्पन्न। इस अवसर पर हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी भगवती माया देवी के पूजनोपरान्त महिलाओं द्वारा दुग्ध कलश लेकर हर की पौड़ी तक भव्य शोभायात्रा, माँ गंगा का पूजन एवं दुग्धाभिषेक।
2. नदियों को प्रदूषण मुक्त कराने, मां गंगा की निर्बाध धारा प्रवाह को बनाए रखने का अभियान प्रारम्भ किया।
3. सम्पूर्ण पश्चिमी उत्तर भारत (उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात व पंजाब) से हरिद्वार आने वाले कांवड़ यात्रियों की सुविधा हेतु उत्तर प्रदेश से दिल्ली पर्यन्त विशिष्ट व्यवस्थाएं कराई गई।
4. दिल्ली सरकार द्वारा धर्मयात्रा महासंघ के सुझाव एवं प्रार्थन पर 1995-1996 मंे कांवरिया समिति का गठन व विशिष्ट बजट की स्वीकृति के साथ सराहनीय योगदान। पुनः ‘तीर्थ समिति विकास’ के गठन को भी दिल्ली सरकार द्वारा स्वीकृति प्रदान की गई।
5. धर्मयात्रा महासंघ के तत्वावधान में कैलाश मानसरोवर यात्रियों के विभिन्न दलों का अभिवादन एवं उन्हें मंगलमय भावभीनी विदाई दी जाती है एवं यात्रियों के लिए केन्द्र सरकार द्वारा अनुदान राशि 3,000 रुपया तथा दिल्ली सरकार द्वारा दिल्ली प्रान्त के निवासी तीर्थयात्रियों को प्रति यात्री 5,000 रुपए की राशि स्वीकृत कराई गई।
6. अन्य प्रान्तों के कैलाश मानसरोवर यात्रियों के लिए दिल्ली में निवास हेतु निर्धारित ‘अशोक यात्री निवास ‘अशोक रोड़ में रहने की व्यवस्था स्वरूप लगभग 1200 (एक हजार दो सौ रूपये) की राशि की स्वीकृति एवं सभी कैलास मानसरोवर यात्रियों के मार्ग में चिकित्सा हेतु ‘चिकित्सा किट्स’ भी विदेश मंत्रालय को दिल्ली प्रान्त सरकार की ओर से प्रदान की गई।
7. उत्तर प्रदेश सरकार ने उत्तर प्रदेश के कैलाश मानसरोवर तीर्थ यात्रियों के लिए प्रति यात्री 5 हजार रूपये, पांडिचेरी सरकार ने प्रति यात्री 5 हजार रूपये तथा तमिलनाडु सरकार ने प्रति यात्री अनुदान की घोषणा की।
8. चीन के राष्ट्रपति के साथ कैलाश मानसरोवर तीर्थ यात्रियों से लिए जाने वाले भारी शुल्क को कम कराने हेतु पत्र व्यवहार हुआ।
9. 84 कोस की ब्रज परिक्रमा यात्रा में सहयोग तथा गोवर्धन परिक्रमा के सौन्दर्यकरण हेतु कार्यरत संस्था ‘तीर्थ संरक्षण एवं विकास ट्रस्ट (मथूरा)’ के साथ सहभागिता की गई।
10. 1996 में श्री जगन्नाथ पुरी में भगवान श्री जगन्नाथ के नवकलेश्वर महोत्सव के अवसर पर तीर्थ यात्रियों की सेवा हेतु निःशुक्ल अल्पाहार की व्यवस्था की गई।
11. पूज्य देवी-देवताओं का अपमान करने वाले कार्यक्रमों का विरोध किया गया।
12. अगस्त 1996 में अमरनाथ तीर्थ यात्रियों की सेवा हेतु भण्डारें की व्यवस्था की गई। अमरनाथ तीर्थ यात्रा त्रासदी पर तत्काल राहत एवं सेवा कार्य किया गया।
13. 6 सितम्बर 1996 को ताल कटोरा स्टेडियम में अमरनाथ त्रासदी के दिवंगत तीर्थ यात्रियों हेतु श्रृद्धांजलि सभा तथा उसी अवसर पर दुर्घटना जांच समिति का गठन किया गया।
14. 1997 मंे जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा अमरनाथ यात्रियों  पर लगाये गए 650 रूपये के टैक्स का विरोध किया गया तथा निर्णय को वापिस करवाया गया।
15. तीर्थ एवं तीर्थ यात्रियों को राजकीय सुविधा प्रदान करने हेतु केन्द्रीय सरकार तथा विभिन्न प्रान्तीय सरकार से पृथक तीर्थाटन मंत्रालय बनाने के लिए पत्र व्यवहार किया गया।
16. टिहरी बांध के कारण गंगा की पवित्रता नष्ट हो जायेगी। परिणामस्वरूप गंगा सागर पर्यन्त गांगेय तीर्थ लुप्त हो जायंगे। इस विषय पर जन-जागरण हेतु करपत्र कांवडि़यों के बीच वितरित।
17. 10 अक्टूबर 1997 को लेह (लद्दाख) से 8 कि.मी. दूर ‘‘शे’’ नामक गांव के समीप सिंधु नदी का पूजन किया गया। इसके तट पर वेदों की रचना होने से इसका विशेष महत्व है। वर्ष 1998 मंे भी सिंधु दर्शन कार्यक्रम आयोजित किया गया। अब प्रतिवर्ष यह कार्यक्रम अन्य लोग करते हैं।
18. हिन्दू धर्म की महत्ता की अभिव्यक्ति हेतु 20 से 22 अक्टूबर 1997 में तीर्थ राज हरिद्वार की पावन भूमि पर विराट हिन्दू सम्मेलन हुआ। उसमें महाराजाधिराज नेपाल श्री 5 विरेन्द्र वीर विक्रमशाह देव, महारानी ऐश्वर्यराज लक्ष्मी शाह, कांचीकाकोटि पीठ के जगद्गुरू शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती जी महाराज, जगद्गुरू शंकराचार्य विजेन्द्र सरस्वती जी महाराज एवं अन्य व्यवस्था में धर्मयात्रा महासंघ का विशेष सहयोग रहा।
19. अप्रैल 1998 को अखिल भारतीय तीर्थ प्रतिनिधि सम्मेलन, हरिद्वार में कुम्भ के अवसर पर आयोजित किया गया।
20. दिसम्बर 1997 में जिलाधिकारी-एटा, उत्तर प्रदेश के साथ मिलकर वार्षिक कुंभ मेला मार्गशीर्ष के अवसर ‘‘शूकर क्षेत्र महोत्सव’’ सोरो नाम से एक पखवारे तक भव्य कार्यक्रम आयोजित किये गये।
21. बिलासपुर (छत्तीसगढ़) में कांवड़ यात्रा प्रतिवर्ष आयोजित की जाती है।
22. वर्ष 1998 से प्रत्येक वर्ष द्वादश ज्योतिर्लिंग में से किसी एक ज्योतिर्लिंग पर महारूद्राभिषेक का आयोजन किया जा रहा है।
23. कांचिकामकोटि पीठ के शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती के गिरफ्तारी के विरोध में 19 नवम्बर, 2004 को जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन किया गया।
24. अयोध्या से जनकपुर (नेपाल) तक 7-19 दिसम्बर 2004 को श्रीराम जानकी विवाह बारात यात्रा का आयोजन किया।
25. दिसम्बर 2004 को दक्षिण भारत में आये विनाशकारी सूनामी तुफान से प्रभावित लोगों की सहायता हेतु राहत शिविर 1 से 3 जनवरी, 2005 तक आयोजित किया।
26. बिहार में आयी भीषण बाढ़ में धर्मयात्रा महासंघ द्वारा तुरन्त राहत सामग्री भिजवाई।
27. वर्ष 2010 में तीर्थपुरोहित महासंघ का विधिवत पंजीकरण करवाया गया।
मठ-मन्दिर हमारी दृष्टि और व्यवहार
विश्व में जहाँ कहीं पूजा-उपासना है, वहाँ किसी न किसी रूप में पूजा केन्द्र भी है। हिन्दू परम्परा में इन्हें ही ‘‘मठ अथवा मन्दिर अथवा गुरुद्वारा‘‘ कहा जाता है। ये हमारी संस्कृति के मूलाधार हैं। छोटे गांव से लेकर बड़े शहर में, ऊँचे गिरि शिखरों पर, वनों में भी सर्वत्र प्राचीनकाल से निर्मित। निर्धन, सम्पन्न, निरक्षर, विद्वान, मजदूर, उद्योगपति सभी मठ-मन्दिरों में बिना किसी भेदभाव के जाते हैं। व्यक्ति और समाज दोनों की मर्यादाओं की रक्षा और दोनों के लिए प्रेरणा के केन्द्र हैं। प्राचीनकाल से पाठशाला, व्यायामशाला, आरोग्यशाला, गोशाला, प्रवचन एवं धार्मिक अनुष्ठानों के केन्द्र, सार्वजनिक, सामाजिक, पारिवारिक कार्यों के लिए मठ-मन्दिरों का उपयोग होता आया है। संगीत और कला के केन्द्र भी थे। मठों में अन्न क्षेत्र (निःशुल्क भोजन) तथा बाहर से कस्बे में आए किसी भी अपरिचित व्यक्ति के रात्रि विश्राम के लिए बेरोकटोक व्यवस्था रहती थी। एक मन्दिर आसपास के न्यूनतम 100 परिवारों की गतिविधियों का केन्द्र होता था।
मठ मन्दिर हिन्दुधर्म, संस्कृति और परम्पराओं के अजेय दुर्ग हैं। इन्हीं के बल पर घोर संकट काल में भी हिन्दू समाज ने अपनी श्रेष्ठ संस्कृति की रक्षा की। मठ मन्दिरों की यह महान परम्परा हमें अपने पूर्वजों से विरासत में मिली है।
भारत में मन्दिरों की चार श्रेणियाँ हैं – (1) व्यक्तिगत मन्दिर – इन मन्दिरों में चढ़ावा, दानपात्र की कोई व्यवस्था नहीं होती है। पास-पड़ोस के लोग इन मन्दिरों में पूजा पाठ के लिए जा भी सकते हैं पर उनका अधिकार नहीं है। (2) समाज द्वारा कोई समिति बनाकर निर्मित और संचालित मन्दिर (3) सन्त-महात्माओं के द्वारा संचालित मन्दिर (उदाहरण- अखाड़ों के मठ-मन्दिर) (4) शासन व्यवस्था के अन्तर्गत मन्दिर – पूर्व काल में राजाओं ने अपने-अपने राज्यों में बड़े-बड़े मन्दिर बनवाए, धनाढ्य लोगों ने मन्दिर बनवाए। निर्माण कराने वाले व्यक्तियों अथवा राजाओं ने मन्दिर के रख-रखाव के लिए बड़ी-बड़ी सम्पतियाँ मन्दिरों को दान में दी। परन्तु कालान्तर में ये उपेक्षित हो गए अथवा व्यवस्था का अभाव हो गया।
मुस्लिम आक्रमण काल में हिन्दुओं के असंख्य मन्दिर तोड़ दिए गए और वहाँ मस्जिदें बना दी गईं। स्वतंत्र भारत में मठ मन्दिरों के साथ जुड़ी सम्पत्ति अथवा इनको मिलने वाले चढ़ावे के प्रति सरकारों में लालच पैदा हो गया। जिससे अव्यवस्था का बहाना बनाकर सरकारों ने इनको अधिग्रहण करना प्रारम्भ किया। इनकी सम्पत्तियों को अनेक जगह बेच दिया गया और बिक्री से प्राप्त धन सरकारी खजाने का हिस्सा बन गया। चढ़ावे के धन का सरकार मन-माना उपयोग/ दुरुपयोग करने लगी। अनेक मन्दिर अपनी पहले से भी खराब अवस्था को पहुँच गए। अनेक की स्थिति सरकारी दफ्तर जैसी हो गई और समाज जागरण की अपनी मौलिक भूमिका से हट गए।
आज भी 35 से 40 लाख मठ मन्दिर अस्तित्व में हैं। उन पर आश्रित व्यक्तियों और सेवकों की संख्या भी करोड़ों में होगी। उन सबकी धार्मिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक भूख को मिटाना शासन का कर्तव्य है। दक्षिण भारत में अधिकांश मन्दिरों का सरकारी अधिग्रहण हो गया। उत्तर भारत में भी सरकार का लालच बढ़ रहा है। केरल में न्यायपालिका ने कह दिया कि मन्दिर व्यवस्थापक के मन में मन्दिर और भगवान के प्रति आस्था होना आवश्यक नहीं है अतः घोर नास्तिक और धर्म विरोधी भी मन्दिर का व्यवस्थापक बन सकता है परन्तु यही विचार मस्जिद और चर्च पर लागू नहीं होता। परिषद चाहता है कि मन्दिर संचालन में शासन या राजनीतिक दलों का हस्तक्षेप बिल्कुल नहीं होना चाहिए। इसके लिए स्वायत्तशासी मन्दिर के आसपास रहने वाले भक्तों की भक्तमण्डली, व्यवस्था टोली बनाई जाए, जिसके सदस्य धार्मिक प्रवृत्ति के चरित्रवान लोग हों।
शासकीय स्वामित्व एवं देखरेख वाले मठ-मन्दिरों के चैकाने वाले तथ्य-
01. मन्दिरों की सम्पत्ति तो बहुत है परन्तु देवता गरीब हैं।
02. कुछ मन्दिरों में दीपक नहीं है तो कुछ में भोग चढ़ाने लायक पैसे भी नहीं हैं।
03. भरपूर जायदाद होने पर भी वह खस्ता हालत में है। कुछ पर किसी ने कब्जा कर लिया है तो कुछ में चोरी व गुप्त रूप से जमीन की अवैध बिक्री।
04. अहिन्दुओं को नाममात्र किराए पर देना, सस्ते में बेचना, किरायेदारों से किराया प्राप्त नहीं होता।
05. व्यवस्थापकों में भ्रष्टाचार व्याप्त है। व्यवस्थापक राजनीतिक कारणों से नियुक्तियाँ करता है। व्यवस्थापक के पद रिक्त पड़े रहते हैं।
06. भक्ति का दिखावा होता है, दृष्टि मुख्यतः जायदाद व आय पर रहती है, उसे अपनी जागीर बनाने की सोचते हैं। दर्शनार्थियों की सुविधा नहीं देखी जाती, उनसे मात्र पैसे उगाहने के तरीके सोचे जाते हैं।
07. अनेक मन्दिरों के कलात्मक एवं सुन्दर अवशेष गायब हो गए हैं। जेवरात तथा मूल्यवान सामान की चोरी अथवा हड़पने की कोशिश की जाती है। मूर्तियों की चोरी अथवा अवैध बिक्री। असली सामान की जगह नकली सामान रख देना।
08. कागजातों में हेराफेरी करके सम्पत्ति हड़पने सम्बन्धी अनेक दोष संस्था संचालकों में घुसे हैं।
हम क्या करें ?
पास-पड़ोस के किसी मन्दिर से जुड़ें। मन्दिर की कोई न कोई एक सेवा पास-पड़ोस के परिवार अपने जिम्मे लें। आसपास रहने वाले श्रद्धालु लोगों की एक भक्त मण्डली बनाएं।
मन्दिर और आसपास की स्वच्छता, नियमित आरती की ओर ध्यान देना।
आसपास के लोग आरती के समय मन्दिर में अधिक इकट्ठे हों। मासिक महाआरती के लिए प्रयत्न करना।
मन्दिरों में सामूहिक त्योहार की परम्परा विकसित करना। जैसे- रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, शिवरात्रि, नवरात्रि पूजन आदि आदि।
मठ-मन्दिरों में सत्संग प्रारम्भ कराएं। बच्चों को मन्दिर जाने की प्रेरणा देना।
मन्दिर जिस प्रकार पूर्व काल में समाज की अनेक गतिविधियों के केन्द्र हुआ करते थे अर्थात वे समाज जागरण के केन्द्र थे, वैसा ही वह पुनः बनने की ओर अग्रसर हो, ऐसे प्रयास हम करें।
मन्दिरों के प्रति हमारी दृष्टि श्रद्धा और विनम्रता की चाहिए। निन्दा अथवा आलोचना की नहीं।
इन्हीं कार्या के लिए हम प्रयासरत है।

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