श्रीराम जय राम जय जय राम, শ্ৰীৰাংজয়ৰাংজয়জয়ৰাং, শ্রীরাম জয় রাম জয় জয় রাম , શ્રીરામ જય રામ જયજય રામ, ಶ್ರೀರಾಮಜಯರಾಮಜಯಜಯರಾಮ, ശ്രിറാം ജയ് റാം ജയ്‌ ജയ് റാം, శ్రీరాంజయరాంజయజయరాం

विश्व हिन्दू परिषद् के बढते चरण

संस्कृत, अर्चक-पौरोहित्य, योग एवं वेद शिक्षण
भारतीय संस्कृति धर्म प्रधान है। विश्व की महान शक्ति बनने का भारत का स्वप्न यदि साकार करना है तो धर्म और संस्कृति का आश्रय लेना ही होगा। भारतीय संस्कृति से जुड़ा सम्पूर्ण तत्वज्ञान संस्कृत भाषा में लिखा है। प्रान्त, भाषा, जाति, सम्प्रदाय आदि भेदों के साथ-साथ सबको एकसूत्र में पिरोने का सामथ्र्य संस्कृत में ही है, इसी विचार से संस्कृत कार्य विश्व हिन्दू परिषद में प्रारम्भ हुआ।
सन् 1979 में प्रयाग में सम्पन्न द्वितीय विश्व हिन्दू सम्मेलन के अवसर पर विश्व संस्कृत सम्मेलन का आयोजन किया गया था, ‘विश्व संस्कृत प्रतिष्ठानम्’ की स्थापना हुई, संस्था का केन्द्र पांडेचेरी रखा गया, काशी नरेश विभूतिनारायण सिंह जी प्रथम अध्यक्ष बने और परिषद के तत्कालीन महामंत्री श्री राजाभाऊ डेग्वेकर (पुणे) इस संस्था के भी महामंत्री बने। कालान्तर में ‘भारत संस्कृत परिषद’ के नाम से एक स्वतंत्र संस्था माघ शुक्ल पंचमी संवत् 2044 विक्रमी (1987 ई0) में गठित हुई।
संस्था के कार्य – संस्कृत व्यवहार शिविर आयोजन, संस्कृत अध्ययन केन्द्रों की स्थापना, वेद विद्याओं के शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए कार्य करना, मौलिक ग्रन्थों का प्रकाशन करना, पौरोहित्य प्रशिक्षण शिविर का आयोजन करना।
सम्पन्न उल्लेखनीय कार्यक्रम – दस दिवसीय सम्भाषण वर्ग हुए। लोकसभा सदस्यों से संस्कृत में शपथ लेने का अनुरोध किया गया, परिणामस्वरूप अगस्त, 1991 लोकसभा में तथा 1992 राज्यसभा में अनेक सांसदों ने संस्कृत में शपथग्रहण की। 1991 से 1994 तक दिल्ली, बड़ौदा, लखनऊ, बेलडांग में संस्कृत प्रशिक्षण वर्ग लगे। संस्कृत व्यवहार शिविर प्रतिवर्ष दिल्ली में किया जाता है। ‘अभिव्यक्ति’ शोध पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। प्रयाग, बरेली, मेरठ में संस्कृत कवि सम्मेलन आयोजित कराए गए। विभिन्न राज्य सरकारों के सहयोग संस्कृत शिविर किए। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संस्कृत के पक्ष में निर्णय की पुस्तिका प्रकाशित की।
मेरठ में आयोजित व्यवहार शिविर में 400 प्रशिक्षार्थी थे। युवा सन्त चिन्तन वर्ग में संस्कृत सम्भाषण की कक्षाएं सन्तों के बीच चलाई। आगरा में संस्कृत चेतना रैली में 4000 ग्रामवासियों ने भाग लिया, ऐसी रैलियाँ प्रयाग में भी हुईं। संस्कृत में पत्र व्यवहार, शुभकामना सन्देश को प्रेरित किया गया। दूरदर्शन, आकाशवाणी में भी संस्कृत को स्थान मिला। दिल्ली में केन्द्रीय स्तर पर एवं राजस्थान में प्रान्त स्तरीय दस दिवसीय संस्कृत व्यवहार शिविर प्रतिवर्ष किए जाते हैं।
वर्ष 2011 में एक केन्द्रीय प्रशिक्षण वर्ग, 12 प्रान्त प्रशिक्षण वर्ग, 55 संस्कृत व्यवहार शिविर एवं 02 प्रवर्तक प्रशिक्षण वर्ग लगे, त्रैमासिक व्याख्यानमाला, शोध संगोष्ठी, संस्कृत प्रेमियों की मासिक गोष्ठी संस्कृत संध्या के नाम से, संस्कृत शिक्षक सम्मान आयोजन एवं काशी, लखनऊ, इलहाबाद, हरिद्वार में विद्वत् संगोष्ठी आयोजित की गई। ऐसे आयोजन विगत अनेक वर्षों से किए जा रहे हैं। प्रतिवर्ष श्रीनिधि वैदिक पंचांग प्रकाशित करते हैं।
उत्तर प्रदेश में 9 स्थानों पर अर्चक-पुरोहितों के समारोह आयोजन किए गए। अर्चक पुरोहित परिवार में संस्कारों की रक्षा करता है। भावी पीढ़ी के मन में हिन्दू परम्पराओं के प्रति श्रद्धा निर्माण करने में अर्चक-पुरोहित की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। योग्य पुरोहित समाज को मिले, इस दृष्टि से प्रशिक्षण की व्यवस्था की प्रारम्भ की। अर्चकों के संगठन के लिए ‘अर्चक अभिनन्दन’ आयोजित किए। राजघाट, वृन्दावन में योग प्रशिक्षण वर्ग किए।
विश्व के सबसे प्राचीन ग्रन्थ वेद हैं। वेद मंत्रों में मंत्रदृष्टा ऋषियों ने जो कुछ मार्गदर्शन किया है वही इस समाज की परम्परा व संस्कृति का आधार है। महर्षि व्यास ने वेद को चार भागों में व्यवस्थित किया। प्रज्ञाचक्षु स्वामी गंगेश्वरानन्द जी महाराज ने चारों वेदों को एक खण्ड में छपवाया। विश्व हिन्दू परिषद के संस्थापक महामंत्री दादा साहब आपटे ने वर्ष 1974-75 में स्वामी जी के साथ मिलकर थाईलैण्ड, फिलिपिन्स, सिंगापुर, मलयेशिया, इण्डोनेशिया, माॅरीशस, इंग्लैण्ड, स्वीटजरलैण्ड, इटली, अमेरिका, कनाडा, सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद का भ्रमण कर अनेक धार्मिक स्थलों, विश्वविद्यालयों में 88 स्थानों पर वेद मन्दिर की स्थापना कराई। कन्याकुमार, तमिलनाडु में 1983 में वेद पाठशाला प्रारम्भ की, जिसकी आर्थिक व्यवस्था बिड़ला फाउण्डेशन ने स्वीकार की।
प्रथम विश्व वेद सम्मेलन, 1992 प्रयागराज –
वेदज्ञों को सम्मानित करने तथा वेद ज्ञान को विश्व में प्रचारित करने की योजना बनाने के लिए प्रयाग में 10 से 16 फरवरी, 1992 की अवधि में प्रथम ‘‘विश्व वेद सम्मेलन‘‘ किया गया। देश के मूर्धन्य वेदज्ञ सम्मेलन में पधारे, उनका अभिनन्दन किया गया। वेद सम्बद्ध 11 विषयों पर विशेषज्ञ विद्वानों की संगोष्ठियाँ की गईं। वेदमंत्रों पर आधारित प्रदर्शनी लगाई गई।
वेद पाठशाला का प्रारम्भ –
गुरुपूर्णिमा 1994 से संकट मोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम, सेक्टर-6, नई दिल्ली में 11 बालकों के साथ वेद पाठशाला गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत प्रारम्भ की। इस परम्परा में वेदज्ञ अध्यापक बालक को वेदमंत्र, मंत्र का स्वर, मंत्रोच्चारण के समय बैठने की स्थिति, मुखाकृति एवं हस्तसंचालन का अभ्यास कराता है। परिषद ने शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिनी शाखा के मंत्रों को कंठस्थ कराने की पाठशाला प्रारम्भ की। इस माध्यन्दिनी शाखा में 40 अध्यायों के अन्तर्गत 1975 मंत्र आते हैं, उत्तर भारत में हमारे जीवन में जितने भी प्रकार के संस्कार, पूजन, अनुष्ठान होते हैं, उनमें माध्यन्दिनी शाखा के मंत्रों का ही प्रयोग होता है। 12 वर्ष की आयु के बालक को पाठशाला में प्रवेश दिया जाता है। एक ही ध्यान रखा जाता है कि बालक हकलाता न हो, तुतलाता न हो, स्मरण शक्ति अच्छी हो, जन्मना कोई गम्भीर रोग न हो। कालान्तर में संकट मोचन आश्रम में प्रारम्भ हुई पाठशाला श्री बद्रीभगत झण्डेवाला टेम्पल सोसायटी ने पूर्णरूप से अंगीकार कर ली, आज भी यह पाठशाला चलती है, इस पाठशाला में 60 से अधिक छात्र वेदाध्ययन कर रहे हैं।
इसी पाठशाला के छात्रों ने अयोध्या, इलाहाबाद, कानपुर, काशी, हरिद्वार एवं जम्मू में वेद पाठशालाएं प्रारम्भ की। काशी, हरिद्वार एवं जम्मू की पाठशालाओं की आर्थिक व्यवस्था पूज्य स्वामी गोविन्ददेव गिरि जी महाराज की प्रेरणा से की जा रही है। सामान्यतया 6 वर्ष में बालक 1975 मंत्रों को कंठस्थ कर लेता है। इसके पश्चात इन मंत्रों को ठीक से समझने के लिए वेदांग की शिक्षा दी जाती है। वेदांग के अन्तर्गत 6 विषय पढ़ाए जाते हैं – व्याकरण, ज्योतिष, छन्द, शिक्षा, कल्प एवं निरुक्त। वेदांग शिक्षण का विद्यालय भी इलाहाबाद में प्रारम्भ किया गया है। इलाहाबाद में चलने वाले वेदांग शिक्षण केन्द्र और वेद पाठशाला की आर्थिक व्यवस्था भारत संस्कृत परिषद द्वारा की जाती है। वर्तमान तक लगभग 100 छात्र वेदमंत्र कंठस्थ करके समाज जीवन में स्थापित हैं, प्रतिष्ठित हैं। 50 छात्र किसी न किसी विश्वविद्यालय में अध्ययन कर रहे हैं अथवा कहीं न कहीं वेद अध्यापक हैं। इसी के साथ-साथ लगभग 200 छात्र आज इन पाठशालाओं में अध्ययन कर रहे हैं। ये छात्र नेपाल, मणिपुर, असम, बिहार, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, उत्तराखण्ड, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान व जम्मू कश्मीर के हैं।
द्वितीय विश्व वेद सम्मेलन 1998, दिल्ली –
09 से 13 दिसम्बर, 1998 तक दिल्ली में आयोजित हुआ। सम्मेलन में पधारे वेदज्ञों की संख्या का प्रान्तशः विवरण इस प्रकार है:- तमिलनाडु-84, केरल-43, पश्चिम आन्ध्र-66, कर्नाटक-55, महाराष्ट्र-220, गुजरात-22, मध्यप्रदेश-3, काशी-68, ब्रज क्षेत्र-18, बिहार-2, बंगाल-3, उड़ीसा-19, असम-7, दिल्ली-18, हरियाणा-2, नेपाल-7। इनके अतिरिक्त सम्मेलन में 3 अग्निहोत्री परिवार एवं विष्णु महायाग के निमित्त पधारे 5 वैदिक विद्वान और भी थे।
सम्मेलन के मुख्यतः 6 अंग रहे, यथा- वेद मंत्रों का सामूहिक सस्वर पाठ, पंचकुण्डीय विष्णु महायज्ञ, अग्निहोत्र यज्ञ, वैदिक विषयों पर संगोष्ठियाँ, वेद कथा तथा प्रदर्शनी। चारों वेदों की विभिन्न संहिताओं का सस्वर सुमधुर दिल्लीवासियों ने पाठ प्रथम बार सुना।  प्रतिदिन प्रातः 09 से 12 बजे तथा अपराह्न 03 से 04.30 बजे तक 20 वेदियों पर वेदों की 10 शाखाओं के वेदज्ञों द्वारा वेद मंत्रों का पारायण हुआ। इसी अवधि में विष्णु महायज्ञ एवं तपोनिष्ठ वैदिकों द्वारा प्रातः-सायं अग्निहोत्र यज्ञ किया गया। सामान्यतः सभी आयोजन एक साथ चले।
संगोष्ठी के विषय – ‘वेद मंत्रों के ऋषि एवं देवता‘, वेदों में प्रतिपादित जीवन दर्शन, ‘वेदों में राष्ट्र की अवधारणा‘ ‘वेद और शरीर रचना विज्ञान तथा आयुर्वेद‘ ‘वेद और विज्ञान‘।
हंसराज माॅडल स्कूल के छात्रों ने स्वामी दयानन्द जी के जीवन चरित्र पर आधारित सुन्दर नृत्य नाटिका ‘वेद भगवान एवं वेदभक्त‘ प्रस्तुत की।
अयोध्या में क्षेत्रीय वैदिक सम्मेलन 2010 – नवम्बर मास में सम्पन्न हुआ। सम्मेलन में भारत सरकार की संस्था महर्षि सांदीपनी वेद विद्या प्रतिष्ठान उज्जैन की पूर्ण सहभागिता रही। अनेक राज्यों के वैदिक विद्वान तीन दिवसीय इस सम्मेलन में पधारें। परिषद की ओर से चलने वाली सभी वेद पाठशालाओं के वर्तमान छात्र, अध्यापक एवं पुरातन छात्र तथा बालकों के माता-पिता सम्मेलन में पधारें।
15 दिवसीय वेद शिविर का आयोजन – यह शिविर प्रतिवर्ष प्रयागराज में माघ माह में मेला क्षेत्र में अयोजित किया जाता है सभी पाठशालाओं के वेद छात्र एवं अध्यापक शिविर में आते है यही पर नये छात्रों का यज्ञोपवीत संस्कार भी किया जाता है शिविर में योगासन, खेलकूद, राष्ट्रीय सामाजित एवं सांस्कृतिक विषयों पर चर्चा, सन्तों के प्रवचन, स्वाध्याय एवं परीक्षा के आयोजन होते है।

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