श्रीराम जय राम जय जय राम, শ্ৰীৰাংজয়ৰাংজয়জয়ৰাং, শ্রীরাম জয় রাম জয় জয় রাম , શ્રીરામ જય રામ જયજય રામ, ಶ್ರೀರಾಮಜಯರಾಮಜಯಜಯರಾಮ, ശ്രിറാം ജയ് റാം ജയ്‌ ജയ് റാം, శ్రీరాంజయరాంజయజయరాం

विश्व हिन्दू परिषद् के बढते चरण

समन्वय मंच (हिन्दू बौद्ध एक्य)
विश्व में आज आक्रमणकारी शक्तियों का प्रभाव बढ़ा है, परिणामस्वरूप असहिष्णुता, आतंकवाद एवं भौतिकवाद बढ़ा है। विभिन्न देशों की प्राचीन संस्कृतियाँ अपनी अस्मिता के संरक्षण के लिए जागरूक भी हुई हैं। वे इस कार्य में भारतीय संस्कृति का सहयोग भी चाहती हैं। इस विचार में से समन्वय मंच का कार्य प्रारम्भ हुआ।
सम्पूर्ण समाज मिलकर भगवान् महावीर जयन्ती, श्री बुद्ध जयन्ती, सन्त कबीरदास जयन्ती, गुरुपूर्णिमा, रक्षाबन्धन, नारायणगुरु समाधि दिवस, वाल्मीकि जयन्ती, गुरुनानक जयन्ती, दत्त जयन्ती, जीजाबाई जयन्ती, रविदास जयन्ती एवं गौरांग महाप्रभु जयन्ती मनाए, ऐसी प्रेरणा देना प्रारम्भ किया। सद्भावना बैठकों का क्रम प्रारम्भ किया। उत्सव, पर्वों में परस्पर सहभागिता, एक दूसरे के धार्मिक स्थानों पर आना-जाना, नियमित चिन्तन बैठकें, संकट के समय में सबका सहयोग लेना, मिलकर सेवा कार्य करना आदि कार्यों को प्रोत्साहन दिया जाता है।
कौन सी संस्कृति पुरानी है, कौन सी नई, कौन प्रदाता है, कौन याचक है, कौन सी संस्कृति ऊँची और कौन सी नीची, कौन सी गहरी और कौन सी उथली, इसकी चर्चा से समाज को बचाते हैं। अपना मत दूसरों पर जबरदस्ती लादा न जाए इसकी प्रेरणा देते हैं। संघर्ष नहीं सहयोग की भावना से काम करने की प्रेरणा देते हैं। इसी विचार के अन्तर्गत हुए कुछ कार्यक्रमों का विवरण निम्न प्रकार है –
हिन्दू बौद्ध एकात्मता के कार्य  – आयोजित सम्मेलन
स्थान     विचारार्थ विषय
01. 1994 सारनाथ (उ0प्र0-भारत)-   हिन्दू बौद्ध मौलिक एकता
02. 1996 क्योटो (जापान)-    अहिंसा की अवधारणा एवं व्यवहार
03. 1997 मोदीपुरम (उ0प्र0-भारत)-   सत्य की अवधारणा एवं व्यवहार
04.   1999 लुम्बिनी (नेपाल)-    करूणा की अवधारणा एवं व्यवहार
05.   2004 सिक्किम हिन्दू बौद्ध सम्मेलन-  बौद्ध समाज में व्याप्त व्यसनों के प्रति
समाज को सचेत करना
05.   2006 काशी (उ0प्र0)-धर्म संस्कृति संगम विश्व शान्ति और समन्वय की धारा को
पुनः प्रबल करने हेतु संवाद
जनवरी, 1979 में प्रयागराज, उत्तर प्रदेश में संगम तट पर सम्पन्न हुए द्वितीय विश्व हिन्दू सम्मेलन में हमारे निमन्त्रण पर परमपावन दलाई लामा जी पधारे एवं तत्कालीन ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य पूज्य स्वामी शान्तानन्द जी महाराज ने परमपावन का स्वागत किया। 2001 ई0 में पूर्ण कुम्भ के अवसर पर परिषद के आमंत्रण पर परमपावन दलाई लामा जी पुनः प्रयाग पधारे और अन्य समस्त वरिष्ठ धर्माचार्यों के साथ चर्चा की तथा कांची पीठाधीश्वर पूज्य जयेन्द्र सरस्वती जी महाराज के साथ संयुक्त वक्तव्य जारी किया।
विश्व हिन्दू परिषद ने पूज्य भन्ते ज्ञानजगत जी महाराज के मार्गदर्शन में कुछ अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर हिन्दू बौद्ध मैत्री के लिए एशिया के 21 देशों की यात्रा तीन चरणों में सम्पन्न की। 1999 में 40 दिन की यात्रा में दक्षिण पूर्व एशिया के 10 देशों का भ्रमण। 2005 में 33 दिन की यात्रा में ब्रह्मदेश, बंगलादेश, भूटान और नेपाल का भ्रमण। 2006 में 71 दिनों की यात्रा में 8 देशों का भ्रमण। हिन्दू बौद्ध समन्वय इन यात्राओं का मुख्य बिन्दु था। हिन्दू और बौद्ध दोनों में ही आध्यात्मिक तत्त्व विद्यमान हैं, इसलिए विश्व कल्याण हेतु दोनों का समन्वय आवश्यक है, यह विचार विकसित हुआ। 1999 में वैदिक और बौद्ध परम्पराओं में समन्वय की दृष्टि से एक संयुक्त वक्तव्य पर 125 धर्माचार्यों की सहमति के हस्ताक्षर कराए गए।
सन् 2002 से 2004 के मध्य विश्व बौद्ध संस्कृति फाउण्डेशन के माध्यम से भारत सरकार के पर्यटन एवं सांस्कृतिक मंत्रालय के साथ मिलकर 3 अथवा 4 दिन के बौद्ध महोत्सव जम्मू कश्मीर के जन्सकार में, किन्नौर (हिमाचल), गंगटोक (सिक्किम), जयगाँव (पश्चिम बंगाल) एवं अरूणाचल प्रदेश के तवांग में किए गए। सैंकड़ों लामाओं एवं भक्तों ने इन उत्सवों में भाग लिया। सेवा कार्य भी प्रारम्भ कराए।
भारत-नेपाल सांस्कृतिक सम्बन्धों को और अधिक प्रगाढ़ करने के लिए कांची कामकोटि पीठ के वरिष्ठ जगद्गुरु शंकराचार्य पूज्य जयेन्द्र सरस्वती जी महाराज के निमन्त्रण पर नेपाल नरेश वीरेन्द्र वीर विक्रम शाह देव भारत तीर्थयात्रा के लिए पधारे। पुण्यभूमि हरिद्वार में अक्टूबर, 1997 को हिंदू सम्मेलन आयोजित हुआ। उपस्थिति लगभग 80,000।

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