श्रीराम जय राम जय जय राम, শ্ৰীৰাংজয়ৰাংজয়জয়ৰাং, শ্রীরাম জয় রাম জয় জয় রাম , શ્રીરામ જય રામ જયજય રામ, ಶ್ರೀರಾಮಜಯರಾಮಜಯಜಯರಾಮ, ശ്രിറാം ജയ് റാം ജയ്‌ ജയ് റാം, శ్రీరాంజయరాంజయజయరాం

विश्व हिन्दू परिषद् के बढते चरण

सेवा
हमारा समाज अनेक भेदों के कारण विघटन और शोषण का शिकार है। करोड़ों का समाज ऐसा है जो समाज की दौड़ में पीछे रह गया है। छुआछूत गहराई तक अनुभव होती है। यह समाज अपने को उपेक्षित भी अनुभव करता है। यदि किसी देश की करोड़ों आबादी निरक्षर हो, अपने को उपेक्षित, शोषित अथवा पिछड़ी अनुभव करती हो तो उस देश की प्रगति की कल्पना नहीं की जा सकती। हमारी ही कमजोरियों का लाभ उठाकर पहले मुस्लिमों और बाद में ईसाई मिशनरियों ने हिन्दू समाज का धर्मान्तरण किया और अपने संस्कारों से उन्हें हमसे दूर कर दिया, हमारे पूर्वजों से भी सम्बन्ध विच्छेद करा दिया, पूर्वजों की सभी परम्पराएं उनके लिए पराई हो गईं। इसी कारण 1947 में देश का विभाजन भी हुआ।
इसलिए बिखरे हुए, असहाय बने, निरक्षर, अपने को शोषित, निरीह अथवा पिछड़ा मानने वाले बन्धुओं को शेष समाज से जोड़ने, उन्हें सामाजिक न्याय दिलाने व सुरक्षा प्रदान करने, उनमें जागरूकता लाकर सामाजिक सम्मान दिलाने के लिए शिक्षा, आरोग्य, स्वावलम्बन, संस्कार के क्षेत्र में सम्पूर्ण समाज के सहयोग से परिषद के प्रारम्भ काल से ही कार्य प्रारम्भ हुआ।
1967 ई0 में महाराष्ट्र के तलासरी में छात्रावास, धीरे-धीरे रोजगार प्रशिक्षण केन्द्र व चिकित्सा केन्द्र प्रारम्भ हुआ। 1972 में उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले के घोरावल गाँव में छात्रावास व प्राथमिक विद्यालय प्रारम्भ हुआ। 1974 में बंगाल के खड़गपुर शहर के पास गोपाली आश्रम प्रकल्प गुरुकुल पद्धति पर प्रारम्भ हुआ। 1976 में गोवा के फोण्डा में निराश्रित बालक-बालिकाओं के लिए मातृछाया प्रकल्प प्रारम्भ किया। राजस्थान के बांसवाड़ा का प्रकल्प भी 1967 में प्रारम्भ हुआ था। 1981 में इसी क्षेत्र में घाटोल गाँव में एकलव्य आश्रम तथा 1982 में मोहकमपुरा गाँव में एक आश्रम प्रारम्भ हुआ। बांसवाड़ा जनपद के इन वनवासी बालकों को प्रारम्भ में शिक्षा, भोजन, आवास, पुस्तकें निःशुल्क उपलब्ध कराई गई थीं। बांसवाड़ा प्रकल्प आज देश में प्रतिष्ठित प्रकल्प है। असम का हाॅफलांग प्रकल्प, तमिलनाडु का हिन्दू बाल छात्रावास एवं स्वामी विवेकानन्द मेडिकल मिशन, कर्नाटक का अश्विनी अस्पताल एवं आन्ध्र का गिरिजन विकास केन्द्र परिषद कार्यकर्ताओं ने प्रारम्भ किया। आत्मनिर्भरता के लिए सिलाई केन्द्र, कम्प्यूटर प्रशिक्षण केन्द्र, रोजगार के अन्य शिक्षण कार्य प्रारम्भ हुए। निराश्रित बालक-बालिकाओं के लिए बाल आश्रम खोले गए। संस्कारों को पुष्ट करने के लिए सत्संग प्रारम्भ किए गए, छोटे-छोटे मन्दिरों का निर्माण किया गया। आज समाज में इनका अच्छा प्रतिफल प्राप्त हुआ है।
1980 के दशक में तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम गाँव में सामूहिक धर्मान्तरण कर लिए जाने के कारण मुस्लिमों ने गाँव का नाम भी बदल दिया। देश में भयंकर आक्रोश पैदा हुआ, इस आक्रोश को परिषद ने रचनात्मक दिशा दी। संस्कृति रक्षा योजना प्रारम्भ हुई। सेवा को परिषद का महत्वपूर्ण कार्य माना गया। स्थान-स्थान पर सेवा कार्यों के लिए स्वतंत्र संस्थाओं का पंजीकरण कराया गया। 1994 ई0 तक देशभर में 74 सेवा संस्थाओं के माध्यम से सेवा कार्य प्रारम्भ कर दिए गए थे। आन्ध्र में विज्ञान पीठम् के माध्यम से अनाथाश्रम, बाद में चिकित्सालय, विद्यालय, वाचनालय विकसित हुए। महाराष्ट्र में नागपुर के देवलापार गाँव में वनवासी विद्यार्थी वसतिगृह प्रारम्भ हुआ। राजस्थान में भारतीय जनसेवा प्रतिष्ठान का गठन हुआ।
वर्तमान में हमारे सेवा कार्यों का विवरण अत्यन्त विशाल है, जिसको सम्पूर्णता के साथ लिखा जाना शायद कठिन होगा। आज प्रमुख प्रकल्पों में कटक का जशोदा सदन, बंगाल का बादामी देवी शिशु कल्याण केन्द्र-हावड़ा, प्लेटफार्म ज्ञान मन्दिर निवासी पाठशाला, नागपुर, गंगा अम्मा चिकुम्भी मठ बाल कल्याण केन्द्र, बेलगाँव-कर्नाटक, कारूण्यसिन्ध बाल कल्याण आश्रम, आन्ध्र प्रदेश, मातृ आँचल कन्या विद्यपीठ-हरिद्वार, वात्सल्य वाटिका-हरिद्वार, मातृछाया गोवा, श्री दत्त बालसेवा आश्रम, गंगापुर-कर्नाटक एवं महिला आश्रम-कोंकण हैं। समय-समय पर भिन्न प्रकार से सेवा क्षेत्र में प्रशिक्षण वर्ग, शिविर किए जाते हैं। वर्ष 2011-12 में देश में 11 स्थानों पर शिविर आयोजित किए गए जिसमें छात्रावास एवं बाल आश्रमों के 65 प्रकल्पों के 599 बालकों ने भाग लिया।
शिक्षा क्षेत्र में बाल संस्कार केन्द्र, प्राइमरी पाठशाला, सेकेण्डरी स्कूल, सीनियर सेकेण्डरी स्कूल, पुस्तकालय एवं संस्कृत विद्यालय चलते हैं। आरोग्य क्षेत्र में चिकित्सालय, प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र, एम्बुलेन्स व चिकित्सा शिविर आयोजित किए जाते हैं। स्वावलम्बन के लिए सिलाई, कम्प्यूटर प्रशिक्षण, महिलाओं के लिए स्वयं सहायता समूह व अन्य ग्रामीण उद्योग के प्रशिक्षण केन्द्र चलते हैं। सामाजिक क्षेत्र में निराश्रित बालक-बालिकाओं के लिए आश्रम, विवाह मिलन केन्द्र, महिलाओं को कानूनी सहायता देने का कार्य और कामकाजी महिलाओं के छात्रावास चलाए जाते हैं। आवश्यकता पड़ने पर मेलों में, तीर्थयात्राओं में चिकित्सा, भोजन, जल व आश्रय प्रदान करने के लिए सेवा कार्य किए जाते हैं। भारत के प्रत्येक राज्य में हमारे सेवा कार्य हैं। 2012 ई0 में इन कार्यों का संचालन 200 ट्रस्टों के माध्यम से किया जा रहा है।
शिक्षा क्षेत्र के सेवा कार्य- बालवाड़ी-162, बाल संस्कार केन्द्र-334, प्राथमिक विद्यालय-86, सेकेण्डरी स्कूल-54, सीनियर सेकेण्डरी स्कूल-29, आवासीय विद्यालय-17, छात्रावास (बालक-बालिका)-76, रात्रि विद्यालय-9, कोचिंग सेन्टर-41, पुस्तकालय-95, संस्कृत एवं वेद पाठशाला-12, अन्य शिक्षा प्रकल्प-34 – कुल शैक्षिक सेवा कार्य-949
चिकित्सा क्षेत्र के सेवा कार्य – होस्पिटल-17, डिस्पेन्सरी-85, मोबाइल डिस्पेन्सरी-12, एम्बुलेन्स-17, प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र-353, औषधि संग्रह केन्द्र-18, पंचगव्य औषधि केन्द्र-8, अन्य चिकित्सा कार्य-211 – कुल चिकित्सा सेवा कार्य-731
स्वावलम्बन क्षेत्र के सेवा कार्य – सिलाई प्रशिक्षण केन्द्र-76, कम्प्यूटर प्रशिक्षण केन्द्र-31, महिला सहायता केन्द्र-875, मैकेनिकल प्रशिक्षण केन्द्र-2, मधुमक्खी पालन केन्द्र-1, ग्राम उद्योग केन्द्र-2, पशु चिकित्सा केन्द्र-10, अन्य स्वावलम्बन केन्द्र-22 – कुल स्वावलम्बन सेवा कार्य-1019
सामाजिक क्षेत्र के सेवा कार्य – निराश्रित बालक-बालिकाओं के आश्रम-44, हिन्दू विवाह मिलन केन्द्र-15, कानूनी सहायता केन्द्र-20, महिला संरक्षण केन्द्र-4, कामकाजी महिलाओं के छात्रावास-2, अन्य सेवा कार्य-38 – कुल सामाजिक सेवा कार्य-123
अन्य सेवा कार्य – चिकित्सा एवं स्वास्थ्य केन्द्र-94, संस्कृत सम्भाषण वर्ग-5, वृक्षारोपण-546, पेयजल केन्द्र-105, धार्मिक यात्राओं में सेवा कार्य-51, प्राकृतिक आपदा में सेवा-38, ग्राम विकास केन्द्र-19, मन्दिर निर्माण-193, अन्य सामाजिक कार्य-55 – कुल अन्य सेवा कार्य-1106

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