श्रीराम जय राम जय जय राम, শ্ৰীৰাংজয়ৰাংজয়জয়ৰাং, শ্রীরাম জয় রাম জয় জয় রাম , શ્રીરામ જય રામ જયજય રામ, ಶ್ರೀರಾಮಜಯರಾಮಜಯಜಯರಾಮ, ശ്രിറാം ജയ് റാം ജയ്‌ ജയ് റാം, శ్రీరాంజయరాంజయజయరాం

विश्व हिन्दू परिषद् के बढते चरण

धर्मप्रसार-कार्य
पृष्ठभूमि – विश्व हिन्दू परिषद के निर्माण की वेला में जो महानुभाव स्वामी चिन्मयानन्द जी के सान्दीपनी साधनालय में एकत्रित आये थे उन सभी के लिए हिन्दुओं में हो रहा धर्मान्तरण एक महत्वपूर्ण विषय था। इसी कारण से जनवरी, 1966 में प्रयाग में आयोजित प्रथम विश्व हिन्दू सम्मेलन में परावर्तन को पूज्य सन्तों की ओर से स्वीकृति प्राप्त हुई थी। परिषद में धर्मप्रसार कार्य का सृजन हुआ। प्रथम प्रयोग राजस्थान में हुआ था। इस्लाम का उदय अरब में हुआ था। इस्लाम के आक्रमणकारी बर्बर थे। इस्लाम ने विश्व में तलवार के बलपर मानवता का विनाश किया। यही जेहादी आक्रमणकारी भारत में भी आये, इन्होंने मारकाट द्वारा भय का वायुमण्डल निर्माण किया था। इसी भय के कारण जो हिन्दू जीवित रहना चाहते थे उन्होंने मुस्लिम रीतियों का पालन करना आरभ्भ किया। ऐसी जातियां बची रही जो मुस्लिम रीतियों के साथ-साथ हिन्दू संस्कारों का भी पालन करती रही।
ब्यावर –
ऐसी ही एक जाति मेहरात है, ये चैहानवंशीय क्षत्रिय हैं, इन्होंने विवाह में कलमा पढ़ने के साथ पण्डितों के द्वारा सप्तपदी का चलन भी अपना रखा था, इनकी वेशभूषा और त्यौहार हिन्दुओं जैसे ही रहे। अजमेर, पाली और भीलवाड़ा जनपद में इनकी जनसंख्या लगभग तीन लाख है। इनके पूर्वज सम्राट पृथ्वीराज चैहान थे और इनकी इष्टदेवी आशापूर्णा माँ है। इन्हें अपने वंश का स्मरण सदैव बना रहा, इनके श्रेष्ठ पुरूषों ने कभी जोधपुर महाराजा से आग्रह किया था कि एक बार आप हमारी पंगत में बैठकर भोजन करें और हमें चैहान वंशीय क्षत्रीय घोषित कर दें तो हम सभी पूर्णरूप से हिन्दूधारा में आ जायेंगे। जोधपुर महाराजा की अनायास मृत्यु के कारण यह कार्य सम्पन्न नहीं हो सका।
परिषद के राजस्थान प्रान्त के कार्यकर्ताओं ने इस जाति के ग्रामों में जाकर अध्ययन किया व जाति के श्रेष्ठजनों से सम्पर्क प्रारम्भ किया। सम्राट पृथ्वीराज चैहान की जयन्ती मनाना शुरू किया, आशापुरा माता रथ यात्रा का आरम्भ हुआ। क्रमशः कार्यक्रमों का क्रम बढ़ा, जनमन में अपने पूर्वजों के घर में आने की चाह खड़ी हुई। यज्ञ-हवन ने इस चाह को परावर्तन (घरवापसी) में परिणित कर दिया। अब तक लगभग 80 हजार मेहरातों की घर वापसी हुई है। इनके ग्रामों में लगभग 60 मंदिरों का निर्माण किया गया है, ग्रामों में भजन मण्डलियां चलती हैं, विद्यालय संचालित हैं, छात्रावास चलता है। इस क्षेत्र का केन्द्र ब्यावर है। वहीं एक आशापुरा माता का मंदिर बनाया गया है, जहाँ नवरात्र महोत्सव के समय चैहानभक्त बड़े-बडे झण्डे लेकर, पदयात्रा करते हुए आते हैं।
बांसवाड़ा –
राजस्थान के बांसवाड़ा जिला में 70 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति का निवास है।  अंग्रेजों के शासनकाल से इस जिले पर चर्च की दृष्टि पड़ी थी। चर्च ने भील वनवासियों को भारी संख्या में ईसाई बनाया। एक समय यह स्थिति बन गई थी कि यहाँ राम-राम के बजाय जय ईशु गूंजता था।
जनजाति से सम्पर्क साधा गया है, उनमें अपने पूर्वजों, देवी-देवताओं का भाव जागृत हुआ है, घर के द्वार पर गणेश लगवाये गये, गणेश महोत्सव किये गये, गांवों में हनुमान मंदिर निर्माण किये, भजन मंडलियों का निर्माण व पहले से चली आ रही भजन मंडलियों को प्रोत्साहन दिया गया। बांसवाड़ा नगर में प्रतिवर्ष 6 दिसम्बर को लगभग 15 से 20 हजार जनजाति बन्धु अपनी भजन मंडलियों सहित आते हैं, सन्तों के प्रवचन होते हैं, रातभर भजन गाये जाते हैं।
बांसवाड़ा, डूंगरपुर व प्रतापगढ़ के जनजातीय क्षेत्रों में लगभग 400 विद्यालय चल रहे हैं, जिनमें लगभग 42 हजार विद्यार्थी पढ़ते हैं। ये सभी इसी क्षेत्र की जनजाति के लाल हैं, शिक्षक 99 प्रतिशत जनजातीय बन्धु है। परिणामस्वरूप आज ईसाईयत सिकुड़ गई है और जनजाति समाज गर्वीला हिन्दू बना है। आसपास के जिलों में 30 छात्रावास भी चलते हैं। 636 भजन मंडलियों के माध्यम से जनजातीय बन्धुओं से सम्पर्क बना है।
जहाँ-जहाँ सन्तों का सम्पर्क बढ़ा वहाँ-वहाँ परावर्तन (घरवापसी) के कार्यक्रम हो रहे हैं। पूर्वी आन्ध्र में प्रतिमास परावर्तन के कार्यक्रम हो रहे है।
तमिलनाडु –
रामनाथपुरम (तमिलनाडु) जिले के जिन गाँवों में सामूहिक धर्मान्तरण हुआ था वहाँ व्यापक जन सम्पर्क व अध्ययन, सन्तों की पदयात्राएं कराई गईं। सन्तों ने हरिजनों के साथ बैठकर भोजन किया। हरिजन परिवार में जन्मे एवं मलयेशिया के एक मठ के स्वामी श्रीरामदास जी महाराज के साथ उन गाँवों में हरिजनों की गोष्ठियाँ हुई, उन्होंने धर्मान्तरण का विचार छोड़ा और दो महीने तक उन्हीं क्षेत्रों में स्वामी रामदास जी महाराज ने गाँव-गाँव भ्रमण किया।
1981 में तमिलनाडु के एक कस्बे मीनाक्षीपुरम में बड़ी संख्या में हरिजन परिवारों को मुस्लिम बना लिए जाने से हिन्दू समाज चकित रह गया। परिषद ने इनको वापस लाने का संकल्प लिया। हिन्दू समाज में नई चेतना जगी। संस्कृति रक्षा योजना बनी। जुलाई, 1982 में हरिद्वार में अखिल भारतीय प्रशिक्षण वर्ग लगा, 114 कार्यकर्ता आए। धर्मान्तरण के विरुद्ध व्यापक जन जागरण का संकल्प लिया गया। गाँव-गाँव सम्पर्क, जनसभाएं, समूह बैठकें, प्रभात फेरियाँ, सन्तों के प्रवचन प्रारम्भ हुए।
तमिलनाडु के इदंतकुराई ग्राम में मछुआरे रहते थे। इनके पूर्वजों को 400 वर्ष पूर्व ईसाई बना लिया गया था परन्तु चर्च इन पर अत्याचार करता था। घर लूटना, घरों को आग लगाना, झूठे मुकदमें चलाना, माँ-बहनों पर अत्याचार होते थे। परिषद कार्यकर्ताओं ने सम्पर्क किया और 176 परिवारों के 1200 सदस्यों ने विधिवत परावर्तन किया।
धर्मप्रसार का उद्देश्य-
समाज के आबालवृद्ध में हिन्दूधर्म के प्रति निष्ठा-भक्ति निर्माण कर इसे सुदृढ़ स्वाभिमानी हिन्दू के रूप में खड़ा करेंगे।
धर्मान्तरण को रोकना-
इस्लाम के काल से तलवार के आधार पर धर्मान्तरण हुआ। अंग्रेजी काल में बड़ी मात्रा में धर्मान्तरण हुआ। धर्मान्तरण के कारण ही पाकिस्तान बना। धर्मान्तरित होने वाला अपनी पूर्वपम्परा, पूर्वज, ग्रंथ, देवी-देवता को त्यागकर विदेशी धर्मनिष्ठा को स्वीकार कर लेता है, भारत को माँ कहने और वन्देमातरम् घोष का विरोध करने लगता है। अतः धर्मान्तरण राष्ट्रान्तरण है। इस धर्मान्तरण को रोकना आवश्यक है।
परावर्तन को सन्तों ने स्वीकारा-
हिन्दू समाज से छीन लिए गए थे अतः अब वापस हिन्दू समाज में ही आ रहे हैं, इसी कारण यह धर्म परिवर्तन नहीं अपितु परावर्तन है। जनवरी, 1966 में प्रयाग में सम्पन्न हुए प्रथम विश्व हिन्दू सम्मेलन में इसी परावर्तन को सन्तों की स्वीकृति प्राप्त हुई।
समझाकर, पूर्वजों की याद दिला कर वापिस लाना परावर्तन है। इसे ही घर वापसी कहा जाता है।
समरसता का प्रयास-
जो घर में आ गये उनको शिक्षित व संस्कारित करना, उन्हें ठीक प्रकार बसाना, सुरक्षा करना, रोजी-रोटी का प्रबन्ध करना, सन्तति को शिक्षित कर कार्य प्रवण बनाना आवश्यक है। इस दृष्टि से संस्कार केन्द्रों का संचालन, मंदिरों का निर्माण, भजनमंडलियों का गठन, विद्यालय, छात्रावास निर्माण, कथा-प्रवचन कार्यक्रम किए जाते हैं। समाज में वे सम्मानित जीवन जियें, ऐसा मन हिन्दू समाज तैयार किया जाता है।
समरसता हेतु सामूहिक कार्यक्रमों का आयोजन, त्योहारों पर, तीर्थयात्राओं के अवसर पर, सभी को सम्मानित करने का कार्य, वाल्मीकि जयन्ती, रविदास जयन्ती मनाना, ‘न हिन्दू पतितो भवेत’, ‘हिन्दव सोदरा सर्वे’ के भाव को प्रबल बनाते हैं। इस सम्पूर्ण कार्य के लिए 300 कार्यकर्ता रात-दिन भ्रमण व परिश्रम करते हैं। जातियों का चयन कर उनके लिए विशेष प्रकल्प तैयार करके, भिन्न-भिन्न प्रकार के सेवा कार्य ऐसे क्षेत्रों में चलाए जा रहे हैं।
सामाजिक समरसता के कार्य
1969 उडुप्पी में सम्पन्न सम्मेलन में अस्पृश्यता के विरुद्ध सन्तों का उद्घोष।
1970 में महाराष्ट्र के पंढरपुर अधिवेशन में द्वारका तथा शृंगेरी के जगद्गुरु शंकराचार्य और मध्व तथा वल्लभ संप्रदायों के पूज्य आचार्यों ने छुआछूत का विरोध किया।
देशभर में शिक्षा, आरोग्य, स्वावलम्बन के लिए सेवा कार्य प्रारम्भ।
1982 की तमिलनाडु ज्ञान रथं यात्रा – रथ पर लकड़ी का मन्दिर बनाकर,  भगवान मुरुगन की मूर्ति प्रतिष्ठापित कर इसे उन पिछड़े क्षेत्रों में ले जाया गया, जहां हिंदू धर्म विरोधी प्रचार चलाया जा रहा था। लगभग 21,000 कि.मी. लंबी इस यात्रा में छह लाख लोगों से संपर्क हुआ।
1983 में कर्नाटक के उजीरे धर्मस्थल पर हुए सम्मेलन में 60,000 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इसमें हिंदू धर्म के मठों के लगभग 174 अधिपतियों ने सर्वसम्मति से अस्पृश्यता के उन्मूलन और हिंदू एकता के लिए संघर्ष का आह्वान किया।
केरल में 1983 में सन्तों के नेतृत्व में दो धर्मरथों में धर्मयात्रा प्रारम्भ। सन्तों ने मुख्य रूप से हरिजन बस्तियों का भ्रमण किया और उन्हीं की झोपडि़यों में जाकर उन्हीं के द्वारा बनाया गया तथा उन्हीं के द्वारा वितरित किया गया भोजन ग्रहण किया।
सेलम (तमिलनाडु) संत सम्मेलन – जनवरी, 1988। सम्मेलन में वैदिक, बौद्ध, नामधारी सिख आदि प्रमुख संप्रदायों के 23 मठाधिपतियों ने भाग लिया। सम्मेलन में सर्वसम्मत निर्णय हुआ कि छूआछूत का हिंदू धर्म में कोई स्थान नहीं है। इसे पूर्णतया समाप्त किया जाना चाहिए।
अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर का शिलान्यास नवम्बर, 1989 में बिहार के एक हरिजन कार्यकर्ता श्री कामेश्वर चैपाल जी से कराया गया।
ग्राम पुजारी प्रशिक्षण – तिरुम लैकोदी (तमिलनाडु) में सन 1990 से ग्रामीण मंदिर के पुजारियों को प्रशिक्षण देने के लिए 15-15 दिन के शिविर लगाये गये। इनमें वनवासी, जनजाति, अति पिछड़ी, पिछड़ी, और अगड़ी जातियों के इन वर्षों में ऐसे शिविरों के द्वारा कई हजार पुजारी मंदिर में पूजा-अर्चन के लिये प्रशिक्षित हुये। कोविल पैरावेरू, त्रिचनापल्ली में 5,300 ग्राम पुजारियों का एक प्रांतीय सम्मलेन 1995 में हुआ। इसका उद्देश्य पुजारियों को संगठित कर उन्हें अपने अधिकार और कर्तव्य के प्रति सजग करना था। परिणाम स्वरुप पुजारियों को सरकार से पेंशन मिलने लगी।
1994 में काशी में धर्मसंसद का आयोजन हुआ। सन्त-महात्मा डोमराजा के घर निमन्त्रण देने के लिए स्वयं चलकर गए, प्रसाद ग्रहण किया, अगले दिन डोमराजा धर्मसंसद अधिवेशन में मंच पर सन्तों के मध्य बैठे, सन्तों ने पुष्प-हार पहनाकर स्वागत किया। इस धर्मसंसद में 3500 सन्त उपस्थित थे।
महर्षि वाल्मीकि व सिद्धू-कान्हू रथ यात्राएं – आजादी के बाद से ही समाज को जाति व धर्म के आधार पर बांटने के प्रयास हो रहे थे। इसके विरुद्ध जनजागरण हेतु मार्च, 1994 में बिहार में दो रथ यात्राएं आयोजित कीं। 1. महर्षि वाल्मीकि रथ यात्रा, जो उत्तर बिहार के क्षेत्रों में गयी। 2. सिद्धू कान्हू रथ यात्रा जो सिंहभूम जिले से बिहार के अत्यंत पिछड़ेे क्षेत्रों में गयी। दोनों यात्राओं ने लगभग तीन हजार कि.मी. की दूरी तय की और लाखों लोगों की इसमें सहभागिता हुई। इस यात्रा ने अति पिछड़े जनजातीय व वनवासी लोगों के हृदय को छुआ। इससे सामाजिक समरसता का वातावरण बिहार में निर्मित हुआ।
अक्टूबर, 1995 में द्वितीय एकात्मता यात्रा के नागपुर में समापन के अवसर पर हिन्दू सम्मेलन। सन्त-महात्मा दीक्षा भूमि पर दर्शन करने गए।
अप्रैल, 2005 में छत्तीसगढ़ के अम्बिकापुर से बिलासपुर तक 782 कि.मी. की पदयात्रा सामाजिक समरसता कार्यक्रम के अन्तर्गत सम्पन्न।
सन्त रविदास चेतना यात्रा – नवम्बर-दिसम्बर, 2005 में चित्तौड़ से काशी तक सन्त रविदास जी की प्रतिमा के साथ 12 दिवसीय गुरु रविदास चेतना यात्रा का आयोजन, 1600 कि.मी. की दूरी में 25 जनसभाएं, 245 स्थानों पर स्वागत, 10 स्थानों पर शोभायात्राएं। कार्यक्रम का आयोजन सन्तों के नेतृत्व में हुआ।
2006 में उड़ीसा में अष्टमातृका रथयात्रा – 8 देवी पीठों से रथयात्रा उड़ीसा में 7 दिन तक भ्रमण, सभी गाँव से मिट्टी और जल चकापाद लाया गया। गोवर्धन पीठाधीश्वर पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद जी महाराज एवं स्वामी लक्ष्मणानंद जी महाराज के द्वारा स्फटिक शिवलिंग का अभिषेक एवं संग्रहीत मिट्टी से तुलसीचैरा बनाया गया। 265 गाँवों से यात्रा गुजरी, 115 धर्मसभाएं, 1684 स्थानों पर स्वागत हुआ। यात्रा के दौरान हनुमान चालीसा, सुन्दरकाण्ड, रामचरितमानस, श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीराम के चित्र व लाॅकेट वनवासी समाज को सन्तों द्वारा भेंट किए गए।
1986 में सुन्दरगढ़ (उड़ीसा) में वनवासी तथा औरंगाबाद (बिहार) में जातीय एकता सम्मेलन किये गये।

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