श्रीराम जय राम जय जय राम, শ্ৰীৰাংজয়ৰাংজয়জয়ৰাং, শ্রীরাম জয় রাম জয় জয় রাম , શ્રીરામ જય રામ જયજય રામ, ಶ್ರೀರಾಮಜಯರಾಮಜಯಜಯರಾಮ, ശ്രിറാം ജയ് റാം ജയ്‌ ജയ് റാം, శ్రీరాంజయరాంజయజయరాం

विश्व हिन्दू परिषद् के बढते चरण

गोरक्षण-संवर्धन के लिए कार्य
जनवरी, 1966 में प्रयाग में आयोजित प्रथम विश्व हिंदू सम्मेलन में गोरक्षा पर पारित प्रस्ताव में कहा गया कि गोमाता के प्रति हिन्दुओं की श्रद्धा का आदर करते हुये समस्त भारत में गोहत्या बन्द करने का केन्द्रीय कानून अविलम्ब बनाया जाये। दिल्ली में 07 नवंबर, 1966 को गोरक्षा के लिये सम्मेलन तथा 20 नवंबर, 1966 से गोवर्धन पीठाधीश्वर पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निरंजनदेव तीर्थ जी महाराज और पूज्य श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी द्वारा आमरण अनशन की घोषणा की गयी।
07 नवम्बर, 1966 को सर्वदलीय गोरक्षा महा अभियान समिति के तत्वावधान में दिल्ली में संसद के सामने विराट प्रदर्शन हुआ, जिसमें सरकार की ओर से निर्मम गोलीवर्षा की गयी थी।
1986 में गोरक्षण तथा संवर्धन के लिए अलग विभाग का गठन किया। बिहार के आरा एवं टाटा नगर के गोरक्षा सम्मेलन। गोसेवा महाभियान समिति के आह्वान पर 25-26 मार्च, 1987 को गोरक्षा सम्मेलन आयोजित हुआ। 25 मार्च को सामुहिक उपवास रखा गया। कोलकाता में 24-25 नवंबर, 1988 को गोपालक सम्मेलन आयोजित हुआ। 1988 में कोलकाता पिंजरापोल सोसायटी शताब्दी आयोजन में 2000 गोशालाओं से सम्पर्क हुआ, सम्मेलन में 12 राज्यों के प्रतिनिधि आये।
कोयम्बटूर में 4 राज्यों के गोसेवकों का सम्मेलन, गोहत्या बन्दी कानून की मांग। 1990 में मध्य प्रदेश में गोहत्या बन्दी का संकल्प घोषित कराया गया। पाली में गोशाला की स्थापना हुई। हैदराबाद स्थित ‘अल कबीर यांत्रिक कत्लखाना हटाओ समिति’ का गठन किया गया। जनांदोलन के कारण 1994 में कत्लखाना अस्थायी रूप से स्थगित कर दिया गया।
1993 से महाराष्ट्र के अकोला में एवं 1995 से देवलापार, नागपुर में पंचगव्य पर अनुसंधान प्रारम्भ हुआ। गोविज्ञान अनुसंधान केन्द्र नागपुर में गठित गोमूत्र, गोबर से मनुष्य के लिये उपयोगी औषधियाँ निर्माण, कीटनियंत्रक, उर्वरक एवं अन्य मनुष्योंपयोगी वस्तुओं का उत्पादन प्रारम्भ हुआ। आज देश में 600 स्थानों पर पंचगव्य एवं गोआधारित जैविक कृषि पर कार्य हो रहा है। किसानों को प्रशिक्षित किया जाता है। कीट नियंत्रक एवं गोमूत्र अर्क पर गोविज्ञान अनुसंधान केन्द्र नागपुर ने भारत सरकार ने वैज्ञानिकों के साथ मिलकर 06 अन्तरराष्ट्रीय पेटेंट प्राप्त किये हैं।
1996 में प्रयाग मे संगम तट पर माघ मेला में गोरक्षा के लिये बजरंग दल के आह्वान पर राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ। सम्मेलन में बजरंग दल के 1,25,000 युवक उपस्थित थे। कत्लखानों को जाने वाली गऊओं को रोकने का संकल्प लिया गया। गोरक्षा वाहिनियों का गठन हुआ। कसाइयों के हाथों से गोवंश को मुक्त करने का राष्ट्रव्यापी अभियान छेड़ा और वर्ष भर में 300 से अधिक स्थानों पर प्रान्तीय सीमाओं पर चैकपोस्ट (चैकियाँ) बनाकर लाखों गोवंश को कत्लखाने जाने से बचाया और मुक्त हुए गोवंश के पालन-पोषण हेतु गोसदनों तथा गोशालाओं का सहयोग प्राप्त करने के अतिरिक्त नये गोसदन भी स्थापित किए गए।
बकरीद पर गोहत्या का विरोध – बकरीद पर गोहत्या के सन्दर्भ में सभी राज्यों में विशाल जनसभा व रैलियां आयोजित कर सरकार से मांग की गई कि उच्चतम न्यायालय के आदेश का पालन हो और बकरीद पर एक भी गाय न कटे।
गो-जागरण रथयात्राएं – धर्माचार्यों के आह्वान पर 1997 से 2000 तक 100 रथयात्राएं पूरे देश में निकाली गयीं। इनसे गोसेवा एवं गोरक्षा के लिये लोक जागरण, लोक संस्कार और लोक प्रशिक्षण के कार्य हुए।
2006 में हुए गोरक्षा सम्मलेन में 700 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इनमें 200 से अधिक गोशालाओं के प्रतिनिधि थे।
गुजरात सरकार द्वारा पूर्ण गोहत्या बन्दी के निर्णय के विरुद्ध कसाइयों की याचिका पर गुजरात उच्च न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय के 1958 के निर्णय के आधार पर सरकार का कानून निरस्त कर दिया। गुजरात सरकार ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की। अब तक किए गए अनुसन्धानों से तथा आयोग की रिपोर्ट के तथ्यों के आधार पर 26 अक्टूबर, 2005 को उच्चतम न्यायालय की सप्त न्यायाधीशों की बंेच ने पूर्ण गोहत्याबन्दी का निर्णय दिया। सप्त न्यायाधीशों की बेंच ने यह माना कि गोवंश कभी भी अनुपयोगी नहीं होता। उच्चतम न्यायालय में अपील के दौरान विश्व हिन्दू परिषद ने अथक प्रयास किया। उसी का परिणाम यह ऐतिहासिक निर्णय है।
अन्य कार्य
कत्ल हेतु ले जाए जाने वाले गोवंश का रक्षण करना।  गोवंश की वृद्धि, उपयोगिता के प्रति जन-जागृति करना।  पंचगव्य आधारित (गोबर, गोमूत्र, दूध, दही, घी) औषधियों का निर्माण कर उनका प्रचार, प्रसार करना।  कृषि के लिए गोबर, गोमूत्र से निर्मित खाद एवं कीट नियंत्रक तैयार करना, वितरित करना, किसानों को प्रशिक्षण देना।  जैविक खेती करने के लिए किसानों को प्रवृत्त करने हेतु किसान प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन करना।
गो विज्ञान अनुसंधान केन्द्र, देवलापार (नागपुर) की गतिविधियाँ
यह केन्द्र निम्न गतिविधियों का विस्तार अनेक धार्मिक, सामाजिक संस्थाओं के साथ कर रहा हैः-
01. गोवंश आधारित शाश्वत खेती    02. गोबर से केंचुआ खाद
03. गोमूत्र $ नीम से कीट नियंत्रक (अन्तर्राष्ट्रीय पेटेंट) 04. गोबर $ गोमूत्र $ गुड़ से अमृतपानी
उक्त चीजों के निर्माण का प्रशिक्षण किसानों को प्रतिवर्ष दिया जा रहा है। फलतः पूरे भारत में कई हजार टन कंेचुआ खाद का निर्माण होने लगा है तथा गोमूत्र का उपयोग कृषि में हो रहा है। इसके कारण रसायनिक खाद और कीटनाशक का उपयोग कम होता जा रहा है। संस्था किसानों को सही अर्थों में स्वावलम्बी बनाने का कार्य कर रही है। साथ ही केन्द्र द्वारा निर्मित 29 पंचगव्य आयुर्वेद औषधियों (जो भारतीय गोवंश के गोबर, गोमूत्र, दूध, दही, घी, छाछ के उपयोग से बनती है) को शासकीय मान्यता प्राप्त हो गई है।
केन्द्र ने निम्नलिखित अनुसंधान किए हैं:-
कामधेनु कृषि।  पंचगव्य आयुर्वेद चिकित्सा (मानव स्वास्थ्य रक्षा के लिए)।  पंचगव्य आयुर्वेद पद्धति से पशु-पक्षियों की चिकित्सा।  ऊर्जा के साधन के रूप में गोबर गैस से बिजली, बैल चालित जनरेटर आदि।  भारतीय गोवंशीय नस्लों की सुरक्षा एवं संवर्धन।  अन्य उपयोगी उत्पाद जैसे, धूप, मच्छर निरोधक बत्ती, फिनाइल आदि।  प्राकृतिक मृत्यु के पश्चात समाधि खाद व चर्म का उपयोग।
वर्तमान स्थिति –
परिषद द्वारा संचालित गौशालाएँ – 370, सम्पर्कित गौशालाएँ-1220, पंचगव्य औषधि निर्माण केन्द्र-340, जैविक खाद निर्माण केन्द्र-333, प्रतिवर्ष गोविज्ञान पर छात्रों को अध्ययन के लिए प्रोत्साहन किया जाता है, परीक्षा ली जाती है, 25 प्रान्तों में दो लाख विद्यार्थी गोविज्ञान परीक्षा में बैठते हैं। डेराबसी (पंजाब), गाजियाबाद, औरया, इटावा (उत्तर प्रदेश), दिल्ली, अमरावती (महाराष्ट्र) एवं इन्दौर (मध्यप्रदेश) में कत्लखाने नहीं खुलने दिए। राजस्थान, बुन्देलखण्ड (उत्तर प्रदेश) में सूखा के समय चारा देकर गोवंश की रक्षा की गई। 500 वैद्यों ने पंचगव्य चिकित्सा कार्यशाला एवं 1000 किसानों ने जैविक कृषि तथा पंचगव्य से खाद एवं कीट नियंत्रक निर्माण कार्यशाला में प्रशिक्षण लिया।

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