श्रीराम जय राम जय जय राम, শ্ৰীৰাংজয়ৰাংজয়জয়ৰাং, শ্রীরাম জয় রাম জয় জয় রাম , શ્રીરામ જય રામ જયજય રામ, ಶ್ರೀರಾಮಜಯರಾಮಜಯಜಯರಾಮ, ശ്രിറാം ജയ് റാം ജയ്‌ ജയ് റാം, శ్రీరాంజయరాంజయజయరాం

विश्व हिन्दू परिषद् के बढते चरण

दैवीय आपदा में सहायता
भारत एक विशाल देश है। यहाँ भिन्न-भिन्न जलवायु में प्राकृतिक स्थितियाँ भी अलग-अलग हैं। स्थिति अनुसार प्राकृतिक त्रासदी/आपदाएं भी आती रहती है – कभी दुर्भिक्ष, कभी भूकम्प, कभी अतिवृष्टि, कभी चक्रवात। देश में जहाँ कहीं भी प्राकृतिक आपदाएं आती हैं, वहाँ पीडि़तों की सहायता के लिए परिषद सदा ही तत्पर रहती है। यहाँ कतिपय उदाहरण ही दिए जा रहे हैं-
उत्तरकाशी भूकम्प –
20 अक्टूबर, 1991 की नीरव रात्रि की अशुभ घड़ी में विनाशकारी भूकम्प ने हिमालय की गोद में बसी देवभूमि के अनेक गाँवों को कुछ ही क्षणों में उजाड़ कर फेंक दिया। उत्तरकाशी, चमोली और टिहरी जनपद भूकम्प से सर्वाधिक प्रभावित हुए। उत्तरकाशी में भी भटवाड़ी तहसील क्षेत्र में तो विनाश का भयंकर तांडव हुआ। लगभग 28,220 मकान ध्वस्त हो गए, 20,685 मकानों में दरार पड़ गई, 1000 से अधिक मनुष्यों की अकाल मृत्यु हो गई।
भूकम्प से प्रभावित अनेक स्थानीय कार्यकर्ता अपना दुःख भूलकर मलबे में दबे मृत व घायलों को अस्पतालों, राहत शिविरों आदि में पहुँचाने लगे, भोजन, जलपान से लेकर ढाँढस बाँधने तक का कार्य इन्होंने ही किया। पश्चिम उत्तर प्रदेश में श्रीराम जन्मभूमि के लिए अयोध्या में किए जा रहे अनुष्ठान में आने वाले भक्तों के लिए एकत्र की गई खाद्य सामग्री को उत्तरकाशी भेज दिया गया।
समाज से प्राप्त 1000 टेन्ट, 2000 तिरपाल, 35000 कम्बल, 3500 रजाई, 900 गाँठ ऊनी वस्त्र,  300 गाँठ सूती वस्त्र, 1/2 टन चाय पत्ती, 35 कि. मोमबत्ती, 2000 टीन की चादरें, 50 टन आटा, 35 टन चावल, 14 टन दाल, 65 टन गुड़, 1 टन चीनी, डेढ़ टन सूखा दूध, 1 टन खाद्य तेल, 2 टन साबुन, लगभग 12 लाख रुपए मूल्य की दवाएँ, डबलरोटी, बिस्कुट के पैकिट, बर्तन, जूते, माचिस आदि लगभग 1.5 करोड़ रुपए की सामग्री पीडि़तों में वितरित की गई।
भूकम्प की विनाश लीला में असमय ही काल कवलित लोगों की आत्मा की शांति के लिए उत्तरकाशी में भागीरथी गंगा तट पर पूज्य स्वामी भगवानदास जी वैष्णव के सान्निध्य में 10 दिवसीय नारायण बलि यज्ञ का आयोजन किया गया। साथ ही श्रीमद्भागवत पाठ, रुद्री पाठ, श्री विष्णुसहस्रनाम पाठ, महामती चण्डी पाठ, गायत्री जाप, रामायण पाठ आदि धार्मिक अनुष्ठान भी किए गए।
बेघर हुए लोगों के पुनर्वास के लिए पहल की गई, उत्तरकाशी जनपद में ध्वस्त 8 गाँवों को गोद लिया गया। सी. बी. आर. आई. रुड़की के पूर्व उपनिदेशक प्रो. के. एल. दत्ता के संयोजन में बनी भवन निर्माण विशेषज्ञ समिति ने रुड़की विश्वविद्यालय के भूकम्प विभाग की सलाह से भूकम्प निरोधी, शीत अवरोधी, स्थानीय आवश्यकता के अनुरूप परम्परागत शैली पर आधारित, भवन का प्रारूप तैयार किया। इसमें एक परिवार की आवश्यकता के अनुरूप 2 रिहायशी कमरे, ईधन व चारा रखने हेतु भंडार तथा रसोई व स्नान गृह की व्यवस्था की गई थी।
प्रत्येक परिवार को टीन की नालीदार चादरों से ढका, पाइपों का लौह ढाँचा प्रदान किया गया, दीवारों व फर्शों का निर्माण-कार्य श्रमदान व परस्पर सहयोग से, ग्रामीणों को शासन की ओर से प्रदत्त अनुदान एवं वन विभाग द्वारा दी गई सस्ती लकड़ी से किया गया।
भूकम्प से देवालय भी ध्वस्त हुए थे, परिषद ने उत्तरकाशी नगर के प्राचीन ‘महिषासुर मर्दिनी’ देवी मंदिर एवं पाव ग्राम में ‘नरसिंह देवता’ के मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया।
भूकम्प के कारण हुए अनाथ, असहाय व निराश्रितों के लिए छात्रावास आरम्भ किया गया। इसमें भोजन, आवास, शिक्षा व चिकित्सा की निःशुल्क व्यवस्था की गई। कढ़ाई, सिलाई, बुनाई-कताई, फल संरक्षण, लघु घरेलू उत्पाद आदि के प्रशिक्षण की स्थानीय स्तर पर व्यवस्था की गई।
महाराष्ट्र भूकम्प-
सन् 1992 में लातूर (महाराष्ट्र) में आए भीषण भूकम्प में भी कार्यकर्ताओं ने भूकम्प पीडि़तों में भोजन, वस्त्र, दवाइयों आदि का वितरण किया।
गुजरात भूकम्प –
26 जनवरी, 2001 को भूकम्प से कच्छ जिले को भारी नुकसान हुआ। चारों ओर मौत का मातम फैल गया। परिवार के परिवार मकानों में दब गए। 8 लाख परिवार बेघरबार हुए और 13 हजार लोग मारे गए। परिषद ने संगठन के अन्य सभी कार्य बन्द करके तत्काल युद्ध स्तर पर सहायता कार्य किया। 1,18,000 कम्बल, 1,00,000 से ज्यादा लोगों को भोजन, 25,000 से ज्यादा मरीजों को चिकित्सा, 04 मेडिकल एम्बुलेन्स तथा अन्य जीवनोपयोगी सामग्री पहुँचाई। पुनर्वसन की दृष्टि से बेटद्वारिका, नागलपर, जामदुधाई, संगमनेर गाँवों को गोद लिया। अमेरिका विश्व हिन्दू परिषद के सहयोग से भूकम्प के केन्द्र लोडाई का पुनर्वसन का काम सम्पन्न किया गया। 15 गाँवों में स्कूल के भवन बनवाए।
जम्मू कश्मीर भूकम्प –
08 अक्टूबर, 2005 को आए भीषण भूकम्प ने पूरे उत्तर भारत को झकझोर दिया। मुख्य प्रभावित इलाका कश्मीर घाटी के उड़ी और बारामूला क्षेत्र और जम्मू संभाग का पुंछ शहर थे। पाक अधिकृत मुजफ्फराबाद तो बिलकुल ही बर्बाद हो गया। वहां पर 50 हजार से ज्यादा लोगों की मृत्यु हुई। पुंछ नगर में किले की दीवार टूटकर घरों पर दुकानों पर गिर गई थी। इससे 300 से अधिक मकान व दुकान क्षतिग्रस्त हो गईं। ऐतिहासिक गीता भवन भी क्षतिग्रस्त हो गया। झलास, अजोट, गुलपुर, मंगनाड, दर्रादुलियां, दिगवार, सलोथरी और खड़ी इत्यादि में 200 से ज्यादा मकान क्षतिग्रस्त हो गए। पुंछ से 54 कि0मी0 दूर उड़ी नगर और आसपास के गाँव भी भूकम्प से बहुत अधिक मात्रा में प्रभावित हुआ था। वहाँ संपर्क के लिए सीधा कोई मार्ग नहीं था इसलिए श्रीनगर होकर 650 कि0मी0 का रास्ता सड़क से पार कर जाना पड़ा। उड़ी का मुख्य बाजार भूकम्प में पूरी तरह ध्वस्त हो गया था। बारामूला शहर और उसके 9 अन्य गांव, कुपवाड़ा जिले की तंगधार तहसील भी प्रभावित हुई थी। कश्मीर घाटी में सेना के 50 जवानों सहित 1500 लोग मारे गए और 4,000 से अधिक घायल तथा इतने ही लापता हुए। जम्मू संभाग में 17 लोग मारे गए और 500 से ज्यादा घायल हुए।
पुंछ के कार्यकर्ता अपने घरों की परवाह न करते हुए सेवा कार्य में जुट गए, जो बच सकता था उसे बचाया, घायलों का उपचार कराया। ठहरने और भोजन के प्रबंध में लग गए। सेना को भी इस त्वरित कार्यवाही का लाभ हुआ। 1000 कंबल पहंुचाए गए। राशन और कंबलों की व्यवस्थाा पूज्य स्वामी विश्वात्मानंद सरस्वती जी के द्वारा करवाई गई।
सत्संग भवन, मन्दिर व सामाजिक भवनों का जीर्णोद्धार कराया गया।
बिहार व असम बाढ़ –
2004 में बिहार में आई बाढ़ के दौरान 19 जिलों में राहत कार्य किया। दरभंगा में दो स्थानों पर राहत शिविर चलाया गया। 20 बोरा चिउडा, जीवन रक्षक दवाएं और एण्टी डायरिया ड्राप एवं ब्लीचिंग पाउडर उपलब्ध करवाया।
2004 में असम में आई भीषण बाढ़ के दौरान राहत व सहायता कार्य किया। नदियों में नावों द्वारा रंगिया, नलवाड़ी, द0 कामरूप, मोरी गाँव, नवगाँव व मंगलदाई जिलों में यथाशक्ति राहत सामग्री वितरित करते हुए 70 गाँवों के 50,000 परिवारों को समय पर सहायता पहंुचाई। नलबाड़ी में नाव से नदी पार करने के बाद अपने सर पर राहत सामग्री से भरी बोरियाँ लादकर 5 कि0मी0 नंगे पाँव पैदल चलकर जरूरतमन्दों को सहायता पहंुचाई।
राजस्थान बाढ़ –
जोधपुर महानगर के बजरंग दल कार्यकर्ताओं को बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लिए सहायता सामग्री लेकर जाते समय ज्योतिष्पीठाधीश्वर बद्रिकाश्रम के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानन्द सरस्वती ने आशीर्वचन दिया तथा संत अमृतराम रामस्नेही जी ने वाहनों को रवाना किया।
लोगों से आटा, दाल, चावल, मसाला, चाय, शक्कर, आलू, प्याज, मोमबत्तियों सूखा भोजन सामग्री के अतिरिक्त बर्तन, तिरपाल व कम्बलों का संग्रह कर राजस्थान के बाड़मेर जिले के बन्धरा, राणासर, झडकली, हरसाणी आदि ग्रामों में बाढ़ग्रस्तों के बीच वितरण किया गया। बाढ़ग्रस्त क्षेत्र में मारे गए मवेशियों के शवों पर लाईम पाउडर का छिड़काव कर बाढ़ प्रभावित लोगों को महामारी से बचाया गया।
गुजरात बाढ़ –
अगस्त, 2006 में गुजरात प्रान्त में आई बाढ़ से प्रभावित लोगों की सहायता में सेवा कार्य किया। प्रतिदिन 5 ट्रक राहत-सामग्री, यथा-40 टन खाद्य सामग्री, लाखों फूड पैकेट्स, पानी के पाउच, खाद्य तेल, लड्डू इत्यादि प्रभावित क्षेत्रों में भेजा गया। 11 से 16 अगस्त, 2006 तक सूरत शहर में स्थान-स्थान पर निःशुल्क भोजनशालाओं के आयोजन किए गए।
उड़ीसा बाढ़ –
उड़ीसा में आई बाढ़ के समय केन्द्रापाड़ा जिले के चार ग्राम पंचायत-श्यामसुन्दरपुर, जुटीयाल, पुरुषोत्तमपुर एवं बागड़ा के ग्रामवासियों को बचाने का कार्य किया। 1500 लोगों को भोजन एवं निःशुल्क चिकित्सा उपलब्ध कराई गई। गोधन के लिए चारा की व्यवस्था की गई। तुणपुर, बलरामपुर, पाटना, टोटासाही, सूर्यपुर, हरकुल, कलापाड़ा, छाघरिया, नानकाना ग्रामों में विशेष कार्य किया।
महाराष्ट्र में अतिवृष्टि –
महाराष्ट्र के 18 जिलों के 51 गाँवों की 101 बस्तियों में 153 टन अनाज का वितरण, 9,400 किट्स (जिसमें अनाज, शक्कर, चायपत्ती, चटाई, चादर, साड़ी, बर्तन, स्टोव, मिट्टी का तेल आदि सामग्री थी), 10 ट्रक कपड़े, 1,49,750 भोजन पैकेट्स वितरित किए गए। 56 वैद्यकीय शिविरों में 40 हलार लोगों पर 50 डाॅक्टरों द्वारा उपचार किया गया, 275 लोगों को डूबने से बचाया गया।
ठाणे जिले के किराडपाडा में 90, बापगाँव में 40 तथा कल्याण के उंबरडा सापरडा में 10 घरों का पुनर्वसन किया गया। कुल 140 घर बनाकर दिए गए।
कोंकण, ठाणे, नांदेड़ आदि स्थानों पर लगभग 100 टन अनाज, दस हजार किट्स (जिसमें चावल, ज्वार, गेंहूँ, दाल, चटाई, चादर, साड़ी, स्टोव, पानी की बोतलें आदि वस्तुएं थीं), 50000 भोजन पैकेट्स का वितरण किया गया। कचरा उठाना, कीटनाशक दवाइयों का छिड़काव, स्कूल के बच्चों को उनके घरों, रिश्तेदारों तक पहुँचाना, बाढ़ में फंसे लोगों को राह दिखाकर सुरक्षित स्थानों पर पहुँचने के लिए मदद करना कार्य भी किए गए।
राजस्थान और उड़ीसा में दुर्भिक्ष –
2001 में राजस्थान और उडीसा में सूखे के समय अनेक शिविर खोले गए, उनमें भोजन की व्यवस्था की गई, पीडित क्षेत्रों में 400 से अधिक कुओं को गहरा करवाया गया, राजस्थान के सूखा पीडित क्षेत्रों में अनाज बाॅंटा गया। मक्खन, दूध और विटामिन गोलियाँ महिलाओं और बच्चो में बांटे गए। उडीसा में काम के लिए अनाज देने की प्रक्रिया शुरु की गई। पशुधन को बचाने के लिए चारा बांटा गया।
उड़ीसा में चक्रवात –
तटीय क्षेत्रों में अक्टूबर 1999 में 300 किलोमीटर प्रति घण्टे की गति से चली तूफानी हवाओं से उत्पन्न चक्रवातों के कारण लाखों लोग प्रभावित हुए, कई नदियों में बाढ़ जैसी स्थिति बन गई। मरने वालों की संख्या 20,000 हो गई थी। खाने के लिए भोजन और पीने के पानी मिलना दूभर हो गया, इस चुनौती को स्वीकारा और आपदा में मरे लोगों की अन्तिम क्रिया की, लगभग 11,500 कंकालो को हटाया। 50 लाख लोंगो में भोजन वितरित किया और 15,0000 लोगों को काम के बदले अनाज देने के कार्य में लगाया। लोगों को पोलीथीन शीट बांटे। 429 डाक्टर सेवा में लगे। 4 लाख लोगों में कपडे वितरित हुए। एक अनाथाश्रम वात्सल्य मंदिर के नाम से शुरु किया गया जिसने सौ अनाथ बच्चों को रखा गया।
आन्ध्र प्रदेश में समुद्री तूफान –
70 ग्रामों में चावल, वस्त्र एवं बर्तन वितरित किए गए। 50,000 नारियल वृक्षों की पौध, 500 बोरा धान के बीज, 500 बोरी यूरिया खाद उसी प्रकार कपड़ा बनाने की हाथ मशीनें, धागा, मछली पकड़ने के जाल, लोगों को वितरित कराए गए।
तमिलनाडु सुनामी –
वर्ष 2005 में तमिलनाडु में सुनामी लहरों ने भयंकर बर्बादी मचाई थी। अनेक मौत के शिकार हुए, हजारों लापता हुए और अरबों रुपए की सम्पत्ति नष्ट हुई। सहायता कार्य प्रारम्भ हुए। मछुआरों को जिनकी नावें नष्ट हो गई थीं नावें देने की व्यवस्था की। फाइबर की एक नाव की लागत लगभग डेढ़ लाख रुपए, काष्ठ नौका की प्रति नाव लागत 82,000 रुपए, पावर इंजिन लगभग 23,000 व मछली पकड़ने के लिए जाल की कीमत लगभग 45,000 रूपए आती है। वहाँ विश्व हिन्दू परिषद द्वारा 25 नावें वितरित की गई।
बिहार की बाढ़ 2008 –
18 अगस्त, 2008 को उत्तर बिहार के छः जिलों के 32 प्रखण्डों के एक हजार से अधिक ग्रामों ने रातों रात समुद्र का रूप धारण कर लिया। 30 लाख से अधिक की आबादी तबाह हो गई, एक लाख नर-नारी, बूढ़े-बच्चे तथा पांच लाख पशु तीव्र जलधारा की भेंट चढ़ गए।
19 अगस्त से ही विहिप के 50 कार्यकर्ताओं ने बचाव कार्य प्रारंभ किया। शहर एवं आसपास के गावों से भोजन के पैकेट लाकर 500 लोगों को भोजन कराया। 20 अगस्त को एकमा, बमनगामा, बरैल, बरुआरी, परसौनी के सभी विद्यालयों में लोगों को ठहराया गया, भोजन के पैकेट दिए गए। उपर्युक्त स्थानों पर ठहरे लोगों को 12 सितम्बर तक भोजन के पैकेट दिए गए। भीमनगर, वीरपुर, वसंतपुर, हृदयनगर में सूखा भोजन पैकेट भेजा गया। प्रत्येक दिन 5000 लोगों को भोजन कराया गया।
20 ट्रक खाद्यान्न, चूड़ा, चावल, त्रिपाल, दाल, बिस्कुट, दवाई 10 कार्टून, पटना से 5 कार्टून दवाई, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के डाॅक्टरों की टीम ने 4 दिन में 1500 लोगों को दवा वितरण की। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब एवं लखनऊ के डाॅक्टरों की टीम बच्चों के लिए दूध पाउडर लेकर पहंुची। उ0 बिहार के किशनगंज जिला से एक ट्रक खाद्यान्न एवं कपड़े, पटना चूड़ी बाजार से एक मिनी ट्रक खाद्यान्न, कपड़े, बिस्कुट, फिरोजाबाद पटना से एक ट्रक चावल, आटा, दाल, रिफाईन, मसाला एवं कपड़े। सिलीगुड़ी बंगाल से 2000 साड़ी कुर्ता, पैजामा, गमछा, 3000 किलो चूड़ा-गुड़ का वितरण हुआ।

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