श्रीराम जय राम जय जय राम, শ্ৰীৰাংজয়ৰাংজয়জয়ৰাং, শ্রীরাম জয় রাম জয় জয় রাম , શ્રીરામ જય રામ જયજય રામ, ಶ್ರೀರಾಮಜಯರಾಮಜಯಜಯರಾಮ, ശ്രിറാം ജയ് റാം ജയ്‌ ജയ് റാം, శ్రీరాంజయరాంజయజయరాం

विश्व हिन्दू परिषद् के बढते चरण

आतंकवादियों की चुनौती स्वीकार की
1987 में सन्तों की राष्ट्रीय सद्भावना यात्रा –
शनिवार, दिनांक 28 फरवरी से सोमवार, दिनांक 09 मार्च, 1987 तक 10 दिनों की अवधि में भारत के महान सन्तों ने एक ‘‘राष्ट्रीय सद्भावना यात्रा‘‘ ब्रह्मकुण्ड (हर की पौड़ी-हरिद्वार) से अमृतकुण्ड (श्रीहरमन्दिर साहिब-अमृतसर) तक निकाली थी। इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य पंजाब के सभी वर्गों में सद्भावना का निर्माण करना था।
जब-जब भी हिन्दू समाज किसी सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक अथवा राष्ट्रीय समस्या से घिरा है तब-तब समाज के विकास और समस्याओं के निदान के लिए ऋषि, महर्षि और सन्त-महात्माओं ने आगे आकर मार्गदर्शन किया है।
1980 ई. के बाद पंजाब में स्थिति बड़ी भयंकर हो गई थी। आतंकवादियों द्वारा गैर सिक्खों को मारा जाने लगा था। हिन्दू-सिखों में परस्पर अविश्वास की भावना घर करती जा रही थी। हिन्दुओं और सिखों में सद्भावना का वातावरण बनाना एक अनिवार्यता बन गई थी। 1986 में अहमदाबाद में केन्द्रीय मार्गदर्शक मण्डल की बैठक में साधु-सन्तों, धर्माचार्यों के नेतृत्व में ‘‘राष्ट्रीय सद्भावना यात्रा‘‘ निकालने की घोषणा की गई। इस यात्रा और उसके कार्यक्रम की पुष्टि हरिद्वार में आयोजित सन्त सम्मेलन में की गई।
यात्रा 28 फरवरी, 1986 को हरिद्वार से प्रारम्भ हुई तथा रूड़की, सहारनपुर, यमुनानगर, जगाधरी, अम्बाला, चण्डीगढ़, सरहिन्द, राजपुरा, पटियाला, संगरूर, नाभा, गोविन्दगढ़, खन्ना, लुधियाना, मोगा, फिरोजपुर, जीरा, तरनतारन, कपूरथला, जालन्धर, फगवाड़ा, बंगा, नवांशहर, होशियारपुर, मुकेरियाँ, पठानकोट, तारागढ़, गुरूदासपुर, धारीवाल, बटाला होती हुई 09 मार्च, 1986 को अमृतसर पहुँची।
सन्त समाज वाहनों से चलता था, नगर में प्रवेश से लेकर सभा स्थल तक पदयात्रा, नगर संकीर्तन व सद्भावना सभा के पश्चात् नगर के दूसरे छोर तक पुनः पदयात्रा करते थे। निर्धारित कार्यक्रमों के अतिरिक्त मार्ग में पड़ने वाले ग्रामों या बाजारों में भी यात्रा के स्वागत कार्यक्रम और इन स्वागत स्थलों पर प्रमुख धर्माचार्यों द्वारा आशीर्वाद देने की व्यवस्था भी रखी गई थी। यात्रा में कुल 20 कार्यक्रम स्थल तथा 45 स्वागत स्थल रखे गए थे।
सम्पूर्ण भारत के शैव, वैष्णव, बौद्ध, जैन, सिख, आर्य समाजी, सनातनी, उदासीन, रामानन्दी, कबीरपंथी, नानकपंथी एवं राधास्वामी सम्प्रदायों के धर्माचार्य इस सद्भावना यात्रा में सम्मिलित हुए। शान्ति और सद्भावना का सन्देश जन-जन में पहुँचाने के लिए और लोगों को राष्ट्रीय एकता एवं सामाजिक भाइचारे के प्रति जागरूक करने हेतु अपने मठों से निकल पड़े थे। पंजाब समस्या के इतिहास में यह पहला अवसर था कि देश की सन्त शक्ति ने सैंकड़ों किलोमीटर की लम्बी यात्रा में भाग लिया और 44 स्थानों पर पदयात्राएँ करके सांस्कृतिक तथा राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने का सन्देश दिया था। सद्भावना यात्रा में लगभग 60 निहंग सिखों का जत्था अत्यन्त प्रेरणा और आकर्षण का केन्द्र बिन्दु रहा। वीर वेश में सजे हुए निहंग रास्ते में युद्धाभ्यास करते हुए चलते थे।
धर्माचार्यों द्वारा दिए गए भाषणों का सार यह था कि सिखों और सहजधारियों के पूर्वज, इष्टदेव, गुरु और संस्कृति एक है, उनके मध्य रक्त एवं मांस का सम्बन्ध है। यह रिश्ते तोड़ने का काम राजनीतिज्ञों ने किया है, लेकिन इन सम्बन्धों को जोड़ने का काम सन्त-महात्मा करेंगे। आतंकवाद का मुकाबला दोनों समुदायों को एकजुट होकर करना चाहिए। पूज्य वामदेव जी महाराज एवं स्वामी सत्यमित्रानन्द जी महाराज के प्रभावी भाषणों की पंजाब में गहरी छाप पड़ी।
यात्रा में नामदेव की डिन्डी महाराष्ट्र से 20, गुजरात से 16, केरल से 5, कर्नाटक से 8, तमिलनाडु से 4, राजस्थान, मध्यप्रदेश, चित्रकूट और अयोध्या से 350 से अधिक सन्त और जगाधरी के अखिल भारतीय वाल्मीकि खालसा पंथ के 50 निहंग भी सम्मिलित हुए थे। श्रीमंत विजयाराजे सिन्धिया भी यात्रा में सम्मिलित हुईं। कुल 500 से अधिक सन्त और हजारों की संख्या में अन्य व्यक्ति इस यात्रा में सहभागी बने।
मोगा, तरनतारन, जगरांव, बटाला जैसे आतंकवादियों के गढ़ समझे जाने वाले स्थानों पर सिख तथा सिक्खेतर समग्र हिन्दू समाज ने पूरे उत्साह से यात्रा का स्वागत किया एवं श्रद्धा से पदयात्रा में सम्मिलित होकर कीर्तन किया। रात्रि के 9 तथा 10 बजे तक की सभाओं में सम्मिलित रहकर जनता ने निर्भयता का परिचय दिया। जबकि उस समय समग्र पंजाब में संध्या को 6 बजे तक सभी बाजार बन्द होकर सड़कें सूनी हो जाती थीं।
अनेक धर्माचार्य मार्ग में सहज रूप से पड़ने वाले सभी प्रमुख मन्दिरों एवं गुरुद्वारों में सद्भावना प्रार्थना के लिए जाते थे। प्रायः सभी स्थानों पर प्रेम, सौहार्द और सद्भावना की विचित्र त्रिवेणी देखने को मिली। इसे देखकर नेत्र तृप्त हो जाते थे। धोबी एसोसिएशनों की ओर से निःशुल्क वस्त्र प्रक्षालन, वस्त्र रात्रि तक धोकर दे दिए जाते थे। रात्रि में सेवा के लिए नापित समाज, दर्जी समाज सब सुध-बुध विसार कर सन्तों की सेवार्थ जुट जाते थे।
आतंकवादी क्षेत्र में जहाँ भय और शंका का वातावरण था, वहाँ इस यात्रा से विश्वास एवं निर्भयता का वातावरण उत्पन्न करने में बड़ा सहयोग मिला। ‘‘हम सब एक हैं, एक रहेंगे‘‘ यह संकल्प सभी जगह सभी के द्वारा निःसंकोच भाव से बार-बार दोहराया गया।
परमहंस स्वामी वामदेव जी, संयोजक महामण्डलेश्वर स्वामी सत्यमित्रानंद जी, पेजावर मठाधिपति विश्वेशतीर्थ जी, जगद्गुरु रामानन्दाचार्य श्री स्वामी शिवरामाचार्य जी, नाथ सम्प्रदाय के प्रमुख महंत अवेद्यनाथ जी, अडमार पीठ के प्रमुख श्री स्वामी विभुदेशतीर्थ जी, महामण्डलेश्वर स्वामी निरंजनानन्द जी, परमार्थ आश्रम-हरिद्वार के स्वामी चिन्मयानन्द जी, चित्रकूट के मानस महारथी श्री त्यागी जी, श्री अशोक जी सिंहल, आचार्य गिरिराज किशोर जी, पंजाब प्रान्त के परिषद के अध्यक्ष श्री ग. न. यादव और महंत रामप्रकाशदास जी ने अकाल तख्त के कार्यकारी जत्थेदार प्रो. दर्शन सिंह रागी से भेंट की। प्रो. रागी ने धर्माचार्यों के समक्ष आतंकवाद की निन्दा की। उन्होंने देश का आदर्श राज्य ‘‘रामराज्य‘‘ बताया, धर्माचार्यों से बातचीत के समय प्रो. रागी के साथ दरबार साहिब के मुख्य ग्रन्थी ज्ञानी पूरन सिंह, श्रीअकाल तख्त के मुख्य ग्रन्थी ज्ञानी कश्मीर सिंह और दमदमी टकसाल के जत्थेदार ज्ञानी जसवंत सिंह भी उपस्थित थे।
1996 की अमरनाथ यात्रा –
जब से कश्मीर में मुस्लिम जेहादी आतंकवाद बढ़ा था, प्रतिवर्ष होने वाली श्री अमरनाथ यात्रा पर संकट के बादल गहराते जा रहे थे, आतंकवादियों की ओर से धमकियाँ आने लगी थी। जनवरी, 1996 में अमरनाथ यात्रा को एक अभियान के रूप में लेने का संकल्प लिया। सम्पूर्ण देश में अमरनाथ यात्रा के सम्बन्ध में वातावरण निर्माण हुआ।
श्री अमरनाथ बर्फानी: कश्मीर के अनन्तनाग जिले की ऊँची-ऊँची पहाड़ी चोटियों के मध्य 12,500 फीट की ऊँचाई पर स्थित गुफा जहाँ तक पहुँचने के लिए 14,500 फीट ऊँचा पर्वत पार करना पड़ता है। अमरनाथ गुफा भगवान शंकर का स्थान है। श्रावण मास की पूर्णिमा को गुफा में बर्फ का शिवलिंग बनता है। यात्री गुफा में हिम शिवलिंग के दर्शन हेतु जाते हैं।
ऊँचाई के कारण हाड़ कँपा देने वाली ठंड और कच्चे-पक्के पहाड़ों को काटकर बनाया गया दुर्गम चढ़ाई वाला मार्ग वर्ष के 8 माह बर्फ से ढका रहता है। आतंकवादियों की चुनौती का सामना करने, सर पर कफन बाँधकर, कठिनाई भरी इस अमरनाथ यात्रा पर नौजवान 18 अगस्त, 1996 को चल पड़े। संख्या को देखकर जम्मू प्रशासन के हाथ पाँव फूलने लगे।
22 अगस्त की देर रात्रि में अचानक भीषण वर्षा आरम्भ हो गई। वर्षा तीव्र से तीव्रतर और तीव्रतर से तीव्रतम होती गई। बरसते पानी और हड्डी कंपाने वाली ठंड में वे अभी थोड़ी दूर ही चले थे कि रोक दिए गए, सूचना आ गई कि मौसम बहुत खराब हो गया है, बर्फ गिर रही है रास्ता बन्द हो गया है, सैंकड़ों लोग हताहत हुए हैं, गायब हैं। जितने मुँह उतनी बातें और उतनी ही अफवाहें। पहलगाम में थोड़ी देर के लिए भय और अनिश्चितता का माहौल बन गया। पानी मूसलाधार गिर रहा था, सर छुपाने के लिए जगह नहीं दिख रही थी। पहलगाम की क्षमता से अधिक लोग वहाँ पहुँच गए थे। 24 अगस्त की दोपहर तक पानी लगातार बरसता रहा, लोग सूचनाएँ प्राप्त करने का प्रयास करते रहे, लोगों में गजब का उत्साह था, विपरीत परिस्थितियों में भी युवक यात्रा पर जाने को तैयार थे किन्तु त्रासदी भीषण थी, मार्ग बन्द हो गया था। प्रशासन गए हुओं को वापस लाने के लिए सोच रहा था। अनेकों के मरने की सूचना आ रही थी। इधर भण्डारों में भोजन समाप्त प्रायः था। अस्पताल बीमारों और शवों से पट गया था।
ऐसे में बजरंग दल का कार्यकर्ता अपने साथ के कार्यकर्ताओं को एकत्रित कर जुट गया सेवा कार्यों में। अपने कार्यकर्ताओं के साथ आम दर्शनार्थियों के भी सुरक्षित रहने की कमान संभाली। अफरा-तफरी का माहौल बन गया था, भोजन के लिए लोग टूट पड़ने लगे। किन्तु बजरंग दल ने सभी व्यवस्था संभाल ली। चिकित्सालय में बीमारों की व्यवस्था देखना, शवों की पहचान करना, लाशों को ढोना, इसके साथ ही जन सामान्य को भी साहस बाँधकर प्रोत्साहित करने का काम कार्यकर्ताओं ने किया। इतनी बड़ी त्रासदी से उत्पन्न अव्यवस्था में प्रशासनिक अधिकारियों के कैम्प कार्यालय पर जाकर उन्होंने मेला अधिकारी से सम्पर्क करके भोजन, आवास तथा अन्य मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सभी व्यवस्थाओं को सुचारु बनाया। मार्ग खुलने के बाद सभी के सुरक्षित वापस होने तक बजरंग दल कार्यकर्ता सक्रिय रहे।
आतंकवादियों को यह सबक मिला कि हिन्दू धमकियों से नहीं घबराता, वहीं समाज के सामने प्रकट किया कि बजरंग दल के कार्यकर्ता का वास्तविक स्वरूप है – सेवा, सुरक्षा और संस्कार। वह नहीं जो हमारे विरोधियों द्वारा अपने राजनैतिक लाभ के लिए समाज को दिखाया गया है।
2005 की बाबा बूढ़ा अमरनाथ यात्रा –
जम्मू शहर से उत्तर-पश्चिम में 290 कि.मी. दूर पंुछ जिले की मण्डी तहसील के ग्राम राजपुरा स्थित लोरेन घाटी में समुद्र तल से 4500 फीट की ऊँचाई पर बाबा बूढ़ा अमरनाथ चट्टानी के नाम से पुलस्ती नदी के बायें तट पर प्रसिद्ध स्थान है। यहाँ से पीर-पंजाल की बर्फीली चोटियाँ दिखाई देती हैं।
जम्मू से सुन्दरबनी, नौशेरा, राजौरी, स्वर्णकोट (सुरनकोट), चण्डक होते हुए मण्डी अथवा चण्डक से पुंछ होकर मंडी का मार्ग है। सम्पूर्ण मार्ग अत्यन्त दुर्गम और आतंकवाद से ग्रस्त है। पूरे रास्ते में घने जंगल है, आतंकवादियों के ठिकाने हैं। सायंकाल 4.00 बजे के बाद इस मार्ग पर यातायात रोक दिया जाता है और प्रातः 7.00 बजे तब खुलता है जब सेना का बम निरोधक दस्ता पूरे मार्ग का निरीक्षण कर लेता है। मार्ग पाकिस्तान सीमा से सटकर जाता है। उस पर पाक की नजरें हैं। सम्पूर्ण क्षेत्र आतंकवादियों का अड्डा है। नौशेरा, राजौरी और पुंछ से भी हिन्दुओं को भगाने का षडयंत्र चल रहा है। आतंकवाद के विस्तार के कारण यह यात्रा लगभग समाप्त सी हो गयी थी। इसे पुनप्र्रतिष्ठित करने का दायित्व बजरंग दल ने लिया।
1965 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हो रहा था तब पाकिस्तानी सेना ने कब्जा करके इस शिवलिंग को तोड़ने का प्रयास किया था किन्तु वे सफल नहीं हो सके और शिव कृपा से विजयश्री भारतीय सेना को मिली। मंदिर में स्थित शिवलिंग श्वेत चकमक (स्फटिक) पत्थर का है जो बर्फ की तरह ही चमकता है।
सम्पूर्ण क्षेत्र में चले आ रहे आतंकियों के कहर ने इस राष्ट्रीय यात्रा को तहसील और जिले तक ही सीमित कर दिया और समय सीमा भी दो-तीन दिन तक ही सिमट गई। इस यात्रा को पुनप्र्रतिष्ठित करना आवश्यक था। बँटवारे के समय कश्मीर एवं जम्मू के बहुत बड़े भू-भाग पर पाकिस्तान ने और 1962 से चीन ने कब्जा कर रखा है और लगातार आतंकी हमलों के कारण कश्मीर घाटी हिन्दुओं से खाली हो गई। अब योजना बचे हुए जम्मू को खाली कराने की है। आज राजौरी में 35 प्रतिशत और पुंछ में 8 प्रतिशत हिन्दू-सिख बचे हैं।
धर्म को पूजा-पाठ एवं कर्मकाण्ड के प्रति आस्थाओं तक ही समेटे न रहें। राष्ट्र निष्ठा एवं राष्ट्ररक्षा का संकल्प यात्रा के माध्यम से प्रकट हो जैसे-1996 में समाप्त प्राय हो रही बाबा अमरनाथ की यात्रा को इस देश की नौजवानी ने अपना बलिदान देकर पुनप्र्रतिष्ठित किया। वैसे ही वर्ष 2005 में बजरंग दल के द्वारा इस यात्रा का आयोजन किया, जिसमें हजारों की संख्या में हिन्दू युवकों ने भाग लेकर अपने संकल्प को प्रकट किया। आज यह यात्रा स्थापित हो चुकी है। आतंकवादी हिम्मत हार चुके हैं।
राष्ट्रीय अपमान का परिमार्जन एवं मानबिन्दुओं की रक्षा

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