श्रीराम जय राम जय जय राम, শ্ৰীৰাংজয়ৰাংজয়জয়ৰাং, শ্রীরাম জয় রাম জয় জয় রাম , શ્રીરામ જય રામ જયજય રામ, ಶ್ರೀರಾಮಜಯರಾಮಜಯಜಯರಾಮ, ശ്രിറാം ജയ് റാം ജയ്‌ ജയ് റാം, శ్రీరాంజయరాంజయజయరాం

विश्व हिन्दू परिषद् के बढते चरण

श्रीराम जन्मभूमि की रक्षा
सम्पूर्ण अयोध्या हिन्दुओं का पवित्रतम (सप्तपुरियों में प्रथम) तीर्थ क्षेत्र है। उसके सांस्कृतिक स्वरूप की रक्षा करना हिन्दू समाज का कत्र्तव्य है। श्रीरामजन्मभूमि मंदिर परिसर या अयोध्या की सांस्कृतिक सीमा में कोई मस्जिद/स्तम्भ/इस्लामिक सांस्कृतिक केन्द्र बनाने के षडयन्त्र को पूरी ताकत से विफल किया जाएगा।
सरकार व मुस्लिमों के वचन – सितम्बर, 1994 में भारत सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में एक शपथपत्र दायर करके कहा था कि यदि यह सिद्ध हो जाए कि 1528 के पहले विवादित स्थल पर कोई हिन्दू भवन था तो भारत सरकार हिन्दू भावनाओं के अनुसार व्यवहार करेगी।
मुस्लिम समाज ने भी भारत सरकार को यह वचन दिया था कि यदि यह सिद्ध हो जाता है कि किसी मन्दिर को तोड़कर यह ढांचा बना है तो हम स्वेच्छा से यह स्थान हिन्दू समाज को सौंप देंगे।
2003 में श्रीराम जन्मभूमि के नीचे की राडार तरंगों द्वारा कराई गई फोटोग्राफी रिपोर्ट तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा किए गए उत्खनन से यह सिद्ध हो चुका है कि इस स्थान पर ईसा पूर्व 1500 वर्ष से उत्तर भारतीय शैली का मन्दिर था। धरती के नीचे दीवारें, फर्श, ऊपर खड़े रहे खम्भों के आधार, जल पुष्करणी एवं एक शिव मन्दिर प्राप्त हुए हैं। अतः भारत सरकार और मुस्लिम समाज दोनों को अपने वचनों का पालन करना चाहिए।
सन्तों का संकल्प है कि ‘भारत सरकार द्वारा अधिगृहीत सम्पूर्ण 70 एकड़ भूमि प्रभु श्रीराम की प्राकट्य भूमि, क्रीडा भूमि व लीला भूमि है। जन्मस्थान सहित अधिगृहीत सम्पूर्ण परिसर पर ही भगवान श्रीराम का उनके गौरव के अनुरूप भव्य मंदिर बनेगा और उन्हीं पत्थरों से बनेगा जो श्रीराम जन्मभूमि न्यास द्वारा अयोध्या में रामघाट चैराहा, परिक्रमा मार्ग पर स्थित कार्यशाला में तराश कर रखे गए हैं।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पूर्णपीठ ने सितम्बर, 2010 को दिए गए अपने निर्णय में स्पष्ट लिखा है कि यह निश्चित किया जाता है कि हिन्दुओं के विश्वास के अनुसार और जैसा कि वे पूजा करते चले आ रहे हैं, तीन गुम्बदों वाले ढाँचे में बीच वाले गुम्बद का स्थान ही भगवान राम का जन्मस्थान है।
सुन्नी वक्फ बोर्ड ने अदालत से यह माँग की थी कि विवादित ढाँचे को मस्जिद घोषित किया जाए। अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट रूप से लिखा कि वह बाबरी मस्जिद नहीं है, विवादित ढाँचा जिसे बाबरी मस्जिद के रूप में जाना जाता था, वह जन्मस्थान मन्दिर को तोड़कर बनाया गया और ढाँचे को मस्जिद के रूप में घोषित किए जाने के लिए कोई वैधानिक वक्फ निर्मित नहीं हुआ। इसी आधार पर अदालत ने लिखा कि मुकदमें में सुन्नी वक्फ बोर्ड को कोई राहत नहीं मिलेगी और उनका मुकदमा निरस्त किया जाता है।
निर्मोही अखाड़ा की माँग थी कि ढाँचे के अन्दर विराजमान भगवान की पूजा-अर्चना और चढ़ावे का प्रबन्धन निर्मोही अखाड़े को सौंपा जाए। अदालत ने स्पष्ट लिखा कि विवादित सम्पत्ति पर निर्मोही अखाड़ा का मालिकाना हक नहीं बनता तथा अखाड़े ने जिस रूप में अपना मुकदमा लिखा है वह स्वीकार करने योग्य नहीं है और निर्धारित समय सीमा में दायर नहीं किया गया है अतः निर्मोही अखाड़ा को कोई राहत नहीं दी जा सकती है और मुकदमा रद्द किया जाता है।
अयोध्या का इतिहास – भारत की समृद्ध संस्कृति का इतिहास है। अयोध्या की गौरवगाथा अत्यन्त प्राचीन है। यह सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रही, महाराजा सगर, भगीरथ तथा सत्यवादी हरिश्चन्द्र इसी वंश में हुए। जैन परम्परा में पाँच तीर्थंकरों की जन्मभूमि, गौतम बुद्ध की तपस्थली दंत धावन कुण्ड अयोध्या में है, गुरुनानक देव जी महाराज ने 1509 ई0 में अयोध्या आकर श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर के दर्शन किए थे। श्रीराम जन्मभूमि पर कभी एक भव्य व विशाल मन्दिर था।
गुलामी को हटाने की ललक – आजादी के बाद देश के प्रथम गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने संकल्प लेकर आक्रमणकारी महमूद गजनी द्वारा तोड़े गए भगवान सोमनाथ के मन्दिर के पुनर्निर्माण कराया। मन्दिर में प्राण-प्रतिष्ठा के समय तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति देशरत्न डाॅ0 राजेन्द्र प्रसाद जी स्वयं वहाँ उपस्थित रहे थे। भारत सरकार ने 1947 के बाद देश के पार्क, सड़क, अस्पताल, नगर, रेलवे स्टेशन के नाम बदले, विक्टोरिया एवं जार्ज पंचम की मूर्तियाँ हटाई, क्योंकि ये सब गुलामी की याद दिलाते थे। श्रीराम जन्मभूमि की मुक्ति और मन्दिर का निर्माण इसी श्रृंखला की कड़ी है।
जन्मभूमि मुक्ति के संकल्प से शिलान्यास तक – 8 अप्रैल, 1984 को दिल्ली के विज्ञान भवन में भारत की अनेक धार्मिक परम्पराओं के 558 सन्त धर्माचार्य एकत्र हुए (प्रथम धर्मसंसद), ताले को खुलवाने के लिए व्यापक जन-जागरण का संकल्प लिया, रामजानकी रथयात्रा द्वारा जनजागरण हुआ। फैजाबाद के जिला न्यायाधीश ने 01 फरवरी, 1986 को ताला खोलने का आदेश दे दिया।
जनवरी, 1989 में प्रयागराज में कुम्भ मेला के अवसर पर पूज्य देवराहा बाबा की उपस्थिति में मन्दिर निर्माण के लिए शिलापूजन का निर्णय हुआ। देश-विदेश से पौने तीन लाख शिलाएं अयोध्या पहुँची। 09 नवम्बर, 1989 को भावी मन्दिर का शिलान्यास सम्पन्न हुआ।
प्रथम आह्वान- 24 मई, 1990  को  हरिद्वार  में हिन्दू  सम्मेलन  हुआ, देवोत्थान एकादशी (30 अक्टूबर, 1990) को मन्दिर निर्माण के लिए कारसेवा करने की घोषणा हुई। यह सन्देश गांव-गांव तक पहुँचाने के लिए 01 सितम्बर, 1990 को अयोध्या में अरणि मंथन के द्वारा अग्नि प्रज्ज्वलित की गई, इसे ‘रामज्योति’ कहा गया। दीपावली के पहले देश के लाखों गांवों में यह ज्योति पहुँचा दी गई। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि ‘अयोध्या में परिन्दा भी पर नहीं मार सकता’। परन्तु रामभक्तों ने 30 अक्टूबर, 1990 को गुम्बदों पर चढ़कर झण्डा गाड़ ही दिया। 02 नवम्बर को भयंकर नरसंहार हुआ, देशभर में रोष छा गया। कारसेवकों की अस्थियों का देशभर में पूजन हुआ, 14 जनवरी, 1991 को अस्थियाँ माघ मेला के अवसर पर प्रयागराज संगम में प्रवाहित कर दी गईं। मन्दिर निर्माण का संकल्प और मजबूत हो गया। घोषणा हुई- सरकार झुके या हटे।
वार्ताओं के दौर – वार्ताएं भी हुई हैं। स्वर्गीय राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में गृहमंत्री बूटा सिंह वार्ता कराया करते थे। हर मीटिंग में वार्ता के मुद्दे ही बदल जाते थे। स्व0 विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में एक वार्तालाप का दिन शुक्रवार था, मुस्लिम पक्ष के लोग दोपहर की नमाज के समय नमाज पढ़ने चले गए, वापस लौटे तो स्वामी सत्यमित्रानन्द जी महाराज ने खड़े होकर अपना आंचल फैलाकर कहा कि ‘‘मैं आपसे श्रीराम जन्मभूमि की भीख मांगता हूँ’’। नमाज के बाद जकात (दान) होती है, आप मुझे जकात में श्रीराम जन्मभूमि दे दीजिए। एक बार सैयद शहाबुद्दीन साहब ने स्वयं कहा था कि यदि यह सिद्ध हो जाए कि किसी मन्दिर को तोड़कर यह स्थान बना है, तो हम इसे छोड़ देंगे। अगली बैठक में सैयद शहाबुद्दीन अपनी बात से पलट गए। श्री चन्द्रशेखर साहब जब प्रधानमंत्री थे तब भी वार्ताएं हुईं। दोनों पक्षों ने अपने साक्ष्य लिखित रूप में गृह राज्यमंत्री को दिए। साक्ष्यों का आदान-प्रदान हुआ। दोनों पक्षों ने एक दूसरे के साक्ष्यों के उत्तर/आपत्तियाँ दी। निर्णय हुआ कि दोनों पक्षों के विद्वान आमने-सामने बैठकर प्रस्तुत हुए लिखित साक्ष्यों पर वार्तालाप करेंगे। 10 जनवरी, 1991 का दिनांक विद्वानों के मिलने के लिए तय हुआ परन्तु मुस्लिम पक्ष के राजस्व और कानूनी विशेषज्ञ मीटिंग में आए ही नहीं। पुनः 25 जनवरी, 1991 को गुजरात भवन में मीटिंग निर्धारित की गई। मुंिस्लम पक्ष का कोई भी विशेषज्ञ नहीं पहुँचा। मुस्लिम पक्ष की अनुपस्थिति को अपमानजनक समझते हुए वार्तालाप का दौर यहीं समाप्त हो गया।
विशाल रैली – 04 अप्रैल, 1991 को दिल्ली के बोट क्लब पर रैली हुई, देशभर से पचीस लाख रामभक्त आए, भारत के इतिहास की विशालतम रैली थी। भारत सरकार ने रैली की विशालता को देखकर बोट क्लब पर रैली आयोजन ही प्रतिबंधित कर दिया।
समतलीकरण के दौरान मन्दिर के प्रमाण मिले – उत्तर प्रदेश सरकार ने विवादित ढाँचे के चारों ओर कुछ भूमि अधिग्रहीत कर उसका समतलीकरण कराया, ढाँचे के दक्षिणी-पूर्वी कोने से जमीन के नीचे से  शिव पार्वती की खंडित मूर्तियाँ, सूर्य के समान अर्ध कमल, मन्दिर शिखर का आमलक, उत्कृष्ट नक्काशी वाले पत्थर व देवगणों की मूर्तियाँ प्राप्त हुईं।
द्वितीय आह्वान- दिल्ली में 30 अक्टूबर, 1992 को पुनः धर्मसंसद हुई, गीता जयन्ती (6 दिसम्बर, 1992) कोे कारसेवा पुनः प्रारम्भ करने की घोषणा की गई, लाखों रामभक्त अयोध्या पहुँचे, निर्धारित तिथि व समय पर रामभक्तों का रोष फूट पड़ा, जो ढाँचे को समूल नष्ट करके ही शान्त हुआ।
शिलालेख मिला- 6 दिसम्बर, 1992 को जब ढाँचा गिर रहा था तब उसकी दीवारों से एक शिलालेख प्राप्त हुआ था, विशेषज्ञों ने पढ़कर बताया कि यह शिलालेख 1154 ई0 का संस्कृत में लिखा 20 पंक्तियों का है, ऊँ नमः शिवाय से शिलालेख प्रारम्भ होता है, विष्णुहरि के स्वर्ण कलशयुक्त मन्दिर व अयोध्या के सौन्दर्य का वर्णन है, दशानन के मान-मर्दन करने वाले का वर्णन है। शिलालेख उस स्थान पर कभी खड़े रहे भव्य मन्दिर के अस्तित्व को ही सिद्ध करता है।
कपड़े के घर में रामलला- ढाँचा ढह जाने के तत्काल बाद उसी स्थान पर भगवान का विग्रह रखकर पूजा प्रारम्भ हो गई। चार कोनों पर चार बल्लियाँ खड़ी करके कपड़े लगा दिए और बन गया मन्दिर। आज भी भगवान् कपड़े के इसी मन्दिर में विराजमान हैं। प्रतिदिन हजारों भक्त दर्शन करते हैं, बीस वर्ष बीत चुके हैं, अब कपड़े का बना भगवान का घर आँखों में खटकता है। बस ! इसी को भव्य रूप देना है।
भावी मन्दिर- भावी मन्दिर पत्थरों से बनेगा, मन्दिर दो मंजिला होगा, भूतल पर रामलला और प्रथम तल पर राम दरबार होंगे। सिंहद्वार, नृत्य मण्डप, रंग मण्डप, गर्भगृह और परिक्रमा मन्दिर के अंग हैं। मन्दिर 270 फीट लम्बा, 135 फीट चैड़ा तथा शिखर 125 फीट ऊँचा, परिक्रमा मार्ग 10 फीट चैड़ा, 106 खम्भे-भूतल के खम्भे 16 फीट ऊँचे, दीवारें 6 फीट मोटी हैं, चैखटें सफेद संगमरमर पत्थर की होंगी।
मन्दिर के फर्श पर लगने वाला सम्पूर्ण पत्थर तैयार किया जा चुका है। भूतल पर लगने वाले 106 खम्भे तैयार हैं, भूतल और प्रथम तल पर रंग मण्डप एवं गर्भगृह की दीवारों तथा संगमरमर की चार चैखटें, खम्भों के ऊपर रखे जाने वाले 150 बीम तथा बीम के ऊपर रखे जाने वाले छत के पत्थर भी पर्याप्त संख्या में तैयार हैं। दो मंजिले मन्दिर में लगने वाले पत्थरों का 60 प्रतिशत से अधिक कार्य पूर्ण हो चुका है, पत्थर नक्काशी कार्य अयोध्या में रामघाट चैराहा, परिक्रमा मार्ग पर श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण कार्यशाला में चल रहा है।
श्रीराम जन्मभूमि सम्पत्ति नहीं है, यह विवाद सम्पत्ति का विवाद ही नहीं है, हिन्दुओं के लिए श्रीराम जन्मभूमि आस्था है, भगवान की जन्मभूमि स्वयं में देवता है, तीर्थ है व धाम है। रामभक्त इस धरती को मत्था टेकते रहे हैं।
वचन का पालन हो – भारत सरकार सर्वोच्च न्यायालय को दिए गए अपने शपथपत्र का पालन करे, संसद में कानून बनाए और मन्दिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करे। भारत में निवास करने वाले वर्तमान मुस्लिम समाज का बाबर से कोई रक्त सम्बन्ध नहीं है। बाबर कोई धार्मिक पुरुष नहीं था, वह आक्रमणकारी था। अतः मुस्लिम पक्ष श्रीराम जन्मभूमि से अपना वाद वापस ले और अपने वायदे को निभाते हुए स्वेच्छा से यह स्थान हिन्दू समाज को सौंप दे। हिन्दु समाज बदले में उन्हें आत्मीयता और सद्भाव देगा, जो अन्य किसी प्रकार प्राप्त नहीं हो सकेगा।

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