श्रीराम जय राम जय जय राम, শ্ৰীৰাংজয়ৰাংজয়জয়ৰাং, শ্রীরাম জয় রাম জয় জয় রাম , શ્રીરામ જય રામ જયજય રામ, ಶ್ರೀರಾಮಜಯರಾಮಜಯಜಯರಾಮ, ശ്രിറാം ജയ് റാം ജയ്‌ ജയ് റാം, శ్రీరాంజయరాంజయజయరాం

विश्व हिन्दू परिषद् के बढते चरण

गंगा रक्षा के प्रयास
अंग्रेज सरकार ने हरिद्वार में गंगा को बाँधकर गंग नहर निर्माण करने की योजना जब बनाई उस समय माँ गंगा के निर्बाध व अविरल प्रवाह को सुरक्षित रखने की, हिन्दू समाज की आस्था की, लड़ाई महामना मदनमोहन जी मालवीय ने प्रारम्भ की। अंग्रेज सरकार झुकी और सरकार ने मालवीय जी के साथ 1916 ई0 में गंगा की निर्बाध अविरल धारा के लिए एक समझौता किया।
जीवन के अन्तिम समय में मालवीय जी ने शिवनाथ काटजू जी (केन्द्र सरकार में मंत्री रहे श्री कैलाशनाथ जी काटजू के सुपुत्र तथा इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अधिवक्ता) को अपने पास बुलाकर कहा था कि गंगा के निर्बाध व अविरल प्रवाह के लिए मैं जीवन भर प्रयत्न करता रहा हूँ। मुझे शंका है कि भविष्य में भी गंगा को बाँधने के प्रयास किए जा सकते हैं। उस समय गंगा के प्रवाह को निर्बाध व अविरल बनाए रखने का दायित्व मैं तुम्हें सौंप रहा हूँ।
श्री शिवनाथ काटजू जी कालान्तर में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने। न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्ति के पश्चात वे विश्व हिन्दू परिषद के अन्तर्राष्ट्रीय अध्यक्ष बने, तब एक अवसर पर उन्होंने श्री अशोक जी सिंहल को यह प्रसंग सुनाते हुए कहा था कि तब तो मैं यह समझ नहीं सका कि मालवीय जी ने मुझसे यह बात क्यों कही ? मुझे यह दायित्व क्या सोचकर सौंपा ? परन्तु आज विश्व हिन्दू परिषद का अध्यक्ष बनने पर मुझे यह रहस्य समझ में आ रहा है इसलिए विश्व हिन्दू परिषद को गंगा के निर्बाध व अविरल प्रवाह को बनाए रखने का कार्य करना है। मैं तो अपने जीवन में शायद ही कुछ कर सकूँ ?
भागीरथी और भिलंगना के संगम पर गढ़वाल के टिहरी नगर में सोवियत संघ की तकनीकि सहायता से बाँध निर्माण करके जल विद्युत परियोजना तैयार की गई, जैसे ही योजना की बारीकियाँ इस विषय से सम्बंधित कुछ लोगों के सामने आईं तभी वैज्ञानिक डाॅ0 वाल्दिया और भूगोलवेत्ता डाॅ0 नित्यानन्द ने बाँध के कारण बनने वाली विशाल झील से उत्पन्न खतरों से समाज को अवगत कराते हुए अपना विरोध व्यक्त किया था। केन्द्र सरकार में ऊर्जा सचिव रहे श्री टी. एन. शेषन (जो कालान्तर में चुनाव आयुक्त बने) ने भी पर्वतीय क्षेत्र में 4000 फिट की ऊँचाई पर इतने बड़े बाँध की सुरक्षितता पर प्रश्नचिन्ह् लगाया थे। आन्ध्र के वैज्ञानिक डाॅ0 शिवाजी राव ने टिहरी बाँध को टाइम बम बताते हुए एक पुस्तक प्रकाशित की।
वर्ष 1983 ई0 में प्रथम बार (भारत माता-गंगा माता) तथा वर्ष 1995 ई0 में दूसरी बार (भारत माता-गंगा माता-गऊ माता) के माध्यम से विश्व हिन्दू परिषद के तत्वावधान में विराट जन-जागरण किया गया था। इन जन जागरण अभियानों को एकात्मता यात्रा नाम दिया गया था। 1983 ई0 में देवोत्थान एकादशी से गीता जयन्ती तक सम्पन्न 30 दिवसीय एकात्मता यात्रा में तीन प्रमुख यात्राएं एवं 350 उपयात्राएं थीं। देश के गांव-गांव में लगभग 10 करोड़ लोगों तक सम्पर्क हुआ था और गंगा माँ के प्रति परम्परा से चली आ रहे आस्था ने मूर्तरूप धारण किया था।
नवम्बर, 1996 में दिल्ली में आयोजित सप्तम धर्मसंसद अधिवेशन में माँ गंगा की अविरलता, निरन्तरता के लिए प्रस्ताव स्वीकार किया गया था।
प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी से मिलकर उन्हें गंगा की अवस्था के बारे में अवगत कराया गया। श्री राजीव गांधी जी ने कहा था कि वे गंगा की पवित्रता बनाए रखने के लिए एक विस्तृत योजना का प्रारुप तैयार कर रहे हैं, जिसके भविष्य में सुखद परिणाम आएंगे।
विश्व हिन्दू परिषद ने ‘‘गंगा रक्षा समिति’’ बनाई। समिति ने यह निर्णय लिया कि गंगा की वस्तुस्थिति जानने के लिए गंगासागर से हरिद्वार तक मोटरबोट के द्वारा एक जलयात्रा की जाएगी और गंगा के दोनों तटों पर स्थित नगरों में गंगा रक्षा हेतु समाज को जागृत करने के लिए सभाएँ करेंगे। गंगासागर से स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती जी एवं श्री जीवेश्वर मिश्र ने मोटरबोट के द्वारा यात्रा प्रारम्भ की, लगभग 25 सन्त भी थे। बीस दिन की इस यात्रा के पश्चात जब जलयात्रा प्रयागराज पहुँची तो प्रशासनिक अधिकारियों ने कहा कि हद्विार तक पहुँचने के लिए गंगा के प्रवाह में इतना जल नहीं है कि उसमें मोटरबोट चल सके, इसलिए हमारा आग्रह है कि आप इस यात्रा को यहीं विराम दें। जबकि मोटरबोट को चलने के लिए मात्र डेढ़ मीटर गहरे जल की ही आवश्यकता थी। यात्रा को प्रयागराज में ही विराम देने का निर्णय लेना पड़ा। 2500 कि.मी. लम्बी गंगा की वस्तुस्थिति को समझने का इससे अच्छा कोई प्रयास नहीं हो सकता था।
हरिद्वार से दिल्ली तक पूज्य स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज के नेतृत्व में गंगा रक्षा यात्रा निकाली गई। यात्रा की पूर्णता के बाद गंगा रक्षा समिति का एक प्रतिनिधि मण्डल टिहरी बाँध के निर्माण को रोकने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला था परन्तु वार्तालाप सार्थक न रही। उस समय के ऊर्जा मंत्री श्री कुमार मंगलम ने दो टूक कहा था कि यदि बाँध निर्माण से गंगाजल की गुणवत्ता प्रभावित होती होगी तो यह बाँध नहीं बनेगा।
टिहरी बाँध के विरुद्ध पनप रहे जनाक्रोश को देखते हुए रूड़की विश्वविद्यालय ने एक सेमिनार का आयोजन किया, जिसमें विभिन्न विधाओं के देश के ख्यातिनाम वैज्ञानिक सम्मिलित हुए। अनेक वैज्ञानिकों ने विभिन्न दृष्टिकोणों से अपने विचार व्यक्त किए। श्री अशोक जी सिहल ने एक मिनरल वाॅटर की बोतल सबको दिखाते हुए प्रश्न किया था कि वैज्ञानिक तरीके से शुद्ध किए गए जल की इस बोतल पर उपयोग की अन्तिम तिथि यानि एक्सपायरी डेट 6 माह लिखी है परन्तु गंगाजल के उपयोगिता की कोई अन्तिम तिथि निश्चित नहीं है, क्योंकि वह वर्षानुवर्ष तक शुद्ध बना रहता है। गंगाजल में यह आत्मशुद्धि का जो स्वाभाविक गुण है क्या इसके ऊपर देश में कोई शोध हुआ है ? सभी का उत्तर नकारात्मक था। इस सेमिनार में दो निष्कर्ष मुख्य रूप से सामने आए-
1. भूकम्प से टिहरी बाँध को कोई खतरा नहीं है।
2. गंगा के आत्मशुद्धि के गुण पर कोई वैज्ञानिक अध्ययन अभी तक भारत में नहीं हुआ।
भारत सरकार के प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी से आग्रह किया गया कि भविष्य में किसी संभावित भूकम्प के कारण टिहरी बाँध को होने वाले खतरे, उसके दुष्परिणाम तथा ऊँचे बाँध के कारण बनने वाली झील में एकत्र गंगाजल की गुणवत्ता पर कोई विपरीत प्रभाव पड़ेगा या नहीं, यह जानने के लिए एक विशेषज्ञ जांच समिति का गठन किया जाए। डाॅ0 मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता में और डाॅ0 माशेलकर के नेतृत्व में समिति का गठन किया गया। समिति ने अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंपी। रिपोर्ट के निष्कर्षों से देश अभी तक अनभिज्ञ है।
भारतीय संसद को एक याचिका प्रस्तुत की गई थी। संसदीय समिति में सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि यह बाँध बाढ़ नियंत्रण एवं गंगा में जलधारा का प्रवाह बनाने के लिए बनाया जा रहा है तथा वर्षाकाल में ही वर्षा के जल से इस बाँध को भरा जाएगा।
गंगा रक्षा के लिए विभिन्न संगठनों के जो अलग-अलग प्रयास हो रहे हैं उन सभी को एक मंच पर लाने के लिए स्वामी रामदेव जी के नेतृत्व में गंगा रक्षा मंच का निर्माण किया गया। सभी जिला केन्द्रों पर प्रदर्शन कर जिलाधिकारी को पंचसूत्री माँगों का ज्ञापन दिया गया। गंगा रक्षा के विषय को इस कार्यक्रम ने अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान किया। एक प्रतिनिधि मण्डल प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी से मिला और अपनी पंचसूत्रीय माँगों के संदर्भ में तत्काल कार्यवाही करने का निवेदन किया। वार्ता के दौरान प्रधानमंत्री जी ने कहा कि हम गंगा के सम्बन्ध में एक बड़ी योजना बनाने का विचार कर रहे हैं। प्रतिनिधि मण्डल ने प्रधानमंत्री से डाॅ0 मुरली मनोहर जोशी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि टिहरी बाँध ने जो गंगा को बांध दिया है उसकी निर्बाध अविरलता के लिए गंगा की एक धारा झील के पिछले बिन्दु से निकाल कर बाँध को लांघते हुए गंगा में मिला दी जाए तो गंगा का प्रवाह निर्बाध बना रहेगा। गंगा के निर्बाध प्रवाह को बनाए रखने के इस अतिरिक्त कार्य पर लगभग 400 करोड़ रूपया खर्च हो सकता है। प्रधानमंत्री जी ने कहा था कि गंगा की अविरलता व निर्मलता के लिए हम धन की कमी नहीं आने देंगे।

ज्ञापन की प्रमुख माँगे –
1. गंगा को राष्ट्रीय नदी/धरोहर घोषित किया जाए और गंगा का संरक्षण और सम्मान अन्य राष्ट्रीय प्रतीकों के समान वैधानिक दृष्टि से किया जाए।
2. गंगा रक्षा के लिए राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर एक सक्षम गंगा रक्षा प्राधिकरण का गठन किया जाए जिसमें भूकम्प, जल, पर्यावरण, मृदा आदि क्षेत्रों के विशेषज्ञ एवं गंगा से जुड़े राज्य सरकारों के प्रतिनिधि और साधु सन्त व गंगा से जीवन पाने वाले मल्लाह और किसानों के प्रतिनिधि सम्मिलित किए जाएं।
3. गंगा की निर्बाधता एवं अविरलता के सम्बन्ध में पं0 मदनमोहन मालवीय जी के साथ अंग्रेज सरकार के समझौते का पालन किया जाए, जो वैधानिक दृष्टि से आज भी मान्य है।
भैरों घाटी, लोहारी नागपाला, पाला मनेरी जल विद्युत परियोजनाओं से गंगा की अविरलता और निर्मलता को पहुँच रही क्षति को ध्यान में रखकर इन योजनाओं को निरस्त कराने के लिए ऊर्जा मंत्री श्री सुशील कुमार शिंदे से गंगा रक्षा मंच का एक प्रतिनिधि मण्डल मिला था।
परियोजनाओं के कारण प्रभावित हो रही गंगा की वस्तुस्थिति को समझने के लिए विभिन्न अखाड़ों के महंत, वरिष्ठ सन्त-महात्मा लोहारी नागपाला गए थे और वहाँ का दृश्य देखकर सभी आक्रोशित होकर लौटे।
हरिद्वार पूर्णकुम्भ-2010 में गंगा रक्षा का विषय प्रधान रूप से चर्चा में रहा। दिनांक 5 अप्रैल, 2010 को कुम्भ में एक विराट सन्त सम्मेलन में गंगा की अविरलता और निर्मलता को ध्यान में रखकर यह निर्णय लिया गया कि 9 अप्रैल, 2010 को प्रातः 9 बजे से लेकर 1 बजे तक कुम्भ के सभी शिविरों के कार्यक्रम स्थगित और शिविरों में स्थापित भगवान के कपाट बन्द रहेंगे। यह कुम्भ के इतिहास में अद्वितीय घटना थी।
गंगा रक्षा मंच की ओर से हरिद्वार में शंकराचार्य चैक पर स्वामी रामदेव जी और स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि जी के नेतृत्व में एक विशाल धरने का आयोजन किया गया जिसमें सैंकड़ों सन्त और हजरों भक्तों ने भाग लिया और जिलाधिकारी को ज्ञापन प्रेषित किया था।

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