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प्रेस विज्ञप्ति- प्रतिनिधि मंडल अल्पसंख्यक आयोग से मिला।

प्रेस विज्ञप्ति – भारत में बिगड़ता हुआ साम्प्रदायिक सौहार्द और इसको सुधारने में अल्पसंख्यक आयोग की भूमिका

मुस्लिम समाज के एक वर्ग में बढती हुई आक्रामकता के विरुद्ध विहिप राष्ट्रीय अल्संख्यक आयोग पहुंचा

नई दिल्ली. अगस्त 13, 2014। सहारनपुर में दंगा पीड़ित सिक्ख व हिंदू समाज से मिलने के बाद डा. सुरेन्द्र जैन के नेतृत्व में विश्व हिन्दू परिषद का एक प्रतिनिधि मंडल आज अल्पसंख्यक आयोग से मिला। उन्होंने आयोग के सामने सहारनपुर के दंगा पीड़ितों की मार्मिक स्थिति का वर्णन करते हुए बताया कि न्यायपालिका के स्पष्ट निर्णय के बावजूद जिस प्रकार की आगजनी और हमले हुए, वह स्पष्ट रूप से इस बात का प्रतीक है की मुस्लिम समाज का एक वर्ग सबको अपनी शर्तों पर जीने के लिए मजबूर करना चाहता है। प्रशासन व सरकार की भूमिका पूर्ण रूप से पक्षपातपूर्ण रही है। तुष्टिकरण की दौड़ में आगे दिखने के लिए न केवल दंगाइयों को खुली छूट मिली अपितु निरपराध सिक्ख व हिंदू नेताओं पर झूठे मुकदमे भी बनाए गए। अब भी क्षतिपूर्ति निर्धारण में जिस प्रकार का भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जा रहा है, वह एक नए असंतोष और अविश्वास को निर्माण करेगा। सिख समाज के ऊपर किये गए बर्बर हमले से यह सिद्ध हो गया है कि अल्पसंख्यक भाई चारे की अवधारणा भ्रम मात्र है। ऐसा दिखाई देता है कि मुस्लिम समाज का एक वर्ग किसी भी गैर इस्लामिक समाज के अस्तित्व को स्वीकार करने की लिए तत्पर नहीं है।

विहिप प्रतिनिधि मंडल ने बताया कि इस वर्ग में एक अजीब प्रकार की अलगावपूर्ण आक्रामक मानसिकता दिखाई दे रही है। ईराक, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, कुछ खाड़ी के देश, बंगलादेश व अन्य कई देशों में इस मानसिकता के परिणाम दिखाई दे रहे है। भारत में भी पिछले दिनों में घटी घटनाऐ इस मानसिकता की ओर संकेत करती है। कश्मीर के कौसरनाग की यात्रा को जिस प्रकार रोका गया उससे यह स्पष्ट होता है की वे वहाँ के ही रहने वाले कश्मीरी पंडितो के पुनर्वास की बात तो दूर,उनको अपने धार्मिक कार्यक्रम भी नहीं करने दे सकते। बालटाल में लंगरों को लूटने और हिंदू देवी देवताओ की मूर्तियों को अपमानित करने बाद जिस तरह राष्ट्र विरोधी नारे लगे वह उनकी अलगाववादी मानसिकता का प्रतीक है।बर्मा के संघर्ष के बाद मुंबई के उग्र प्रदर्शन में तो राष्ट्रीय स्मारकों पर हमले भी किये गए। हर उग्र प्रदर्शन या दंगे के बाद इस तरह के नारे लगाना आम बात हो गई है। ISIS में भर्ती होने का अभियान, उसकी टी शर्ट पहनकर घूमना इसी प्रवृत्ति का प्रतीक है लव जेहाद का घिनौना षडयंत्र अब तेजी से फैलता जा रहा है। मा० केरल उच्च न्यायालय ने भी इस पर चिता व्यक्त की है। भारत में कई दंगों में यही कारण प्रमुख रूप से केंद्रबिंदु रहा। दुर्भाग्य से भारत के छद्म-सेक्युलरिष्ट इस मानसिकता को अपने निहित स्वार्थो के कारण बढ़ावा दे रहे है।

डा जैन ने बताया कि इस परिस्थिति को ठीक करने में अल्पसंख्यक आयोग की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। भारत की ये समस्याऐ अल्पसंख्यकवाद के कारण निर्माण हो रही हैं। मा० सर्वोच्च न्यायालय के जस्टिस लाहोटी ने 2005 के एक मामले में आपके इस दायित्व को परिभाषित किया था। उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत में अल्संख्यकवाद देशहित में नहीं है। यह समाप्त होना चाहिए और अल्पसंख्यक आयोग इस मामले में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सकता है। विहिप ने स्पष्ट किया कि भारत में सभी भारत माँ के पुत्र है। यह भावना ही समाज में सदभाव निर्माण कर सकती है। यह भाई चारा ही सबके हितों की सुरक्षा की गारंटी है। अल्संख्यकवाद ने अल्पसंख्यकों में भी दुर्भाव ही निर्माण किया है। विहिप ने अपील की की वे देशहित में अपने इस दायित्व को स्वीकार करें और भारत को अल्पसंख्यकवाद के अभिशाप से मुक्त कराये। यही कदम भारत में स्थायी शांति का निर्माण करेगा।

इस प्रतिनिधि मंडल में डा. सुरेन्द्र जैन के अतिरिक्त विहिप के केन्द्रीय मंत्री श्री खेमचंद शर्मा व श्री प्रशांत हरतालकर तथा विहिप की स्वर्ण जयंती महोत्सव समिति के प्रवक्ता श्री विनोद बंसल भी सम्मिलित थे। श्री हरतालकर ने पाकिस्तान और बंग्लादेश में हिंदुओ पर हो रहे अत्याचारों का भी मार्मिक वर्णन किया।

 

जारीकर्ता – डा० सुरेन्द्र कुमार जैन, प्रवक्ता- विहिप

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श्रीमान अध्यक्ष जी

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग

नई दिल्ली ।

विषय : भारत में बिगड़ता हुआ साम्प्रदायिक सौहार्द और इसको सुधारने में अल्पसंख्यक आयोग की भूमिका

महोदय ,

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का अल्पसंख्यको के अधिकारों की रक्षा में दिया जा रहा योगदान सर्वविदित है । परन्तु यह भी सर्वविदित तथ्य है की अगर देश में साम्प्रदायिक सौहार्द बना रहता है तो सभी के अधिकारों की रक्षा स्वयमेव हो जाती है चाहे वे अल्पसंख्यक हों या बहुसंख्यक । भारत के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय , मुस्लिम समाज के एक वर्ग में अलगावपूर्ण आक्रामकता की प्रवृत्ति आश्चर्यजनक रूप से तेजी से बढती जा रही है । यह ठीक है कि की आक्रामकता का वैश्विक रूप भी दिखाई दे रहा है । ईराक , अफगानिस्तान ,पाकिस्तान ,बंगलादेश , मलेशिया व् खाड़ी के कई देशों में अल्पसंख्यकों के साथ होने वाले बर्बर व्यवहार किसी से छिपे नहीं हैं । परन्तु भारत में वे अल्पसंख्या में होने के बावजूद जिस प्रकार बहुसंख्यक तथा अन्य अल्पसंख्यकों पर हावी होने का प्रयास कर रहे हैं, वह देश के सभी प्रबुद्ध लोगों के लिए प्रबल चिंता का विषय बनाता जा रहा है । इसको पहचान कर इसका विश्लेषण और उपचार करने की जगह इस प्रवृत्ति को या तो ढकने की असफल कोशिश की जा रही है या इसको बढ़ावा दिया जा रहा है । कुछ मुस्लिम नेता , छद्मसेक्युलरवादी नेता और मीडिया का एक वर्ग इसमें विशेष भूमिका निर्वाह कर रहे हैं । इसको समझने के लिए कुछ ही उदाहरण पर्याप्त हैं ।

 

१. सहारनपुर में न्यायपालिका के स्पष्ट निर्णय के बावजूद जिस प्रकार उग्र भीड़ द्वारा गुरूद्वारे और सिक्ख भाइयों की दुकानों पर हमला कर उन्हें लूटा गया तथा उनको जान माल का नुकसान पहुंचाया गया , उससे ध्यान में आता है कि मुस्लिम समाज का एक वर्ग गैर मुस्लिम अल्पसंख्यक समाज के साथ भी भाई -चारा नहीं निभा सकता । इस सम्बन्ध में सहारनपुर के सिक्ख समाज ने आपको अपना प्रतिवेदन भी दिया है ।

२. कश्मीर के कौसरनाग में अनादिकाल से चल रही हिंदू समाज की यात्रा को जिस प्रकार रोका गया उससे ध्यान में आता है कि वे तथा जम्मू कश्मीर की सरकार घाटी में कश्मीरी पंडितो के बसने की बात तो दूर , उनको अपने धार्मिक कार्यक्रम भी करने देना स्वीकार नहीं करते ।

३. बालटाल में अमरनाथ यात्रा के दौरान जिस प्रकार का हमला लंगर वालो पर करके उनको लूटा गया तथा हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियों का अपमान किया गया ,उसकी कड़ी भर्त्सना करने की जगह जैसा पर्दा डाला गया ,वह बीमारी को बढ़ाएगा । उस समय राष्ट्र विरोधी नारे लगाना किस प्रवृत्ति का प्रतीक है , किसी को बताने की आवश्यकता नहीं है ।

४. शामली , मुजफ्फरनगर ,कांठ ,तावडू (हरियाणा) , गुड़गांव आदि की घटनाऍ तो शर्मसार करती ही हैं , खरखौदा (मेरठ ) की ४ अप्रैल की घटना जिसमे एक हिंदू लडकी के साथ सामूहिक बलात्कार के बाद धर्मांतरण व् महिला तस्करी की शंका के विषय तो किसी भी सभ्य समाज के माथे पर कलंक है । उत्तर प्रदेश की पुलिस व् राज्य सरकार जिस प्रकार बिना किसी निष्पक्ष जांच के इस कांड को ढक रही है , वह भी चिंता का विषय है ।

५. लव -जेहाद का विषय पिछले कई वर्षों से चिंता का विषय बना हुआ है । आपको ज्ञात ही होगा कि इस शब्द का प्रयोग केरल हाई कोर्ट के “शहंशाह बनाम केरल राज्य सरकार “मामले में किया गया है और इस प्रवृत्ति पर मा. न्यायालय ने विस्तार से प्रकाश डालते हुए चिंता व्यक्त की है । उन्होंने इसमे प्रेम नहीं धर्मांतरण का ही कारण माना है । इस मामले का विस्तार से अध्ययन कर इस षडयंत्र पर सख्ती से रोक लगाने की आवश्यकता है । इस प्रकार के घिनौने षडयंत्र के क्या परिणाम हो सकते है , मेरठ और शामली की घटनाओं को देखकर समझा जा सकता है ।

६. जैसे दुर्दांत आतंकी संगठनो में शामिल होने व् उनकी टी शर्ट पहनने की प्रवृत्ति एक वर्ग की मानसिक सोच की ओर संकेत करती है । यह सोच देश के प्रबुद्ध वर्ग को चिंतित कर रही है ।

उपरोक्त घटनाऐ इस घातक प्रवृत्ति की झलक मात्र हैं । इस प्रकार की सैकड़ों घटनाओं का वर्णन किया जा सकता है । बर्मा तथा बोडो – बंग्लादेशी संघर्ष एवं अमरनाथ मामले के बाद जिस तरह राष्ट्र -ध्वज का अपमान किया गया और राष्ट्र विरोधी नारे लगाए गए , वह विषय भी कुछ लोगों के देश -बाह्य लगाव का प्रतीक है । मुंबई के उग्र प्रदर्शन के बाद तो राष्ट्रीय स्मारकों को भी अपमानित किया गया । इन सब घटनाओं की स्वाभाविक प्रतिक्रिया भी हो सकती है । राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम की धारा 9(f) ,9(g) तथा मा. सर्वोच्च न्यायालय के जस्टिस लाहोटी (२००५) के निर्णय इस सन्दर्भ में आपके लिए विशेष दायित्व की ओर संकेत करती है । इस सम्बंध में आपसे अनुरोध है कि :

१. उपरोक्त वर्णित घातक प्रवृत्ति का अध्ययन व् विश्लेषण करें जिससे इसके अंतर्राष्ट्रीय , राष्ट्रीय व अन्तर्निहित कारणों को समझा जा सके ।

२. मा. सर्वोच्च न्यायालय ने उपरोक्त वर्णित मामले में स्पष्ट कहा है कि अल्पसंख्यकवाद देश के लिए घातक है । हमारा भी मानना है कि भारत में कोई अल्पसंख्यक – बहुसंख्यक नहीं , सभी भारत माँ के पुत्र हैं । इन सब में स्वाभाविक भाई – चारा होना चाहिए । अल्पसंख्यक वर्गों के भाई -चारे की अवधारणा केवल भ्रम मात्र सिद्ध हो चुकी है । ईसाई – बौद्ध व् सिक्ख – मुस्लिम संघर्षो से यह सिद्ध भी हुआ है । अत: आपसे निवेदन है की मा. न्यायपालिका द्वारा प्रदत्त इस दायित्व का निर्वाह करें और भारत को अल्पसंख्यवाद के अभिशाप से मुक्त कराये ।

३. छद्मसेक्युलरिष्ट और कुछ मुस्लिम नेताओ ने मुस्लिम समाज को केवल वोट बैंक समझा है तथा यह माना है की उनकी भावनाओ को भड़का कर ही उनके वोटों को प्राप्त किया जा सकता है । साम्पदायिक दंगों में इनकी भूमिका का विश्लेषण भी बहुत आवश्यक है । दुर्भाग्य से मीडिया का एक वर्ग मुस्लिम सम्प्रदाय के किसी भी से जुडी घटनाओं को साम्प्रदायिक रंग देकर अपने आपको सैक्युलरी दौड़ का चैम्पियन सिद्ध करने की कोशिश करता है ।

इन सब विषयों को ठीक कर देश में एकता का भाव निर्माण करने में आपकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है । हमें विश्वास है कि आप अपनी भूमिका को सफल रूप से निभाएंगे और देश को साम्प्रदायिक वैमनस्य के अभिशाप से मुकत करायेंगे ।