श्रीराम जय राम जय जय राम, শ্ৰীৰাংজয়ৰাংজয়জয়ৰাং, শ্রীরাম জয় রাম জয় জয় রাম , શ્રીરામ જય રામ જયજય રામ, ಶ್ರೀರಾಮಜಯರಾಮಜಯಜಯರಾಮ, ശ്രിറാം ജയ് റാം ജയ്‌ ജയ് റാം, శ్రీరాంజయరాంజయజయరాం

सांदीपनी साधनालय में स्वर्ण जयंती महोत्सव का शुभारंभ

विश्व हिन्दू परिषद स्वर्ण जयंती वर्ष के प्रथम आयोजन के अवसर पर संत-महापुरुषों के सम्मुख महामंत्री का प्रास्ताविक निवेदन

सांदीपनी साधनालय, पवई, मुम्बई, (महाराष्ट्र)

पूज्यvhp50-2 संत-महापुरुषों के श्रीचरणों को अपना प्रणाम निवेदन करता हूँ। परिषद कार्य में आज का दिन ऐतिहासिक है। 50 वर्ष पूर्व वर्ष 1964 में श्रीकृृष्ण जन्माष्टमी के दिन इसी पवित्र स्थल पर देश के स्वनामधन्य संतजन व हिन्दुस्थान व हिन्दू समाज के गौरवशाली स्वरूप को देखने की इच्छा रखनेवाले महानुभाव एकत्र आए थे। सांदीपनी साधनालय के अधिष्ठाता पूज्यपाद स्वामी चिन्मयानंद जी महाराज, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक परम पूजनीय श्री गुरुजी, मास्टर तारासिंह जी, सद्गुरु जगजीत सिंह जी, रामटेक के योगशिरोमणि सीताराम दास जी महाराज, राष्ट्र संत तुकडो जी महाराज, डॉ0 कन्हैयालाल माणिक लाल मुंशी, हिन्दू महासभा के तत्कालीन महासचिव श्री बी0जी0 देशपाण्डे सरीखे श्रेष्ठजन इस अवसर पर उपस्थित थे, जिन्होंने हिन्दू समाज की अवस्था पर चिंतन करते हुए विश्व हिन्दू परिषद के गठन की घोषणा की थी।

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ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों का अध्ययन करने के लिए मध्यप्रदेश सरकार द्वारा गठित किए गए नियोगी कमीशन की रिपोर्ट ने देश में हलचल पैदा कर दी थी। रिपोर्ट से यह स्पष्ट हो गया था कि भारत में ईसाई मिशनरियों को विदेशों से प्राप्त होनेवाले धन से संचालित स्कूल, अस्पताल, अनाथालय जैसे सेवा प्रकल्पों का दुरुपयोग गरीब लोगों को विशेष रूप से वनवासियों को छल-कपट द्वारा धर्मान्तरित करने में किया जाता है। ये धर्मान्तरण समाज की समरसता भंग कर रहा था। धर्मान्तरण करनेवाली शक्तियाँ देश को और अधिक टुकडों में बांटने की इच्छा रखती थीं। आठवीं से सत्रहवीं शताब्दी तक के कालखण्ड मंे तलवार के भय से किए गए धर्मान्तरण के कारण ही 1947 में भारत का विभाजन हुआ था। यह विभाजन समाज को पीड़ा पहंुचा रहा था। महापुरुषों का विचार था कि भविष्य में समाज के सम्मुख विभाजन के इतिहास की पुनरावृृत्ति न हो और जो बन्धु हमारे से छीन लिए गए उनको अपने पूर्वजों से जोड़ने का प्रयास किया जाए।

विदेशों में निवास करनेवाला हिन्दू अपनी परम्पराओं और सांस्कृतिक जडों से कट रहा है। कैरेबियन देशों में रहनेवाला हिन्दू अपने नामकरण और विवाह सरीखे संस्कार भी चर्च में कराता था। इस अवस्था से वहां निवास करने वाले अनेकों लोग दुःखी रहते थे। इस समाज को अपने धर्म, अपने संस्कार और अपने पूर्वजों की धरती से जोडकर रखने के लिए कुछ प्रयत्न किया जाए।

ऊँच-नीच, स्पृृश्य-अस्पृृश्य के भेदभाव को त्यागकर हिन्दू समाज अपने सभी धार्मिक, सामाजिक कार्य जात-पात और जन्म का विचार किए बिना एक भ्रातृत्व भाव के आधार पर सम्पन्न करे ताकि यह समाज कालबाह््य सामाजिक कुरीतियों से मुक्त होकर निर्दोष और तेजस्वी बने और संत महापुरुष समाज को युगानुकूल नई आचार व्यवस्था प्रदान करें इसकी आवश्यकता महापुरुष अनुभव करते थे।

दुनिया के अनेक देशों में साम्यवादी शासन स्थापित हो चुका था। चीन तिब्बत को हडप कर नेपाल की सीमा तक आ गया था। साम्यवाद धर्म को अफीम मानता था। तिब्बत में मंदिर तोडे गए थे, 1962 में चीन भारत पर हमला कर चुका था। साम्यवाद के इस वैचारिक आक्रमण से अपने देश की रक्षा करने का विचार अनेकों के मन में घूमता था।

धन का प्रभाव और धन का अभाव वाले दोनों ही क्षेत्रों में संस्कारों का अभाव अनुभव होता था। हिन्दू परिवारों में अच्छे संस्कार बाल्यकाल से ही प्रदान करने की व्यवस्था स्थापन करने का विचार भी अनेकों को कौंधता था।

गौ हिन्दू समाज के लिए श्रद्धा का विषय सदैव से रहा। गाय की रक्षा के लिए हिन्दू समाज ने बलिदान दिए हैं। इस देश की मान्यता है कि यह धरती गाय पर टिकी है। गाय सदैव से भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार रही है। परन्तु परतंत्रता/संघर्ष के काल में गौवंश की हत्या प्रारंभ हुई जो भारत के स्वतंत्र होने के पश्चात भी थमी नहीं। गौ की रक्षा के लिए समाज में जागृृति पैदा हो, इसकी आवश्यकता अनुभव होती थी।

भारत को आजादी मिलने के बाद भी संस्कृत भाषा उपेक्षित थी। हिन्दू मठ-मंदिर, हिन्दू समाज के रीढ़ रहे, इस रीढ़ को अंग्रेजों ने तोड़ने के लिए मठ-मंदिरों को राज्य के नियंत्रण में लेने का प्रयास अंग्रेजों ने किया इसके लिए कानून बने और मठ-मंदिर, सरकार का विभाग बन गया, मंदिरों की जमीनों को हड़पना, बेचना प्रारम्भ हो गया यह भी भारतीय समाज पर आक्रमण था। आजादी के बाद भी जिन व्यक्तियों के हाथ में सत्ता आई वे विदेशी नीतियों के अनुगामी बने रहे, इस दृश्य को बदलने का विचार उस समय आया।

भारत में उत्पन्न सभी मत पंथ, सम्प्रदाय एवं धर्मों को एक जगह लाकर देश-विदेश में फैले उनके असंख्य अनुयायियों को एकसूत्र में गूंथने का प्रयास किया जाए, उनके हृदय में हिन्दू संस्कृति और इतिहास के प्रति गौरव निर्माण हो, जन्म से मृत्यु तक के संस्कारों के प्रति आस्था पैदा हो। इसकी आवश्यकता भी अनुभव की जा रही थी।

इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए दार्शनिक आचार्यों, गुरुओं, विचारकों और प्रख्यात सामाजिक चिंतकों ने श्रीकृृष्ण जन्माष्टमी 29 अगस्त, 1964 को विश्व हिन्दू परिषद नाम से एक संगठन के गठन की घोषणा की थी।

सांदीपनी साधनालय के प्रतिष्ठाता पूज्य स्वामी चिन्मयानंद जी महाराज, मैसूर रियासत के महाराजा जयचामराज वाडियार, मेवाड़ के महाराणा भगवत सिंह, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश शिवनाथ काटजू, उद्योगपति विष्णुहरि डालमिया एवं श्री अशोक सिंहल अध्यक्ष के रूप में अब तक परिषद का नेतृृत्व कर चुके हैं।

बौद्धजगत के धर्मगुरु परमपावन दलाई लामा जी, भारत में चारों पीठों के जगद््गुरु शंकराचार्य, महंत दिग्विजय नाथ जी, प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, जगद््गुरु मध्वाचार्य पूज्य स्वामी विश्वेशतीर्थ जी महाराज, कर्नाटक के पूज्यपाद शंकरानंद सरस्वती जी, असम के पूज्यपाद सत्राधिकारी, वेदमूर्ति पूज्यपाद दामोदर सातवलेकर जी, होशियारपुर पंजाब के आचार्य विश्वाबंधु जी, गुरु गंगेश्वरानन्द जी महाराज, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के पूर्व उपकुलपति डॉ0 सी0पी0 रामास्वामी अय्यर, श्री एन0बी0 गाडगिल, श्री जुगलकिशोर बिरला, श्री हनुमानप्रसाद पोद्दार का आशीर्वाद और सक्रिय सहयोग परिषद कार्य में सदैव रहा है।

भारत के राष्ट्रपति डॉ0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन, उपराष्ट्रपति श्री गोपालस्वरूप पाठक, राष्ट्रपति श्री बी0बी0 गिरि, उत्तरप्रदेश के राज्यपाल श्री गोपाल रेड्डी एवं श्री विश्वनाथ दास जी, बिहार के राज्यपाल श्री अनन्त शयनम अयंगार, नेपाल नरेश, नागा समाज की रानी गाइडिल्यू एवं श्री जगजीवन राम, ग्वालियर घराने की राजमाता विजयाराजे सिंधिया, मॉरीशस के उद्योग मंत्री दयानंद बसंतराय, कवयित्री महादेवी वर्मा, कर्नाटक राज्य लोकसेवा आयोग के सदस्य श्री आर0 भरनैय्या सरीखे श्रेष्ठ लोगों का आशीर्वाद परिषद को प्राप्त हुआ है।

1964 से 1971 तक भारत और भारत से बाहर भिन्न-भिन्न स्तर पर हिन्दू सम्मेलनों का आयोजन हुआ, इन सम्मेलनों के कारण समाज में स्वाभिमान पैदा हुआ, हम सब हिन्दू हैं यह भाव जगा। जहां-जहां सम्मेलन हुए वहां-वहां विश्व हिन्दू परिषद का कार्य प्रारंभ होने लगा।

संसार के अनेक देशों में स्वयं जाकर 88 स्थानों पर चारों वेदों के संयुक्त ग्रन्थ की स्थापना और वेद मंदिर के निर्माण का कार्य अपने प्रारंभिक जीवन में परिषद कार्यकर्ताओं ने किया।

जो हिन्दू अनेक कारणों से भूतकाल में अपनी परंपराएं, धर्म और महापुरुष छोडकर इस्लाम या चर्च के अनुगामी बन गए थे उनको पुनः हिन्दू समाज स्वीकार कर ले तो देश का बहुत बडा लाभ हो सकता है। इस विचार को जनवरी 1966 में प्रयागराज में संगमतट पर आयोजित हिन्दू सम्मेलन में संतों ने अपनी पूर्ण स्वीकृृति प्रदान की और घरवापसी के मार्ग के अवरोध को समाप्त किया। इसी सम्मेलन में ‘‘न हिन्दू पतितो भवेत’’ का जयघोष पूज्य पेजावर स्वामी द्वारा किया गया था।

दिसम्बर, 1969 को कर्नाटक राज्य के उडुपी तीर्थस्थल पर सम्पन्न हुए हिन्दू सम्मेलन में सेवानिवृृत्त आईपीएस अधिकारी श्री आर0 भरनैय््या के द्वारा प्रस्तुत किए गए अस्पृृश्यता और ऊंच-नीच के भेदभाव को त्याग कर अपने सभी सामाजिक कार्य भ्रातृत्व भाव के आधार पर करने के प्रस्ताव को पूज्य संतों ने हजारों श्रद्धालुओं के समक्ष करतल ध्वनि से स्वीकार किया था। ‘‘हिन्दवः सोदरा सर्वे की घोषणा इसी सम्मेलन में की गई थी। संत-महापुरुषों ने अस्पृश्यता को त्यागने का आह्वान इसी सम्मेलन से किया गया था।

हिन्दू समाज जनगणना में अपने को हिन्दू लिखाए। हिन्दू समाज का कोई भी अंग अब समाज से न टूटे, हम सब हिन्दू हैं, हिन्दू को आदर्श हिन्दू बनाना है, संत समाज सर्वसाधारण समाज के मध्य भ्रमण करना प्रारंभ करे। समाज का जो वर्ग विकास की दौड में बहुत पीछे रह गया है, शिक्षा से पूर्णतः वंचित हो जाने के कारण आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से पिछड़ गया ऐसे बंधुओं को समाज में आगे बढाने के लिए सम्मानपूर्वक रहने का अवसर प्रदान करने के लिए उनमें शिक्षा, चिकित्सा सरीखे सेवाकार्य हिन्दू समाज आगे आकर प्रारंभ करे, ऐसे आह्वान हिन्दू सम्मेलनों से हुए। परिणामस्वरूप सेवाकार्यों का प्रारंभ हो गया।

उत्तराखण्ड, गुजरात, महाराष्ट्र, जम्मू कश्मीर में भूकम्प, उड़ीसा, आन्ध्र, तमिलनाडु, बिहार में बाढ़, समुद्री तूफान, सुनामी की दैवीय आपदा आने पर परिषद से जुडे कार्यकर्ता एवं कार्यकर्ताओं की प्रेरणा से समाज का बहुत बडा वर्ग सेवाकार्यों के लिए आगे आ गया।

पंजाब जब आतंक के संकट से जूझ रहा था तब संत समाज पंजाब में सदभावना का संदेश देने के लिए दस दिन तक भ्रमण करता रहा। अमरनाथ की तीर्थयात्रा पर पाकिस्तान प्रेरित आतंकवाद का संकट मंडराया तो संपूर्ण भारत की तरुणाई बजरंग दल के नाम पर आगे आई और आतंकवादी पीछे हट गये। जहां अमरनाथ यात्रा पर कभी कुछ हजार तीर्थयात्री ही यात्रा करते थे वहां अब लाखों भक्त जाते हैं। बूढा अमरनाथ सरीखे कठिन क्षेत्र में दर्शन के लिए जाने की हजारों लोगों को प्रेरणा देना बजरंग दल के युवकों का देश के प्रति सदैव स्मरण रखने योग्य कार्य है।

वर्ष 1979 में बौद्ध धर्मगुरु परम पावन दलाई लामा परिषद के वैश्विक सम्मेलन में प्रयागराज पधारे थे, उनका सम्मान ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद््गुरु शंकराचार्य पूज्य स्वामी शांतानंद जी महाराज ने किया था, पूज्य दलाई लामा जी वाराणसी गए थे, काशी में उनका सम्मान काशी के पंडितों ने किया था। इतिहास के जाननेवाले इस कार्य के महत्व को भलीभांति समझ सकते हैं। वर्ष 1994 में काशी में डोमराजा के घर प्रसाद पाने के लिए संत स्वयं गए और अपने सम्मेलन में अपने बीच में बैठने के लिए निमंत्रित किया, वे आए। सामाजिक समरसता का यह उदाहरण अद्वितीय है।

गौमूत्र और गोबर खाद के उपयोग में आता है यह तो सभी जानते हैं परन्तु गौमूत्र और गोमय मनुष्य शरीर के आरोग्य के लिए भी उपयोगी है, यह कार्य परिषद के एक कार्यकर्ता ने यह सिद्ध कर दिखाया। गौमूत्र अर्क, घनवटी का निर्माण प्रारंभ हुआ। पूज्य सत्य साईंबाबा जी ने उसे आशीर्वाद दिया। धीरे-धीरे वैज्ञानिकों ने पंचगव्य से निर्मित वस्तुओं पर अनुसंधान प्रारंभ किया। संसार के अनेक देशों से पेटेण्ट प्राप्त किए, आज पंचगव्य और पंचगव्य से बनी हुई वस्तुएं औषधि, कीटनियंत्रक के रूप में सारे देश में प्रचलित हैं। गाय का केवल दूध ही नहीं तो गौमूत्र और गोमय भी उपयोगी है और इसके आधार पर दूध न देनेवाली गाय से भी गाय के साथ-साथ परिवार का भरण-पोषण भी किया जा सकता है यह सिद्ध हुआ है।

समाज की करोडों आबादी ऐसे क्षेत्रांे में रहती है जहां सडक नहीं, आवागमन के साधन नहीं, केवल पैदल चलना पडता है, सरकार के विद्यालय नहीं अथवा समाज के दिल-दिमाग से बच्चों को साक्षर बनाने का विचार ही निकल चुका है ऐसे क्षेत्रों में स्वामी विवेकानंद जी के विचारों को आधार बनाकर साक्षरता का काम प्रारंभ हुआ। धीरे-धीरे ऐसे कठिन क्षेत्रों में आरोग्य, स्वाबलम्बन, संस्कार और स्वाभिमान जागरण का कार्य पिछले 25 वर्षों में प्रारंभ हुआ। देश के 54,000 स्थानों पर आज यह कार्य चलता है।

इसके अतिरिक्त भारत वर्ष में बाल संस्कार केन्द्र, प्राथमिक पाठशालाएं, छात्रावास, वेद पाठशालाएं, चल चिकित्सा वाहन, एम्बुलेंस, प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र, नियमित अस्पताल, महिलाओं के लिए स्वयं सहायता समूह, स्वाबलम्बन के लिए प्रशिक्षण केन्द्र, गौशालाएं, निराश्रित बालक-बालिकाओं के सर्वांगीण विकास के केन्द्र इस प्रकार के 6,000 स्थाई सेवाकार्य परिषद की प्रेरणा से समाज चलाता है। इसके अतिरिक्त समय-समय पर अल्पकालिक, आकस्मिक सेवाकार्य भी कार्यकर्ता समाज की सहायता से सम्पन्न करते हैं। ये सेवाकार्य लगभग 225 पंजीकृृत न्यासों/समितियों के माध्यम से चलाए जाते हैं।

आज हमारा कार्य भारत वर्ष में कुल 1,21,000 स्थानों पर किसी न किसी रूप में है। 51,000 स्थानों पर बजरंग दल के नाम से नवयुवकों में कार्य चलता है। 9,152 स्थानों पर मातृृशक्ति एवं दुर्गावाहिनी का कार्य है। 60,000 स्थानों पर साप्ताहिक सत्संग चलते हैं। विगत 50 वर्षों में 61,00,000 व्यक्तियों को धर्मान्तरित होने से बचाया गया है। 7,00,000 लोगों ने पुनः अपने पूर्वजों की परंपरा को स्वीकार किया। 26,00,000 गोवंश को कटने से बचाया है। घर में छोटे बच्चे गाय के बारे में जानंे इसके लिए गौविज्ञान परीक्षा के माध्यम से बच्चों को गाय के संबंध में जानकारी दी है। कर्नाटक, राजस्थान में रामायण और महाभारत की परीक्षाएं छात्रों के बीच आयोजित की जाती हैं। आज देश के लगभग 15,000 संत परिषद के द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में भागीदारी करते हैं। संसार के 40 देशों में हिन्दू जागरण का कार्य होता है। हिन्दू बौद्ध समन्वय हो, इसके विधिवत प्रयास किए गए हैं। 1528 में विदेशी आक्रांता द्वारा ध्वस्त किए गए मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए प्रारंभ किए गए श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन और तमिलनाडु राज्य में रामेश्वरम के निकट भगवान श्रीराम द्वारा निर्मित रामसेतु को तोडने के सरकारी प्रयत्नों के विरुद्ध किए गए प्रयास बहुत निकट की ही बात है। सारा संसार इन प्रयत्नों के परिणामों से परिचित है। इन प्रयत्नों के परिणामस्वरूप हिन्दू समाज में प्रबल एवं प्रभावी जागरण हुआ है, स्वाभिमान बढा है।

परन्तु पाश्चात्य प्रभाव भी बढा है, हिन्दू जीवनमूल्यों में ह्रास हुआ है, विघटनकारी शक्तियों का दुष्प्रभाव बढा है, विविधता में एकता के उदात्त स्वरूप को भी कानून द्वारा गलत ढंग से व्याख्या करके समाज को भ्रमित करने और तोडने के प्रयास होते हैं। हिन्दू संस्कृृति और हिन्दू संस्कारों में प्रदूषण और दुर्बलता अभी अनुभव होती है। समाज में आत्मविस्मृति के कारण अस्पृश्यता सरीखी सामाजिक बुराइयां अभी भी हैं। धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्दों ने हमारे समाज को विकृत ही किया है। हिन्दू समाज के लिए युगानुकूल नई आचार व्यवस्था प्रदान करने का 1964 की पीढ़ी का विचार पूर्ण करने की आवश्यकता अनुभव होती है।

भारत में उत्पन्न सभी धार्मिक परंपराओं के अनुयायियों में ‘‘हम हिन्दू समाज के अंग हैं’’, ‘‘हिन्दू हम सब एक हैं’’, यह भाव जगाना जरूरी है। हिन्दू जागरूक बने, समरस बने और हिन्दू सक्रिय भी बने यह आवश्यक है। जिस समाज को अस्पृश्य कहा जाता था उस समाज में शिक्षा और धन में तो वृृद्धि हुई है परन्तु सम्मान दिलाना अभी शेष है। समाज में आपस में मिलना-जुलना, खानपान तो बढे साथ-ही-साथ हृदयों की निकटता भी बढनी चाहिए। 1966 और 1969 के सम्मेलनों के संदेश को आगे बढाने की आवश्यकता अभी भी अनुभव होती है। धर्मान्तरण रोकना, धर्मान्तरित हो चुके समाज को पुनः अपने पूर्वजों की धारा से जोडना, अस्पृश्यकता सरीखी बुराइयों को दूर कर समरसता का भाव निर्माण करना तथा परिवारों में संस्कारों की रक्षा, मानबिन्दुओं की रक्षा जैसे विषय संपूर्ण समाज का विषय बने ऐसे प्रयास करना आवश्यक है।

स्वर्णजयंती वर्ष में भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्यक्रमों के द्वारा अपने कार्य का भौगोलिक विस्तार, सक्रिय कार्यकर्ताओं की संख्या में वृद्धि, सेवाकार्यों की वृद्धि और हिन्दू स्वाभिमान का भाव और अधिक जाग्रत कर सकें इसके लिए नवम्बर, दिसम्बर 2014 तथा जनवरी, फरवरी 2015 में प्रत्येक जिले में हिन्दू सम्मेलन आयोजन का निश्चय कार्यकर्ताओं ने किया है। साथ ही साथ वर्षभर में भिन्न-भिन्न कार्यक्रयों की योजना/रचना की गई है। इन कार्यक्रमों में आप सभी संत/महापुरुषों का केवल आशीर्वाद ही नहीं तो सक्रिय सहयोग प्राप्त हो, यही निवेदन अत्यन्त विनम्रतापूर्वक करता हूँ

चम्पतराय – महामंत्री-विहिप. दिनांक: 16 अगस्त, 2014

विश्व हिन्दू परिषद – स्वर्ण जयंती कार्यक्रम 16-17 अगस्त, 2014 सांदीपनी साधनालय मुम्बई में उपस्थित पूज्य संत

01. जगद्गुरु मध्वाचार्य पू. विश्वेशतीर्थ जी महाराज, पेजावर मठ, उडुपी

02. म0म0 पूज्य संतोषी माता जी, सन्यास रोड, कनखल, हरिद्वार

03. म0म0 पूज्य विश्वेश्वरानंद जी महाराज, सन्यास आश्रम, विलेपार्ले, मुम्बई

04. पूज्य स्वामी गोविन्द देव गिरी जी महाराज, पुणे

05. श्रीमहंत पूज्य फूलडोल बिहारीदास जी महाराज श्रीमहंत चार सम्प्रदाय, वृृन्दावन

06. पूज्य स्वामी चिन्मयानंद जी महाराज, परमाध्यक्ष परमार्थ आश्रम, हरिद्वार

07. जगद्गुरु रामानुजाचार्य पूज्य श्रीधराचार्य जी महाराज अशर्फी भवन, अयोध्या

08 पूज्य महंत कमलनयन दास शास्त्री जी महाराज, मणिराम छावनी, अयोध्या

09. म0म0 पूज्य स्वामी अखिलेश्वरानंद जी महाराज, समन्वय सेवा केन्द्र, जबलपुर

10. पूज्य स्वामी विवेकानंद जी महाराज, गुरुकुल प्रभात आश्रम, मेरठ

11. पूज्य स्वामी शिवलिंगेश्वर स्वामी जी महाराज, कोयम्बटूर

12. पूज्य स्वामी निर्मलानंदनाथ जी आदि चुन-चुनगिरि मठ, कर्नाटक

13. सत्राधिकार पूज्य जर्नादन देव गोस्वामी उत्तर कमलाबारी सत्र माजुली, असम

14. पूज्य चिन्तदेवनाथ जी शान्ति काली आश्रम, त्रिपुरा

15. पूज्य तमामिन्डो जी महाराज, अरूणाचल

16. पूज्य देवानंद ब्रह्मचारी, कोलकाता, प. बंगाल

17. पूज्य स्वामी गुरूपदानंद जी महाराज, भारत सेवा आश्रम संघ, कोलकाता

18. पूज्य बन्धुगौरव जी महाराज, प. बंगाल

19. पूज्य स्वामी संग्राम जी महाराज, आन्ध्र

20. पूज्य स्वामी जीवनमुक्तानंद जी, पुरी, प0 उत्कल

21. म0म0 पूज्य स्वामी शंकरानन्द सरस्वती, माटुंगा, मुम्बई

22. पूज्य स्वामी द्वारकेश लाल जी, वल्लभ सम्प्रदाय, जामनगर, गुजरात

23. पूज्य कृष्णमणि जी महाराज, प्रणामी सम्प्रदाय, खीजडी, गुजरात

24. पूज्य नौत्तम स्वामी जी महाराज, स्वामी नारायण वडताल, गुजरात

25. पूज्य अमृतस्वरूप जी महाराज, केरल

26. पूज्य महंत जगन्नाथदास जी मान महंत मटियानी, नेपाल

27. पूज्य संत ऋषपाल सिंह जी महाराज, नामधारी, थोंडी साहब, पंजाब

28. पूज्य संत स्वतंत्रपाल सिंह जी महाराज, कूका सम्प्रदाय, पंजाब

29. श्रीमहंत पूज्य रामस्वरूपदास जी महाराज, अखनूर, जम्मू कश्मीर

30. पूज्य स्वामी अंजनेशानंद सरस्वती जी महाराज, सासाराम, बिहार

31. म0म0 पूज्य स्वामी हरिहरानंद महाराज, मृत्युंजय आश्रम, अमरकंटक

32. पूज्य जितेन्द्रनाथ जी महाराज, अमरावती, महाराष्ट्र

33. पूज्य डॉ0 राहुल बोधि जी महाराज, मुम्बई

34. महंत पूज्य हरीओमदास जी महाराज, बांसवाडा

35. पूज्य स्वामी परमात्मानंद सरस्वती, महामंत्री आचार्य सभा राजकोट, गुजरात

36. पूज्य संत युधिष्ठिर लाल जी महाराज, रायपुर, छत्तीसगढ़

37. पूज्य शिवस्वामी जी महाराज, आन्ध्र

38. पूज्य भंते ज्ञानजगत जी महाराज, बलिया, उ0प्र0

39. पूज्य स्वामी नयपदम सागर जी महाराज, मुम्बई

40. पूज्य स्वामी कुंदन ऋषि जी महाराज, मुम्बई

41. पूज्य स्वामी सच्चिदानंद गिरी जी महाराज, आन्ध्र

42. म0म0 पूज्य प्रियव्रत ब्रह्मचारी जी महाराज, ढाका, बांग्लादेश

43. पूज्य महंत रामकृष्णदास जी, पापडिया मठ पुरी, उत्कल

44. पूज्य स्वामी तेजोमयानंद जी महाराज, चिन्मय मिशन, मुम्बई

45. पूज्य स्वामी हंसाराम जी महाराज, भीलवाडा, राजस्थान