कांग्रेस के १२५ वर्ष- बोझ तले सिसकता भारत\ 125 Years of Congress-India reeling under burden

भारत के सबसे बडे राजनीतिक दल, कांग्रेस, की स्थापना को १२५ वर्ष हो चुके हैं। भारत पर इस समय कान्ग्रेस के नेतृत्व में ही सरकार चल रही है परंतु देश में भारत के सबसे पुराने राजनैतिक दल के इस महत्वपूर्ण अवसर पर कोई उत्साह नहीं दिखाई दे रहा। चारों तरफ एक हताशा सी दिखाई दे रही है। कमरतोड मंहगाई, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद,वंशवाद,व्याभिचार आदि से त्रस्त आम आदमी अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहा है। वह इस अवसर पर वह खुशी मनाने का कोई कारण नहीं ढूंढ पा रहा है। परंतु आज देश को कुछ विषयों पर मंथन अवश्य करना होगा।

इस अवसर पर १९४७ में अपने रक्त से कांग्रेस को सींचने वाले महात्मा गांधी का वह वक्तव्य याद आता है जिसमें उन्होने कहा था कि अब कांग्रेस समाप्त कर देनी चाहिये। उन्होंने कान्ग्रेस के अन्दर पनप रही विकृतियों को पहचान लिया था। उन्हें ध्यान में आ गया था कि कांग्रेस अब स्वतंत्रता संग्राम में किये गये योगदान को भुना सकती है।कांग्रेस के नेताओं में सत्ता प्राप्त करने की भूख वे देख ही चुके थे और यह भूख देश की क्या दुर्दशा कर सकती है इसका अनुमान वे भली-भांति कर पा रहे थे। इसलिये अब वे कांग्रेस को जीवित नहीं देखना चाहते थे। बाद के घटनाक्रमों ने यह सिद्ध कर दिया कि बापू की दृष्टी कितनी स्पष्ट और सही थी। जब कांग्रेस ने देश की सत्ता संभाली, उस समय उनके लिये खुला मैदान था। उनका कोई प्रतिस्पर्धी नहीं था। वे जो चाहे कर सकते थे। उसके नेताओं को देश के प्रबुद्ध नेताओं से चर्चा कर देश के निर्माण की दिशा स्पष्ट करनी थी। स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के कारण देश का संकल्प जागृत था। सही दिशा मिलने पर देश का विकास तीव्र गति से हो सकता था और हम भी चीन या जापान के समकक्ष खडे हो सकते थे। चीन को “खरबूजे की तरह” यूरोपीय देश आपस में बांट लिया करते थे। उसका अपना कोई वजूद नहीं था। वह १९४९ में ही अपने स्वतंत्र अस्तित्व में आया था। जापान भी लगभग उसी समय बरबादी के कगार से बाहर आया था। परंतु सही दिशा और संकल्प के कारण वे आज विश्व के अग्रणी देशों की पंक्ती में खडे हैं। परंतु भारत की स्थिती उनकी तुलना में बहुत ही दयनीय है। सम्पूर्ण विश्व की किसी भी बिमारी का नाम लीजिये, उसका वीभत्सतम रूप आज भारत में दिखाई देता है। भ्रष्टाचार, क्षेत्रवाद, जातिवाद, आतंकवाद, वंशवाद, भूखमरी, बेरोजगारी, तुष्टीकरण की आत्मघाती राजनीति, न्यायपालिका का अवमूल्यन, अराजकता, अशिक्षा, चारित्रिक पतन, आदि सभी बिमारियां आज भारत में अपने चरम पर हैं और स्वार्थों में डूबे सभी राजनीतिक दल इन बिमारियों के उन्मूलन की जगह इनके पोषण में लगे हुए दिखाई देते हैं। सभी राजनीतिक दल इन सबके लिये एक दूसरे को कोस रहे हैं । सूक्ष्मता से विश्लेषण करने पर ध्यान में आता है कि वास्तव में कांग्रेस ही इन सब व्याधियों की जननी है। १९४७ में कांग्रेस की कोई मजबूरी नहीं थी। प्रतिस्पर्धी के अभाव तथा गठबंधन की मजबूरियों के ना होने के कारण वे देश के सामने उद्दात्त आदर्श रख कर मजबूत आधारशिला निर्माण कर कर सकते थे। परंतु पदलिप्सा, व्यक्तिगत अहम,व्यक्तिगत सनकों के चलते उस समय के नेताओं नें देश को गलत दिशा दे दी जिसका दुष्परिणाम आज तक देश भुगत रहा है।

अपनी उदार छवि निर्माण करने के लिये नेहरू जी द्वारा अपने प्रभाव का दुरुपयोग कर संविधान में मुस्लिम तुष्टीकरण संबंधी प्रावधान जुड्वाना, ईसाइयत के प्रचार की सुविधा के लिये धर्मांतरण पर प्रतिबंध न होने देना, शेख अब्दुल्ला के हाथों खेल कर धारा ३७० का प्रावधान लाना, बापू के वायदे के बावजूद गौहत्या पर प्रतिबंध न लगने देना, समाजवाद की अव्यवहारिक परंतु “फंतासी” अवधारणाओं को देश पर थोप कर इंस्पेक्टर राज की भ्रष्टाचारी व्यवस्था को लागू करना, अब्दुल कलाम आजाद जैसे सर्वप्रिय नेता के चुनाव के लिये मुस्लिम बहुल क्षेत्र चुनना,जाति पर आधारित चुनाव व्यवस्था का निर्माण करना, अपने प्रतिनिधी के तौर पर इन्दिरा गांधी का ही विकास करना आदि कई कार्यों से नेहरू जी ने भारत के विकास की नहीं, भारत के विनाश की नींव रख दी थी। इन भयंकर भूलों की यह सूची पूर्ण नहीं है। यह केवल बानगी है उन गलतियों की जिनका बीजारोपण नेहरू जी ने किया था , जिनको बाद के कांग्रेसी नेताओं नें सिंचित किया और जो आज विषबेल बन कर सम्पूर्ण भारत को अपनी मजबूत पकड में जकड चुकी है। जीप घोटाला, खेसरी दाल कांड आदि घोटालों पर नेहरू जी के नरम रुख से भावी राजनीति में घोटालों की भूमिका स्पष्ट हो गई थी। नेहरू जी के व्यक्तिगत जीवन से राजनीतिज्ञों के जीवन में नैतिक मूल्यों की निरर्थकता स्थापित हो रही थी जिस परम्परा को उनके वारिसों ने बखूबी निभाया।

संवैधानिक संस्थाओं के अवमूल्यन में बाद के कांग्रेसी नेताओं ने कोई कसर नहीं छोडी। इन्दिरा जी ने आपातकाल लगाकर “प्रतिबद्ध न्यायपालिका” का निर्माण किया और सेवानिवृत्ति के बाद सरकारी पदों पर स्थापित करने का लालच देकर चुनाव आयोग जैसी महत्वपूर्ण संस्था को अपना चाकर बनाने की कोशिश की। राज्यपाल को केंद्र सरकार का एजेंट बनाकर रख दिया गया जो अपने स्वामियों की इच्छापूर्ति के लिये किसी भी सीमा तक गिर सकते हैं। बडे-बडे व्यवसायिक घरानों की सुविधा के अनुसार अब मंत्रियों की नियुक्ति होने लगी है। पत्रकारिता जगत के कई दिग्गजों को भी केवल चारण भाट की स्थिती तक पहुंचा दिया गया है। वोट बैंक अब इतना महत्वपूर्ण हो गया है कि आतंकवादी अब खुल कर खेल रहे हैं और अपना चेहरा ढंकने के लिये निरपराध संतों और नेताओं को फंसाया जा रहा है। आम आदमी महंगाई के बोझ से दबा जा रहा है परंतु कांग्रेसी नेता इस का भी लाभ उठा कर अपनी जेबें भरने में लगे हैं।

आंतरिक व बाह्य सुरक्षा तथा विदेशी मामलों में कांग्रेस ने देश को पंगू बनाकर रख दिया है। पहले तुष्टीकरण के चलते कांग्रेसी नेता आतंकियों की अनदेखी करते थे परंतु बाद में वे स्वयं आतंकवाद को बढावा देने लगे। इन्दिरा जी ने पंजाब के आतंकवाद को जन्म दिया , यह सर्वविदित तथ्य है। परन्तु लिट्टे को प्रशिक्षण दिलवाने में इन्दिरा जी और राजीव गांधी की क्या भूमिका थी, इसकी भी जांच होनी चाहिये। दुर्भाग्य से इन दोनों के द्वारा शुरु किये गये आतंकवाद ने बाद में इन्हीं की जान ले ली। इसके बावजूद आज के कांग्रेसियों नें कोई सबक नहीं सीखा और अब वे जेहादी आतंकवाद को बढावा दे रहे हैं। उनका क्या होगा, यह भविष्य के गर्त में छुपा है परंतु वे देश को विनाश की अंधेरी गलियों में धकेल रहे हैं। ये लोग स्वार्थों में इस कदर डूब चुके हैं कि उन्हें देश की सीमाओं की सुरक्षा की भी चिंता नहीं है। चीन की तो बात ही क्या, पाकिस्तान और बंगलादेश जैसे देश भी हमारी सीमाओं पर आंख गडाये बैठे हैं। विदेशी मामलों में हम इस कदर पिछड रहे हैं कि हमारा एक भी पडोसी देश हमारा मित्र नहीं है।

ऐसे और भी कई मुद्दे हैं जिनका विश्लेषण करने पर ध्यान में आता है कि आज देश में जितनी भी समस्याएं हैं उनके मूल में केवल कांग्रेस की गलत नीतियां ही हैं। १२५ वर्ष पूर्ण होने पर कान्ग्रेस को आत्मविश्लेषण करना चाहिये । इन्हें अब देश की जडों के साथ जुड कर अपनी भूलों का परिमार्जन करना चाहिये वरना देश की जनता उन्हें माफ नहीं कर पायेगी।

 

125 Years of the Congress: India reeling under the Congress’ burden

It has been a 125 years since Congress, the biggest political party of India was formed. The Congress is ruling the country at the moment, but one can hardly witness any enthusiasm in the oldest political party of the country when this should have been an important occasion for them. There is a sense of helplessness that has gripped the country. Back-breaking inflation, corruption, terrorism, regionalism, casteism, dynasty-rule etc. have left the common man feeling cheated. It cannot find any reason to celebrate on this occasion. But, the nation needs to introspect on a few issues today.

Today, one is compelled to remember Mahatma Gandhi’s call to dismantle the Congress, the same Mahatma who had so tirelessly offered his blood and sweat to build the Congress. Even then, he had recognized the evil that had crept into the Congress. He knew that the Congress would now exploit the contribution it had made in India’s freedom struggle. He had seen the hunger for power in the Congressmen and he could very well imagine how this hunger could lead to the nations’ ruin. This is why he wanted the end of the Congress as a political party. Later events proved how true Bapu was in his assessment. When the Congress took over the mantle for the first time, it had no opposition; the nation was like a virgin, open field for it. They could have done whatever they wanted to. Their leaders needed to talk to the intellectuals and statesmen of the country and decide on the course of action and direction that was required for the nation’s progress. The nation was inspired because of the recently-concluded freedom struggle. The nation could have progressed at a rapid pace if it took the right decisions and today we would have been standing shoulder to shoulder with Japan and China. China used to be dissected like into spheres of influence by the western imperialists, very much like a musk melon, it never had much of a standing of its own. It came into its independent state in 1949. Japan, too was coming out of its war-ravaged state at about the same time. Today, they are the top countries of the world, why, only because of the correct decisions and resolve. The state of affairs of our country vis-à-vis these two countries is dismal. Think of any disease of the world and you have its worst manifestation in India. Corruption, regionalism, casteism, dynasty-rule, starvation, unemployment, suicidal policy of appeasement, degradation of the judiciary and other constitutional bodies, arson, illiteracy, downfall in character, name them and you have it here in the country, and political parties instead of excoriating them from the system, are in fact, trying to give it more impetus. All the political parties are accusing each other for these heinous diseases that have sapped the blood of the body politic of the country. However, if we do a micro analysis of the problem, we find that the Congress is the main culprit. In 1947, the Congress had no competition, it did not have to face the rigors of coalition politics, and therefore, it could have laid a solid foundation for the nation by working on the best ideals and principles. But, power-hungry, egoistic and prejudiced politicians of the Congress pushed India into the wrong direction, the after-effects of which are being felt by us all today.

Nehru, in trying to project himself as the liberal, used his influence to get the policy of muslim appeasement inserted into the constitution, he did not ban religious conversions so that Christianity could have a free hand in India, played into the hands of sheikh Abdullah by accepting the provisions of article 370, did not ban cow-slaughter, despite Bapu’s commitment to the cause, imposed the impractical but ‘fantasy’ provisions of socialism which led to the corruption manifested by the ‘license raj’, chose a muslim-dominated constituency for a popular leader like Abul Kalam Azad , instituted an electoral system that was based on caste-based vote banks, endorsed Indira Gandhi as his successor, all these laid the foundation for India’s nemesis. This list, is by no means, exhaustive, it is only a list that shows how Nehru sowed the seeds of India’s destruction, the seeds that were nurtured by the later leaders of the Congress, now that same seed has engulfed India from all sides like a poisonous creeper pulling India down into the vortex of corruption. The soft attitude of Nehru on the ‘jeep scandal’ and ‘khesri daal scandal’ paved the way for more corruption in the future. Nehru’s own culpability in his personal life showed the meaninglessness of ethical values in the life of a politician, this tradition was subsequently followed by his successors with aplomb.

The later leaders of the Congress did not leave any stone unturned in trying to degrade the constitutional institutions. Indira Gandhi, by imposing the emergency, laid the foundation for a pliant and committed judiciary. She tried to make the independent election commission into a lackey of hers by promising jobs to its officials after retirement. The governor’s office was transformed into that of an agent of the centre, which could go to any extent to please its master in Delhi. Ministers are now appointed to appease large industrial houses; the scribes too have been reduced to being mere boot-lickers of politicians. Vote-bank politics has become so important that now terrorists are now operating freely, and the blame is being put on Hindu saints and seers. While the common man is reeling under back-breaking inflation, the leaders of the Congress are busy raking in the moolah.

In terms of internal and external security and foreign affairs, the Congress has left India completely handicapped. Previously, the Congress leaders in the name of muslim appeasement, would only see the other way when it came to terrorism, but now they have gone to the extent of supporting them. It is a well-known fact that Indira Gandhi was the progenitor of terrorism in Punjab. Her role along with her son, Rajiv Gandhi, into the formation of LTTE, should also be investigated. Unfortunately, the terrorist organizations nurtured by these two led to their own nemesis. Despite this, the Congress leaders have not learnt their lesson and are now rooting for the jehadis. Only the future will unravel what will happen because of this, but one thing is certain that this is going to lead the country to destruction. They are so enmeshed in their own selfish interests that they seem to have even forgotten the problem India faces on its borders. Forget China, even countries like Pakistan and Bangladesh have set their eyes on India’s border. We are so hopelessly out of sync when it comes to foreign affairs that we don’t seem to have any friends in our neighborhood.

There are so many issues, which if looked into, will go a long way to prove that their genesis lies in the wrong policies adopted by the Congress party. The Congress must introspect, now that it is 125 years old. It should now align itself with the grass-roots so that it can right the wrongs that it has committed or else the citizens will never forgive it.

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