६३वें गणतंत्र दिवस पर गण और तंत्र दोनों ही अनुपस्थित

आज भारत अपना ६३वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। इस दिन भारत का संविधान लागू किया गया था । संविधान निर्माताओं नें भारत को गणतंत्र घोषित किया था, अर्थात गण(समाज) के लिये बनाया गया तंत्र। गण की पहचान के लिये संविधान की भूमिका में स्पष्ट रूप से लिखा गया था,” हम जो भारत के नागरिक हैं….” भारत के लोगों की कोई और पहचान संविधान निर्माता नहीं चाहते थे। उनके अनुसार भारत तभी सशक्त बन सकेगा जब भारत के लोगों की केवल एक पहचान होगी कि वे केवल भारतीय हैं। पंथ, भाषा, प्रांत, जाति,वर्ण आदि व्यवथाएं उनकी भारतीयता के सामने गौण होंगी। परन्तु दुर्भाग्य से उसी संविधान में अपनी पांथिक या जातिगत पहचान को बनाये रखने के लिये कुछ व्यवस्थाएं भी रखी गयीं। हालांकि उनको अस्थायी रूप दिया गया, परन्तु राजनीतिक स्वार्थों के चलते अब वे अस्थायी व्यवथाएं इतनी सशक्त हो गयीं हैं कि चाहे संविधान समाप्त हो जाये उन विभाजनकारी व्यवथाओं को कोई हाथ भी नहीं लगा सकता। उसके बाद तो सभी राजनीतिक दलों में होड लग गई है कि अपने वोट बैंकों को मजबूत करने के लिये वे कितनी अधिक विभाजनकारी व्यवस्थाओं का निर्माण कर सकते हैं। पहले कहा जाता था कि कोई भी कानून संविधान की मूल भावनाओं के विपरीत नहीं होगा। इस आधार पर कई कानून बदले भी गये। अब यदि कोई कानून संविधान विरोधी लगता है तो वह कानून नहीं बदलेगा, उसके लिये संविधान को बदला जा सकता है(शाहबानो प्रकरण, मुस्लिम आरक्षण मामला या रंगनाथ मिश्र आयोग की अनुशंसाओं को लागू करने का मामला)। अब भारत के लोगों को इस कदर बांट दिया गया है कि अब उनको भारतीय के रूप में अपनी पहचान बताना घाटे का सौदा लगने लगा है। किसी पंथ, प्रांत, भाषा या वर्ण के साथ जुडकर उसे लाभ मिलने लगा है और धीरे-धीरे वही अब उसकी पहचान बन गई है। इससे हो सकता है कि कुछ लोगों को लाभ मिलने लगा हो परन्तु घाटे में तो भारत ही रहा क्योंकि उसका “गण” तो लुप्त हो गया जिसको पाने के लिये संविधान निर्माताओं नें वर्षों तक मेहनत करके इस संविधान को बनाया। घाटे में तो वे स्वतंत्रता सेनानी रहे जिन्होंने इस गण को पाने के लिये अपना बलिदान दिया या वे महात्मा गांधी रहे जिनके नेतृत्व में २६ जनवरी १९३० को स्वतंत्रता दिवस मनाने का संकल्प लेकर देशवासियों ने बलिदान की परम्परा को आगे बढाया था। आज यह ” गण” इतना निरर्थक हो गया है कि इसकी चिंता करने वालों को भी दंडित किया जा रहा है। इस पहचान की अनुपस्थिती के कारण ही १९४७ में भारत का विभाजन हुआ था। अब कुछ स्वार्थी तत्व इस पहचान को भुलाकर भारत के कई और विभाजन कराने की तैय्यारी में जुटे हैं।

गणतंत्र का मतलब है कि गण की इच्छा के अनुसार तंत्र निर्णय ले। स्वतंत्रता के बाद गण की इच्छा जानने की कभी कोशिश नहीं की गई, उस पर पालन करने का विचार तो दूर की कौडी बन गया है। इसलिये” गण ” ने अपने आपको अप्रसांगिक मानकर अपनी राय बताना बंद कर दिया। यह माना जाने लगा कि एक बार जनता ने सरकार को चुन लिया तो उस सरकार को मनमानी करने का अधिकार मिल गया और उस पर तुर्रा यह कि वह ये मनमानियां जनता की इच्छा के नाम पर करेगी। वोट देकर पांच साल तक चुनी गई सरकार की मनमानी चुपचाप सहना जनता की मजबूरी बन गया था। कुछ ऐसे भी अवसर आये जब भारत के “गण ” ने अपनी राय सरकारी तंत्र को बताई। दुर्भाग्य से न केवल इस राय की अपराधिक उपेक्षा की गई अपितु इस राय के विपरीत निर्णय लिये गये। पुराने इतिहास को अगर भुला भी दें तो पिछले १ वर्ष में” गण” ने कई बार अपनी राय बताई। उन विषयों पर सरकार ने क्या निर्णय लिये ६३ वें गणतंत्र दिवस पर यह जानना बहुत महत्वपूर्ण है। रामजन्मभूमि मामले में मा. न्यायालय के निर्णय के बाद अधिकांश समाचार पत्रों और टी.वी. चैनलों द्वारा इस विषय पर जनता की राय जानी गयी। अगर सब रायों की औसत निकाली जाये तो ध्यान में आया था कि देश की ७५% जनता चाहती है कि रामजन्मभूमि पर मन्दिर ही निर्माण होना चाहिये। परन्तु सरकार “गण” की राय की उपेक्षा कर मस्जिद निर्माण करने वालों के साथ खडी हुई दिखाई दी। जनता की राय जानने वाले हर माध्यम का यह कहना है कि सशक्त लोकपाल व अन्य माध्यमों से भ्रष्टाचार पर रोक लगनी चाहिये और भ्रष्ट नेताओं पर सख्त कार्यवाही होनी चाहिये जबकि इसके ठीक विपरीत सरकार भ्रष्ट नेताओं के साथ खडी होकर भ्रष्टाचार को संरक्षण देती हुई दिखाई दे रही है। इसी प्रकार मुस्लिम आरक्षण, रंगनाथ कमीशन, अफजल गुरू मामलों में सरकार जनता की राय के ठीक विपरीत काम करती हुई दिखाई दे रही है। ऐसा लगता है कि यह तंत्र गण की इच्छा के अनुसार नहीं उसकी इच्छा का दमन करने के लिये काम करता है।

भारतीय संविधान में ” गण ” का स्वरूप और उसके महत्व को बनाये रखने के लिये कुछ व्यवस्थाओं का निर्माण किया गया था। लोकसभा, राज्यसभा, न्यायपालिका, चुनाव आयोग, केन्द्रीय सतर्कता आयोग के अतिरिक्त ऐसी दर्जन भर व्यवस्थाओं को बनाया गया जिससे भारत के गण का स्वरूप और इसके अधिकारों की रक्षा की जा सके। दुर्भाग्य से देश के स्वार्थी राजनीतिकों नें अपने स्वार्थों के चलते इस व्यवथाओं को या तो ध्वस्त कर दिया या इनका इस कदर अवमूल्यन कर दिया कि वे निष्प्रभावी और निरर्थक बन गये। संसद के दोनों सदन अब कोई सार्थक भूमिका निभाने की स्थिती में नहीं रहे हैं। नेहरू के समय से ही विपक्ष को अपने बहुमत से कुचलने की धमकी दी जाती थी। अब तो कोई भी निर्णय “गण” का हित देखकर नहीं, शासक दल के हितों को देखकर किया जाता है। विपक्ष की भूमिका केवल शोरमचाकर या संसद का बहिष्कार कर अपने कर्तव्य की इतिश्री करने तक सीमित रह गई है। सांसदों की खुले आम मंडी लगते देखकर गण कितना भी शर्मिंदा हो रहा है, इसकी चिंता किसी को नहीं है। गण तो अपने चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा अपनी ही संपत्ति को बडी ही बेशर्मी के साथ खुले आम लूटते हुए देखने के लिये मजबूर है। न्यायपालिका से उसे कई बार उम्मिदों की किरणे आती हुई दिखाई देती हैं। परन्तु वह भी इन स्वार्थी लोगों के प्रभाव और षडयंत्रों से प्रभावित होने के लिये मजबूर है। लम्बी न्यायिक प्रक्रिया के कारण “गण” न्याय की उम्मीद खो बैठता है । जब कभी न्यायापालिका गण के साथ मजबूती से खडी दिखाई देती है , कार्यपालिका या विधायिका उसे अपनी औकात में रहने के लिये धमका देती है। न्यायपालिका को इतना पंगू बना दिया है कि अब ३ लाख से अधिक मामले विभिन्न अदालतों में लम्बित पडे हैं। अब तो न्यायपालिका भी भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हुई है। चुनाव आयोग को उन सीमाओं में काम करना पडता है जो सरकार निर्धारित करती है। अब तो उन पर लगाम लगाने के लिये बहुसदस्यीय व्यव्स्था बनाकर उनकी स्वतंत्रता कम कर दी गई । केन्द्रीय सतर्कता आयोग के साथ किया गया खिलवाड अभी ताजा ही है । एक भ्रष्ट परन्तु सरकार के लिये सुविधाजनक नौकरशाह को इस पद पर बैठाने के लिये सरकार नें किस प्रकार बेशर्म आचरण किया था, यह आसानी से भुलाया नहीं जा सकता। ऐसी सभी संवैधानिक संस्थाएं आज विनाश के कगार पर खडी हैं।इन से निराश होकर गण मीडिया की ओर आशाभरी निगाहों से देखता है क्योंकि उसे लोकतंत्र का चतुर्थ स्तम्भ कहते हैं।वह भी आशा पर खरा उतरता दिखाई नहीं देता। वह वो नहीं दिखाता जो गण के हित में है । वह वही दिखाता है जो उनके हित में है। राडिया प्रकरण व आई. एस.आई. के एजेंट डा. गुलाम नबी फाई से इनके सम्बंधों के उजागर होने के बाद कई कथित बडे पत्रकारों की कलई खुल लेकर समाचार देने के मामले से इनकी विश्वसनीयता पर गहरी चोट पहुंची है।गण के विश्वास पर यह चोट बहुत गहरी है।

आज आवश्यक्ता है कि इस गणतंत्र दिवस पर इस देश का हर प्रबुद्ध व्यक्ति इस बात पर विचार करे कि भारत में सही गणतंत्र की स्थापना कैसे की जा सकती है। यह देश और समाज ही नहीं , राजनेताओं तथा नौकरशाहों के लिये भी जरूरी है। समाज में व्याप्त असंतोष के क्या परिणाम हो सकते हैं, यह आज सम्पूर्ण विश्व अनुभव कर रहा है। भारत का समाज भी उस मार्ग पर चल पडेगा तो यह उनके हित में भी नहीं होगा।

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