क्या अलगाववादी भारत सरकार के समर्थन से काम कर रहे हॅं?

पहले तो लगता था कि भारत में अलगाववादी आन्दोलन केन्द्रीय सरकार की लापरवाही के कारण चलते हॅं परन्तु दिल्ली में आयोजित अलगाववादियों के सम्मेलन से अब यह स्पष्ट हो गया हॅ कि समस्त अलगाववादी आन्दोलन केन्द्रीय सरकार की शह पर ही चलते हॅं। भारत सरकार की नाक के ठीक नीचे, नई दिल्ली में २१ अक्तूबर,२०१० को देश के सभी अलगाववादी संगठनों का एक जमावडा हुआ जिसमें खुलकर भारत विरोधी भाषण हुए और भारत से अलग होने के आह्वान किये गये। भारत की न्यायपालिका की खुलकर धज्जियां उधेडी गई। भारत विरोधी नारे जोर शोर के साथ लगाये गये। परन्तु इन देशद्रोहियों को गिरफ्तार करने की बात तो दूर इनका विरोध करने वाले देशभक्तों को ही गिरफ्तार कर लिया गया। इस सम्मेलन में क्या होगा , यह सबको पता था। इसके बावजूद इनको अनुमति देने से स्पष्ट हॅ कि इनको सरकार की केवल अनुमति नहीं ,सरकार की सहमति भी प्राप्त थी। जो भाषण वे अपने प्रांतों में छुप कर देते थे, उनसे भी खतरनाक भाषण उन्होनें दिल्ली में दिये हॅं। इन अलगाववादियों ने खुलकर भारत की प्रभुसत्ता को चुनौती दी हॅ। परन्तु कानून को खुली चुनौती देने के बावजूद वे आराम के साथ अपनी “मान्दों” में वापस चले गये और देश की पुलिस उन पर कार्यवाही करने की जगह उनको सुरक्षा देती रही।

अलगाववादियों की पुरानी समर्थक अरुन्धति राय ने सब सीमाएं पार कर लीं। उन्होनें कहा,” कश्मीर को भूखे-नंगे हिन्दुस्तान से आजादी लेनी चाहिये।…. भारत एक थोथी शक्ति हॅ और मॅं अपने आप को इससे अलग करती हूं।” इस “भूखे-नंगे” भारत में उनके ऍशो आराम कॅसे मिलते हॅं, इसकी जांच होनी चाहिये। हर अलगाववादी को उनका समर्थन कॅसे मिलता हॅ और उनके अनेक देश विरोधी वक्तव्यों के बावजूद उन पर कोई कार्यवाही नहीं होती अपितु मीडिया उनको प्रसिद्धी देता हॅ, इसकी भी जांच होनी चाहिये। देश की सॅक्युलरिष्ट सरकार देश को भूखा रख कर कश्मीर पर पॅसा लुटा रही हॅ, इसके लिये उन्हें देश का अहसानमंद होना चाहिये। अगर ये पॅसा जनता को न मिलकर वहां के भ्रष्ट नेता खा जाते हॅं तो इसके लिये भारत को दोष कॅसे दिया जा सकता हॅ? गुलाम कश्मीर , जो उनकी आजादी का माडल हॅ, को देखकर उन्हें कथित आजादी के बाद होने वाले हाल का अन्दाजा लगा लेना चाहिये। आजादी उन्हें मिल नहीं सकती क्योंकि जम्मू-काश्मीर का निर्णय २६ अक्तूबर,१९४७ को ही हो चुका था जब महाराजा हरि सिंह जी ने विलय पत्र पर बिना किसी शर्त के हस्ताक्ष्रर किये थे। वह विलय पूर्ण व अन्तिम था । अब उसे बदला नहीं जा सकता। ये अलगाववादी पाकिस्तान के हाथों में खेलकर कश्मीर की बदहाली को बढा ही सकते हॅं, उसे खुशहाली की ओर नहीं ले जा सकते।

पूरा विश्व जानता हॅ कि कश्मीर की समस्या जवाहर लाल नेहरू व शेख अब्दुल्ला की देन हॅ। अब दुर्भाग्य से उनकी तीसरी पीढी दोनों जगह राज कर रही हॅ। वे दोनों अब वे ही भाषा बोल रहे हॅं जो इनके पूर्वज बोल रहे थे। १९४७ में शेख और नेहरू के वक्तव्य आज उमर और सोनिया के वक्तव्यों से अलग नहीं हॅं। ये राजनीतिक फायदा ले सकते हॅं, परन्तु भुगतना देश को पड रहा हॅ। परन्तु अब इसके लिये देश उनको माफ नहीं करेगा। देश में, खास तौर पर जम्मू में, हुए आन्दोलनों से उनको देश का इरादा और तेवर दोनों समझ में आ रहा होंगे। देर होने से पहले इनको सम्हलना होगा और इन अलगाववादियों पर लगाम कसनी होगी अन्यथा देश उन्हें माफ नहीं करेगा।

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