अन्ना का चमत्कार

अन्ना के आन्दोलन के सामने सम्पूर्ण विश्व हतप्रभ है। आबाल -वृद्ध, शिक्षित- अशिक्षित, शहरी- ग्रामीण, राजनीतिक-गैरराजनीतिक, सभी इस आन्दोलन से जुडते जा रहे हैं। भारत ही नहीं , विदेशों में भी इस आन्दोलन को जबर्दस्त समर्थन मिल रहा है। लोग जुडते जा रहे हैं ,सरकार झुकती जा रही है। जो सरकार अभी तक अन्ना को माफिया, ब्लैक मेलर, बेईमान, संघ की कठपुतली, अमेरिका का दलाल ,तानाशाह और न जाने किन-किन उपाधियों से विभूषित कर उन्हें बदनाम कर रही थी और उनको जेल में डाल कर दमन करने का सोच रही थी, आज उनके सामने नतमस्तक हो रही है। भ्रष्टाचार और भ्रष्ट नेताओं के प्रति जनता का आक्रोष बढ्ता जा रहा है। उनके घरों पर जनता प्रदर्शन कर रही है। चारों तरफ जनसैलाब उमड रहा है। वे अब सभी राजनीतिक दलों के सांसदों की जवाबदेही तय करना चाहते हैं। इसलिये अब सभी राजनीति दल घबरा रहे हैं। अब ऐसा लगता है कि जनता निर्णय का अधिकार सांसदों के हाथ से लेकर अपने ही हाथ में रखना चाहती है।

इस आन्दोलन को बदनाम करने के लिये पहले कहा गया कि यह संघ के इशारे पर चल रहा है। कारण बताया गया कि उन्होंने अपने मंच पर भारत माता की तस्वीर लगा रखी है। अन्ना नें इस पर बार-बार सफाई दी। आरोप लगाने वालों नें इस आधार पर उनमें विभाजन कराने की कोशिश की। अन्ना के एक सहयोगी द्वारा संघ के बारे में हल्के शब्दों का प्रयोग भी किया गया। परन्तु संघ नें अपनी धीर- गम्भीर शैली के अनुरूप उनको जवाब देना भी उपयुक्त नहीं समझा। उसके बाद किसी ने कहा कि यह अमेरिका द्वारा चलाया जा रहा है। वही पैसा भी दे रहा है और उनका संगठन भी कर रहा है। इस बीच एक सरकारी अनुकम्पा पाने वाले सज्जन ने कहा कि अन्ना के एक सहयोगी नक्सलवादियों के समर्थक हैं, इसका संचालन वामपंथी कर रहे हैं। एक व्यक्ति ने तो यहां तक कह दिया कि अगर दिल्ली में उपस्थित २००० लोगों पर वामपंथी गोलियां चला देंगे तो वे सरकार को बंधक बना सकते हैं। अब कुछ लोग इसे सरकार की मिली भगत से चलने वाला अन्दोलन भी कहने का दुस्साहस कर रहे हैं । उनका कहना है कि बाद में कुछ मुद्दों पर सहमती दिखा कर असली मुद्दों पर से जनता का ध्यान हमेशा के लिये हटा दिया जायेगा।

ये सब लोग वास्तविकता से मूंह मोड रहे हैं। भारत के हर शहर और कस्बे में प्रदर्शन हो रहे हैं। विदेशों में रहने वाले बच्चे भी भारत में आकर अनशन में भाग ले रहे हैं। पढे लिखे युवक अवकाश लेकर आन्दोलन में भाग ले रहे हैं। मुम्बई के डिब्बे वाले भी एक दिन की हडताल कर चुके हैं। रामलीला मैदान में चने- मुंगफली वाले मुफ्त या कम दाम पर अपना सामान दे रहे हैं। कई स्वयंसेवी संगठन भोजन के लंगर चला रहे है। अपना किराया खर्च करके दूर दूर से लोग दिल्ली आ रहे हैं। बारिश में भीगने पर भी लोग नहीं हट रहे हैं। अब लोग बीमार पडने लगे हैं, परन्तु वे रामलीला मैदान नहीं छोड रहे हैं। कई गांवों के किसान भी शामिल हो रहे हैं। अदालतों के बहिष्कार हो रहे हैं। विद्यार्थी एक दिन के लिये अपनी कक्षाओं का बहिष्कार कर चुके हैं। क्या ये सब भाडे पर लाये गये लोग हो सकते हैं? इतना समर्पण केवल संकल्प के आधार पर ही हो सकता है। वह संकल्प है भारत से भ्रष्टाचार मिटाने का और लिये उसके कुछ भी कर गुजरने का जनून उन्हें मैदान में जुटाये हुए है। २१ अगस्त को मुम्बई और दिल्ली में जुटे लाखों लोग किराये के नहीं थे और न ही किसी के बहकाए हुए थे। यह बात इस देश के राजनेता जितनी जल्दी समझ लेंगे, इसका समाधान भी उतना ही जल्दी होगा।

इस आन्दोलन कुछ बातें अद्वितीय हुई हैं। जेल में बंद कैदी को छोडा जा रहा हो और वह कहे कि मैं नहीं जाऊंगा जब तक सरकार मेरी बात नहीं मानेगी। जेल के बाहर हजारों लोग बैठों हों कि हमें भी जेल में भेजो । अन्ना के बाहर आने तक हम नहीं जायेंगे। सरकार इन सबके सामने झुकने के लिये मजबूर होती है। दिल्ली के मुख्य सचिव कहते हैं कि ऐसा आन्दोलन पहली बार हुआ है जिसमें लाखों लोगों ने भाग लिया हो और एक भी पैसे का नुकसान नहीं हुआ हो। आन्दोलन स्थल पर खडे युवक स्वयं आन्दोलनस्थल की झाडू से सफाई कर रहे हों और कहते हों कि यह मेरी भारत माता है जिसकी सफाई रखना मेरी जिम्मेदारी है। पहले हम कूडा हटायेंगे, बाद में भ्रष्टाचार हटायेंगे। आम जनता के लोग खुद तिरंगा खरीद कर लहरा रहे हों और” मैं अन्ना हूं” की टोपी या टी शर्ट खरीद कर गर्व से पहन रहे हों।

अब अन्ना का आन्दोलन जन आन्दोलन बन चुका है। किसी कारण से अगर यह आन्दोलन बीच में ही रुक जाता है तो भी अब एक बात सबके सामने स्पष्ट हो चुकी है कि अब देश की जनता भ्रष्टाचार को सहन नहीं करेगी। उसके विरोध में जन मानस तैय्यार हो चुका है। आज नहीं तो कल अब भ्रष्टाचार को समाप्त करन ही पडेगा। अन्ना पर आरोप लगाने वालों को अपनी गिरेबान में झांकना चाहिये। शायद वे अपने किसी पाप को छिपाने के लिये ही अन्ना और उनके आन्दोलन को बदनाम कर रहे होंगे।

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