बाबा अमरनाथ यात्रा को बाधित करने के अलगाववादियों के षडयंत्र में राज्यपाल भी शामिल

अनादिकाल से चल रही बाबा अमरनाथ यात्रा हिन्दुओं के लिये एक बहुत महत्वपूर्ण यात्रा है। बर्फानी बाबा के दर्शन कर हर हिंदू अपने आप को धन्य समझता है। इसीलिये इस यात्रा में सब प्रकार की कठिनाइयों को वह बाबा का प्रसाद समझता है और हर आपदा को वह एक चुनौती के रूप में स्वीकार करता है। विधर्मियों के आक्रमण भी इस यात्रा को बाधित नहीं कर पाये। विदेशी आक्रमणकारी इस तथ्य को भली भांति समझते थे कि यह यात्रा केवल हिंदुओं की आस्था का केन्द्र नहीं है, यह राष्ट्रीय एकता का भी प्रतीक है। इसलिये यह यात्रा उनके निशाने पर भी रही है, परन्तु हिन्दू समाज के संकल्प के आगे वे हमेशा ही विफल होते रहे हैं।

१४वीं शताब्दी में मुस्लिम आक्रमणों की भीषणता के कारण कुछ समय के लिये यह यात्रा बाधित हुई थी । तब से लेकर अब तक यह यात्रा निरन्तर चलती आ रही है। वर्तमान युग में भी अलगाववादियों ने इस यात्रा को बाधित करने का हरसम्भव प्रयास किया है। वे जानते हैं कि जब तक यह यात्रा चलती रहेगी ,पूरे देश का हिन्दू यहां आता रहेगा और जब तक हिन्दू आता रहेगा काश्मीर घाटी को भारत से अलग नहीं किया जा सकता। इसीलिये पहले वह यात्रियों को धमकी देता था, उसके बाद उसने उन पर हमले करना शुरू कर दिया। कई बार यात्रियों को बलिदान भी देने पडे। परन्तु गोलियों की वर्षा या बमों के धमाके भी यात्रियों के उत्साह को कम नहीं कर पाये। यात्रा न केवल चलती रही अपितु उसमें भाग लेने वालों की संख्या भी निरन्तर बढती चली जा रही है। २००८ में न्यायालय के आदेश से यात्रा के लिये अस्थायी तौर पर कुछ जमीन देने का निर्णय किया गया। इस न्यायिक निर्णय को लागू होने से रोकने के लिये अलगाववादियों नें हिंसक आन्दोलन किया। जम्मू -काश्मीर की सरकार नें उनके सामने आत्मसमर्पण कर दिया और वहां के राज्यपाल आतंकियों के हाथ का खिलौना बन गये। सम्पूर्ण देश के हिन्दू समाज नें इसको राष्ट्रीय एकता के लिये चुनौती के रूप में लिया और एक अहिंसक आन्दोलन के माध्यम से सरकार को झुकने के लिये मजबूर कर दिया था। स्वतंत्र भारत का यह पहला आन्दोलन था जिसमें राष्ट्रीय आखण्डता की रक्षा के लिये हिन्दू समाज ने सरकार को झुकने के लिये विवश कर दिया।

हिन्दू समाज की क्षमता के विराट रूप के दर्शन के बावजूद अलगाववादियों और सैक्युलरिस्टों के षडयंत्र नहीं रुके। दुर्भाग्य से अब राज्यपाल उनके हस्तक के रूप में काम कर रहे हैं। गत वर्ष इस राज्यपाल नें यात्रा की अवधि ५ दिन कम की थी। समाज के विरोध के बाद इन्होनें आश्वासन दिया था कि २०११ से यह वापस दो महीने की कर दी जायेगी। परन्तु इस बार बिना किसी से विचार किये इन्होनें यात्रा की अवधी को १५ दिन कम करने का निर्णय ले लिया। श्राईन बोर्ड के पदेन अध्यक्ष के नाते उन्हें यात्रा की व्यवस्था करने का दायित्व दिया गया है, इसकी अवधी या स्वरूप तय करने का उनको कोई अधिकार नहीं है। यह काम साधू संतों का है। ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा से प्रारम्भ होने वाली यह यात्रा श्रावण माह की पूर्णिमा तक चलती है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित नीतिसेन समिती नें यह अनुशंसा दी थी कि सभी यात्रियों के व्यवस्थित व सुरक्षित दर्शन के लिये इस यात्रा को दो माह की अवधि तक चलाना चाहिये। लेकिन जब से यह यात्रा दो माह की हुई है, अलगाववादियों को परेशानी होने लगी है। वे इसके विरोध में आवाज उठाते रहे हैं। दुर्भाग्य से राज्यपाल उनके हाथ की कठपुतली बन गये और यात्रा की अवधी के साथ मनमाने खिलवाड करने लगे। स्मरण रहे ये वही राज्यपाल हैं जिन्होंनें२००८ में अमरनाथ जमीन मामले में भी आतंकियों के सामने समर्पण किया था और जमीन सरकार को वापस करने का असंवैधानिक निर्णय लेकर देशभक्तों को चुनौती दी थी। इस वर्ष इन्होंनें इस यात्रा को १५ दिन कम कर फिर देशभक्त जनता को ललकारा है। पहले यात्रा १५ जून से प्रारम्भ होनी थी परन्तु अब इन्होने २९ जून को प्रारम्भ करने की एकतरफा घोषणा कर दी। अब हिन्दू समाज ने इस चुनौती को स्वीकार कर लिया है और यात्रा को १५ जून से ही प्रारम्भ करने का निर्णय ले लिया है। बीमा क० से बात हो गई है। वे पहले की तरह ही यात्रियों का बीमा करेंगे। लंगर वाले भोजन आदि की व्यवस्था करेंगे और सेना नें भी यात्रा की सुरक्षा देनें में अपना सौभाग्य माना है। देश भर में १५ जून से प्रारम्भ होने वाली यात्रा के लिये पंजी करण प्रारम्भ हो गये हैं। परमपूज्य शंकराचार्य पूज्य वासूदेवानन्द जी महाराज नें यात्रा के उदघाटन के लिये आना स्वीकार कर लिया है। समाज का उत्साह इतना जबर्दस्त है कि पंजाब में आतन्कवाद को खत्म करने वाले श्री के० पी०एस० गिल ने पहले दिन की यात्रा को झंडी दिखाकर प्रस्थान कराने का तय किया है। जब समाज तैय्यार हो, पूज्य जगतगुरू का आशीर्वाद हो और गिल साहब जैसों का सहयोग तथा समर्थन हो तो अलगाववादी और उनके एजेंट कुछ नहीं कर सकते। यात्रा का सफल होना निश्चित है।

राज्यपाल के षडयंत्रों का खुलासा हो चुका है। कुख्यात ,कथित स्वामी, अग्निवेश पहले आतंकियों से मिले और उसके बाद राज्यपाल की उपस्थिति में आतंकियों की भाषा बोलते हुए अमरनाथ यात्रा के औचित्य पर प्रश्नचिंह लगाने का दुस्साहस करने लगे। उसने पूज्य बर्फानी बाबा के विषय में अपशब्दों का उपयोग किया। समाज इसका उत्तर देगा परन्तु एक बात निश्चित है कि यह सब उसने राज्यपाल के इशारे पर ही कहा है। क्या ऐसा हिन्दू विरोधी राज्यपाल यात्राओं की व्यवस्था करने वाले श्राइन बोर्ड के अध्यक्ष बने रहने का अधिकार रखता है? कभी वह पर्यावरण की बात करते हैं तो कभी सुरक्षा का बहाना बनाते हैं। क्या उन्हें कभी बकरीद पर पर्यावरण की चिन्ता हुई है जब लाखों बकरों को काटा जाता है? वे यह भूल जाते हैं कि जम्मू काश्मीर की अर्थव्यवस्था यात्रियों पर ही निर्भर है। क्या वे यात्रा को कम करके वहां की जनता के पेट पर लात मारना चाहते हैं? वे केवल यात्रा की अवधि कम करना चाहते हों ऐसी बात नहीं है, वे कम करते-करते यात्रा बंद करना चाहते हैं। ऐसा लगता है कि वे आतंकियों के अधूरे एजेंडे को पूरा करना चाहते हैं। समाज ऐसे हिन्दू विरोधी और आतंकियों के साथी राज्यपाल के षडयंत्रों को बर्दाश्त नहीं करेगा। उन्हें २००८ की तरह इस बार भी घुटने टेकने पडेंगे । राज्यपाल महोदय को समय रहते अपने निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिये। कहीं ऐसा न हो कि २००८ की पुनरावृत्ति हो जाये। यदि ऐसा होता है तो इसकी जिम्मेदारी राज्यपाल की होगी।

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