भ्रष्टाचार के शकुनियों का चक्रव्यूह

वामपंथियों की पूरानी नीति है,”थूको और भागो।” अगर कोई किसी के मूंह पर अचानक थूक दे तो वह पहले सकपकाता है और थोडा झिझक कर अपना मूंह साफ करता है। इसमें थोडा समय लगता है। इसके बावजूद उसको और देखने वालों को उसका मूंह गंदा होने का एहसास होता रहता है। अगर वह इस एहसास से बाहर आ भी जाता है तो वे दोबारा थूक देते हैं और वही प्रक्रिया पुनः शुरू हो जाती है। यदि वे इसमें सफल नहीं हो पाते तो उनको भागने में देर नहीं लगती। वे ऐसा दिखाते हैं मानो वे वहां थे ही नहीं। वाम पंथी हमेशा से ही अपने विरोधियों के विरुद्ध इस नीति का प्रयोग करते रहे हैं। मीडिया के एक वर्ग पर नियंत्रण होने के कारण वे इसमें कई बार सफल होते हुए दिखाई भी देते हैं। वामपंथियों के लम्बे समय तक सहयोगी रहे कांग्रेसी इस कला में दक्ष हो गये हैं। भ्रष्टाचार के विरुद्ध जब भी कोई लडता है, हर कांग्रेसी को लगता है कि यह लडाई उनके खिलाफ है। शायद उनको गलत भी नहीं लगता क्योंकि भारत में कांग्रेस ही “भ्रष्टाचार की गंगोत्री” है। इसलिये अगर कोई भष्टाचार के विरूद्ध आवाज उठाता है तो उसके निशाने पर कोई न कोई कांग्रेसी अवश्य आ जाता है। गुजरात का नवनिर्माण आन्दोलन, लोकनायक जयप्रकाश का समग्रक्रान्ति आन्दोलन, विश्वनाथ प्रताप सिंह का बोफोर्स तोप सम्बंधी आन्दोलन, बाबा रामदेव का काले धन के विरूद्ध आन्दोलन और अन्ना हजारे का जन लोकपाल बिल आन्दोलन इन सभी का निशाना कांग्रेस ही रही है। इसलिये इन्होंने हमेशा बौखलाकर “थूको और भागो” की नीति का ही अनुसरण किया है। इन्होंने हमेशा उपरोक्त हर आन्दोलन के नायक के विरुद्ध विषवमन किया है, आरोपों की झडी लगाई है परन्तु हमेशा मूंह की खाई है।

पुराने इतिहास को छोड भी दें तो वर्तमान सन्दर्भ ही इनकी रणनीति को स्पष्ट करने के लिये पर्याप्त है। बाबा रामदेव ने कुछ समय से काले धन के विरुद्ध जनजागरण अभियान प्रारम्भ किया हुआ है। बाबा को जबर्दस्त जनसमर्थन मिला जो स्वाभाविक ही था क्योंकि सारा देश भ्रष्टाचार से बहुत दुखी हो चुका था। बाबा की स्वच्छ छवि पर सबको विश्वास है और सबको उनमें आशा की किरण दिखाई दी। परन्तु कांग्रेसी एकदम बौखला उठे और बाबा पर आरोपों की झडी लगा दी। बाबा ने बौखलाये बिना उन सबका जमकर जवाब दिया। अपने ट्रस्ट के खाते तक मीडिया के सामने रख दिये। जनता के सामने कांग्रेस की विश्वस्नीयता खतरे में पड गई। आरोप लगाने वाले बयानों से पल्ला झाडने में उनको अपनी कुशलता समझ में आने लगी। इसी दौरान भ्रष्टाचार के विरुद्ध पुराने योद्धा , अन्ना हजारे, सामने आ गये। वे जन्तर-मन्तर पर अनशन पर बैठ गये। दो दिन में ही वह हो गया जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। पूरे देश का समर्थन अन्ना को मिल रहा था। राजनेताओं और कांग्रेस के विरुद्ध आक्रोश बढ रहा था। मध्यपूर्व देशों के जनआन्दोलनों से सरकार पहले ही भयभीत थी। उन्हें झुकना पडा। परन्तु वे अपनी शकुनी वाली चालें चलने लगे। अन्ना की टीम को झुकाने की भरसक कोशिश की गई परन्तु देश से भ्रष्टाचार मिटाने के लिये संकल्पबद्ध लोगों के सामने उनकी दाल नहीं गली। मनमारकर ही सही, सरकार को उनकी शर्तें माननी पडी। भारत में पहली बार किसी कानून को बनाने के लिये आमलोगों की सहभागिता को स्वीकार किया गया। सारे देश में हर्ष की लहर दौड गई।

परन्तु असली कांग्रेस का असली खेल तो आना बाकी था। अचानक काग्रेस के दो प्रवक्ताओं नें आरोपों का घिनौना खेल शुरू कर दिया। पहले तो उनके जनप्रतिनिधी होने पर सवाल खडे किये, उसके बाद इस आन्दोलन के खर्चे का हिसाब मांगना शुरू कर दिया। जब इन सबका ब्यौरा दे दिया गया तो सदस्यों के चरित्र हनन का अभियान शुरू कर दिया। ऐसा लगता था मानों वे कह रहे हों,” हम तो बेईमान हैं, ये कौन से कम हैं। इसलिये इनको हमारे विरुद्ध लडने का कोई अधिकार नहीं है।” यह सब बालीवुड की फिल्मों की तरह हो रहा था जिनमें आरोपों से घिरा खलनायक हीरो पर भी आरोप लगा कर उसको फंसाने की कोशिश करता है जिससे उसकी हिम्मत टूट जाये। पहले भूषण पिता पुत्र पर आरोपों की झडी लगवायी गयी मानों वे लोकपाल बनाये जा रहे हों जबकि वे सिर्फ ड्राफ्ट समिती के सदस्य हैं, जिनको उनकी कानूनी समझ के कारण ही इस समिती में लिया गया था। सब सीमाएं तब पार हो गई जब कर्नाटक के लोकायुक्त जस्टिस संतोष हेगडे पर भी निशाना साधा गया। उनकी छवि को मलिन करने के लिये बहुत ही बेहूदे ढंग से कीचड उछाली गई। कभी यह कहलवाया गया कि समिती में सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं है मानो यह समिती नहीं लोकसभा जैसी कोई संस्था बनी हो। क्या संसद की किसी समिती को बनाते समय सभी जाति-वर्गों का ध्यान रखा जाता है? भ्रष्टाचारियों को बचाने के लिये शकुनियों के द्वारा रचे गये इस चक्रव्यूह का एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि कांग्रेस की अध्यक्षा सोनिया गांधी और प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह जी भ्रष्टाचार को मिटाने का संकल्प दोहराने का नाटक किये जा रहे थे । ऐसा दिखाने का असफल प्रयास किया जा रहा है कि ये दोनों बहुत ईमानदार हैं और भ्रष्ट लोगों को ये बर्दाश्त नहीं करते जबकि सारी दुनिया यह जानती है कि ये उनके सबसे बडे संरक्षक के रूप में काम करते हैं।

इन दोनों के बेईमानों के साथ खडे होने के सैंकडों उदाहरण हैं। परन्तु इनके असली चरित्र को बताने के लिये कुछ उदाहरण ही पर्याप्त हैं। कामनवैल्थ खेलों की आयोजन समिती के अध्यक्ष पद से स्वर्गीय सुनील दत्त को हटाकर सुरेश कल्माडी को अध्यक्ष बनाने के लिये कौन जिम्मेदार है? इनके आयोजन में गडबडी के समाचार मिलने पर भी उसके विरुद्ध पहले कार्यवाही क्यों नहीं की गयी? अपने ही द्वारा बनाई गई शुंगलू समिती की रिपोर्ट कूडेदान में सिर्फ इसलिये डाल दी गई क्योंकि उसमें इनकी चहेती शीला दीक्षित भी फंसती हुई दिखाई दे रही थीं। मा० सर्वोच्च न्यायालय के बार बार दबाव देने पर इन्हें राजा के विरुद्ध कार्यवाही तो करनी पडी। परन्तु उसके बाद भी मनमोहन सिन्ह जी उसकी पीठ थपथपाते हुए दिखाई देते हैं और उनके ही एक मंत्री “शून्य हानि” की बहुत ही बेशर्मी के साथ चर्चा करके उनका बचाव करने का असफल प्रयास करते हैं। बोफोर्स के मामले में CBI से स० न्यायालय में यह कह कर इसकी फाइल बन्द करवाई गई कि इसकी जांच में २५० करोड रू० खर्च हो चुके हैं, जबकि बाद में यह जानकारी मिली कि जांच में केवल ५ करोड रू० खर्च हुए हैं। इस मामले में ,मुख्य आरोपी क्वात्रोची को बचाने के लिये यह सारी कसरत की गयी। क्वात्रोची के किसके साथ सम्बंध हैं? भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे और आदर्श घोटाले के बाद भी जिनके नये-नये घोटाले सामने आ रहे हैं , महाराष्ट्र के ऐसे पू० मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण के गांव में वर्तमान मु० मंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने स्पष्ट कहा है कि उनके साथ सरकार व पार्टी मजबूती के साथ खडी है। यह मजबूती हर भ्रष्टाचारी के साथ दिखाई देती है। जब तक मजबूरी नहीं बन जाती ये किसी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं करते। कार्यवाही करनी भी पडे तो ये उसका साथ नहीं छोडते। यही है इनका असली चरित्र। परन्तु अब इनको समझ आ जाना चाहिये कि अब वे भ्रष्टाचार के विरुद्ध लडाई को रोक नहीं सकते। अब पूरा देश खडा हो चुका है। किसी भी प्रकार की शातिर चाल अब इस मुहीम को नहीं रोक सकती। यह ठीक है कि अकेला जनलोकपाल इस कीचड को साफ नहीं कर सकता। परन्तु यह इस लडाई में मील का पत्थर अवश्य सिद्ध होगा।