अन्ना! पैसे या प्रसिद्धि के लिये देशद्रोहियों का साथ देना सबसे बडा भ्रष्टाचार है।

अन्ना टीम के प्रमुख सदस्य प्रशान्त भूषण की कुछ युवकों द्वारा उनके चैम्बर में घुसकर पिटाई करना दुर्भाग्यपूर्ण है। लोकतंत्र में विचारों के प्रकटीकरण का मौलिक अधिकार है और वैचारिक मतभेद के कारण हिंसा का उपयोग करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। परन्तु इस घटना नें कई प्रश्नों को जन्म दिया हैः

१.क्या विचार प्रकटीकरण का अधिकार असीमित है? भारतीय संविधान में ही इन सीमाओं का वर्णन किया गया है। देश व संविधान विरोधी वक्तव्य न देना तथा अलगाववादियों का समर्थन न देना इन सीमाओं में शामिल है। अन्ना टीम के कई सदस्य नक्सली आतंकियों का खुलकर समर्थन करने का देशविरोधी और संविधानविरोधी काम करते रहे हैं। अब वे कश्मीर के आतंकियों के साथ ख्डे होकर उनकी भाषा बोलने में भी संकोच नहीं करते हैं। प्रशान्त भूषण जैसे वकील पैसे के लिये इनके केस लडते रहते हैं। व्यवसायिक स्वतंत्रता की आड में कुछ लोग इस काम को उचित ठहरा सकते हैं। परन्तु क्या यह सोचने का विषय नहीं है कि ये देशद्रोही और अमरसिंह जैसे भ्रष्टाचारी इनके पास ही क्यों जाते हैं?

२.अन्ना टीम के कुछ सदस्य इन अलगाववादियों से सम्बंधित NGOs से सुविधाएं और पैसे लेकर उनके समर्थन में भाषण भी देते हैं और उनके अधूरे एजेंडे को पूरा करने का काम करते हैं। क्या ये दोनों काम किसी भ्रष्टाचार से कम हैं? यह भ्रष्टाचार रिश्वत लेने भी ज्यादा गम्भीर अपराध है। इस भ्रष्टाचार के उपर अन्ना मौन क्यों है?

३.प्रशान्त,मेघा, अग्निवेश जैसे अन्य कई लोग खुलकर अलगाववादियों के साथ खडे होते हैं और कई बार वे उनके कार्यक्रमों में जाकर उनके देशद्रोही नारों का उदघोष भी करते हैं। वे उनकी संविधान विरोधी मांगों का समर्थन भी करते हैं। क्या इनके विचारों को उनकी व्यक्तिगत राय कह कर छोडा जा सकता है? संजीव भट्ट जैसे अनुशासनहीन और कांग्रेस के हाथ में खेलने वाले पुलिस अधिकारी की गिरफ्तारी पर भी बोलने वाले अन्ना इन देश विरोधी बातों पर चुप कैसे रह सकते हैं? वे ऐसे लोगों को अपनी बगल में कैसे बिठा सकते हैं?

४.अन्ना के अनशन के दौरान देशद्रोही बयानों के लिये कुख्यात इमाम बुखारी ने कहा था कि भारत माता की जय और वंदे मातरम के नारे इस्लाम विरोधी हैं, इसलिये मुसलमानों को अन्ना के आन्दोलन में भाग नहीं लेना चाहिये। अगले ही दिन उनकी टीम के लोग बुखारी के दरवाजे पर पहुंचकर इन नारों के बारे में सफाई देने लगे। यह तुष्टीकरण का एक वीभत्स उदाहरण है। क्या इससे देशविरोधी मानसिकता को बढावा नहीं मिलेगा? अन्ना को इसके बारे में भी अपनी राय प्रकट करनी चाहिये।

५.प्रशान्त की पिटाई करने वालों युवकॉ नें कानून हाथ में लिया। उनको कानून सजा देगा। लेकिन कानून के जानकार प्रशान्त नें बाद में उस युवक की निर्मम पिटाई की ।क्या इसके बावजूद वे अहिंसा के पुजारी होने का दावा कर सकते हैं? क्या कानून को उनके ऊपर कार्यवाही नहीं करनी चाहिये?

इस ब्लाग के लेखक नें अन्ना की प्रशंसा में बहुत कुछ लिखा है। वे युगान्तरकारी परिवर्तन का काम कर रहे हैं। परन्तु उनकी टीम के कई सदस्य उनकी प्रतिष्ठा का लाभ लेकर अपने निहित स्वार्थों की पूर्ती करते हुए दिखाई दे रहे हैं। देशद्रोहिता के अपराध अक्षम्य होते हैं। इनकी टीम के कुछ सद्स्यों के इन कामों के सम्बंध में उनकी राय जानने के लिये देश उत्सुक है।

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