ये रश्दी को ही नहीं देश को भी धोखा दे रहे हैं।

सल्मान रश्दी को जयपुर के साहित्यिक सम्मेलन में भाग लेने से रोकने के लिये इस्लामिक कट्टरपंथियों का सहारा लेकर भारत सरकार और राजस्थान सरकार नें जो कलाबाजियां खाई हैं , उससे पूरा देश शर्मिंदा हुआ है। पिछले १० सालों में सलमान रश्दी ५-६ बार भारत आ चुके हैं। किसी ने इतना शोर नहीं मचाया जितना इस बार मचा है। कारण स्पष्ट दिखाई देता है कि इस बार उनका भारत में उनका आना संयोगवश उत्तर-प्रदेश में हो रहे चुनावों की पूर्व संध्या पर हो रहा है। उत्तर प्रदेश में जीतने के लिये मुस्लिम वोटों का महत्व सभी सैक्युलर पार्टियां स्थापित कर चुकी हैं। उनके वोटों को जीतने के लिये पहले मुस्लिम आरक्षण की देशविरोधी चाल चली गई। जब इससे बात नहीं बनी तो रश्दी के आने के मौके को भुनाने के लिये के दारुल- इस्लाम , देवबंद को आगे कर यह घिनौनी चाल चली गई। उनसे सलमान के खिलाफ फतवा जारी कराया गया। जिस प्रसंग को मुस्लिम समाज भुला चुका था, अब उसको याद दिला कर ये लोग मुस्लिम समाज को कट्टरता के खोल में मजबूती के साथ धकेलने का महापाप कर रहे हैं। इन्होंने न केवल मुस्लिम समाज की आतंकी छवि को पोषित किया है अपितु सम्पूर्ण विश्व में भारत को एक कमजोर देश के रूप में प्रस्तुत किया है जो एक साहित्यकार की रक्षा नहीं कर सकता और आतंकी जिसको जब चाहे अपने इशारे पर नचा सकते हैं।

जयपुर-सम्मेलन के आयोजकों को पहले आतंकी धमकी का डर दिखा कर रश्दी को जयपुर आने से रोकने के लिये कहा गया। रश्दी के मना करने पर जब इस बात पर शोर मचा तो पहले महाराष्ट्र पुलिस और उसके बाद राजस्थान पुलिस नें भी ऐसी किसी धमकी से मना कर दिया। अब जिस प्रकार राजस्थान की कांग्रेस सरकार अपनी छी्छालेदर से बचने के लिये नित नयी कहानियों को गढ रही है उससे न केवल वहां की सरकार की छवि बिगडी है अपितु उसका खमियाजा पूरे देश को भुगतना पड रहा है। कट्टरपंथियों की हिम्मत बढ रही है और हिन्दू समाज अपने आपको ठगा हुआ महसूस कर रहा है। इसी प्रकरण के दौरान मुम्बई पुलिस नें मुम्बई धमाकों को सुलझाने का दावा भी किया है। जिस प्रका्र इन भीषण विस्फोटों के लिये केवल ३ व्यक्तियों को ही जिम्मेदार माना गया है, उससे समझ में नहीं आता कि वे दोषियों को पकड रहे हैं या उनको छिपा रहे हैं? लोग सवाल पूछ रहे हैं कि अभी तक दिग्विजय सिंह को इन विस्फोटों में किसी हिंदू का नाम क्यों नहीं दिखाई दिया? किसी हिंदू संगठन का नाम लेने से से शायद वे मुस्लिम हितों के ज्यादा बडे पैरोकार दिखाई दें। ये दोनों प्रकरण एक दूसरे से जुडे हैं। ये दोनों सिद्ध करते हैं कि भारत की सैक्युलर पार्टियां मुस्लिम वोटों के लिये किसी भी सीमा तक जा सकती हैं।

इस घटना से भारत के कथित बुद्धिजीवियों का दोगलापन भी सामने आता है। भारत माता और हिन्दू देवी- देवताओं के अश्लील चित्र बानाने के लिये कुख्यात एम० एफ० हुसैन के भारत न आने पर इन्होंनें दहाडे मार-मार कर विधवा विलाप किया था और हिंदू संगठनों की खूब आलोचना की थी। हालांकि किसी ने भी हुसैन साहब को जान से मारने की धमकी नहीं दी थी और केंद्र सरकार उनको बार-बार वापस आने का आग्रह कर रही थी। उन पर भारत में कुछ केस चल रहे थे जिनको वापस लेने के लिये केंद्र सरका्र ललायित थी। यह साफ है कि वे न्यायपालिका से डरकर ही भारत से भागे थे। इसके बावजूद उनके लिये घडियाली आंसू खूब बहाये गये। लेकिन लगता है रश्दी के लिये उनके पास आंसू की एक बूंद तक नहीं है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैरोकारों को क्यों लकवा मार जाता है जब उनके सामने मुस्लिम या इसाइ कट्टरपंथी खडे होते हैं? आई० एस० आई० के कुख्यात एजेंट गुलाम नबी फाई के साथ इन कथित बुद्धिजीवियों के सम्बंध उजागर हो रहे हैं। क्या चंद पैसों या सुविधाओं के लिये इन लोगों ने अपनी कलम और जुबान को देश विरोधी कट्टरपंथियों के हितों की लडाई के लिये गिरवी रख दिया है?