कांग्रेस का तालिबानी चेहरा

सुदर्शन जी के एक बयान के बाद कांग्रेस की हिंसक प्रतिक्रिया न केवल दुर्भाग्यजनक और अलोकतान्त्रिक है अपितु कांग्रेस की तालिबानी एवम हिंसक सोच को प्रदर्शित करती है। सुदर्शन जी के बयान व उसके समय पर असहमति हो सकती है। उस पर कांग्रेस को आपत्ति भी होना स्वाभाविक है। उनके विरोध प्रदर्शन के जनतान्त्रिक अधिकार से कोई भी असहमत नहीं हो सकता परंतु विरोध प्रदर्शन की आड में हिंसक प्रदर्शन करना और संघ कार्यालयों पर हमले करना उनकी फासिस्ट व तालिबानी सोच का परिचायक है। कांग्रेस के प्रवक्ता श्री जनार्दन द्विवेदी जी का यह कहना कि अब कांग्रेस के लोग कुछ भी कर सकते हैं और उसके लिये पार्टी जिम्मेदार नहीं होगी,१९८४ की याद दिलाता है जब देश भर में सिक्खों का नरसंहार करने के लिये कांग्रेस नेताओं ने अपने कार्यकर्ताओं को उकसाया था और ३००० से अधिक मासूम सिक्खों की निर्मम हत्या के बाद स्वर्गीय राजीव गांधी ने इस भीषण हत्याकांड को उचित ठहराया था। इसी तरह के हमले इन्होने १९४८ में भी किये थे जब गांधी जी हत्या का झूटा आरोप संघ पर लगाया गया था। कांग्रेस का इस तरह की हिंसक गतिविधियों का लंबा इतिहास है। १९७७ के बाद जब आपतकाल की अपराधी इन्दिरा गांधी को कानूनन गिरफ्तार किया गया था तब भी कांग्रेसियों ने हिंसक प्रदर्शन कर न केवल सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया था अपितु विमान अपहरण जैसे जघन्य अपराध किये थे।

कांग्रेस के युवराज और उनकी माता श्रीमती सोनिया जी के द्वारा संघ पर अनर्गल आरोपों और उनकी राज्य सरकारों द्वारा संघ कार्यकर्ताओं पर झूटे मामलों के बाद संघ ने भी १० नवंबर को देशव्यापी प्रदर्शन किये थे। ७०० से भी अधिक स्थानों पर ये प्रदर्शन किये गये परंतु एक भी स्थान पर कोइ हिंसा या अशोभनीय व्यवहार नहीं हुआ। ये प्रदर्शन पूर्ण रूप से लोकतान्त्रिक मर्यादा के अनुरुप थे। विरोध प्रदर्शन का अधिकार है परंतु यह कौन सा सभ्य तरीका है जो कांग्रेसी अपनाते हैं?

सुदर्शन जी ने जो बयान दिये, उनकी जांच होनी बाकी है। निष्पक्ष जांच के बाद गलत सिद्ध होने पर उन पर कानूनी कार्यवाही भी हो सकती है। परंतु पिछले ५० वर्षों से ये जो आरोप लगाते आये हैं वे न्यायालय द्वारा गलत सिद्ध होने पर भी वे बहुत ही बेशर्मी के साथ उनको दोहराते रहते हैं और कुछ नेताओं पर कानूनी कार्यवाही करने पर वे माफी भी मांग चुके हैं। गांधी हत्याकांड में संघ का कोइ हाथ नहीं है, यह कांग्रेस सरकार द्वारा नियुक्त कपूर आयोग ने निर्णय दिया था और मा० न्यायालय ने भी संघ को निर्दोष सिद्ध किया था। उसके बावजूद भी ये आज तक इस झूठ को बार बार बेशर्मी के साथ दोहराते रहते हैं। क्या वे भूल गये हैं कि सीताराम केसरी ने इस झूठे बयान के कारण अदालत में माफी मांगी थी? इस झूठे प्रचार से व्यथित होने के बावजूद क्या एक भी कांग्रेसी नेता पर हमला किया गया? क्या एक भी पार्टी कार्यालय पर हिंसक प्रदर्शन हुआ? यही अंतर है कांग्रेसी और संघ की सभ्यता में। संघ हमेशा लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करता है जबकि कान्ग्रेस हमेशा से तालिबानों की तरह अपने विरोधियों को सत्ता के दुरुपयोग और हिंसा के अलोकतान्त्रिक, निर्मम और असभ्य हथियार का प्रयोग कर कुचलने का प्रयास करती है। इस बार तो भ्रष्टाचार के आरोपों से बुरी तरह घिर चुकी कांग्रेस ने इस अवसर का उपयोग जनता का ध्यान बटाने के लिये किया है।

विरोधियों के विरुद्ध हिंसा का प्रयोग कर वे देश में गलत परम्परा स्थापित करना चाहते हैं। क्या संघ के कार्यकर्ता इसका जवाब नहीं दे सकते? क्षमता होने के बावजूद वे नहीं दे रहे तो इसका केवल एक ही कारण है कि वे सभ्यता और मूल्यों पर आधारित आचरण में विश्वास करते हैं। इसको उनकी कमजोरी समझने की भूल कदापि नहीं करनी चाहिये।

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