हैदराबाद में अब देश विरोधियों की उल्टी गिनती शुरू हो गई है!

हैदराबाद एक बार फिर गलत कारणों से चर्चा के केन्द्र में रहा है। वहां के एक विधायक अकबरुद्दीन औवैसी ने एक स्थान पर अपने विषैले भाषण में न केवल हिंदू समाज का अपमान किया अपितु उसने भारत सरकार को भी चुनौती दे डाली। उस भाषण में उसने हिन्दू आस्थाओं का खुलकर मखौल उडाया। हिंदुओं के देवी देवताओं के विषय मे बहुत ही घटिया भाषा का प्रयोग किया । हिंदू संगठनों और हिंदू नेताओं को उसने हैदराबाद में निपट लेने की खुली चेतावनी भी दी । उसने सरकार को भी चुनौती दी कि वह उस पर कोई कार्यवाही करके दिखाये। इससे भी आगे बढकर उसने वहां पर उपस्थित मुस्लिम समाज के लोगो को उकसाते हुए कहा कि वे ( हिंदू समाज का) कुछ भी करें और उसे फोन कर दें, उसका कुछ भी नहीं बिगडेगा । एक सिरफिरे ने ऐसा ही किया। परन्तु उस सिरफिरे की ही नहीं वहा पर औवैसी की भी जम कर सेवा हुई । इसके बाद जब दबाव पडा तो उस पर पुलिस को कार्यवाही करनी पडी । उसे ही नही उसके भाई असाउद्दीन औवैसी पर भी सरकार को सख्त कार्यवाही करने के लिये मजबूर होना पडा। उन पर हुई कार्यवाही के विरोध में वहा का मुस्लिम समाज हमेशा की तरह अपनी दरिन्दगी पर उतरा। उन्होंने दुकानें तोडी, बसों में आग लगाई, यहां तक कि एक बार तो यात्रियों से भरी बस को भी आग लगाई गई । परन्तु हैदराबाद और पूरे देश में जिस तरह का प्रतिकार हुआ , उससे उनको ध्यान में आ गया कि अब उनके दिन लदने वाले हैं। केवल वोट बैंक की भिखारी सरकारों के कारण ही उनकी दहशत थी। समाज जब अपनी पर आ गया तो उन लोगों धमकी केवल गीदड भभकी ही साबित हुई।

ये दोनों भाई आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन के नेता है जिसको संक्षेप मे एम आई एम कहा जाता है। इस पार्टी का इतिहास देखने पर ध्यान में आता है जिस पार्टी की बुनियाद ही देश विरोध के कारण रखी गई हो उस पार्टी में ऐसे ही देशद्रोही और साम्प्रदायिक व्यक्ति नेता बन सकते हैं। १९२७ में हैदराबाद के नवाब के कहने पर ही इस पार्टी की स्थापना हुई जिसका लक्ष्य मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना रखा गया था । ये लोग मुस्लिम लीग के साथ मिलकर देश को तोडने के लिये काम करते थे। जिन रजाकारों ने हिंदुओं पर अमानवीय अत्याचार किये थे वे इसी पार्टी के कार्यकर्ता थे। हालांकि ये लोग पाकिस्तान चले गये थे परन्तु अपनी वैचारिक विरासत को वे भारत में ही छोड गये । इसीलिये इस पार्टी पर १९४८-१९५७ यक प्रतिबन्ध रहा था। इनके नेता कासिम रिजवी को इसी शर्त पर जेल से छोडा गया था कि वे भारत छोड कर चले जायें। उसके बाद पिछले ४० साल से औवैसी परिवार का ही इस पार्टी पर साम्राज्य रहा है। अब्दुल वाहिद औवैसी,सलाहुद्दीन औवैसी और अब असाउद्दीन औवैसी तथा अकबरुद्दीन औवैसी ; इन सबने हिन्दू विरोध और देशद्रोहिता की इस विरासत को न केवल सम्भाला अपितु उसमें कुछ न कुछ इजाफा ही किया है। पूरे विश्व में कही भी कुछ भी इस्लाम विरोधी हुआ हो उसका खमियाज हमेशा हैदराबाद के हिन्दुओं को भुगतना पडा है । चाहे हजरत साहब का बाल चोरी होने का नाटक हो, चाहे भुट्टो की फांसी हो, चाहे अय्यूब की विमान दुर्घटना मे म्रुत्यु हुई हो, हमेशा ही हैदराबाद के हिंदुओं पर इनके ही नेतृत्व मे हमले किये गये और मन्दिरों को तोडा गया। देश की नपुन्सक सरकारे इनके सामने नतमस्तक होती रही और वहा का हिन्दू समाज सिसकता रहा । परन्तु अब कहानी पलट रही है । अब वे न केवल अपने बचाव के लिये संकल्प बद्ध हो गये है अपितु उनको जवाब भी देने लगे हैं। अब वे सरकारो के भरोसे नही है। इसीलिये सरकारें भी मजबूर होकर इन दुष्टों पर कार्यवाही करने लगी है।

अब इन लोगों को समझ लेना चाहिये कि उनकी नफरत की राजनीति के दिन लद गये हैं। यदि उन्हें भारतीय राजनीति मे रहना है तो अब हिंदू विरोध के आधार पर नही, हिन्दुओं के साथ प्रेम करके ही काम करना पडेगा। अब उनको मुस्लिम आक्रमणकारियों नही, राम और कृष्ण के साथ नाता जोडना पडेगा।

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