वर्तमान चुनावी परिदृश्य -मुस्लिम समाज के लिए आत्मविश्लेषण का अवसर

लोकतंत्र में हर चुनाव महत्वपूर्ण है । परन्तु २०१४ का लोकसभा का चुनाव कुछ कारणों से विशिष्ट बन गया है । पहले के चुनाव भी व्यक्ति केंद्रित होते थे । सामान्यत: नेहरू तथा तथाकथित गांधी परिवार के व्यक्ति ही केंद्र बिंदु रहे हैं । परन्तु २०१४ का चुनाव जिस व्यक्ति के इर्द गिर्द लड़ा जा रहा है ,वह इन परिवारों से नहीं है । वैचारिक प्रतिष्ठान पर चलने का दावा करने भाजपा की चमक भी इस व्यक्ति के आभामंडल में विलीन हो गई है । इन मुद्दों से भी महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि कांग्रेस समेत सभी कथित सैक्युलर पार्टियों ने वोटों के साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए सभी सीमाएं पार कर दी हैं । आतंकियों को बढावा देने वालों और दंगाइयों को अपनी जिन हरकतों के लिए शर्मिंदा होना चाहिए था ,वे इन सैक्यूलरिष्टो की हरकतों के कारण अपने आपको पीड़ित बता कर सहानुभूति का पात्र सिद्ध करते रहे । चुनाव आयोग से लेकर मा.सर्वोच्च न्यायालय व सभी देशभक्त संगठनों को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की गई । देशभक्त मुस्लिम समाज ,जो इन तत्वों से दूर होने की कोशिश कर रहा था ,कहीं न कहीं इनको अपना प्रतिनिधी मान रहा होगा । यह प्रयास पहले भी होता था ,परन्तु इसका जवाब देने के लिए भाजपा हिंदू मतों को भी सुदृढ़ करने का प्रयास करती थी । इस बार नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा नें अपने को विकास की चर्चा तक ही सीमित करने का प्रयास किया । जिस किसी ने भी हिंदू हितों की चर्चा की , उसकी आवाज को दबा दिया गया । इसमें वे कितने सफल रहे और इसका क्या परिणाम निकलेगा ,यह तो भविष्य ही बतायेगा । परन्तु सैक्यूलरिष्टो के दिल में जो डर रहता था कि कहीं हिंदू वोट इकट्ठा न हो जाए , इस बार यह डर इनके दिल में नहीं था ।

स्वतंत्रता के बाद के घटना क्रम से एक बात तो ऊपरी तौर से दिखाई देता है कि इस देश का मुस्लिम समाज किसी भी अन्य देश के मुस्लिम समाज से अधिक अधिकारों का उपयोग करता है । चाहे हज सब्सिडी हो या पृथक आचार संहिता हो;इस्लामिक बैंक,काम ब्याज पर लोन, देश की नीतियों को प्रभावित करने की क्षमता ,इस्लाम के नाम पर बंगलादेशी घुसपैठियों को शरण देने के अलावा कितने ही और भी अधिकार है जिनकी चर्चा बार बार होती रहती है । परन्तु एक और अधिकार है जिसकी किसी सभ्य समाज में कल्पना भी नहीं की जा सकती । भारत का विभाजन , विभाजन के समय प्रत्यक्ष कार्यवाही के नाम पर किया गया नरसंहार ,घाटी में भीषण नरसंहार के द्वारा किया गया हिंदू समाज का सफाया,जेहाद के नाम पर हिंदू समाज पर किये गए हजारो हमले ,५०० से अधिक मंदिरो को तोडना ,आतंकियों को संरक्षण ,अपने ही देश के सैनिको पर हमले ,तिरंगे का बार बार अपमान आदि ऐसे लाखो अपराध है जिनके कारण आत्मग्लानि व अपराधबोध के स्थान पर इन सबके लिए पीड़ित समाज को ही दोषी ठहराने की वृत्ति कही भी देखने को नहीं मिलती ।

परन्तु गहराई से देखने पर ध्यान में आता है कि आजादी का सबसे अधिक दुरुपयोग करते हुए दिखाई देने के बावजूद वे विचित्र प्रकार की दासता की बेड़ियों में जकड़े हुए हैं । भारत का मुस्लिम समाज दास है उन मध्ययुगीन बर्बर परम्पराओं का छुटकारा पाने के लिए उनका एक वर्ग छटपटा रहा है । वे दास हैं उन विदेशी आक्रमणकारियों की स्मृति के ठहराने की प्रवृत्ति कहीं भी देखने को नहीं मिलती जिन्होंने न केवल इस देश पर हमले किये अपितु लाखो हिंदुओं के नरसंहार किये ,हजारों मंदिर तोड़े व् करोड़ों हिंदुओं का जबरन धर्मांतरण किया । यह ध्यान रखने योग्य है की भारत के ९५% मुस्लिम वे हैं जिनके पूर्वजों पर अवर्णनीय अत्याचार कर उनका जबरन धर्मांतरण किया गया था । यह उनकी विडम्बना है कि अपने पूर्वजों पर अत्याचार करने के कारण जिनके प्रति उनके मन में नफ़रत होनी चाहिए थी , वे उन पर और उनकी परम्पराओं पर गर्व का अनुभव करते हैं और उनके मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं । वे दास है अपनी उन “आसमानी किताबों ” की कुछ आयतों के जो उनको हिंदुओ दे नफ़रत सिखाती हैं और जेहाद के नाम पर अपने ही देश को रौंदने के लिए प्रेरित करती हैं । वे दास हैं उन छद्म सैक्यूलरिष्टो के जो बार-बार उन पर( कभी न हुए) अत्याचारों के काल्पनिक चित्र प्रस्तुत कर उनको डराने की कोशिश करते हैं और स्वयं को उनको बचाने वाले एकमात्र मसीहा के रूप में पेश करते हैं । ये छद्म सैक्यूलरिष्ट कुछ हिंदू नेताओं और हिंदू संगठनों के प्रति भय निर्माण करते जिसका दुष्परिणाम हिंदू समाज और भारत के प्रति नफ़रत के रूप में दिखाई देता है । इसीलिये उनके कुछ नेता कभी भारत माता को डायन कहते हैं तो कुछ संविधान को फाड़ने की धमकी देते हैं । आज उनके द्वारा होने वाले उग्र प्रदर्शनों में तिरंगे को अपमानित करने की घटनाएं बढती जा रही हैं । विश्व में कही भी इस्लामिक अत्याचारों के विरुद्ध प्रतिक्रिया हो ,भारत में उनके विरुद्ध उग्र प्रदर्शनों होने और उन प्रदर्शनों में पुलिस/सेना के जवानों पर प्राणघातक हमले और राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान आम दृश्य बन गए हैं । आतंकियों और बंग्लादेशी घुसपैठियों पर होने वाली किसी भी कार्यवाही के विरोध में मुस्लिम समाज का खड़ा होना इसी दासत्व का परिणाम है । कोल्हू के बैल की तरह वे केवल वही देखते हैं जो उनके आका उनको दिखाना चाहते हैं । वे उनको कभी आत्मविश्लेषण करने नहीं देते और अगर कोई मुस्लिम नेता आत्मविश्लेषण के लिए मुस्लिम समाज को प्रेरित करता है तो सारी सेक्युलर बिरादरी इकठ्ठी होकर उस पर हमला बोल देती है । पहले ‘इस्लाम खतरे में है ‘का नारा मुस्लिम नेता लगते थे और ये सेक्युलरिस्ट उनके पीछे-पीछे चलते थे परन्तु अब ये सेक्युलरिस्ट पहले ये नारा लगाते है और मुस्लिम नेता उनके पीछे’ शहादत’ के अन्दांज में इन नारो को दोहराते है।

मुस्लिम समाज को दास बनाने वाली ये जंजीरे हिन्दू समाज व भारत के लिए नफरत का स्थायी भाव निर्माण करती है । अपनी कामियो के लिए दूसरो को ही जिम्मेदार ठहराने के लिए मजबूर करती है । विश्व का इतिहास साक्षी है की जो समाज नफरत में जीता है तथा आत्मविश्लेषण नहीं करता ,वह समाज समाप्त हो जाता है । इन’ सेक्युलिरिष्टो के कारण ‘वे दासत्व भाव से बेशक अपनी संख्या बढाते रहते है परन्तु यह बढ़ती हुई जनसंख्या उनके विकास में सहायक नही बाधक बनती है ,यह उनको समझ लेना चाहिए । यदि मुस्लिम समाज वास्तव में प्रगति करना चाहता है तो उन्हें इन सब आकाओ के दासत्व से मुक्त हो जाना चाहिए । तभी वे अपने विकास की एक नयी इबारत लिख सकेंगे ।’ भारत के विकास में हक़ है मेरा ‘केवल नारा बनकर रह जाएगा तथा इसी मृगमरीचिका में भटकते रह जाएगे ।