आरक्षण की आग से मत खेलो-यह देश को जला देगी Playing with the fire of reservations: It can burn the nation to cinders

आज उत्तर भारत में जाटों को आरक्षण की मांग को लेकर चल रहा आन्दोलन उग्र होता जा रहा है। धरने प्रदर्शन से शुरु हुआ यह आन्दोलन अब सडक रोकने से लेकर रेल मार्ग को रोकने पर आ चुका है। अब दिल्ली के लिये पानी, दूध, सब्जी रोकने की धमकी दी जा चुकी है। सभी दलों के जाट नेता प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस आन्दोलन का समर्थन कर रहे हैं। इसका विरोध करने का साहस कोई भी राजनीतिक दल नहीं जुटा सकता। राज्य सरकार इनके सामने समर्पण कर चुकी है। इसी बात से आन्दोलनकारी समाज की ताकत का अनुमान लगाया जा सकता है। क्या इतनी ताकत रखने वाले समाज को किसी भी दृष्टी से पिछडा कहा जा सकता है, यह यक्ष प्रश्न आज देश के प्रबुद्ध वर्ग के सामने खडा है। राजस्थान के गूजर समाज के आन्दोलन के दुष्परिणामों की याद से ही देश सिहर उठता है। वर्तमान आन्दोलन के कारण देश को क्या पीडा भुगतनी पड सकती है, इसका अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है।

आज देश उस मोड पर आकर खडा हो गया है जब देश को आरक्षण नीति पर पुनर्विचार करना पडेगा। अनुसूचित जाति और अनु. जनजाति के बारे में स्थिति स्पष्ट है। उनके शोषण की एक ऐतिहासिक और सामाजिक पृष्ठभूमि है। प्रारम्भिक अवस्था में उनका आरक्षण हर दृष्टि से आवश्यक था। हालांकि अब उसको जारी रखना उनके भी हित में है या नहीं , इसका विश्लेषण इन्हीं के नेताओं को अवश्य करना चाहिये। परन्तु जहां तक पिछडे वर्ग का प्रश्न है, उसके बारे में भारत के संविधान की स्थिती बहुत स्पष्ट है। धारा ३४०(१) पिछडों की पहचान कर उनके विकास की बात करती है। उसमें कहीं भी पिछडी जातियों की पहचान कर उनका विकास करने की भी बात नहीं कही गई, उनको आरक्षण देने की बात तो बहुत दूर की बात है। पिछडापन जातिगत आधार पर नहीं, आर्थिक आधार पर होता है। अगर पिछडेपन की पहचान के लिये मंडल आयोग द्वारा बनाये गये ११ संकेतों की भी चर्चा करें तो वे संकेत सभी जातियों में उपस्थित गरीबों में समान रूप से पाये जाते हैं। यदि कहीं बच्चे विद्यालय नहीं जाते या जल्दी पढाई छोड देते हैं तो यह सभी गरीबों के साथ होता है चाहे वे किसी भी जाति के हों। अगर कच्चे मकानों में रहना पडता है तो यह सभी जाति के गरीबों की मजबूरी है। अगर महिलाओं में शिक्षा का अभाव है तो सभी जातियों की गरीब महिलाओं में समान रूप से है। यदि सभी गरीबों के उत्थान का विचार करते तो उनका भी विकास स्वाभाविक रूप से होता जो तथाकथित पिछडी जातियों में भी हैं। संविधान की भावना भी यही थी। परन्तु इसका इतिहास देखने पर ध्यान में आता है कि जिन लोगों ने इसको लागू किया या इसके लिये आन्दोलन किये , उनकी रूचि “पिछडों” के विकास में नहीं, कथित पिछडी जातियों का वोट बैंक बनाने में थी। इस लक्ष्य की पूर्ती के लिये इन्होनें न तो संविधान की चिंता की और न इस देश के भविष्य की। ये नेता जिन जातियों के आधार पर राजनीति करते हैं, उनकी स्थिति देखने पर आसानी से समझ में आ जाता है कि वे जातियां तो वहीं हैं परन्तु उन नेताओं का अवश्य विकास हो गया।

सर्वप्रथम १९५३ में पिछडी जातियों की पहचान करने के लिये काका कालेलकर आयोग की स्थापना की गई। उन्होंनें २३९९ पिछडी जातियों की पहचान की थी। इस आयोग की सिफारिशों को इसलिये स्वीकार नहीं किया गया क्योंकि इन्होंने अपनी सिफारिशों के लिये किसी जनगणना को आधार नहीं बनाया था। इन्होंने इसके लिये किसी भी प्रकार का अध्ययन नहीं किया था। इसके पश्चात १९७९ में मोरारजी देसाई नें बहुचर्चित मंडल आयोग की स्थापना की थी। इन्होंनें ३७४३ जातियों की पिछडी जाति के रूप में पहचान की थी। इन जातियों के अन्तर्गत देश की ५२% आबादी आ जाती थी। इस आयोग ने इनकी आबादी के अनुपात में इनको आरक्षण देने की अनुशंसा की थी। यदि उनकी इस बात को मान लिया जाता तो अनु. जाति और अनु. जनजाति को मिलने वाले २३% आरक्षण को मिलाकर ७५% आरक्षण हो जाता। उस देश की स्थिति की कल्पना कीजिये जहां ७५% आरक्षण दिया जाता हो। वहां पर विकास के अवसर समाप्त हो जाते और देश की प्रतिभाएं कुन्ठित हो जाती हैं, जिसकी परिणति जातिगत संघषों में होती। जिस देश में ७५% आबादी ऐसी हो जिसे आरक्षण चाहिये, वह देश दुनिया में किस छवि के साथ चलता इसका भी अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। शायद यही कारण है कि अगले १० सालों में चार सरकारें आयीं, लेकिन किसी ने भी मंडल आयोग के इस जहरीले नाग को पिटारे से बाहर नहीं निकाला। परन्तु अचानक १९९० में तत्कालीन प्रधानमन्त्री विश्वनाथ प्रताप सिंह नें बिना किसी से चर्चा किये इसको लागू करने की घोषणा इस गर्वोक्ति के साथ कर दी कि वे अब वो ऐसी आग लगा रहे हैं जिसको बुझाने का साहस कोई भी नहीं कर सकेगा। इस घोषणा की पृष्ठभूमि बहुत महत्वपूर्ण है। चौ. देवीलाल ने दिल्ली में किसान रैली कर अपने जाट वोट बैंक की धमक सबके सामने दिखा दी थी। विश्वनाथ प्रताप सिंह इसकी तोड करने के लिये, अपना विश्वसनीय वोट बैंक तैय्यार करना चाहते थे। उन्हें इससे बढिया वोट बैक दिखा नहीं। मंडल आयोग की घोषणा खालिस वोट बैंक की कसरत थी, यह स्वीकृती बाद में उनके सिपहसालर पासवान जी के कई वक्तव्यों से हो जाती है। इन सबको मालूम था कि इसकी क्या प्रतीक्रिया हो सकती है। इसके बावजूद कोई भी सावधानी लिये बिना वे आगे बढते चले गये। इस घोषणा की अपेक्षित प्रतिक्रिया हुई। पूरे देश में जबर्दस्त आक्रोश फैल गया। छात्र सडकों पर उतर आये। उनको अपना भविष्य खतरे में दिख रहा था। राजीव गोस्वामी और सुरेन्द्र सिंह चौहान जैसे युवक आत्मदाह करने लगे। उस समय सत्ता के गलियारों में एक वाक्य बहुत चलता था,” एक युवक जलकर मरता है तो हमारा वोट बैंक और मजबूत होता है।” कालक्रम ने इस वाक्य को सही सिद्ध किया। जगह-जगह बसें जलायी जा रहीं थीं। लगभग एक महीने तक देश जलता रहा , परन्तु सत्ताधीशों को कोई चिन्ता नहीं थी। उस समय की आज से तुलना करके एक बहुत महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है। आज यह आम चर्चा है कि १९९० में जिन लोगों ने मंडल आयोग की सिफारिशों के विरुद्ध आक्रोश को संगठित कर उत्तर भारत में उसको हिंसक स्वरूप दिया था , आज वे ही लोग आरक्षण प्राप्त करने के लिये उग्र आन्दोलन को प्रेरित कर रहे हैं। इसका अर्थ बहुत स्पष्ट है कि वे अपने वोट बैंक के लिये पिछडे वर्ग को आरक्षण का विरोध भी कर सकते हैं और जरूरत होने पर उसका समर्थन भी कर सकते हैं। वे अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिये किसी भी तरह की आग भडका सकते हैं।

अब समय आ गया है कि आरक्षण के सम्बंध में समाज के लोगों को व्यापक दृष्टीकोण से पुनर्विचार करना होगा। आरक्षण की आड में आसान नौकरियां पाना उनके लिये अच्छा है या प्रतियोगिता में बैठकर अपनी प्रतिभा को निखार कर हासिल करना, यह विचार उन्हें अवश्य करना होगा। आज जब शिक्षा का मौलिक अधिकार प्राप्त हो गया है तो अच्छी शिक्षा प्राप्त कर अपने दम पर अवसर प्राप्त करने का स्वाभिमान लेना बेहतर है । यह स्वाभिमान ही उनके पिछडेपन को दूर कर सकता है।आरक्षण की वैसाखी पर मिलने वाला अवसर न तो उनको स्वाभिमानपूर्ण जिन्दगी देगा और न ही उनके पिछडेपन को दूर कर सकेगा। वे अधिक सुविधाएं प्राप्त करनी की ऐसी अंधी दौड मे शामिल हो जायेंगे जिसका कोई अंत नहीं होता है। गूजर आन्दोलन इसका सबसे ज्वलन्त उदाहरण है। वे पिछडे वर्ग को मिलने वाली सुविधाओं से सन्तुष्ट न होने के कारण अब अनु. जनजाति का दर्जा प्राप्त करने के लिये बार-बार उग्र आन्दोलन का मार्ग अपनाते हैं। क्या यह उनके या देश के हित में है? क्या समतामूलक समाज के निर्माण का हमारे महापुरुषों का स्वप्न इस आरक्षण के चलते पूरा हो सकेगा? जिस जातिवाद का जहर समाज के लिये बहुत घातक है , क्या इस आरक्षण के कारण वह जहर हमारे समाज में बहुत गहरे नहीं समा रहा है? अब इस देश के राजनीतिज्ञों को भी विचार करना होगा कि आखिर कब तक वे अपने स्वार्थों के लिये अपनी जाति और देश को इस आग में झुलसाते रहेंगे। अब इस आरक्षण नीति पर हम सबको पुनर्विचार करने का अवसर आ गया है।

The Jat agitation for reservations is gaining momentum in the north; something that started merely with protest demonstrations has now converted itself into rail and road-disruptions. A warning has been given to stop the supply of water, milk and vegetables to the capital, Delhi. Cutting across party lines, all Jat leaders are offering support to the agitation. No political party can summon enough courage to oppose this agitation . The state governments have surrendered before the Jat agitationists. This will give you a fair amount of idea about the strength of this powerful community. Can a potent community like this be called backward; this poses a moot question before the intellectual community of the country. The country trembles just at the mention of the consequences of the Gujjar agitation for reservations in Rajasthan. This present agitation has the potential to lead the country into complete chaos and anarchy.

Today, the country is standing at the crossroads where it will have to do a rethink about the reservation policy. The policy is clear in terms of the Scheduled Castes and Tribes. There is a background to their social and historical exploitation. The reservations extended to them in the initial stages of the country’s independence, was completely justified in all respects. However, even reservations for this community need be relooked into by their own leaders with respect to how effective and necessary they are for them now.

Article 340 (1) talks about identifying the backwards and their development. Nowhere in this article has the word ‘caste’ been used, leave alone talking in terms of providing reservations to them. Backwardness is always on the basis of economics and not caste. If we were to take the 11 indicators prepared by the Mandal report to identify backward castes, we find that all these points are found equally among the poor of all the castes. If children drop out of school quickly or do not go to school at all, then this happens with all the poors and not with a particular caste. If someone has to live in thatched hutments, then this happens with poors of all the castes and not with a particular caste. If there is a lack of education among the womenfolk, then that is prevalent in poor women of all castes and not of a particular caste. If we think in terms of the development of all the poors, then naturally the poor of the so-called backward castes too, will get empowered. The spirit of the constitution too was the same. But if we take a look at the history of the reservation agitations, we find that the people who implemented these policies or led agitations for the same, were not interested in the ‘development of the backward’ but the consolidation of vote-banks of the backward communities. To achieve this end, they hardly gave a thought to the constitution or the future of the country. One look at the leaders of these communities and you can make out that the castes they profess to be leading have remained static in terms of progress, but yes, the leaders themselves have progressed, leaving nothing to doubt about their unsavory intentions.

In 1953, it was established, the first committee to look into the identification of backward castes, the Kaka Kalelkar committee. He identified 2399 backward castes. The report of this committee was not accepted as he had not made use of any census records to postulate his theory. He did not make any sort of research for the same. Subsequent to this, the much-talked-about Mandal Commission was formed by the Morarji Desai government in 1979. He identified 2743 castes as backward in his report, this meant 52% of India’s population. The report recommended the granting of reservations to these castes on the basis of their percentage in the country’s population. If the recommendations of this commission were accepted, then the total percentage of reservations would have been as high as 75%, which would have included 23% of that of the already existing SCs and STs. Just imagine the plight of a nation where such a system exists. All opportunities of development would have come to a nil and the talent of the country, finding no outlet, would have been frustrated, leading to caste wars. Imagine the world’s perception of a country, where 75% of the population is having reservations. Perhaps, this is why four governments made their way in and out of the Parliament after this report, but none dared to implement the report. But, suddenly, out of nowhere, the erstwhile PM, V P Singh, announced the implementation of this report, without any consultations, along with the high-sounding rhetoric that no one will be able to douse the fire that he has lit. The background to this announcement is very important to know. Choudhary Devi Lal had shown and proved his strength by organizing a Jat rally in Delhi. In order to break the stranglehold of this vote-bank, and build his own trustworthy vote bank, V P Singh could not have taken a more sinister step than announce the implementation of the Mandal recommendations. This was only an exercise to garner the vote-bank; this is proved beyond doubt by the many statements delivered by one of his trusted lieutenants, Paswan. All of them knew the kind of reaction that could take place after this. Despite this, they went ahead and kept going ahead with their shenanigans, without taking any precautions. The reaction that took place was on expected lines. There was tremendous disapproval and angst against the Mandal recommendations, students came out on the streets to protest its implementation once they realised that it could jeopardise their future. Bright students like Rajeev Goswami and Surendra Singh Chauhan tried to immolate themselves as a measure of protest. In the corridors of power, they used to say then, “Whenever a youth immolates himself, our vote-bank gets that much stronger.” Time has proved this to be right. Buses were being set on fire on the streets, this mayhem continued for about a month, but the powers that be were not worried at all. A very important fact emerges when one compares that era to the times of today. One finds that the very same people who had organized the anti-Mandal agitations then are today at the forefront of agitating violently for reservations. It is crystal clear that these people can support or oppose reservations for the backward depending on what suits them. To meet their selfish ends, they can go to any extent and don any mantle.

Today, it is the call of the times that a comprehensive rethink and overhaul is done on the policy of reservations. Does it suit their (backward castes) dignity to secure jobs the easy way through the back-door, with the help of reservations or prove their mettle by securing the same jobs on the basis of their talents in an open competitive exam? Today, when the ‘Right to Education ‘has become a fundamental right, wont it be more suitable for them to pride themselves on a job secured through acquiring the best of education rather than through the dubious system of reservations? This belief in their abilities is the only way they can redeem their pride and say goodbye to their backwardness. Jobs secured on the crutches of reservations cannot instil in them a sense of pride, nor can it help them in getting rid of their backwardness. They will only become a part of the never-ending race which only talks of extracting more and more concessions and benefits. The Gujjar agitation for reservation is a prime example of what can happen with the Jat agitation. The Gujjars, not satisfied with the backward caste reservation benefits, are now demanding and sometimes violently agitating for the Scheduled Tribe status for themselves. This is surely not in the interest of the Gujjars and certainly not in the interest of the nation. Will the equalitarian pattern of society that was envisaged by our great leaders ever be achieved in the face of such fissiparous demands? The poison of casteism that is so lethal in itself, is that venom not infiltrating the very core of our system by this caste-based system of reservations? Today, even the politicians of this country will have to do a rethink as to how long they will continue to use their caste to meet their selfish ends and play havoc with the future of the nation? It is now time to reconsider this policy of reservation.

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