गोवा-भोग भूमि नहीं,पुण्य भूमि है\Goa-not a Land of hedonists but a land of holiness

गोवा पर्यटन विभाग के प्रचार तथा हिन्दी चल चित्रों के प्रभाव के कारण आम समाज में गोवा की कल्पना केवल मौज मस्ती करने वालों की क्रीडा स्थली के रूप में होती है। ७,८ व ९ जनवरी,२०११ को विश्व हिन्दू परिषद की गोवा में आयोजित प्रबंध समिति व प्रन्यासी मंडल की बैठक में आये अधिकांश कार्यकर्ता भी इसी धारणा को मन में पाले हुए थे। गोवा से बाहर का समाज यह मान कर चलता है कि समुद्र-तटों की जैसी मस्ती चलचित्रों में दिखाई देती है सारा गोवा वैसा ही होगा और गोवा इसाई बहुल होगा तथा वहां पर सब तरफ चर्च ही होंगे। परंतु फोंडा में आते ही उन सबको लगा कि यह वो गोवा नहीं है।उन्हें चारों तरफ भ्व्य मंदिरों के दर्शन हो रहे थे। बैठक व आवास भी वहां के प्रमुख देवस्थानों,रामनाथी मंदिर तथा शांतादुर्गा मंदिर, में रखा गया था। वहां के पवित्र वातावरण में सबको एक अदभुत शान्ति का अनुभव हो रहा था। सबको यह अनुभूति हो रही थी कि वे किसी प्रमुख तीर्थस्थल पर एक आध्यात्मिक वातावरण में देश और समाज की परिस्थितियों पर विचारमंथन के लिये यहां पर आये हैं। यदि गोवा का सही इतिहास और वहां की आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक धरोहर का परिचय सम्पूर्ण देश को कराया जाये तो वे भी अपनी धारणा सही कर गोवा को भोग भूमि नहीं, एक पुण्य भूमि के रूप में पहचानेंगे।

गोवा के प्राचीन नाम गोमांतक,गोपपट्टणम और गोपराष्ट्र(गोवराष्ट्र) हैं। इन्हीं नामों के आधार पर इसे आज गोवा के नाम से पहचाना जाता है। यहां पर जब भगवान कृष्ण आये तो यहां के लोग उन्हें अपने गोपों की तरह लगे और उनके नाम पर इसे गोपराष्ट्र तथा वहां की गायों के आधार पर इसे गोवराष्ट्र के नाम से जाना जाने लगा। इस प्रदेश की स्थापना भगवान विष्णु के षष्टम अवतार श्री परशुराम ने की थी। तभी से यह हिंदुओं की एक पवित्रस्थली के रुप में जाना जाता है। वहां पर एक पर्वत का नाम भस्म डोंगर है जिसके बारे में यह माना जाता है कि यह श्री परशुराम जी के यज्ञों की भस्मी से बना है। यह संस्कृत और वैदिक दर्शन के अध्ययन का एक बहुत बडा केंद्र रहा है। यहां पर सभी हिंदु देवी देवताओं मंदिरों के दर्शन होते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश के अलावा यहां पर सूर्य,हनुमान,दत्तात्रेय,विट्ठल,परशुराम, गणेश, कुमार कार्तिक,मां दुर्गा के विभिन्न रूपों के मंदिर दिखाई देते हैं। जैन मंदिरों और बौद्ध मठों के अवशेषों को देखकर लगता है कि यह इन दर्शनों का भी एक बडा केंद्र रहा है। यहां पर नाथ सम्प्रदाय सहित भारत के सभी पंथों के मठ-मंदिर दिखाई देते हैं। यहां पर आदिशंकराचार्य, मध्वाचार्य,रामानुजाचार्य,गौपदाचार्य आदि के मठ-मंदिर सिद्ध करते हैं कि यह स्थान भारत के सभी दर्शनों का प्रमुख केंद्र रहा है। मुस्लिम व पुर्तगाली आक्रमणकारियों के विध्वंस के बावजूद आज भी वहां हजारों प्राचीन मंदिरों के दर्शन होते हैं। इन सबके दर्शन से गोवा का एक और प्राचीन नाम,कोंकण काशी साकार होता है। यह सिद्ध होता है कि यह इसाइयों द्वारा प्रचारित “पूर्व का रोम” नहीं, पश्चिम भारत की काशी है।

अपनी आध्यात्मिक धरोहर और भौतिक सम्पन्नता के कारण गोवा लगातार १००० वर्ष तक मुस्लिम तथा पुर्तगाली आक्रमणकारियों के निशाने पर रहा है। इन्होनें न केवल यहां के लोगों का जबरन धर्मांतरण करने की कोशिश की, अपितु यहां के मंदिरों को ध्वस्त कर उनके स्थान पर मस्जिद या चर्च बनाने का पाप भी किया है। मुस्लिम आक्रमणकारियों ने लगभग ४०० मंदिरों को ध्वस्त किया। परन्तु वे यहां अधिक समय नहीं रुक पाये। कभी विजय नगर साम्राज्य तो कभी छत्रपति शिवाजी महाराज के साम्राज्य के साथ रहकर यहां के निवासियों ने उनको यहां टिकने नहीं दिया। वे उनका मुकाबला करते रहे परन्तु उनके सामने आत्मसमर्पण नहीं किया। १४९८ में इसाईयत के विस्तार के लिये वास्को-डि-गामा के आने के बाद मानों गोवा पर आफत के पहाड टूट पडे थे। पुर्तगालियों की सेना जंगल की आग की तरह सम्पूर्ण गोवा में फैल गयी और पाश्विक अत्याचारों का सिलसिला प्रारम्भ हो गया। वे सम्पूर्ण गोवा को इसाई भूमि में परिवर्तित करने का लक्ष्य लेकर जबरन धर्मांतरण और मंदिरों के ध्वंस के कार्य को तेजी से करने लगे। १५४० में पोप के निर्देश पर पुर्तगाली वायसराय ने गोवा के सारे मंदिर तोडने का आदेश दिया। इसाई मिशनरी और पादरी सेना के साथ मिलकर पोप के आदेश को लागू करने के लिये गोवावासियों पर अमानवीय अत्याचार करने लगे। “सैन्ट” जेवियर जैसे मिशनरी क्रूरता की सब सीमाएं पार कर रहे थे। “इनक्विजिशन” के आधार पर किये गये अत्याचार इसाईयों की वास्तविकता को प्रकट करते हैं। उन अत्याचारों के कुछ अवशेष आज भी बाकी हैं। वहां पर “हथकतरा” स्तंभ विद्यमान है। जो हिंदू इसाई बनना स्वीकार नहीं करते थे, उनके हाथ पीछे बांधकर खम्बे से बांध दिया जाता था और उनको कई दिन तक भूखा प्यासा रखा जाता था। इसके बाद भी अगर वे इसाई बनने के लिये तैय्यार नहीं होते थे तो उनके हाथ पैर काट कर उनको मरने के लिये छोड दिया जाता था। यातना देने के लिये तरह तरह के यंत्रों का प्रयोग किया जाता था। खौलते तेल में डालने से लेकर, उनको “कवाब” की तरह जिन्दा ही आग में भूना जाता था। उनके सब तरीकों का वर्णन करना सम्भव नहीं है। पूरे विश्व को सभ्य बनाने के “ईश्वरीय आदेश” को पालन करने वाले जेवियर जैसे इन मिशनरियों ने अपने अत्याचारों से दरिंदों को भी पीछे छोड दिया। आज भी कुंकडी नामक ग्राम में उस समय के जलियावाला बाग को देखा जा सकता है।वहां पर कुछ पादरियों ने ग्रामवासियों को एक बाग में वार्ता के लिये बुलाया और उनको इसाई बनने के लिये विवश किया। परन्तु जब वे सफल नहीं हुए तो उन “धर्मावतारों” ने तलवार से उनको काटना शुरू कर दिया। उस दिन १६ मासूम हिंदू उन दुष्टों के हाथ से काट दिये गये। सभ्यता के ध्वजवाहक इन पादरियों ने ऐसे अत्याचार सम्पूर्ण विश्व में किये हैं। इन सबके लिये कई पोप क्षमा मांग चुके हैं। परंतु भारत के मिशनरी और सैक्युलर नेता इन अत्याचारों पर पर्दा डालने और झुठलाने की निरंतर कोशिश करते हैं। इस कारण इन पापों के लिये कोई भी पोप आज तक माफी भी मांगने की जरूरत नहीं समझता। सामने आने पर माफी मांगना, नहीं तो झुठलाना, यही इनकी असलियत है।

गोवा के महान हिंदू समाज नें न केवल इन दुष्टों के साथ संघर्ष किया अपितु अपने धर्म और धर्मस्थलों की पवित्रता की रक्षा के लिये कोई कसर बाकी नहीं छोडी। सशस्त्र प्रतिकार में भी ये पीछे नहीं रहे। कुंकडी में हिंदुओं के नरसंहार के बाद वहां के लोगों ने ५ पादरियों को मार दिया था। अपने मंदिरों को अपवित्र होने से बचाने के लिये ये कई मंदिरों को सुरक्षित स्थानों पर ले गये। गोवा की अध्यात्मिक राजधानी फोन्डा में स्थापित कई मंदिर इस अध्याय पर प्रकाश डालते हैं। वहां पर स्थित् शान्तादुर्गा मंदिर पहले केलछी में था। इसी प्रकार रामनाथ मंदिर व मंगेशी मंदिर मूल रूप से कुट्ठाडी में थे तथा महालसा मंदिर वेरणा में स्थित था। ऐसे और भी सैंकडों उदाहरण हैं जो गोवावासी हिंदू समाज की वीरता और धर्मप्रेम के अप्रतिम उदाहरण हैं। इसी धर्मपारायणता का ही परिणाम है कि गोवा को पूर्व का रोम बनाने की पोप की इच्छा अधूरी ही रह गई। नरसंहारों और मंदिर ध्वंस में मिशनरियों ने सब सीमाएं पार की हैं। आज गोवा में जितनी भी प्राचीन चर्च हैं , वे सब मंदिरों को तोड कर उनके अवशेषों पर बनायी गयी हैं। इसके बावजूद भी गोवा के हिंदू बहुल चरित्र को बदला नहीं जा सका। आज भी वहां ७०% हिंदू है तथा मंदिरों की पवित्रता बरकरार है। इसके लिये वहां का हिंदू समाज साधूवाद का पात्र है।

गोवा के इस चरित्र का दर्शन करने के लिये गोवा जाने वाले पर्यटकों को अब केवल समुद्र तटों पर नहीं वहां के प्राचीन मंदिरों के दर्शन के लिये भी जाना चाहिये। उन्हें बताना चाहिये कि गोवा केवल पर्यटन का नहीं तीर्थाटन का भी स्थान है। वहां पर इसाई मिशनरियों के अत्याचारों के प्रति समाज को जागरूक करना भी जरूरी है जिससे वहां का इतिहास कहीं और न दोहराया जा सके।

The very name Goa conjures up images of a beach resort full of fun and frolic, nudity, merry abandonment and unrestricted adult entertainment, thanks to the Goa Tourism Department and the the movies that feature Goa. The members of management committee and board of trustees of VHP who had come down to Goa for the meetings held on the 9th, 10th and 11th of January, 2011, too were besieged by the same image of Goa. The kind of image that is portrayed of Goa in the movies makes us believe that this coastal state is merely full of beaches, is Christian-majority and the landscape dotted only with churches. But, as the workers reached Fonda, the cultural capital of Goa, the realisation dawned upon them that this was not the Goa they were expecting. They could see grand temples all around. The meetings and residential accommodation too, were organised in the major Hindu religious places like the Ramnathi Mandir and Shantadurga Mandir. In that holy environment, everyone seemed to find peace and solace. Everyone could feel the spiritual inside themselves as if they were not in the Goa that they had imagined but in one of the holiest of holy Hindu pilgrimage centers. If the people of the country were to be made aware of the real history of Goa, then Goa will transform itself from the’ land of hedonists’ image to the ‘land of holiness’ in no time.

The ancient name of Goa is Gomantak, Gopapattanam, and Goparashtra (Govarashtra). The present name of Goa is a distortion of these earlier names. When Lord Krishna came to Goa, he named it Goparashtra as the folk down under were like his own kinsmen, the gopas, and it also came to be known as Govarashtra because of its cows. The sixth incarnation of Vishnu, Parshuraam had brought Goa into existence. It has been known as one of the holiest places of the Hindus ever since. The mountain called ‘Bhasma Dongar’ here is said to have been made out of the ashes from the yajnas of Parshuraam. It has been a great center of learning of Sanskrit and Vedic philosophies. One can view temples of all the gods and goddesses of the Hindu religion here. Apart from Brahma, Vishnu and Mahesh, one can also witness various forms of Surya, Hanuman, Dattatreya, Vitthal, Parshuraam, Ganesh, Kumar Kartika and Maa Durga in their temples. The remains of Jain and Buddha temples tell us that these two philosophies too must have been in wide circulation here at some point of time. Together with the ‘Nath sect’, almost all the sects of the Hindus have their temples/mathas out there. The Mathas of Adi Shankaracharya, Madhavacharya, Ramanujacharya, Goapdacharya go a long way to prove that this place must have been the repository of all the philosophies prevalent in India. One can still see thousands of ancient Hindu temples in Goa despite the iconoclastic attack of the muslims and Portuguese. After seeing these, one understands why Goa was earlier called ‘Konkan Kashi’. It proves that unlike what the Christians call the ‘Rome of the east’, Goa, is actually India’s ‘Kashi of the west.’

Goa has been at the receiving end of Muslim and Portuguese aggression for about1000 years because of its spiritual and physical prosperity. Not only did these people forcibly convert the people, but also demolished the temples and made mosques and churches out of them. The Muslim aggressors demolished at least 400 temples here. But, they could not establish themselves in Goa. The Vijayanagar Empire and Shivaji’s warriors proved to be too good for them. The locals kept relentlessly fending off the Muslim attacks and never surrendered before them. Goa had to face the brunt, when in 1498, Vasco Da Gama arrived here for the spread of Christianity. The Portuguese army spread into all of Goa like a forest fire and started enacting beastly acts to convert the locals. Their goal was the complete conversion of Goans to Christianity and they started demolishing the Hindu temples in order to achieve this end. In 1540, on the orders of the Pope, the Viceroy of Goa ordered all Hindu temples to be demolished. The Christian missionaries and the Portuguese army committed beastly acts on the people of Goa in order to convert them on the orders of the pope. St Xavier, the missionary crossed all limits of cruelty. The cruelty perpetrated in Goa in the name of ‘Inquisition’ show the barbarism of the Christians. The remnants of these cruelties can still be seen. One can see the ‘Hathkatara’ pillar. The Hindus, who would not accept conversion, were tied to this pillar, their hands were tied back on this pillar and were kept starving for days on end. If they did not relent even after this, then their hands and legs were amputated and were left to die. Different types of devices were made to inflict pain on the victims. From drowning them in boiling water to being roasted alive like a ‘kabab’, everything was employed. It is not possible to vividly describe all the heinous ways of the Christian missionaries here. In their zeal to civilise humanity in the name of God, missionaries like Xavier, with their acts of barbarism, employed all forms of barbarism. Even today, in the village of Kukandi, one can see the ‘Jallianwala Bagh’ of Goa. The padres invited the villagers to a park for a meeting and then compelled them to convert to Christianity. But, when the villagers did not relent, the missionaries started beheading the innocent villagers with their swords. Sixteen innocent Hindus were killed that day by the barbaric missionaries. The flag-bearers of civilization have done these heinous acts all over the world. So many Popes have asked forgiveness for this. But the secular leaders and missionaries of India have been trying to cover-up these gory acts. Therefore, no Pope has ever given a thought to apologize for these acts of cruelty in India. They apologize when the truth comes to light or else they try to keep it under wraps, this is the double standards practised by the Christians.

The great Hindus of Goa fought back relentlessly to preserve their religion and religious places and left no stone unturned in trying to fend off these barbarians. They took the fight to the opposition even in armed conflict. After the man-slaughter in Kukandi, the Hindus killed 5 padres in retaliation. To save the temples from getting polluted, they took the temples to safer places. The spiritual capital of Goa, Fonda, is a witness to this. The Shantadurga temple here was actually in Kelchhi prior to being located here. Similarly, Ramnath and the Mangeshi temple were earlier in Katthadi and the Mahaalasaa temple was in Verna. There are several such examples of the bravery of the Goanese Hindus. It was because of this that the pope’s dream of converting Goa into the ‘Rome of the east’ could not materialise. The missionaries have crossed all limits when it comes to massacre and iconoclasm. All the famous churches in Goa have been built after demolishing ancient temples. Despite this, the Hindu character of Goa could not be changed. Even today, there are 70% Hindus in Goa and the sanctity of the temples is intact. The Hindu of Goa deserves to be praised for this.

The tourists who visit Goa should also visit the Hindu temples of Goa and not just return empty-handed playing on the beaches of Goa. They should know that Goa is not only a tourist resort, but also a pilgrimage. It is also important that the barbarism committed by the Christian missionaries is brought to light and people made aware of it so that such heinous acts of religious persecution do not take place again in the future.

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