गोधरा का निर्णय- सैक्युलरिस्टों के मूंह पर एक तमाचाGodhra Verdict leaves the secularists frothing at the mouths

९ वर्ष पूर्व गोधरा में साबरमती ऐक्सप्रैस में सवार ५९ निर्दोष रामभक्त कारसेवकों को जेहादियों की बर्बर भीड ने जिंदा जलाने का दुष्कर्म किया था। होना तो यही चाहिये था कि उन नरपिशाचों को उसी समय फांसी पर चढा दिया जाता। परन्तु भारत के सैक्युलरिस्ट अपने वोट बैंक को मजबूत करने के लिये इस मौके का लाभ उठाने की कोशिश में इन जेहादियों को बचाने के लिये सब प्रकार के कानूनी व राजनैतिक परन्तु अनैतिक हथकंडे अपनाते रहे और इनके शिकार बने रामभक्तों के बलिदान पर तरह-तरह की कीचड उछालते रहे। तीस्ता सीतलवाड जैसे देशविरोधी व्यक्ति विदेशी पैसे की सहायता से एक घटिया उपन्यासकार की तरह नई-नई कहानियों को को गढते थे और उनको कानूनी जामा पहनाने की कोशिश करते थे। सम्पूर्ण विश्व में वे अपनी झूठी कहानियों का प्रचार कर गुजरात और भारत के हिन्दू समाज को अपमानित करने का महापाप करते रहे।स्वयं मा० स० न्यायालय ने उसको इन अपराधों के लिये डांट भी लगायी है। लालू प्रसाद जैसे भ्रष्टाचारी और विदूषक नेता ने रेलमंत्री के पद का दुरुपयोग करते हुए एक नई हास्यास्पद कहानी को जन्म दिया कि उन रामभक्त कारसेवकों ने अपने आप को स्वयं आग लगाई और इस कहानी को कानूनी आधार दिलाने के लिये एक बेरोजगार पूर्व न्यायाधीश को ढूंढ निकाला जो इस बेहूदी कहानी पर मोहर लगा सके। “जस्टिस” बनर्जी की रिपोर्ट ने न्यायपालिका की प्रतिष्ठा पर आघात पहुंचाया। देश में किसी ने इस घटिया कहानी पर विश्वास नहीं किया। देश के मीडिया का एक प्रभावी वर्ग इन कहानियों को सनसनीखेज ढंग से प्रचारित कर भारत को बदनाम कर रहा था। इन सबकी कोशिश थी कि वे इस नरसंहार को साजिश नहीं,एक दुर्घटना का परिणाम सिद्ध कर सकें।इन्होनें अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिये न्यायपालिका को भी बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोडी। ऐसा वातावरण बना दिया गया था कि अब गुजरात में न्याय नहीं मिल सकता। इन सबकी दुरभिसंधी के परिणाम स्वरूप न केवल अपराधियों की हिम्मत बढ रही थी अपितु बलिदानी कारसेवकों के परिवारों का कानून पर से विश्वास उठ रहा था। वे हताश हो चले थे। जेहादियों को भी लगने लगा था कि भारत उनके लिये अभयारण्य बन गया है क्योंकि नरसंहार करने के बाद उनको कोई पकडेगा नहीं और अगर पकड भी लिया गया तो उन्हें बचाने वालों की कमी नहीं। इन सैक्युलरिस्टों के रहते उनको खुलकर जेहाद का अवसर मिलेगा और अगर किसी ने उनको पकडने की हिम्मत भी की तो उनको इतना बदनाम कर दिया जायेगा कि वे हताश होकर इनको छोड देंगे। इसलिये अब वे अपने जेहाद के सभी प्रकारों का हिंदुओं और भारत के विरुद्ध खुलकर प्रयोग करने लगे थे।

मा० सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर गठित विशेष सत्र अदालत ने, उन्ही के आदेश पर गठित विशेष जांच दल के द्वारा की गई जांच के आधार पर २७ फरवरी,२००२ को हुए इस नरसंहार की नौवीं बरसी से ठीक पहले यह निर्णय सुनाकर इन षडयंत्रकारी सैक्युलरिस्टों के गाल पर एक जोरदार तमाचा मारा है। इस निर्णय में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि गोधरा का नरसंहार एक साजिश का नतीजा था। गोधरा रेलवे स्टेशन पर जेहादियों की उन्मादी भीड ने एक पूर्वनियोजित षडयंत्र के आधार पर ही निर्दोष कारसेवकों की हत्या की थी। तीस्ता, लालू,बैनर्जी तथा अन्य षडयंत्रकारियों में अगर थोडी भी गैरत है तो उन्हें अपने पापों के लिये राष्ट्र से क्षमा मांगनी चाहिये। परन्तु इन बेशर्मों से इस शिष्टाचार की अपेक्षा भी व्यर्थ है। अगर यह निर्णय मा० स० न्यायालय द्वारा गठित अदालत द्वारा नहीं आता तो ये दुष्ट लोग फिर गुजरात की न्यायपालिका के विरुद्ध विषवमन करते। न्याय में विलम्ब तो हुआ, परन्तु शायद यह विलम्ब न्याय के ही हित में हुआ। अब उनके पास बगलें झांकने के सिवाय कुछ नहीं बचा है। अब न्याय के हित में यही है कि मा० स० न्यायालय स्वयं संज्ञान लेकर न्यायिक प्रक्रिया में अनावश्यक विलम्ब करने के लिये इन लोगों को दंडित करे, तभी अपने निहित स्वार्थों के लिये न्यायिक प्रक्रिया में बाधा पहुंचाने और उसे बदनाम करने वालों पर लगाम लग सकेगी।

यह न्याय अभी अधूरा है। विशेष जांच दल द्वारा एकत्रित साक्ष्यों की कमी के कारण इस षड्यंत्र के मुख्य सूत्रधार मुल्ला उमर सहित ६३ अभियुक्त बरी हो गये हैं। उनके विरुद्ध दोबारा जांच होनी चाहिये। साक्ष्य एकत्रित करने में स्थानीय लोगों का सहयोग लेना चाहिये। त्वरित कार्यवाही करते हुए ३१ अभियुक्तों को अविलम्ब फांसी पर चढाना चाहिये और शेष ६३ दोषियों तथा १३ भगोडों को भी उनके पापों की सजा जल्द देनी चाहिये तभी बलिदानी कारसेवकों की आत्मा को शान्ति मिलेगी। इनके परिवारजनों और गुजरात की जनता का न्याय में विश्वास बहाल करने के लिये भी यह अत्यंत आवश्यक है।

Nine years ago, a jehadi mob had indulged in the dastardly act of burning alive, 59 innocent Raam-bhakta, Kar-sevaks on board the Sabarmati Express in Godhra. Talking of what should have been done to them, I feel similar treatment should have been meted out to them, and the demons should have been hanged there and then. But, in order to strengthen their vote-banks by trying all the tricks in the rule-book to save these jehadis, the secularists of the country, decided to put this heinous act to some good use. They used all kinds of tools, political, legal but always unethical and left no stone unturned in denigrating the sacrifice of the Raam-bhaktas. Teesta Setalvad and her cohorts, with the aid of foreign moolah, would conjure up new stories, every new and then, which read even worse than bad fiction and then try to legitimize the story. They did the most ghastly sin of demeaning the Hindu religion and the Hindus and people of Gujarat, all over the world, by concocting false stories. The Hon. Supreme Court even took cognizance of this and reprimanded her. A corrupt and buffoon of a politician, Laloo Prasad Yadav, in gross violation of his ministerial portfolio, cooked up a ludicrous theory that the Kar-sevaks had incinerated themselves in the coach and to legitimize this theory, chanced upon a retired unemployed ex-judge, so that he could get a legal stamp of approval. The Justice Banerjee Committee left the reputation of the judiciary in tatters. No one in the country believed in this incredulous theory. A certain influential section of the media maligned the country’s reputation by sensationalizing these stories. All of them tried their best to present this as a case not of man-slaughter, but an accident. To uphold what they wanted to prove, they did not even think twice of criticizing and maligning the judiciary. An environment was created wherein it could be made to seem that justice was not possible in Gujarat. Because of the nexus of these people, not only were the perpetrators of the Godhra carnage getting emboldened, but also, the families of the victims had started losing faith in the system. They had become disheartened. As far as the jehadis are concerned, it was party-time for them, for they knew, that India is now their favourite war-zone, where they could easily get away by playing any sort of man-slaughter and not get caught and even in the worst case scenario, if they did indeed get caught, there would always be enough people to bail them out. They knew that the secularists would leave the field open for them to carry out their jehadi activities and in case they were apprehended, the ones who dared to do so would be so defamed that they would eventually leave them out of frustration.

The special sessions court, constituted by the Hon SC delivered this verdict a few days before the ninth anniversary of the ’27 February, 2002 Godhra carnage’, the verdict was based upon the Special Investigation Team’s findings which was also constituted by the Hon’ble Supreme Court, the verdict has, no doubt, left the secularists bleeding and frothing at their mouths. It has been very specifically mentioned that the Godhra carnage was the result of a conspiracy. The frenzied jihadi mob present at the Godhra Railway station had carried out the carnage in a pre-planned manner on the innocent Kar-sevaks. If the Laloos, Teestas and Banerjee’s have some sense of self-respect left in them, then they should openly acknowledge their shenanigans and ask for forgiveness from the nation. But, it is outside the realm of the thinkable to even think of getting such an apology from them. Had this verdict not have come from the court working under the supervision of the Hon. SC, these wicked people would have again rallied against the Gujarat judiciary. Justice was definitely delayed, yet, now it seems this delay was in favour of justice. Now, they have nothing else to do, but indulge in superfluous talk. The judiciary should take cognizance of this fact and punish these people for delaying the process of law, only then will people like these learn a lesson and it will prove to be a deterrent for anyone planning to play games with the judiciary and maligning it.

However, this verdict is as yet incomplete, for the main culprit and organizer of this carnage, Mullah Omar along with his 63 cohorts have been let off by the court on account of lack of evidence collected by the Special Investigation Team. Investigations should be initiated against them again. Help should be taken from the local populace for evidence-collection. Acting fast on the verdict, the 39 culprits should be sent to the gallows immediately, and the rest 63 guilty and 13 absconders should also be brought to book quickly. Only then, will the souls of the Kar-sevaks rest in peace. It is essential that this is done so that the martyr Kar-sevaks’familes and the people of Gujarat’s confidence in the justice system can be re-established.

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