हज नीति पर अब तो पुनर्विचार करो!

“माले मुफ्त दिले बेरहम”, “बडे बेशर्म होकर तेरे कूचें से हम निकले”। ये दोनों कहावतें भारत की सरकारों की हज नीति पर लागू होती हैं। भारत के न्यायालय कई मामलों में हज यात्राओं पर जनता की गाढी कमाई को बेदर्दी और बेशर्मी के साथ लुटाने पर आपत्ति कर चुकी हैं। अब तो भारत के सर्वोच्च न्यायालय नें स्पष्ट कह दिया है कि,” हो सकता है कि इस हज नीति का राजनीतिक उपयोग हो। परन्तु यह निश्चित रूप से एक भद्दी धार्मिक परम्परा है। अब इस सम्बंध में अगले साल तक नयी हज नीति बननी चाहिये।” मा. सर्वोच्च न्यायालय की इस कठोर टिप्पणी के बाद भारत के सभी राजनीतिक दलों को मुस्लिम तुष्टीकरण के लिये हज यात्रा पर सरकारी खजाने से हर वर्ष करोडों रु. लुटाने की दुर्नीति पर विचार करना ही चाहिये। क्या वे इस मामले में भी भ्रष्टाचार के मामलों की तरह मा. न्यायालय के स्पष्ट आदेश की प्रतीक्षा कर रहे हैं?

भारत में १९५९ से हज सब्सिडी चल रही है। भारत के उस समय के “नवाब” जवाहर लाल नेहरू नें हज एक्ट बनाकर इस सब्सिडी को लागू किया था। उन्हें मालूम था कि अपनी जेब से एक भी पैसा खर्च किये बिना वे मुस्लिम वोट बैंक का निर्माण कर सकते हैं और सत्ता पर अपनी पकड हमेशा के लिये बना सकते हैं। सरकारी खजाने का बेशर्मी के साथ अपने स्वार्थों के लिये उपयोग करने की जो परम्परा नेहरू जी ने शुरू की थी, उनके बाद की सभी सरकारों इस दिशा में उनसे भी आगे निकलनी की अन्धी दौड लगानी शुरू कर दी। इस दौड में किसी को भी देश के हितों का ध्यान नहीं रहा। सभी सरकारें इस सब्सिडी की राशि बढाती रहीं। कई प्रदेश सरकारों नें तो अधिगृहित हिन्दू मन्दिरों में आयी चढावे की राशी का भी इस सब्सिडी के लिये दुरूपयोग करने का अनैतिक एवं असंवैधानिक पाप करने का दुःस्साहस किया। भाजपानीत केन्द्र सरकार से देश को कुछ अपेक्षाएं थीं। परन्तु वे भी इस होड में पीछे नहीं रहे। उन्होंनें हज सब्सिडी तो बढाई ही, उन्होंनें करोडों रू. खर्च कर देश में अनेकों हज हाउसों का निर्माण भी किया जिनका घोषित उपयोग वर्ष में केवल एक बार होना है। वे सारे साल जेहादी कार्यों के लिये ही उपयोग हो रहे हैं। यह अनुदान सुरसा के मूंह की तरह बढता जा रहा है। २००८ में केवल केन्द्र सरकार नें ७७० करोड रू. इस मद पर खर्च किये। अनुमान है कि गत वर्ष यह राशि बढकर १८०० करोड रु. हो गई। २००७ में ४७४५४ रु. प्रति हज यात्री केन्द्र सरकार नें खर्च किया था। इसके विपरीत विश्व की सबसे कठिन तीर्थ यात्रा, मानसरोवर यात्रा पर केवल २०० रू. प्रति यात्री खर्च किया जाता है। कुछ समय पूर्व सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल एक याचिका के जवाब में केन्द्र सरकार नेण कहा था कि वे बाकी धर्मों की यात्राओं पर भी अनुदान देंगे। इसी आश्वासन के आधार पर ही न्यायालय नें हज सब्सिडी को वैधता प्रदान की थी। क्या केन्द्र सरकार की धर्मनिरपेक्ष नीति का यही अर्थ है?

इस विषय पर इस्लाम क्या कहता है, यह जानना बहुत आवश्यक है। शरीयत बहुत स्पष्ट रूप से कहती है कि हज यात्रा केवल उन मुसलमानों को करनी चाहिये जो शारीरिक और आर्थिक रूप से सक्षम हों। हज यात्रा अपने पैसे से की जायेगी, तभी अल्लाह को कबूल होगी। इसका अर्थ है कि १९५९ की बाद की हज यात्राएं हलाल नहीं हैं। यह सब्सिडी करदाताओं के पैसे से दी जाती है जिनमें गैरमुस्लिम करदाताओं, जिनको ये काफिर समझते हैं, की संख्या निश्चित रूप से ज्यादा है। क्या यात्रा उनके लिये हराम नहीं होंगी? ये एक ही परिस्थिती में हलाल हो सकती हैं जब भारत का मुसलमान इस पैसे को “मालेगनीमत” अर्थात जेहाद के लिये की गई लूट का माल समझें और यह समझना देश के लिये कितना घातक होगा, यह इन राजनीतिज्ञों को समझना चाहिये।

इस सब्सिडी के सम्बंध में मुस्लिम नेताओं की राय जानना भी महत्वपूर्ण है। शहाबुद्दीन, औवैसी से लेकर मदनी तक सबकी राय यही है कि इस तरह की सब्सिडी इस्लाम विरोधी है और शरिया के खिलाफ है। इसके साथ ही उनका यह भी कहना है कि यह सब्सिडी एयर-इन्डिया के हवाई जहाजों पर ज्यादा खर्च होती है जिसका किराया सबसे ज्यादा है। उसकी तुलना में अन्य एयर लाइन्स सस्ते किराये पर ले जाती हैं जिसके लिये सब्सिडी की जरूरत नहीं है। इस सब्सिडी के कारण मुसलमान बदनाम भी होता है और उसको असल में कोई फायदा नहीं हो रहा है। वे इस सब्सिडी को तो छोडना चाहते हैं परन्तु क्या वे अन्य सुविधाएं जैसे हज हाउस को भी छोडेंगे?

केन्द्र सरकार नें मा. न्यायालय को अश्वासन दिया था कि वे २०११ से इस सब्सिडी को धीरे- धीरे समाप्त करेंगे परन्तु अभी तक इस दिशा में अभी तक कोई ठोस कार्य योजना नहीं लायी गई है। अब इस यात्रा पर सरकारी खर्चे से भेजे जाने वाले भारी भरकम प्रतिनिधी मंडल पर न्यायालय नें रोक लगा दी है। अब समय आ गया है कि सभी राजनीतिक दल मिल कर विचार करें कि इस अनैतिक, असंवैधानिक और देशविरोधी परम्परा को कैसे बन्द किया जाये। उससे पहले इनको विचार करना होगा कि कोई भी ऐसे विषयों पर राजनीति नहीं करेगा।अब इन सबको समझ लेना चाहिये कि तुष्टीकरण की राजनीति से अभी तक देश को नुकसान ही हुआ है। विभिन्न विषयों पर न्यायायपालिका के निणयों से सबको समझना चाहिये कि अब कोई भी समझदार नागरिक तुष्टीकरण की राजनीति के दुष्परिणामों को समझने लगा है। जब तक यह दुर्नीति चलती रहेगी मुस्लिम समाज देश की मुख्य धारा में शामिल नहीं हो सकेगा। हिन्दुओं में आक्रोष बढता रहेगा और इसके परिणामस्वरूप कभी भी विस्फोट्क स्थिती निर्माण हो सकती है।

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