हिन्दू विरोधी राजनिती का शर्मनाक व्यवहार (Embarrassing behavior of anti-Hindu politicians)

आज आंध्र प्रदेश में जो हो रहा है, यह हिंदू विरोधी राजनिती का ज्वलंत उदाहरण है.  इसके 3 प्रसंग अभी वर्तमान में घटित हो रहे है.
हाल ही में जानकारी मिली है की आंध्र प्रदेश राज्य सरकार जरूरतमंदो को घर बनाने के लिए भूखंड देने के लिए मंदिरो की भूमि का आंवटन करने वाली है. वैसे तो जरूरतमंदो को जमीन देने में तत्वतः कोई विरोध नही होना चाहिए. किंतु हिन्दू दानदाताओं ने इस भूमि को मंदिरों के रखरखाव के लिए तथा उसके विकास के लिए दान किया है. यह राज्य सरकार का कर्तव्य है की वह दानदाताओं के  इच्छा तथा भावना का ध्यान रखे. राज्य सरकार जमीनों के निलामी का मार्ग अपना  रही है. पहले ऐसा अनुभव है कि अनेक बार हेतूपुर्वक गलत ढंग से निलामी करने से मंदिरों को निलामी में जमीन के लिए योग्य मूल्य नही मिल पाया. जमिन के खरिददारों ने बादमें बडे मुनाफे से वह जमीने पुनः तुरंत बेची. इसी कारण से मंदिरों की जमीन बेचने पर हायकोर्ट ने रोक लगाई हुई है. आश्चर्य का विषय यह है कि राज्य सरकार ईसाई मिशनरी संस्थाओं  की या मुस्लिम वक्फ बोर्ड की बडे मात्रा में जो जमिने है उनके अधिग्रहण करने कि बात नही कह रही है. सौ वर्ष पूर्व ब्रिटिश सरकारने ईसाई संस्थाओं  को जो जमिने लीजपर  दी हुई थी वह लीज कई संस्थाओं के लिए 1994 में ही समाप्त हो गई है. वक्फ बोर्ड कि जमिनों का भी जरूरतमंदो को घर देने के लिए उपयोग किया जा सकता है.  मंदिरों के जमिनो का इस तरिके से बेचना 2006 के हायकोर्ट और उसके  बाद के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के विपरीत है. सही मार्ग तो यह है की मंदिरों को चलाने के लिए हिन्दू समाज को सौप देना चाहिए. अभी सुप्रीम कोर्ट में चल रहे जगन्नाथ पूरी मंदिर केस में सुप्रीम कोर्ट ने योग्य  ही पुछा है कि क्या सरकारो ने मंदिर तथा धार्मिक संस्था चलानी भी चहिए?  कुछ राजनितिज्ञो के संपत्ती की पिपासा  से भी  आज  मंदिरों की भूमि लुप्त हो रही है.

आंध्र प्रदेश के सरकार ने करदाता के पैसो से प्रती माह हर ईसाई पास्टर को ₹.5,000/-, हर  मस्जीद के मौलवी को ₹.10,000/- तथा हर मुस्लीम मौजन (नमाज के पहले आवाज देनेवाले) को ₹.5,000/-  देने की घोषणा की है. यह संविधान के धारा 27 के विरूद्ध है. ईसाई   मिशनरी  संस्थाओं के पास तथा वक्फ बोर्ड के पास पर्याप्त संपत्ती है, जिससे वह पास्टर तथा मौलवी यों का पैसा दे सकते है. सबसे बडी विडंबना तो यह  है की न तो आंध्र प्रदेश सरकार ईसाई मिशनरीयो के षडयंत्र को रोकने के लिए कुछ कर रही है बल्की सामान्य हिन्दू समाज से इस मार्ग से  स्वयं को धर्मांतरीत करने के प्रयास को एवं ऐसे लोगो उलटा धन दिलवा रही है!!

और फिर तिरूपती देवस्थान तथा श्री शैलम के ज्योतिर्लिंग मंदिर सहित अनेक मंदिरों में अहिन्दू ओं की व्यवस्थापन में तथा प्रत्यक्ष नौकरी में रखने का विवादित मुद्दा है. आंध्र प्रदेश के चिफ सेक्रेटरी श्री सुब्रमण्यमजी ने अहिन्दू ओं को ऐसी नौकरी या व्यवस्थापन में सहभाग न देने का जो स्पष्ट पब्लिक  स्टँड लिया है वह अभिनंदनीय है. श्री शैलम  में ऐसे 14 ईसाई तथा मुस्लिम नौकरी में है. तिरूपती के पवित्र सात पहाडों में ऐसे लोगो कि सहायता से धर्मांतरण के अनेक प्रयास ईसाई मिशनरीयोंने पहलेभी  किये है. श्री शैलम में , विद्यमान प्रावधानों के विरूध्द जाकर , एंडोवमेंट बोर्ड के कुछ अधिकारीयों के मिलिभगत से , अनेक दुकान मुसलमानों को आंवटीत किये गये थे. स्थानीय न्यायपालिका ने उसपर रोक लगाकर बादमें उसको रद्द भी किया.

आंध्र प्रदेश में नयी सरकार आने के बादसे ही मुस्लीम तथा ईसाई तुष्टीकरण की ऐसी अनेक गतिविधियां सरकारी स्तरपे तेज हो गयी है, जो हिन्दू आस्था तथा संवेदनाओं  के लिए अपमानजनक तथा खतरनाक है. संपूर्ण आंध्र प्रदेश में इन विषयों को लेकर चिंता तथा प्रतिक्रिया है. अनेक हिन्दू संगठनों ने इसके प्रती अपना आक्रोश मुखर  होकर प्रकट भी किया है तथा आंदोलन करने का निश्चय भी प्रकट किया है. राज्य के महामहिम राज्यपाल महोदय को आवेदन  इन विषयों पर दिये गये है. आंध्र प्रदेश के  राज्य सरकार को संयमपूर्वक, हिन्दू आस्थाओं का सम्मान  बनाये रखते हुए ही कोई भी कदम उठताना चाहिए. राज्य सरकार के हिन्दू आस्था को नुकसान पहुचाने के  किसी भी प्रत्यक्ष या परोक्ष कदम का जागृत हिन्दू समाज पुरजोर विरोध करेगा. –

 

मिलिंद परांडे.
महामंत्री, विश्व हिन्दू परिषद

You May Also Like

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *