भारत ने एक युगपुरुष और कर्मयोगी को खो दिया

डा. ए पी. जे. अब्दुल कलाम नहीं रहे। विहिप के लिए लिखा जाना चाहिये। परन्तु कहाँ से शुरू करुँ ? व्यक्तित्व के इतने आयाम कि सब पर लिखा नहीं जा सकता। डर लगता है कि जो छूट जायेगा कहीं महत्वपूर्ण न हो। लेकिन इस विश्वास के साथ कि जो लिखा जायेगा वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं होगा मैंने लिखना शुरू कर दिया। मैं शुरुआत वहीं से करता जहाँ से विश्व हिन्दू परिषद् दिवंगत अब्दुल कलाम के साथ जुड़ गयी। जब उनका राष्ट्रपति के पद के लिये नामांकन किया गया , तब मैं मुंबई में था। वहां पत्रकारों ने प्रतिक्रिया मांगी ,मैंने एक क्षण सोचकर उनके नामांकन का हार्दिक स्वागत किया। अगले दिन मैंने समाचारपत्र में देखा तो मा. आचार्य गिरिराज किशोर जी ने भी दिल्ली से उनके स्वागत का बयान दिया था। हमसे पूछा गया कि आप एक मुसलमान का स्वागत कैसे कर सकते हो। मेरे पास जो जानकारी उपलब्ध थी ,उसके आधार पर मैंने तुरंत कहा कि वे किसी भी मत की परिधि से बाहर हैं। जो गीता और उपनिषद् पढता हो ,जिसका बचपन रामेश्वर के मंदिर की छाया में बीता हो ,जो भारत को समर्थ बनाने के लिए जीता हो , वह एक कर्मयोगी है और भारत माँ का सच्चा सपूत है। बाद में जब हम उनके संपर्क में आये व् उनके बारे में पढ़ा और जाना , उससे यह सिद्ध हो गया कि हमारा आकलन गलत नहीं था। हाँ , अधूरा जरूर था।

वे भारत के श्रेष्ठतम वैज्ञानिकों में से एक थे। वे केवल मिसाइल पर काम नहीं करते थे ,वे भारत के वैज्ञानिकों को कुछ नया करने के लिए प्रेरित करते रहते थे। अणु ऊर्जा के लिये यूरेनियम चाहिये , जिसके लिए हमें दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता है। वे जब चाहे हमारी बाहें भी मरोड़ देते हैं। परन्तु थोरियम विकल्प के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। भारत में थोरियम के अपार भण्डार हैं। इसलिए वे प्रेरित करते थे कि इस प्रक्रिया को सरल और सस्ता बनाया जाये। वे जानते थे कि रामसेतू के टूटने पर वहां पर विद्यमान थोरियम का अपार भंडार बह जायेगा। इसलिए वे रामसेतू तोड़ने के पक्षधर नहीं थे। वे हिन्दुओ की आस्था का सम्मान करने के कारण भी रामसेतू को तोड़ने का विरोध करते थे। ईसाई मिशनरी हमेशा से ही भारत में धर्मान्तरण के नए -नए षडयन्त्र करते रहते हैं। एक बार उन्होंने पंजाब के सिक्ख समाज और हरियाणा के जाट समाज को विशेष लक्ष्य बनाकर कुछ कार्ययोजना बनाई थी। उस समय मा. अशोक जी के नेतृत्व में मैं तथा कुछ जाट और सिक्ख नेता राष्ट्रपति कलाम से मिलने गए। उन्होंने हमारा ज्ञापन लेने के बाद उसकी एक-एक पंक्ति पर चर्चा करनी शुरू की। हमारी मांगों की वैधानिकता पर उनके प्रश्नों से यह स्पष्ट होता था कि इस विषय पर उनकी रूचि और अध्ययन कितना व्यापक था। वे धर्मान्तरण के दुष्परिणामों से भली – भाँति परिचित थे। ३० मिनट के लिए निर्धारित हमारी मुलाकात ५५ मिनट चली। यह भेंट हमेशा अविस्मरणीय रहेगी।

आजादी के बाद वे भारत के पहले महापुरुष थे जिन्होंने देश को एक सपना दिखाया ,उसको प्राप्त करने के लिए देश को प्रेरित किया और उसको प्राप्त करने का मार्ग भी दिखाया। नालंदा के एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा था कि भारत को महाशक्ति बनाने के लिए हमें गीता और उपनिषदों के मार्ग पर चलना होगा। नालंदा जैसे प्राचीन विश्वविद्यालय की पुनर्स्थापना , जहां भारतीय दर्शन पढ़ाया जाये ,की आवश्यकता भी उन्होंने प्रकट की थी।

अमर्त्यसेन जैसे लोग उसका जो हाल कर रहे थे ,वे उससे बहुत दुःखी थे। वे अन्तर्मन की गहराई से हिन्दू दर्शन को ही देश का दर्शन मानते थे। जब फाइटर पायलट ण बन पाने के कारण वे निराशा में थे तब एक हिन्दू संत ,शिवानंद जी महाराज , ने ही उनकी निराशा को दूर किया था और जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी थी।

वे समस्त भारतीयों के लिए एक रोल माडल बन गए थे। प्रत्येक युवा उनके संदेशो को अपने जीवन में उतारना चाहता है। भारत के मुस्लिम समाज , जिसका वो अनन्य अंग थे ,को भी उनको रोल माडल के रूप में अपनाना चाहिए। औवेसी ,अबु आजमी ,आजम खान उनके आदर्श नहीं हो सकते। इनका मार्ग बर्बादी का मार्ग है। केवल चाचा कलम का मार्ग ही उनको विकास और शांति के मार्ग पर ले जा सकता है।

कलाम चाचा को शत -शत प्रणाम

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