सैक्युलरवादियों के दोगलेपन का ताजा शिकार- भारत की न्यायपालिका/Indian Judiciary- the latest target of Indian “Secularists”

माओवादियों के मददगार विनायकसेन व दो अन्य को राजद्रोह के अपराध में आजीवन कारावास की सजा घोषित होते ही ऐसा लगा मानो भारत के सैक्युलर जगत में भूकम्प आ गया। इनकी सारी बिरादरी एक स्वर में न्यायपालिका के पीछे हाथ धोकर पड गई। इनके लिये भारतीय संविधान से लेकर भारत के न्यायाधीशों तक , सभी “गरीब विरोधी” और “अंधे” बन गये । इनके अनुसार विनायकसेन को बिना किसी सबूत के आधार पर सजा सुनाई गई तथा गरीबों की आवाज उठाने के कारण ही सजा सुनाई गई है। निर्णय को पढे बिना ही वे स्वयं ही आरोपों की कल्पना कर रहे हैं और उनकी मनमानी व्याख्या कर रहे हैं। उन्होनें यह भी तथ्य सामने नहीं आने दिया कि इनकी जमानत की अर्जी मा० सर्वोच्च न्यायालय दो बार ठुकरा चुका है। क्या सैशन कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक सभी बिना सबूतों के आधार पर निर्णय देते रहे? दुर्भाग्य से भारत के एक पूर्व न्यायाधीश, श्री राजेन्द्र सच्चर भी इस दौड में शामिल हो गये । वैसे इनके लिये यह स्वाभाविक ही था क्योंकि जब भी अलगाववादियों का मामला आता है ये हमेशा उनके साथ खडे हुए दिखाई देते हैं। चाहे माओवादी हों या जेहादी आतंकवादी यह सारा “सैक्युलर गैंग” इनके साथ खडा होता है। भारत विरोध के अपने घोषित एजेंडे की पूर्ती में जो भी बाधा बनता है, ये सभी इसी प्रकार उसके पीछे पड जाते हैं। पत्रकार जगत के भी कुछ स्वनामधन्य पत्रकार हमेशा की तरह अपने संसाधनों के साथ सामने आ जाते हैं। इस बार तो एक चैनल इस विषय पर आग उगले वाले हर व्यक्ति को लगातार प्रमुखता से दिखा रहा है मानो अब देश से भ्रष्टाचार, महंगाई, आतंकवाद, अलगाववाद, आदि सभी समस्याएं समाप्त हो गई हों और विनायक सेन के छूटने से देश में रामराज्य आ जायेगा। ऐसा लगता है कि इन सब लोगों का न्यायपालिका पर कोई विश्वास नहीं रहा। अभी उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में याचिका के विकल्प बचे हैं। शायद ये न्यायपालिका को प्रभावित करने की रणनीति के अंतर्गत इस प्रकार के आक्रामक रुख का प्रयोग कर रहे हैं।

इन सैक्युलर तालिबानियों के निशाने पर न्यायपालिका पहली बार नहीं आयी है। संसद पर हमला करने के आरोप में अफजल गुरू को फांसी की सजा हो या अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक दर्जा देने का मामला हो; आन्ध्र सरकार द्वारा मुस्लिम समाज को असंवैधानिक तरीके से आरक्षण देने का मामला हो या गुजरात दंगों के मामले में नरेन्द्र मोदी को क्लीन चिट देने का मामला हो, जब भी इनके एजेंडे के अनुसार निर्णय नहीं आये ,ये इसी प्रकार न्यायपालिका पर आक्रमण करते रहे हैं। ऐसे और भी पचासियों उदाहरण हैं जब ये लोग न्यायपालिका को इसी प्रकार अपमानित करते हुए सब प्रकार की सीमाएं पार कर आक्रमण करते हैं।

ये वही लोग हैं जो रामजन्भूमि के विषय में निर्णय आने के पूर्व हिंदू संगठनों पर न्यायपालिका के निर्णय को मानने के लिये हमेशा आक्रमण करने की कोशिश करते थे। परन्तु हिन्दुओं के पक्ष में निर्णय आने के बाद ये इसी प्रकार से मा० न्यायपालिका पर अभद्र हमला करने लगे थे। ३० सितम्बर,२०१० को सायं ४ बजे तक न्यायपालिका की दुहाई देने वाले ये सभी सैक्युलर तालिबानी निर्णय आते ही गिरगिट की तरह रंग बदलने लगे और बहुत ही भद्दे तरीके से निर्णय की धज्जी उधेडने लगे। मा० न्यायाधीशों पर व्यक्तिगत हमला करने में भी इन्होनें संकोच नहीं किया। दुर्भाग्य से ये सभी लोग मीडिया के एक वर्ग द्वारा भद्र लोक के व्यक्ति के रूप में दिखाये जाते हैं। इनके विपरीत हिंदू संगठनों के प्रतिनिधियों ने कभी न्यायपालिका के प्रति असम्मान प्रकट नहीं किया। हम हमेशा कहते रहे हैं कि आस्था के मामले न्यायपालिका के आधीन नहीं आते । यह केवल हमारा ही कहना नहीं है, कई मामलों में मा० न्यायपालिका का भी यही निर्णय है। अन्य धर्मों का मामला आने पर ये सैक्युलरवादी भी यही कहते हैं। परन्तु ऐसा कहते समय भी कभी हमने मा० न्यायपालिका का असम्मान नहीं किया। विपरीत निर्णय आने पर हमने कभी मा० न्यायाधीशों पर व्यक्तिगत हमला नहीं किया। हमने ऐसे सब मामलों में कानूनी प्रक्रिया का ही प्रयोग किया है।

इन लोगों को यह समझ लेना चाहिये कि देश की जनता सब समझ रही है। इसलिये जनता हमेशा हमारे साथ रहती है और सब प्रकार के प्रचार के बावजूद ते लोग आम समाज से कटे रहते हैं। इन लोगों को वास्तविकता को स्वीकार करनी चाहिये और अपने तालिबानी तरीकों से बाज आना चाहिये अन्यथा उन्हें अप्रसांगिक बनने में देर नहीं लगेगी

There seems to be a lot of consternation within India’s secular establishment after the life-term imprisonment verdict for sedition was pronounced by the judiciary against Binayak Sen, a friend of the Maoists and two others. The whole secular establishment now seems to be against the judiciary. For them, everything from the constitution to the judiciary, all are anti-poor and blind to the welfare of the poor. According to them, Binayak was pronounced guilty without any evidence and only because he was pro-poor. They are making arbitrary allegations and then dissecting the same without even having gone through the verdict. They even concealed the fact that the Hon. Supreme Court had twice denied bail to Sen. So, does it mean that from the Session’s court to the Supreme Court, and all have been passing verdict without any evidence? It is unfortunate that a former judge, Mr Rajinder Sachar, too has got involved in this episode. But, it was only logical that he did it as he has always taken sides with the separatists. This ‘secular gang’ will always put up a defense for them, be they Maoists or jehadi terrorists. Whoever comes in between their openly advocated anti-India policy, get the wrong side of the stick from this gang. Some well-established names of the journalistic world, too, join the bandwagon with all the resources at their disposal. This time, one of the channels can be seen providing prime time space to all those people who are spewing venom on this issue, as if issues like corruption, inflation, terrorism, separatism etc are no longer a cause for worry and the release of Binayak Sen would usher in a Ram Rajya in India. It seems all these pseudo-seculars have no trust in the judiciary. Binayak Sen still has the option of knocking on the doors of the High and the Supreme Court. It seems the gang of seculars is doing all this only to pressurise the judiciary in advance to get a favourable judgement.

This is not the first time when the judiciary has come under attack by these secular Talibanis. Prior to this, be it the case of the death sentence of Afzal Guru in the parliament attack case, the grant of minority status to the Aligarh Muslim University, the unconstitutional policy of the Andhra govt to give reservations to Muslims or the clean-chit given to Narendra Modi in Gujarat riots case, these secularists have been known to get aggressive at the judiciary. There are innumerable more examples when they have launched a frontal attack on the judiciary when judgements have not been in their favour and in this, they always cross the limits of constitutional propriety.

They are the same people who would once advise us to accept the verdict of the court on the Ram janmabhoomi issue, but now that the same judiciary has pronounced a pro-Hindu verdict, they are now attacking the judiciary. On the eve of the judgement on September 30, 2010, 5 pm, these secular talibanis changed colour and started criticising the judgement. They did not think twice about making personal allegations against the Hon. Judges. Unfortunately, these people are portrayed as the moderate, liberal face of India by the media. On the contrary, the representatives of the Hindu organisations have never once made any frontal personal allegations on the judiciary. We have always maintained that issues of faith cannot be dealt by the judiciary. This is not something that only we have been saying, even the judiciary has made the same comments on matters of faith. Even these secularists sing the same tune when it comes to question of other religions. But, despite all this, we have never insulted the judiciary or made any personal comments on hon’ble judges while giving arguments on the issues of faith. We have always taken due recourse to law.

These people must understand that the citizens of the country cannot be fooled forever and can see through their game. That is why the masses are always with us and despite all their show and rhetoric; they do not have the support of the masses. These people must understand the reality and forgo their talibani arm-twisting policies or it won’t be long before they become irrelevant and are consigned to the dust-bin of history.

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