जाति आधारित जनगणना के बाद अब “महादलित”- समाज को अपने स्वार्थ के लिये और कितना बांटोगे?

हिन्दू समाज को अन्ग्रेज इतना नहीं बांट सके जितना ये स्वार्थी राजनीतिज्ञ बांट रहे हैं। स्वतंत्रता के बाद दलितों के लिये आरक्षण की अस्थायी व्यवस्था की आवश्यक्ता थी। आज के मनु डा० भीमराव अम्बेडकर ने यह व्यवस्था बनाते समय इसको अस्थायी रूप दिया था। परन्तु किसी भी सरकार ने इसके लाभों का विश्लेषण करना तो दूर अब इसको लगभग स्थायी रूप दे दिया है। ये लोग यहीं तक नहीं रुके, अपने स्वार्थ के लिये ये समाज को और बांटते जा रहे हैं। नये-नये वर्ग बनाने के बाद अब वे इन वर्गों में भी उपवर्ग बनाकर परस्पर संघर्ष का आधार तैय्यार कर रहे हैं। दलितों में भी अब महादलित बनाकर ये उनका विकास करना चाहते हैं या उनको आपस में लडाना चाहते हैं?

You May Also Like