जाति पर आधारित जनगणना- हिन्दू समाज को तोडने का एक षडयन्त्र

कल भारत के वित्त मन्त्रि ने लोकसभा में कहा कि जनगणना में जाति को शामिल करने का निर्णय लिया जा चुका हॅ जिस पर कॅबिनेट की अगली बॅठक में मोहर लगा दी जायेगी। लोकसभा में कुछ सान्सदों के शोर मचाने पर मन्त्रि जी ने यह जवाब दिया। परन्तु यह देश का दुर्भाग्य हॅ कि एक भी सान्सद ने इस देशतोडक कदम का विरोध करने का साहस नहीं दिखाया। क्या देश की राजनीति वोट बॅंक की इतनी बन्धक बन गयी हॅ कि कोइ देश हित में आवाज भी नहीं उठा पाता? इस गम्भीर मुद्दे पर कम से कम सार्वजनिक बहस तो होनी चाहिये थी जिससे देश की राय जानी जा सके।

जातिगत जनगणना का प्रारम्भ अन्ग्रेजों ने किया था क्योंकि वे जातिवाद के विष का परिणाम जानते थे। परन्तु उस समय के राजनीतिज्ञ देश हित को राजनीतिक लाभ-हानि की तराजू में नहीं तोलते थे। सभी राजनीतिक-सामाजिक सन्गठनों के सशक्त विरोध के कारण १९३१ के बाद इसे रोक दिया गया। महात्मा गान्धी ने तो कम्युनल अवार्ड के विरोध में आमरण अनशन तक किया था। हमारे यहां वर्ण व्यवस्था थी परन्तु जातिवाद तथा छुआछूत नहीं था। यह गुलामी की देन हॅ। हमने गुलामी के इस अवशेष को अपनी जिन्दगी का हिस्सा बना लिया और जातिवादी राजनीति ने समाज को बान्टना शुरु कर दिया।

सन्विधान निर्माता जातिवाद के दुष्परिणाम जानते थे। इसीलिये डा०अम्बेडकर जातिविहीन समाज का निर्माण सन्विधान का लक्ष्य मानते थे। वे कहते थे हजारों जातियों में बन्टा हुआ समाज एक राष्ट्र कॅसे बन सकता हॅ? इसीलिये सन्विधान में कहीं भी पिछ्डी जाति शब्द का प्रयोग नहीं हॅ। वहां पर पिछडे वर्ग शब्द का ही प्रयोग हॅ। भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री श्री जवाहर लाल नेहरु भी जातिविहीन समाज का निर्माण चाहते थे। दीनदयाल उपाध्याय,जयप्रकाश नारायण आदि कई नेताओं ने जातिवादी राजनीति के विरोध में आवाज उठाई हॅ।राममनोहर लोहिया ने तो जातितोडक आन्दोलन भी चलाया था। संघ के द्वितीय सरसन्घचालक परमपूज्य गुरुजी से एक बार पूछा गया कि क्या अब भी वर्णव्यवस्था प्रासन्गिक हॅ? उनका स्पष्ट जवाब था,”जब वर्णव्यवस्था आवश्यक थी, समाज ने इसको अपनाया। जब अनावश्यक हो जायेगी, समाज इसको त्याग देगा।”राजीव गान्धी ने भी मन्डल आयोग पर बहस में भाग लेते हुए जातिविहीन समाज के निर्माण को सन्विधान का लक्ष्य बताया था। इन सब महापुरुषों के स्पष्ट चिन्तन के बावजूद,लोहिया के शिष्य जातिआधारित जनगणना कराने के लिये सन्सद ठप्प करते हॅं और समाज को संगठित करने का दावा करने वाले इनका समर्थन करते हॅं तथा गान्धी ऑर नेहरु के नाम की राजनीति करने वाले इस देशतोडक षडयन्त्र को लागू कर रहे हॅं। यह देश का दुर्भाग्य हॅ कि पहले अन्ग्रेज यह काम करना चाहते थे ऑर देश के राजनीतिक सन्गठन इसका विरोध करते थे परन्तु अब लोहियावादी इसके लिये दबाव बनाते हॅं तथा सभी राजनीतिक दल इसका समर्थन करते हॅं। वोट्बॅंक की राजनीति के बन्धक बने राजनीतिज्ञ इस पर फॅसला कर रहे हॅं जबकि इस विषय पर खुली एवं व्यापक बहस होनी चाहिये थी।

उत्तर प्रदेश की एक घटना से इन राजनीतिज्ञों की आंखें खुल जानी चाहिये थी। वहां की मिडडे मील योजना में एक उपजाति के दलितों द्वारा बनाया गया भोजन एक अन्य उपजाति के बच्चों द्वारा ठुकरा दिया गया। इससे ध्यान में आ रह हॅ कि इस चिन्तन ने समाज को कितना बांट दिया हॅ। अब जातिवाद हिन्दु समाज को बांटने का षदयन्त्र बन गया हॅ। इस्लामिक आतन्कवाद,मिशनरी प्रेरित धर्मान्तरण ऑर अन्यान्य खतरों के प्रति बढ्ती चेतना उसे एकबद्ध न कर दे, इसलिये उसे जातिवाद की लडाई में उलझाया जा रहा हॅ।यह देश तोडक सॅक्युलर राजनीतिज्ञों का एक प्रमुख हथियार बन गया हॅ । जातिवाद के कारण राजस्थान में लगी आग से इनको समझ आनी चाहये थी। क्या अब वे इस आग में सारे देश को जलाना चाहते हॅं?

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