जैन समाज और अल्पसंख्यकवाद की राजनीति

केंद्र सरकार द्वारा जैन समाज को अल्पसंख्यक घोषित करना न केवल हिंदू समाज को बांटने का अक्षम्य अपराध है अपितु भारत के सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना भी है । अंग्रेज १९४७ में भारत का विभाजन करते समय भारत की जमीन का विभाजन ही कर सके थे । वे हिन्दू समाज के दिलों को कभी नहीं बांट सके थे । लेकिन राहुल गांधी के निर्देश पर जिस तरह जल्दबाजी में यह घोषणा की गई ,उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि “जो हुकुम मेरे आका” की तर्ज पर काम करने वाले मनमोहन सिंह को न तो देश की अखण्डता की चिंता है और न ही न्यायपालिका के निर्णयों के सम्मान की ।जो काम अंग्रेज नहीं कर सके ,वह अब राहुल गांधी और उनकी पिछलग्गू कांग्रेस करने जा रही है । मा. सर्वोच्च न्यायालय नें २००५ में स्पष्ट रूप से कहा था कि अल्पसंख्यकवाद देश के हित में नहीं है तथा इसको शीघ्र ही समाप्त करना चाहिए । उन्होंने यह दायित्व केंद्र सरकार के साथ-साथ अल्पसंख्यक आयोग पर भी डाला था और यह अपेक्षा की थी कि वे देश में इस घातक विष को फैलने से रोकेंगे । जस्टिस लाहोटी की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय पीठ ने यह स्पष्ट निर्णय दिया था कि इन दोनों को” ऐसी सामाजिक परिस्थतियों को विकसित करना चाहिए जिससे अल्पसंख्यक वर्ग की सूची में से धीरे -धीरे विविध धर्मावलम्बियों का नाम हटाया जा सके और अंततः इस सूची को ही समाप्त किया जा सके । ” किसी भी अन्य पंथ को उन्होनें केन्द्रीय सूची में डालने से स्पष्ट मना कर दिया था । यह ध्यान रखना चाहिए कि यह निर्णय जैन समाज के ही कुछ कथित नेताओं की अपील पर ही दिया गया था । परन्तु यह देश का दुर्भाग्य है कि देश की एकता को मजबूत करने का जिनका दायित्व था वे ही देश व् समाज को विघटन की ओर ले जा रहे हैं ।
संविधान में अल्प्संख्यकों के लिये कुछ सुविधाएं दी गई हैं। इन सुविधाओं की सूची सुरसा के मूंह की तरह बढती जा रही हैं। लक्ष्य मुस्लिम वोट बैंक है, परन्तु इन सुविधाओं को कुछ अन्य समाजों के कुछ लोग अपने निहित स्वार्थों की पूर्ती के लिये अपने समाज के लोगों को बरगला कर अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त करने की होड में लग गये हैं । जैन समाज से पहले आर्य समाज, राम कृष्ण मिशन, गोरक्ष सम्प्रदाय आदि भी इस दौड में शामिल हुए थे। इनमें से कुछ पक्ष तो ऐसे हैं जिनकी स्थापना का लक्ष्य हिंदू समाज की रक्षा करना ही था। ये सुविधाएं भारत को छोड कर किसी भी समाज में नहीं हैं। विश्व में सब जगह अल्पसंख्यकों को समान अधिकारों का संघर्ष तो चलता है, विशेषाधिकार तो केवल भारत में ही दिये जाते हैं। इसी का दुष्परिणाम है कि हिंदू कहलाने में जिनको गर्व होना चाहिये था , अब वे उससे अलग होने के लिये छटपटा रहे हैं। यदि यही चलता रहा तो कौन अपने को हिंदू कहेगा? शायद यही इन समाजतोडक राजनीति करने वालों का लक्ष्य भी है। बात यहीं तक नहीं रुकेगी। इसके बाद देश से अलग होने में भी कुछ लोगों को अगर फायदा मिला तो इसमें भी वे संकोच नहीं करेंगे। शायद जस्टिस लाहोटी की चेतावनी साकार रूप ले लेगी। अब तो सरकार को इस समाज तोडक नीति से तौबा करनी चाहिये और जो सुविधाएं वे केवल अल्पसंख्यकों को दे रही है वे सबके लिये दे, यही देशहित में है।
सरकार यह तर्क दे रही है कि जैन समाज के ही प्रतिनिधि अल्पसंख्यक दर्जे की मांग करते हैं । कुछ लोग गए भी थे । उनमें से ही कुछ लोग कह रहे हैं कि उनको यह बताया ही नहीं गया कि वे क्यों मिलने जा रहे हैं और वहाँ जाकर विशुद्ध राजनीतिक कारणों से यह मांग उठाई और यह कहा गया कि अगर उनकी बात मानी गई तो जैन समाज के सभी लोग उनको वोट देंगे । जैन समाज किन कारणों से अल्पसंख्यक है,इसकी चर्चा ही नहीं हुई। फिर भी यह प्रश्न खड़ा होता है कि मिलने वाले लोग कैसे जैन समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं ? सरकार नें जैन समाज की राय जानने के लिए क्या जैन संतों या जैन समाज का कोई जनमत संग्रह किया? जैन समाज की सभी परम्पराओं के संतों और लोगों से चर्चा करने पर यह सहज ही ध्यान में आ जाता है कि जैन समाज का बहुसंख्यक वर्ग अल्पसंख्यक दर्जे के पक्ष में नहीं है । जैन धर्म के मूर्तिपूजक संघ ने पहले ही यह निर्णय लिया हुआ है कि वे अल्पसंख्यक दर्जा नहीं चाहते हैं । स्थानकवासी संतों ने तो हमेशा ही इसका विरोध किया है । दिगंबर परम्परा के भी कई संत अल्पसंख्यक दर्जे का विरोध करते रहे हैं । कई संतों और संघों द्वारा इसके विरोध में प्रस्ताव भी पास किये गए हैं जो लेखक के पास संग्रहित हैं । लेखक के परिवार में ही तीन संत बने हुए हैं जिनकी राय सम्पूर्ण समाज जानता है । इससे यह स्पष्ट रूप से ध्यान में आ जाता है कि कुछ स्वयंभू नेता ,जो मुखर हैं और कुछ राजनेताओं के साथ संपर्क रखते हैं , अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए अपनी राय समाज पर थोप रहे हैं और सरकार अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए ही यह समाजघाती निर्णय ले रही है ।
२००९ में दिल्ली की एक धर्मसभा में अग्रणी जैन संतों ने यह कहा था कि “प्राचीन समय से ही भारत में कई धर्मों और पंथों के लोग रहते आये हैं। वे सभी समरसता के साथ अपना जीवन व्यतीत करते आये हैं । तो फिर आज क्यों अल्पसंख्यक -बहुसंख्यक के नाम पर देश की सामाजिक एकता को नुकसान पहुंचाया जा रहा है । ” गहराई से अध्ययन करने पर ध्यान आता है कि जैन व् जैनेतर हिन्दू समाज पूर्ण रूप से एक व् अभिन्न रहा है । यह ऐतिहासिक तथ्य है कि भगवान ऋषभदेव के पुत्र चक्रवर्ती सम्राट भारत के नाम पर भारत का नाम रखा गया है । इसलिए १२५ करोड़ से अधिक जिसके भाई बहन हों , वह कैसे अल्पसंख्यक हो सकता है । दार्शनिक च आध्यात्मिक रूप से ये दोनों परम्पराए एक दूसरे को समृद्ध करती रही हैं । जैन और हिंदू , पूजा पद्धतियों के नहीं, जीवन मूल्यों के नाम हैं । बारीकी से देखने में ध्यान में आता है कि इस आधार पर दोनों में कोई अंतर नहीं है । समस्त तीर्थंकर सनातनी परम्परा के परिवारों से आये हैं , इसके अलावा वर्त्तमान संतों के ७०% संत भी सनातनी परिवारों से मिले हैं । दोनों समाजों में रोटी बेटी के सहज एवं स्वाभाविक सम्बंध समरूप व् एकात्म समाजों की तरह ही होते हैं। दोनों समाज इस कदर परस्पर गुंथे हुए हैं कि इनको अलग करना नाखूनों को उंगलियों से अलग करने के समान होगा ।
जैन समाज को अल्पसंख्यक घोषित करने पर मिलने वाले लाभों की जो मृगमरीचिका दिखाई जा रही है , उस पर भी विचार करना होगा । जैन समाज के मंदिरो और शिक्षण संस्थाओं में सरकार का हस्तक्षेप नहीं होगा यह कहा जा रहा है । क्या इस पर विचार किया गया है कि अभी तक कितना हस्तक्षेप होता है या कितने जैन मंदिरों का अधिग्रहण हुआ हैं? जैन विद्यार्थियों को जैन संस्थाओं में आरक्षण या छात्रवृत्तियों की बात की जा रही है । क्या इतने मात्र के लिए भारत का सबसे समृद्ध समाज अपनी जड़ों से कटकर अपने ही देश में अल्पसंख्यक बनना पसंद करेगा ? यह एक स्थापित तथ्य है कि अपने शैक्षणिक और धार्मिक संस्थानों की सुरक्षा और संवर्धन के लिए जैन समाज को अल्पसंख्यक दर्जा नहीं समस्त हिंदू समाज की सदभावना व् विशवास ही चाहिए जो उसके पास पहले से है ।

जैन समाज को अब यह विश्लेषण करना होगा कि अल्पसंख्यक घोषित होने पर अगर उसे कुछ मिला भी तो क्या वह उससे ज्यादा होगा जो उसेखोना पड़ सकता है । अल्पसंख्यक दर्जे की मांग करने वाले नेताओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने पक्ष पर व्यापक दृष्टिकोण से पुनर्विचार करें और देश तथा समाज हित में इस हठ को त्याग दें । समाज का जागृत वर्ग सक्रिय हो और इस घातक मांग का विरोध करे तथा सरकार को यह निर्णय वापस लेने के लिए बाध्य करें । केन्द्रीय सरकार को भी यह विचार करना चाहिए कि वे चंद राजनीतिक स्वार्थों के लिए हिंदू समाज को किस मार्ग की ओर ले जाना चाहते हैं। उन्हें यह विचार करना होगा कि अल्पसंख्यकवाद से ग्रस्त और विखंडित हिंदू समाज का निर्माण देशहित में होगा या एकरस और सुसंगठित हिंदू समाज देश के विकास की गारंटी होगा ।

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