जामिया मिलिया इस्लामियाःभारत के एक और विभाजन का शस्त्रागार Jamia Millia Islamia: An Arsenal for another Partition of India

अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय को पाकिस्तान का शस्त्रागार कहा जाता है। १९४७ से पूर्व और उसके पश्चात वहां चल रही गतिवधियों का गहराई से अध्ययन करने पर उपरोक्त कथन की सत्यता ध्यान में आ जाती है। १९४७ से पहले वहां पर न केवल पाकिस्तान के विचार को बौद्धिक आधार दिया जाता था अपितु उसके पक्ष में वातावरण बनाने का भरपूर प्रयास किया जाता था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इस चरित्र को बदलने की जगह इसका पोषण किया गया। वहां पर न केवल कट्टरपंथी इस्लामिक विचारधारा को प्रोत्साहन दिया गया अपितु भारत विरोधी गतिविधियों को निर्बाध रूप से चलने दिया गया। इसीलिये वह आतंकवादियों का अभयारण्य बन गया। एक समय ऐसा आया था जब कश्मीर में पकडे गये अधिकांश आतंकियों के पास वहां का परिचय पत्र मिला करता था। वे वहां के छात्रावासों में रहते थे और अगर कभी किसी गुप्तचर एजेंसी का अधिकारी वहां जाने की हिम्मत करता था तो उसे पीट-पीट कर अधमरा कर दिया जाता था । उन देशविरोधियों पर कार्यवाही करने की जगह अगले ही दिन उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री उनसे क्षमायाचना करता था। अफजल गुरू को फांसी की सजा मिलने पर वहां भारत विरोधी नारे लगते हैं और कश्मीर की आजादी के समर्थन में खुलकर अभियान चलाये जाते हैं। इन सबके बावजूद उसे इस्लामिक जगत के आदर्श के रूप में स्थापित करने का आत्मघाती और बेवकूफाना कदम इस देश की सैक्युलर सरकारें उठाती रही हैं। केरल,बिहार और बंगाल में उसके केंद्र स्थापित कर केन्द्र सरकार भारत के मुस्लिम समाज को किस मार्ग पर जाना चाहती हैं? अब इस वर्ष के बजट में केरल और बंगाल के केन्द्रों के लिये ५०-५० करोड रू. देने का प्रावधान किया गया है। तुष्टीकरण के इतिहास का एक अत्यधिक काला पॄष्ठ तब लिखा गया जब उसे अल्पसंख्यक दर्जा देने का षडयंत्र किया गया। दो बार इलाहाबाद उच्च न्यायालय व एक बार सर्वोच्च न्यायालय नें सैक्युलर सरकारों के इस देशद्रोही कदम पर रोक लगाई। इन निर्णयों में यह स्पष्ट कहा गया कि देश के खून पसीने की कमाई से मिलने वाले अनुदान से चलने वाला कोई भी केंद्रीय विश्वविद्यालय अल्पसंख्यक घोषित नहीं किया जा सकता। परंतु ऐसे हर अदालती निर्णय का सम्मान करने की जगह केंद्र सरकारें बहुत ही बेशर्मी के साथ इसको अल्पसंख्यक दर्जा दिलाने का संकल्प दोहराती रहीं मानो वे वोट बैंक की दौड में बाधा बन रही न्यायपालिका को ठिकाने लगाने की चेतावनी दे रहीं हों। अभी भी यह मामला मा. सर्वोच्च न्यायालय के विचाराधीन है। १९६८ में अजीज बाशा मामले में दिया गया निर्णय कि संसद द्वारा स्थापित किसी भी केंद्रीय वि.वि. को अल्पसंख्यक दर्जा नहीं दिया जा सकता, आज भी प्रभावी और प्रासंगिक है।

परन्तु “मुस्लिम वोट बैंक के लिये कुछ भी करेगा” की तर्ज पर केंद्र सरकार ने न्यायपालिका को एक बार फिर ठुकराते हुए एक और देशघाती कदम की घोषणा कर दी। इस्लामिक कट्टरपंथ के एक और केंद्र जामिया मिलिया इस्लामिया , जो एक केंद्रिय वि.वि. है, को अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के राष्ट्रीय आयोग नें अल्पसंख्यक दर्जा देने की घोषणा कर पूरे देश को चौंका दिया। इस आयोग को कई व्यक्तियों ने इस सम्बन्ध में न्यायिक स्थिती से अवगत कराया था परन्तु उन्होंने साफ कह दिया कि उनका यह निर्णय “अजीज बाशा” मामले में न्यायपालिका को भी प्रभावित करेगा। उनके इरादे साफ हैं कि वे न्यायपालिका की परवाह नहीं करते। जब तक न्यायपालिका उनके सामने समर्पंण नहीं कर देती, तब तक वे इस दिशा में काम करते रहेंगे। अल्पसंख्यक दर्जा मिलते ही जामिया में न केवल मुस्लिम विद्यार्थियों को ५०% आरक्षण मिल जायेगा अपितु अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछडे वर्ग को मिलने वाला आरक्षण भी समाप्त हो जायेगा। इससे न केवल अवांछित मुस्लिम तत्वों को प्रवेश की खुली छूट मिल गई है, SC, ST ,OBC के संविधान प्रदत्त अधिकारों पर भी डाका डाला गया। सरकार ने जामिया को केन्द्रीय वि. वि. का दर्जा देते समय यह घोषणा की थी इसका धर्मनिरपेक्ष चरित्र बनाया रखा जायेगा। परन्तु सरकार ने अपने इस देशद्रोही षडयंत्र के माध्यम से न केवल न्यायपालिका की अवहेलना की है अपितु यह भी सिद्ध कर दिया है कि वे मुस्लिम समाज को खुश करने के लिये अपने वचनों की मर्यादा को भी तार -तार कर सकती है।

जामिया के चरित्र को पहचानने के लिये उसके इतिहास के कुछ पॄष्ठों को पलटने की आवश्यक्ता है। जिस खिलाफत आंदोलन के परिणामस्वरूप इस्लामिक कट्टरता बढी थी और पाकिस्तान का जन्म हुआ था, जामिया का जन्म भी उसी आन्दोलन के कारण १९२० में अलीगढ में हुआ था। कुछ कट्टरपंथी इस्लाम की शिक्षा को अ. मु. वि. वि. की तर्ज पर नहीं ले जाना चाहते थे । वे देवबंद से प्रेरणा लेकर कट्टरपंथी इस्लाम की शिक्षा देना चाहते थे।यह तथ्य सभी को ज्ञात होगा कि इसी देवबन्द से प्रेरणा लेकर दुनिया भर में आतंकवाद चल रहा है। उस समय तुर्की के खलीफा के पैसों से जामिया की स्थापना की गयी थी। १९२४ में जब खिलाफत का अंत हो गया तब इसको आर्थिक तंगी का मुकाबला करना पडा। उस समय भी देश के कट्टरपंथी मुस्लिम लोग ही इस्लाम के नाम पर सहायता के लिये आगे आये थे। उन्हें खुश करने के लिये ही महात्मा गांधी ने सहायता के लिये हाथ बढाने का आश्वासन दिया था। कुछ लोग इसके चरित्र को धर्मनिरपेक्ष दिखाने के लिये गांधी जी के नाम का उपयोग करते हैं, परन्तु इसके जन्म की पॄष्ठभूमि तथा इसका मोटो इसकी असलियत को उजागर करता है। इसके मोटो में स्पष्ट लिखा है,” अल्लाहो अकबर” ,जिसका अर्थ है, अल्लाह की विजय हो और अल्लाह की विजय तभी होगी जब दारुल इस्लाम की स्थापना होगी। इसमें कुरान की एक आयत भी लिखी है जिसका अर्थ है कि जो अल्लाह के सामने सिर झुकायेगा, उसे ही सत्य का साक्षात्कार होगा। इस्लाम का प्रचार करना और इस्लामिक समाज में कट्टरता का निर्माण करना इसका प्रारम्भ से ही लक्ष्य रहा है। यह कभी भी उदारवादी नहीं रहा और न इसमें कभी गैर मुसलमानों को सम्मानजनक स्थान मिला है। १९२० से लेकर अब तक के कुलपतियों और उपकुलपतियों की सूचि देखने पर ध्यान में आता है कि इस सूचि में एक भी गैर मुस्लिम नहीं है। स्वतन्त्रता के बाद का इतिहास साक्षी है कि जामिया का परिसर कट्टर पंथी मुसलमानों का हमेशा से अड्डा बना रहा है। वहां का छात्र संघ, पूर्व छात्र संघ, कर्मचारी संघ, प्राध्यापक संघ सभी कट्टरता के पोषक रहे हैं। जब भी कभी वहां पर कोई मुसलमान विद्यार्थी या कर्मचारी थोडी भी उदारवादी बात करने की हिम्मत दिखाता है, ये सब एकजुट होकर उस आवाज को बेरहमी से कुचल देते हैं। एक बार वहां के एक उपकुलपति ने कुछ ऐसा कहा था जो इन कट्टरपंथियों को पसन्द नहीं था, इन सब ने मिलकर वहां ऐसी परिस्थिती बना दी कि उसे त्यागपत्र देना पड गया था। इन्हीं संघों ने ही अल्पसंख्यक दर्जे की मांग की है। अ. मु. वि. वि. की तरह यहां भी खुले आम भारत विरोधी नारे लगते हैं और कश्मीर की आजादी के पक्ष में कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। अब यह भी अलगाववादियों का प्रेरणास्थल बन गया है। यहां आतंकवादियों ने कई बार पनाह भी ली है। कई बार यहां के परिसर में घातक हथियारों का जखीरा भी मिला है। यहां के नजदीक की बस्ती, जामिया नगर में आतंकी पनाह लेते हैं परन्तु पुलिस के वहां पहुंचने पर सब लोग मिलकर उनका विरोध करते हैं। एक बार लालकिले पर हमला करने वाले आतंकियों को पकडने जब वहां पुलिस गई तो उनका जबर्दस्त विरोध किया गया। इसके बावजूद जब पुलिस उन आतंकियों को पकड कर ले गई तो वहां के नगर पार्षद के नेतॄत्व में स्थानीय मुसलमानों की एक हिंसक भीड ने थाने पर हमला कर उनको छुडाने की कोशिश की। इस कोशिश में जामिया के विद्यार्थी भी शामिल थे। यह वही जगह है जहां पर छिपे आतंकवदियों को पकडने के लिये इन्सपेक्टर मोहन शर्मा के नेतॄत्व में एक पुलिस बल गया था और उन आतंकियों को बचाने के लिये स्थानीय लोगों ने भरसक प्रयास किये थे। जिसका परिणाम हुआ कि आतन्कियों को संभलने का मौका मिल गया और उस मुठ्भेड में इन्पेक्टर शर्मा को अपना बलिदान देना पड गया। आज ऐसा लगता है कि जामिया का परिसर भी आतंकवादियों का अभयारण्य बन गया है। देश की जनता के खून-पसीने की कमाई से मिले अनुदान के आधार पर चल रहे जामिया में आज उसी जनता का खून बहाने वाले दरिन्दे शरण पाते हैं। इसको अल्पसंख्यक दर्जा देकर इन नरपिशाचों को खुलकर खेलने का अवसर दिया जा रहा है। अलीगढ मुस्लिम वि.वि. को जामिया के संस्थापक नरमपंथी मानते थे। जब वह १९४७ में पाकिस्तान का शस्त्रागार बन गया था तो प्रारम्भ से ही कट्टरता का पोषक जामिया क्या कर सकता है, इसका अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। ये दोनों मिलकर कितने पाकिस्तान और बना सकते हैं, इसकी कल्पना मात्र से ही दिल कांप उठता है। अल्पसंख्यक दर्जे से मिलने वाले नाखून इस अभियान को अधिक हिंसक बना देंगे। जामिया को दिया गया अल्पसंख्यक दर्जा न केवल अनैतिक और संविधान विरोधी है, यह देश विरोधी भी है, जिसका हम सबको खुलकर विरोध करना चाहिये तभी वोटबैंक के भिखारी इन सैक्युलर राजनीतिज्ञों के इस देश विरोधी अभियान पर रोक लग सकेगी।

AMU is called the arsenal that provided the cannon fodder for the creation of Pakistan. The authenticity of the above statement comes to light if one studies the events that took place in the university from 1947 and prior to it, in depth. Prior to 1947, the university not only indulged in the creation of an intellectual base for the idea of carving out Pakistan, but also, sought to create an environment in favour of its creation. After the attainment of independence, this character of the university was further enhanced. Not only was fundamentalist Islamic ideology encouraged here, even anti-India activities continued to be propagated from the campus unabashedly. No doubt, it ended up becoming the breeding- ground for the terrorists. There was a time when most of the terrorists caught in Kashmir would be found possessing the identity-card of AMU. The terrorists used to live on the campus of AMU and if ever any personnel from the intelligence gathered courage to venture into the campus, he would be beaten half-dead. Instead of taking action against those traitors, the erstwhile Chief Minister of UP would end up apologising to them. Anti-India slogans were raised in this university when Afzal Guru was sentenced to execution and pro-liberation campaigns for Kashmir are openly organised on campus. Despite all this, the pseudo-secular governments of this country have been taking the suicidal and stupid steps of trying to portray the university as the ideal of the Islamic world. By establishing more centres of AMU in Kerala, Bihar and Bengal , where is this government trying to take the muslims of the country? This year’s budget talks of spending Rs 50 crore on the Kerala and Bengal units this year. That certainly was a black day in the politics of minority appeasement in the country when the university was chosen to be conspiratorially accorded the minority status. The Allahabad High Court twice issued a judgement against it and the Supreme Court too has tried to put a spoke in the wheels of this policy of appeasement once. The judgments very specifically mention that the central universities which run on the grants that come from the hard-earned revenue cannot be wasted in transforming it into a minority institution. But, despite these judgements, the government at the centre, unabashedly continued to resolve to transform these institutions into minority institutions, it almost sounded like it was trying to challenge the judiciary, which had sort of become a hurdle in the implementation of this treacherous policy. Even now, this case is lying pending in the Supreme Court. The 1968, Aziz Basha case, is still relevant and effective today, which states that any central university established by the parliament, cannot be given the status of a minority institution.

But the sickening mentality of the central government which believes in ‘will do anything to appease the Muslims, come what may’, has shown the judiciary a thumbs down, and taken an anti-national decision. The National Commission for Minority Educational Institutions has shocked the entire nation by according minority status to the Jamia Millia Islamia University, another centre of Islamic fundamentalism. The Commission was made aware of the Aziz Basha case on numerous occasions, but the commission overrode all considerations and told the sceptics that this decision of theirs would even change the judiciary’s stand on this issue. It is no one’s guess that they have scant regard for the judiciary. Till the judiciary does not succumb to their wishes, they will continue to carry out their activities. With the award of the minority institution tag, not only will the Muslim students start cornering 50% of all the seats, the scheduled caste, scheduled tribe and the other backward caste quotas would then stand null and void. With this decision, not only have the unwanted elements of the Muslim society now got unhindered access to the university, even the scheduled castes, scheduled tribes, and the other backward castes, too have lost their constitutional rights. While according the tag of the ‘central university’ to the Jamia, the government had emphasized that the secular character of the university would not be tampered. But, in their anti-national step, the government has not only shown its contempt for the judiciary but proved that, if need be, it will also leave no stone unturned to falsify its own promises.

In trying to decipher the character of the Jamia, a few pages of its history need be revisited. The Khilafat agitation that led to the growth of Islamic radicalism and the creation of Pakistan, also led to the creation of Jamia in Aligarh in 1920. Some radicals were not happy with the way Islamic teachings were imparted in AMU. Inspired by Deoband, they wanted to impart radical Islamic teaching in the country. Readers, I presume, would know that all the terrorism in the world, today,is under the inspirational guidance of this seminary. The caliphate of Turkey funded the creation of Jamia then. When the Khilafat ended in 1924, Jamia had to go through serious financial trouble. Even then, it was the radical among the muslim in the name of Islam, who had come forward to help Jamia. To appease them, Mahatma Gandhi had assured them help. Some people use the name of Mahatma Gandhi to establish the secular credentials of the Jamia, but the background of its creation and its motto nullifies that claim. The insignia of Jamia clearly depicts the words ‘Allah-o-Akbar’, which means, ‘victory be to Allah’ and allah will win only when Dar-ul-Islam is established. A verse from the Koran has also been taken here which says that only those who bow their heads in front of Allah will be revealed the truth. The propagation of Islam and the creation of radicalism in the muslim society has been the goal of this university from its inception. It has never been liberal and the non-muslims have never ever had a respectable place in it. There has not been one non-muslim Chancellor or Vice-Chancellor of the university since 1920. The post-independent history of the country stands testimony to the fact that the university has remained the hotbed of radical islam in the country. The students ’ unions, alumni union, staff associationsand teacher’s association, all have been propagators of radicalism. Whenever a muslim student or staff of the university tries to starts singing a liberal tone, the radical voices in the industry crush it down. In one instance, a vice-chancellor had to resign because he had said something liberal which did not go down well with these radicals. It is these unions that had demanded for the minority status for jamia. Like AMU, even in Jamia, anti-India slogans are raised and programmes for the demand of azaad Kashmir are openly made. Now, even Jamia has become the inspirational hub of the secessionist. The terrorists have sought refuge in the university several times. On many occasions, arms and ammunitions have been recovered from the campus of the university. The terrorists regularly sneak into contiguous Jamia Nagar and even live in the village, but when the police tries to frisk the ares, they are vehemently opposed by the local populace. Once when the police went to the area to arrest the attackers on Lal Qila, they were vehemently opposed. Despite this, when the police managed to take these attackers to the police station, a violent mob led by the local councillor of the area attacked the police station and tried to free the accused. Students of Jamia too were involved in this operation. This is the same place where Inspector Mohan Sharma had led a force to arrest the terrorists and the locals had fought tooth and nail to save the culprits, as a result of which the terrorists regrouped themselves and Inspector Sharma had to pay for it by his life. Today, it seems, even Jamia’s campus has become a hot-bed of the terrorists.Two students of Jamia were once arrested for involvement in serial bomb blasts of Delhi, the vice chancellor immediately formed a committee to provide legal help to those terrorists. The hard-earned revenue of the central government comes from the blood and toil of the masses, from where the grants are given to Jamia, but it looks like these grants will now be used to bleed those same people on whose blood and toil the university was raised upon. The demons can now play their games openly.Now the central university is a minority institution. When, in 1947, AMU had become the cannon fodder for the creation of Pakistan, then one can easily gauge what Jamia has in store for us, considering that it has been the fort of the radicals from its inception. The two in tango, can end up making so many Pakistans, one shudders at the mere thought. The claws of the minority institution tag will make their movement even more violent. Not only is the minority status awarded to Jamia, unethical, it is also unconstitutional and also anti-national. We all must come out openly to protest this, only then will the politics of these vote bank-begging, secular politicians be roped in.

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