जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं

आज के दिन भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था। सम्पूर्ण मानवता को कर्म के लिये प्रेरित करने वाली गीता का उपदेश देने वाले श्रीकृष्ण का सम्पूर्ण जीवन कर्म के महत्व को प्रतिपादित करता है। गीता का मूल मर्म उसके एक श्लोक में माना जाता है,

” कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफल हेतुर्भूर्मा ते सन्गोस्त्वकर्मणि॥”

भगवान कृष्ण के जीवन की हर लीला में यही संदेश परिलक्षित होता है। कर्मयोगी के सर्वोच्च रूप को प्रतिस्थापित करने के कारण ही उन्हें योगीराज भी कहा जाता है। उन्होंनें अपने जीवन का लक्ष्य गीता का उपदेश देते समय ही स्पष्ट कर दिया था,

” परित्राणाय साधुनाम, विनाशाय च दुष्कृताम। धर्म संस्थापनार्थाय, संभवामि युगे-युगे॥”

उनके जन्म से लेकर निर्वान तक की हर घटना इसी उद्देश्य की ओर ले जाती हुई दिखाई देती है। जन्म के समय ही उन्होंने अपने माता-पिता को बंधनमुक्त किया था। उनके बाल्यकाल की हर लीला, चाहे वह पूतना का वध हो या अन्य किसी राक्षस का, चाहे वह गोवर्धन पूजा हो या कालिया मर्दन , उनके लक्ष्य की ओर ही ले जाती हुई दिखाई देती है। कंस का वध कर उन्होंने मथुरा में धर्मराज्य की स्थापना की । कुरुक्षेत्र में महाभारत के सूत्रधार भगवान कृष्ण ही थे। वहां पर युद्ध के क्षेत्र में कर्मच्युत अर्जुन को उपदेश के माध्यम से प्रकट हुई गीता विश्व की श्रेष्ठ्तम रचना मानी गई है। जीवन की हर उलझी गुत्थी का समाधान गीता में मिलता है। इसीलिये भारत के पूर्व राष्ट्रपति ए पी जे कलाम ने एक बार कहा था कि भारत गीता के मार्ग पर चलकर ही विश्व की महाशक्ति बन सकता है। उनके जन्म दिन पर हम सबको यह अवश्य विचार करना होगा कि अधर्म के मार्ग पर ले जाये जा रहे भारत में धर्मराज्य की स्थापना किस प्रकार की जा सकती है।

आज ही के दिन स्थापित विश्व हिन्दू परिषद भारत में धर्मराज्य की स्थापना का लक्ष्य लेकर चल रही है। १९६४ में जन्माष्टमी के पावन पर्व पर पूज्य स्वामी चिन्मयानन्द जी की अध्यक्षता में देश के सभी धर्मिक, सामाजिक क्षेत्रों के प्रमुख महापुरूषों नेम देश और समाज की परिस्थितियों पर विचार किया। अस्पृश्यता, जातिवाद, इस्लाम और इसाइयत द्वारा धर्मांतरण के अन्तर्राष्ट्रीय षडयंत्र आदि विषयों पर इन महापुरूषों ने गहन चिंतन कर यह निर्णय लिया कि एक ऐसे संगठन का निर्माण होना चाहिये जो इन चुनौतितों का मुंह तोड जवाब दे सके। सभी महापुरूषों की यह हार्दिक इच्छा थीन कि यह संगठन सभी मतों-मतान्तरों के संगठनों और संतों के लिये एक सशक्त मंच भी बन सके जहां ये सभी एकत्रित आ सकें। इसी मंथन का परिणाम था कि विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना हो गई। विहिप अपने जन्म से ही ओऊज्य संतों की अपेक्षाओं पर खरी उतरती हुई भारत में धर्मराज्य की स्थापना के लक्ष्य की ओर निरन्तर बढ्ती जा रही है। रामजन्म भूमि आन्दोलन , रामसेतू आन्दोलन,अमरनाथ यात्रा आन्दोलन आदि के माध्यम से जहां हिन्दू समाज जागृत हुआ है वहीं उसके सामर्थ्य के सामने हिन्दू विरोधियों को नतमस्तक होना पडा है। अब लोगों को यह विश्वास हो चला है कि धर्मराज्य की स्थापना का लक्ष्य वास्तविकता की ओर बढ रहा है।

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