जस्टिस मारकंडे काटजू -जेहादी आतंकवादियो के नए पैरोकार

जस्टिस मारकंडे काटजू एक ऐसे व्यक्तित्व का नाम है जो हमेशा विवादों में रहा है । वे अनेक अति संवेदनशील मुद्दों पर इस तरह की टिपाणियां करते रहे है जो न केवल अंतहीन विवाद निर्माण करती है अपितु की बार सनसनी भी पैदा करती है । वे इस तरह की टिपाणियां केवल सामाजिक व् राजनीतिक मुद्दों पर ही नहीं करते , वे न्यायिक विषयों पर भी विवाद निर्माण करने में संकोच नही करते । इन्होंने एक बार इलाहाबाद उच्च न्यायालय में “सडांध ” सम्बन्धी एक टिप्पणि की थी जिस पर लम्बे समय तक विवाद नही थमा । एक बार इन्होने ९०% भारतीयों को मूर्ख कहा था । इनके द्वारा निर्मित विवादों की अन्तहीन सूची है । इसीलिये कुछ लोग यहां तक कहने लगे है कि वे लगातार चर्चा में बने रहने के लिए ही जान बूझ कर विवाद निर्माण करते रहते हैं । कारण कुछ भी हो लेकिन यह बात सत्य है कि जस्टिस काटजू और विवादों का चोली दामन का साथ रहा है ।
परन्तु अब जस्टिस काटजू ने जो कहा है वह केवल सनसनी ही निर्माण नही कर रहा , उससे देश की सुरक्षा से जुड़े कई मुद्दों पर नकारात्मक प्रभाव भी पड सकते हैं । एक अंग्रेजी दैनिक द्वारा आयोजित एक गोष्ठी में उन्होंने कहा है कि “आतंकी हमलों की गैर जिम्मेदाराना रिपोर्टिंग के कारण मीडिया साम्प्रदायिकता फैलाता है ।” वे यही तक नही रुके उन्होंने कहा कि आतंकी घटनाओ के वक्त मीडिया मुसलमानो को राक्षस के रूप में पेश करता है । उनका कहना है की जब भी कोई बम विस्फ़ोट होता है तो उसके एक घंटे के भीतर ही बहुत सारे टी .वी . चैनल यह दिखाना शुरू कर देते है कि इण्डियन मुजाहिदीन ,जैश-ए -मुहम्मद या ऐसी किसी मुस्लिम नाम की संस्था की ओर से ईमेल या एसएमएस मिला है जिसमे घटना की जिम्मेदारी लेने का दावा किया गया है । इसके बाद जो कहा गया है वह इन आतंकी संगठनो का एक पैरोकार ही कह सकता है,आम आदमी ऐसा सोचने पर विवश हो सकता है । उनका कहना है कि यह इमेल किसी शरारती आदमी की करतूत भी हो सकती है । उन्होंने मीडिया पर आरोप लगाते हुए कहा की वे कुछ इस तरह का सन्देश देते है कि सभी मुसलमान आतंकी हैं और बम फ़ेंकने के अलावा उनका कुछ और काम नहीं है । वे पूरे मुस्लिम समुदाय को राक्षस के रूप में पेश करते है औए एसा करके वे साम्प्रदायिकता को बढावा देते हैं । आतंकवाद जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दे पर जस्टिस काटजू के ये उवाच न केवल गैरजिम्मेदाराना है अपितु आतंकवादियों और उनके समर्थको के हौसले बुलंद करने वाले सिद्ध हो सकते है । अब इन लोगो के हाथ में एक और तर्क आ गया है जिसका उपयोग कर वे अपने कारनामो को छिपाने का काम कर सकते है । अब उनके तरकस में जस्टिस काटजू ने एक ऐसा तीर डाल दिया है जिसका उपयोग वे न केवल जांच एजेंसियो के जांच एजेंसियों को कटघरे में खडा करने के लिए करेंगे अपितु वे न्यायिक प्रक्रिया को भी प्रभावित कर सकते है । अब उनका यह” कुतर्क ” मीडिया को निष्पक्ष व् तथ्यपरक रिपोटिंग करने से भी रोकेगा । जस्टिस काटजू ने मीडिया को तो स्पष्ट रूप से धमकी भी दी की वे उनको इस तरह की रिपोर्टिंग नही करने देगे । एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से समाज के मन में आयेगा कि वे मीडिया के संरक्षक है या उनको गुलाम बनाने वाले तानाशाह ।
भारत आतंकवाद से सबसे अधिक प्रभावित देश है । यह तथ्य भी सबको ज्ञात है कि अधिकांश आतंकी घटनाए जेहादी मानसिकता के कारण ही है । अब वे जमाने बीत गए जब अधिकांश आतंकी बाहर के थे । अब भारत के रहने वाले लोग ही आतंकी गतिविधियों को अंजाम दे रहे है । उनको मिलने वाला स्थानीय सहयोग भी किसी से छिपा नही है । अब उनको सहयोग मिलना भी रुक रहा है । इसके कारण एक बेचैनी उन लोगो में बढ रही है । इस बेचैनी का लाभ लेकर आतंकियो को हतोत्साहित किया जा सकता था । जब तक वैचारिक आधार पर उनको परास्त नही किया जाएगा आतंकवाद समाप्त नही हो सकता , यह तथ्य सभी जानते है । उनकी बेचैनी से वोटबैंक के पुजारी राजनीतिक लोग परेशान हो सकते है । उनका लालच समझ में आ सकता है । परन्तु जस्टिस काटजू जैसे लोगो की क्या मजबूरी हो सकती है ? आतंकी संगठनो के नाम छुपाने के बाद क्या वे अब पकडे गए आतंकियो के नाम भी छिपाने की सलाह देंगे ? या वे भी उनकी जगह किसी हिन्दू को पकडने की सलाह देंगे ? जस्टिस काटजू कश्मीर के रहने वाले है । क्या कश्मीर में हिंदुओ का नरसंहार करने वाले संगठनो को वे इसलिए बचाना चाहेंगे क्योकि उनका नाम मुस्लिम है ?
जस्टिस काटजू को सलाह है कि वे चर्चा में बने रहने के लिए देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड न करे । उनको यह भ्रम मन में नही पालना चाहिए की केवल मुस्लिम समाज का पक्ष लेकर ही वे सेक्युलर कहला सकते है । उन्हें जेहादियों के द्वारा कश्मीर में मारे गए अपने परिवारजनों के बलिदानों को स्मरण रखना चाहिए और यह प्रयास करना चाहिए कि भारत में फिर कभी कश्मीर जैसे नरसंहार दोहराए न जा सकें ।

You May Also Like