कश्मीर की स्वायत्तता कहीं देश की स्वायत्तता के लिये खतरा न बन जाये

जब से कश्मीर घाटी में “पत्थरबाजी जेहाद” शुरू हुआ हॅ , वहां के कथित रूप से ‘भ्रमित’ युवकों के पॅरोकार ज्यादा सक्रिय हो गये हॅं। वे न केवल असहाय कर दी गई सेना के खिलाफ वातावरण बना रहे हॅं अपितु घाटी के जेहादियों के प्रति सहानुभूति निर्माण कर रहे हॅं। इसके साथ ही वे केन्द्रीय सरकर व राजनीतिक दलों पर वहां की समस्या के एक निश्चित दिशा में समाधान के लिये दबाव बना रहे हॅं।लगभग निर्धारित हो चुकी इस दिशा के क्या परिणाम होंगे,वे इस पर न तो स्वयम सोच रहे हॅ ऑर न किसी को सोचने का मौका देना चाहते हॅं। अमेरिका के दबाव में दिये जाने वाला यह पॅकेज देश से छिपाया जा रहा हॅ परन्तु जो बातें सामने आ रहीं हॅं वे चिन्ताजनक हॅं।इसके चार पहलू सामने आ रहे हॅं

१.जम्मू कश्मीर को स्वायत्तता प्रदान की जाये।

२.सेना के अधिकारों में कटोती करके उन्हें क्रमबद्ध रूप से वापस बुलाया जाये।

३.कश्मीरी युवकों के दर्द को समझकर मरहम लगाई जाये।

४.घाटी का विकास किया जाये।

आज जिस विषय पर सबसे अधिक चर्चा हो रही हॅ, वह स्वायत्तता ही हॅ। प्रधानमन्त्री जी का राजनीतिक समाधान इसी दिशा की ओर जाता हॅ।फारुख अब्दुल्ला ऑर उनके युवराज उमर अब्दुल्ला इसे रामबाण की तरह पेश कर रहे हॅं। परन्तु यह क्या हॅ, इसका खुलासा करने से सभी बच रहे हॅं। स्वायत्तता का एकमात्र अर्थ हॅ, १९५३ से पूर्व की स्थिती बहाल करना।१९५३ से पूर्व की स्थिती का अर्थ हॅः

१ सुरक्षा,विदेश,मुद्रा व सन्चार केन्द्र के आधीन होंगे,शेष सभी विभाग राज्य सरकार के पास होंगे जिनमें केन्द्र का कोइ दखल नहीं होगा।

२ राज्य का अलग ध्वज होगा।

३ वहां के मुख्यमन्त्री को वजीरे आजम (प्रधानमन्त्री) कहा जायेगा।

४ वहां का राज्यपाल विधानसभा चुनेगी।

५ वहां का चुनाव आयोग भारत के चुनाव आयोग से अलग होगा।

६ जम्मू कश्मीर भारत के सर्वोच्च न्यायलय के आधीन नहीं होगा।

७ भारत की प्रशासनिक सेवाओं (IAS,IPS) का वहां कोई अस्तित्व नहीं होगा।

उपरोक्त प्रावधानों को ही पढने से ध्यान में आता हॅ कि अगर यह मांग स्वीकार कर ली गई तो डा० श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान व्यर्थ हो जायेगा ऑर कश्मीर भारत से पूर्ण रूप से अलग हो जायेगा। यह पॅकेज समाधान का नहीं विभाजन का दस्तावेज सिद्ध होगा। नॅशनल कांफ्रेन्स के अलावा कॉन स्वायत्तता मांग रहा हॅ, यह तथ्य बडा रोचक हॅ। भाजपा, कांग्रेस इसका विरोध कर रहे हॅं;PDP, ‘selfrule’ से कम पर सहमत नहीं;आतन्कवादी केवल आजादी चाहते हॅं,वे इससे कम पर हिन्सा का ताण्डव कम नहीं करेंगे। इसका अर्थ हॅ कि केवल नॅशनल कांफ्रेन्स इसकी मांग कर रही हॅ जो घाटी पर अपना नियन्त्रण खो चुकी हॅ। इस विषय पर वहां की जनता के विचारों का अध्ययन अवश्य करना चाहिये।आन्दोलनकारी कुल आबादी के केवल १०% का प्रतिनिधित्व करते हॅं। लद्दाख ,जो बोद्ध बहुल हॅ, की जनता भारत की सामान्य जनता की तरह रहना चाहती हॅ।पहले उन्होनें हिमाचल के साथ विलय का प्रस्ताव भी रखा था। जम्मू की जनता तो धारा ३७० को समाप्त कर इस समस्या को हमेशा के लिये समाप्त करना चाहती हॅ।कश्मीर में शिया-सुन्नी दोनों हॅं। शिया किसी भी तरह का अलगांव नहीं चाहता,वहां के गुजर,जो शिया हॅं,की एकमात्र मांग हॅ कि उन्हें भारतीय सन्विधान के अन्तर्गत अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया जाये। अगर घाटी के सुन्नियों का भी सर्वेक्षण किया जाये तो वे भी सभी अलगाववादी चरित्र को पसन्द नही करते। इस विश्लेषण से यह ध्यान में आता हॅ कि स्वायत्तता वहां की जनता की मांग नहीं हॅ। ऍसा समाधान जो न तो वहां की जनता को स्वीकार हॅ ऑर न ही वहां के सन्गठनों को,किस दिशा में ले जायेगा? इसके बाद जो मुसीबतों का पिटारा खुलेगा, उसका भी विचार करना चाहिये। पूर्वोत्तर के कई सन्गठन स्वायत्तता की मांग पहले से ही कर रहे हॅं। अब वे अपनी हिन्सक गतिविधियां तेजी से बढा देंगे। कमजोर केन्द्र सरकार फिर झुकेगी ऑर इसके परिणाम कितने भयावह होंगे? इन नेताओं को समझना चाहिये कि शेख अब्दुल्ला ने जब १९७४ में स्वायत्तता की मांग की थी, तब इन्दिरा जी ने कहा था,”घडी की सूईयों को वापस नहीं घुमाया जा सकता।” इसके बाद यह विषय शेख ने कभी नहीं उठाया ऑर कश्मीर शान्त रहा।

जहां तक सेना के अधिकारों में कटॉती करके उन्हें वापस बुलाने की बात हॅ तो यह जमीनी हकीकत हॅ कि घाटी सेना के कारण ही भारत के साथ जुडी हुई हॅ। जो नेता सेना को बुलाने की बात करते हॅं वे एक बार सेना का सुरक्षा चक्र छोड्कर’अपने लोगों ‘के बीच घूम कर दिखायें। आज वहां पर सेना के बावजूद स्वतन्त्रता दिवस नहीं मनाया जा पाता,वहां भारत विरोधी नारे लगते हॅं,तिरन्गे को जलाया जाता हॅ ऑर सन्विधान को पॅरों से रोंदा जाता हॅ। सेना हटने के बाद क्या होगा?

जो कश्मीरी युवक भारत विरोधी नारे लगाकर सुरक्षाबलों पर निर्मम हमले करते हॅं,हिन्दुओं के बचे खुचे मन्दिरों को तोडते हॅं ऑर अमरनाथ यात्रियों तथा ट्रकों के हिन्दू -सिक्ख चालकों पर कातिलाना हमला करते हॅं, उनके किस दर्द को समझने की बात की जा रही हॅ? दर्द तो उनका हॅ जो इनसे पीडित हॅ। जम्मु-कश्मीर की सरकारी नॉकरियां घाटी के युवक ले जाते हॅ, राज्य का अधिकतम पॅसा वहां खर्च होता हॅ, अधिकतम सरकारी कालेज ऑर विश्वविद्यालय वहां खुले हॅ। अगर दर्द समझना हॅ तो कश्मीरी पन्डित,लेह व जम्मु की जनता का समझना चाहिए। मलहम की जरुरत तो इनको हॅ न कि इनका शोषण करने वालो को। क्या ये लोग अपनी देशभक्ति की सजा पा रहे हॅ?

विकास का प्रश्न निश्चित रुप से गम्भीर प्रश्न हॅ। प्रकृति ने वहां के भरपूर साधन दिये हॅ। केन्द्र सरकार ने देश की जनता की खून पसीने की कमाई का पॅसा घाटी पर पानी की तरह बहाया हॅ। प्रति व्यक्ति अनुदान सबसे अधिक वहां दिया गया हॅ। उस प्रदेश की जनता साफ कहती हॅ कि १९४७ से अब तक का प्रदेशिक नेतृत्व बेइमान हॅ वह इन अकूत सन्साधनों का उपयोग केवल अपने विकास के लिये करता हॅ,प्रदेश के लिये नहीं।

केन्द्र सरकार ने हूरियत को आगे बढाकर अपने हाथ जला लिये हॅ। वह इस पॅकेज नाम पर “बर्बादी” का दस्तावेज तॅयार नहीं करें। वहां के तथा देश के जनमानस की भावनाओ को समझने के लिये व्यापक चर्चा करे तथा इस प्रकार के कदम उठायें जो कश्मीर को विनाश की ओर नहीं विकास की ओर ले जाये।