क्या मनमोहन भ्रष्टाचार के विरोधियों को गद्दाफी की तरह कुचलेंगे ?

भारत भ्रष्टाचारियों और आतंकियों की सबसे बडी शरणस्थली बन गया है। यहां पर केन्द्र सरकार भ्रष्टाचारियों, आतंकियों, भारत के दुश्मनों ,अलगाववादियों और राष्ट्र ध्वज का अपमान मरने वालों को संरक्षण देती है तथा भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाने वालों ,भारत माता की जय बोलने वालों, आतंकवाद के विरुद्ध आवाज उठाने वालों और तिरंगे का सम्मान करने वालों को सरकारी दमन का शिकार बनना पडता है। 4 जून की मध्य रात्रि को दिल्ली के रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार के विरोध में स्वामी रामदेव के साथ अनशन पर बैठे हजारों अहिंसक भारतियों के उपर केन्द्र सरकार की बर्बर कार्यवाही ने इस धारणा को पुष्ट किया है। सरकार के इस दमन नें न केवल आपात काल को याद दिला दिया है अपितु जलिया वाला कांड की याद को ताजा कर दिया है।

भारत में व्याप्त भ्रष्टाचार से आम नागरिक व्यथित है। कई सामाजिक , धार्मिक नेता इस पर चिंता व्यक्त कर चुके हैं। सम्पूर्ण विश्व में भारत की पहचान भ्रष्टतम देश के रूप में होने लगी है। भारत की न्यायपालिका इस विषय कई बार बहुत कठोर टिप्पणी कर चुकी है। एक बार तो यहां तक कह दिया था कि इस इन्होंने भारत को नर्क बना दिया है। न्यायपालिका व सामाजिक कार्यकर्ताओं नें जब भी यह आवाज उठाई, केन्द्र सरकार ने उनको अपमानित करने की कोशिश की है। पहले इन्होंने अन्ना हजारे को अपमानित किया और उनके साथ छल कपट ्किया गया। उसके बाद स्वामी रामदेव के आन्दोलन और उनकी छवि को आघात पहुचाने की असफल कोशिश की गई। इनके हर दमनात्मक प्रयास के बावजूद बाबा राम देव का जनसमर्थन बढता चला गया। अब सरकार नें शकुनी के तरकस के हर बाण को आजमाना शुरु कर दिया। कुछ नेता बात कर रहे थे तो कुछ छुटभैय्ये व्यक्तिगत व ओछे आरोप आरोप लगा रहे थे। परन्तु बाबा नहीं रुके। निर्णयात्मक कार्यवाही के लिये सरकार को बाध्य करने के लिये आखिरकार बाबा को गांधीवादी मार्ग का अवलम्बन करना पडा और उन्होंने अनशन का निर्णय किया। सरका ने रोकने कि हर कोशिश की। बाद में उनके स्वागत के लिये ४ केंद्रीय मंत्री हवाई अड्डे पर पहुंचे। सबने कहा कि जितने बडे नेता आये हैं , धोका उतना ही बडा होगा और वही हुआ। रामलीला मैदान में लाखों भारतीय उनके समर्थन में आये। भारत में कई स्थानों पर उनके समर्थन में अनशन का आयोजन किया गया। उनका इतना समर्थन देखकर भ्रष्ट सरकार के भ्रष्ट नेताओं का विचलित होना स्वाभाविक था। सरकार के कोरे आश्वासनो पर किसी को विश्वास नहीं था। सरकार से लिखित रूप में कार्यवाही की मांग में कुछ भी अस्वाभाविक नहीं था। परन्तु इससे सरकार फंस सकती थी। इसलिये पहले तो उनके आश्वासनों को सार्वजनिक कर बाबा को धोखा दे कर उनको बदनाम करने की कोशिश की गई। वे भूल गये थे कि जनता का सरकार के बेईमान नेताओं पर कोई भरोसा नहीं है। जब उन्होंने देखा कि उनका षडयंत्र विफल हो गया तब उन्होंने वह किया जिस पर मानवता की गर्दन हमेशा शर्म से झुकी रहेगी। उन्हॉने न केवल सोते हुए भूखे अनशनकारियों पर लाठी गोली चलाई अपितु पानी की बौछारों और अश्रुगैस का इस्तेमाल किया। मासूम लोगों को बेरहमी ्से पीटा गया। महिलाओं के साथ दुर्वयवहार किया गया। जिस पंडाल में बाबा बैठे थे उसको आग लगा दी गई। अपने ही देश के लोगों पर इस प्रकार के अमानुषिक अत्याचार अयोध्या के बाद अब ही किये गये। उन अत्याचारों के बाद वहां सरकार को जाना पडा था, अब इस अमानवीय घट्ना के बाद इस सरकार को भी जाना पडेगा।

पिटते हुए अनशनकारी भारत मां की जय के नारे लगा रहे थे, उनके हाथ में तिरंगा झंडा था। वंदे मातरम कहने वाले बाबा को कहा गया कि आपके दिल्ली प्रवेश पर पाबंदी है, उनको जबर्दस्ती दिल्ली से बाहर भेज दिया गया और “तडीपार” कर दिया गया। यह वही दिल्ली है जहां अलगाववादी खुलकर भारतविरोधी भाषण देते हैं और नार लगाते है परन्तु उस दिन भी भारत मां की जय हो कहने वालों को पुलिस ने पीटा था। भारत के खिलाफ भाषण करने वालों को पुलिस ने संरक्षण दिया था। आज तक न्यायपालिका के कहने के बावजूद उन अलगाववादियों पर कोई कार्यवाही नहीं की गई। ऐसा लगता कि केन्द्र सरकार को अलगाववादियों और भ्रष्टाचारियों से कोई शिकायत नहीं है अपितु वह उनके संरक्षक के रूप में काम करती है। सम्पूर्ण खाडी के देशों में बेईमान तानाशाहों को उनके अत्याचारों के बावजूद हटना पड रहा है। सरकार को इससे सबक लेना चाहिये।

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